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Monday, June 23, 2008

समझने में तर्क नहीं है.

तर्क से हम कुंठित होने की जगह में पहुँचते हैं। हर मनुष्य में जो सुखी होने की प्यास है - उसको पहचान लेने पर उसको पूरा करने के लिए जो अध्ययन करना है, वह हम करने में लगते हैं। सकारात्मक भाग को लेकर प्यास हर व्यक्ति में बना हुआ है।

वैदिक विचार में निषेध का प्रयोग करके कहा गया की उससे हर व्यक्ति में विधि का उदय होगा। अर्थात - यह सच्चाई नहीं है, यह भी सच्चाई नहीं है - इस तरीके से वैदिक विचार का presentation रहा। इस तरह यह सोचा गया था की ऐसे करते करते एक ऐसी जगह में पहुँच जायेंगे, जिसमें हम केवल "जो सच्चाई है" - उस तक पहुँच जायेंगे। वह प्रमाणित नहीं हो पाया।

मध्यस्थ-दर्शन का approach है - "जो है" उसका अध्ययन करना। अस्तित्व ही है - उसी का अध्ययन करना। सम्पूर्ण अस्तित्व क्यों है, और कैसा है - यह स्पष्ट होना। अस्तित्व में ही अविभाज्य मानव क्यों है, और कैसा है? इसके अलावा कुछ बचता नहीं है। इसके बाद अध्ययन का अध्याय ही ख़त्म।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७)

Friday, June 20, 2008

हर कर्म फलवती होता है.

हर क्रिया का फल होता हैं। हर व्यव्हार का फल होता हैं। हम जो कुछ भी कर्म करते हैं, सोचते हैं, बोलते हैं - उससे या तो समस्या होगा या समाधान होगा। तीसरा कोई कर्म का फल नहीं होता।

जागृति की दिशा पकड़ने के बाद श्राप, ताप, और पाप तीनो ख़त्म हो जाते हैं। जागृति के पास आने से पहले पूर्व कर्मो का फल जीवन भोग चुकता हैं। जिस क्षण से हमारी प्रवृत्ति सही की ओर हो जाती हैं, उसी क्षण से हमारे द्वारा पूर्व में की गयी गलतियों का प्रभाव हम पर ख़त्म हो जाता हैं।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

ज्ञान की बात

शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध इन्द्रियों का जो ज्ञान है - वह किसको होता है? शरीर को होता है, या शरीर के अलावा और किसी को होता है? विगत में ज्ञान, ज्ञाता, और ज्ञेय ब्रह्म को ही बताया। साथ ही ब्रह्म को अव्यक्त और अनिर्वचनीय बता दिया। अब ज्ञान जो वचनीय भी हो, हम समझ भी सकें, समझा भी सकें - ऐसे हमको चलना है। ज्ञान का मतलब ही यही होता है - जो मैं समझ सकता हूँ, और जो मैं समझा पाता हूँ।

यहाँ एक समीक्षा हो सकती है - विगत ने हमको क्या दिया? विगत से आयी आदर्शवाद और भौतिकवाद (बनाम विज्ञान) ने हमको क्या दिया? आदर्शवाद ने हमको शब्द-ज्ञान दिया - जिसके लिए उसका धन्यवाद है। भौतिकवाद (विज्ञान) ने सभी तरह के time और space के नाप-तौल की विधियां दी, जिससे कार्य (work) को पहचाना गया - जिसके लिए उसका धन्यवाद है। अब बाकी और क्या ज्ञान की ज़रूरत है? धरती बीमार हो गयी है - अब आदर्शवाद और भौतिकवाद से इसका कोई रास्ता निकल नहीं रहा है, इसलिए हमको इनके आगे समझने की ज़रूरत है। यही reference point है - मध्यस्थ-दर्शन का अध्ययन शुरू करने के लिए। "आवश्यकता" के अर्थ में एक reference रखना पड़ेगा। यदि आवश्यकता ही नहीं है - तो हम अध्ययन क्यों करेंगे? इस reference को भूलना नहीं। यदि reference को नहीं रखते तो time और space का निर्णय कैसे करोगे? इस reference के आधार पर पता चलता है, हमने इतने time और space में क्या किया। उसी के आधार पर हम कार्य (work) को तय करते हैं।

कार्य की पहचान भी ज्ञान ही है - क्रिया-ज्ञान के रूप में। ज्ञान और क्रिया में क्या अन्तर है? भौतिक संसार में कार्य-ऊर्जा होती है - तभी तो भौतिक संसार क्रियाशील है। यह मूल ऊर्जा व्यापक ही है। मनुष्य में कार्य-ज्ञान ही कार्य-ऊर्जा है। मनुष्य में "कार्य-ज्ञान" होता है - यह बात परम्परा में आ चुकी है। इसी के आधार पर हम कार्य के लिए प्रशिक्षण लेते हैं। अब कार्य-ज्ञान के मूल में जो प्रवृत्ति है - उसे हम "ज्ञान" कह रहे हैं। यह वही मूल ऊर्जा है। यह वही साम्य ऊर्जा है। मानव में यह ऊर्जा ज्ञान के स्वरुप में जुड़ा है। "होने" के आधार पर साम्य-ऊर्जा, "रहने" के आधार पर कार्य-ऊर्जा।

इस बात को अच्छे से डूब के समझ लो! यह point यदि miss होता है, तो हम पुनः पटरी से उतर जायेंगे।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

Thursday, June 19, 2008

ज्ञानावस्था का वैभव

सत्ता व्यापक होने के आधार पर नियति-विधि से सह-अस्तित्व में उद्देश्य बनी - चारों अवस्थाओं का प्रमाणित होना। चौथी अवस्था (ज्ञानावस्था) में सह-अस्तित्व सहज प्रमाण में ही परम्परा बनती है। यही ज्ञान-अवस्था का वैभव है। यही जागृति का मतलब है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

प्रस्तावना, समीक्षा, निर्णय

अनुभव मूलक विधि बात-चीत करने के तीन ही column हैं।

(१) प्रस्तावना
(२) समीक्षा
(३) निर्णय

प्रस्तावना का मतलब है - अपनी बात को रखना। प्रस्तावना के रूप में विद्या की किसी भी बात को रखा जाए। उसको जांचने का अधिकार सामने वाले व्यक्ति के पास है। उसी तरह हर सुनी हुई बात को प्रस्तावना के रूप में ही लिया जाए, उसको दूसरे की अवहेलना/विरोध करने के लिए नहीं लिया जाए।

शुभ जो घटित नहीं हुआ - अपेक्षा ही रह गया, उसकी समीक्षा होती है। जो प्रमाणित हो गया उसका ही मूल्यांकन होता है। यदि जिसकी समीक्षा कर रहे हैं, उससे भविष्य में अपेक्षा नहीं रखते, तो वह विरोध ही हो जाता है।

तीसरा बात-चीत का कालम है - निर्णय। निर्णय होता है - कार्य-योजना के अर्थ में। इसका मतलब हम किस तरह अपनी समझदारी को प्रमाणित करेंगे, इस बात का निर्णय होता है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

व्यवस्था का आधार परिवार है.



मध्यस्थ-दर्शन से मानवीय-व्यवस्था का आधार परिवार है, यही निकलता है।

इससे पहले व्यवस्था का आधार "राजा" बताया था। जो असफल हुआ। राजा लोगों के तौर-तरीकों को लोग पहचान गए, और उनको नकार दिए।

उसके बाद व्यवस्था का आधार "सभा" बताया। सभा में सब चोर हो गए! वह भी असफल हो चुका है।

व्यवस्था का मूल बीज परिवार ही है। समाधान-समृद्धि का प्रमाण - व्यवस्था का पहला बीज रूप परिवार ही है। इस जगह में मार्क्स नहीं पहुँचा, इस जगह में मनु (मनु धर्म-शास्त्र) नहीं पहुँचा, इस जगह में ऐडम स्मिथ नहीं पहुँचा। इस जगह में आज तक कोई नहीं पहुँचा।

परिवार देश की व्यवस्था का आधार हो सकता है, यह अभी तक किसी देश में नहीं है।

मैं एक अकेला आदमी, नगण्य आदमी, इसको पहचानने का संयोग मिला - उसको मैं उत्सव मानू कि नहीं मानू?

व्यवस्था का आधार परिवार है, न कि सभा, न कि व्यक्ति। अब मैं यह सोचता हूँ, (१) एक ग्राम में स्वराज्य व्यवस्था प्रमाणित करना, (२) एक कक्षा-१ से १२ तक एक विद्यालय प्रमाणित करना (इस समझ पर)। ये दो रिक्त स्थालियाँ हैं अभी। इन दो जगह प्रमाणित होने के बाद यह दावानल है। इस बात की आवश्यकता है - यह ध्वनी के रूप में पहुँच रहा है। आंशिक रूप में यह उत्साह के रूप में भी दिखता है। involvement की बात उसकी आन्शिकता में दिखता है।

शहरी जिन्दगी में शिक्षा में प्रमाणित होना निकटवर्ती है।
ग्रामीण जिंदगी में व्यवस्था में प्रमाणित होना निकटवर्ती है।

इसकी आवश्यकता तो आ गयी है। इस को आप कैसे अपनाओगे यह आप के ऊपर निर्भर है। तकनीकी तो आप के पास है!

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

शब्द का अर्थ

शब्द का अर्थ होता है।
अर्थ के मूल में अस्तित्व में वस्तु होता है।
वस्तु को इंगित करना ही शब्द का काम है।
उसको पहचान लेना व्यक्ति का काम है।
पहचान लिया = समझ में आया।
नहीं पहचाना = समझ में नहीं आया।
पहचान पूरा हो जाना = अध्ययन पूरा होना।
अध्ययन पूरा होना = सह-अस्तित्व रुपी अस्तित्व में बोध संपन्न होना।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)