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Thursday, September 28, 2017

इतिहास - मध्यस्थ दर्शन के दृष्टिकोण से



प्रश्न:  इतिहास के बारे में आपका क्या दृष्टिकोण है?  क्या इतिहास से हम कुछ सबक ले सकते हैं?  इतिहास का सही स्वरूप क्या है?

उत्तर:  अभी तक मानव परंपरा कैसा गुजरा, उसकी समीक्षा को स्मरण करने की विधि इतिहास है.  जो बीत चुका है उसको स्मरण में लाने की विधि इतिहास है.  इस इतिहास के अनेक आयाम हैं.  जैसे - आर्थिक विधा में हज़ार साल पहले मानव क्या समझा और किया?  राज्य को कैसे समझा?  हज़ार साल पहले किसको 'न्यायिक संविधान' समझा? उस समय अलंकार का क्या स्वरूप होता था?  कैसे नाचता रहा, गाता रहा, भाषा का प्रयोग करता रहा?

अभी इतिहास में केवल मार-काट किसने, कब और कैसे किया - यही याद करते हैं.  देवासुर संग्राम की कथाएँ तो शुरुआत से ही लिखी हैं.  वैदिक ऋचाओं में भी इनको बढ़िया से लिखा हुआ है.  किसने, कैसे, किसको मारा-काटा.  इससे हम क्या सीखें?  क्या समझें?  "मानव इतिहास" के लिए कोई प्रस्तुति यहाँ से मिलता नहीं है. 

मेरे अनुसार अभी तक "मानव" का इतिहास शुरू ही नहीं हुआ है.  सम्मानजनक भाषा प्रयोग करें तो यही कहना बनता है.  अमानवीयता के इतिहास को यदि आप मानव का इतिहास कहना चाहें तो हमको इसमें कोई तकलीफ नहीं है.  एक नारियल उसमे मैं भी चढ़ा दूंगा! 

मानवीयता का इतिहास इस धरती पर अभी तक शुरू नहीं हुआ है - यह तो बात सही है.  राक्षस मानव और पशु मानव के इतिहास को पढ़ करके कोई "मानव" तो होने वाला नहीं है.

अभी तक के घटना-क्रम से सार्थक यही है - उन्होंने मानव शरीर परंपरा को बनाए रखा.  अध्यात्मवाद ने हमको अच्छी भाषा/शब्दों को दिया, उसके लिए भी हम उनके कृतज्ञ हैं.  व्यापक कोई वस्तु होता है, यह सूचना दिया है.  देवी-देवता श्रेष्ठ होते हैं - यह सूचना दिया है.  तीसरे, मानव सदा से शुभ चाहते रहे - इसके लिए हम कृतज्ञ हैं.

प्रश्न:  तो क्या हम इतिहास को पढ़ाना बंद कर दें?

उत्तर:  नहीं, ऐसा कुछ नहीं कहा है मैंने.  हम पढ़ाएंगे - जंगल युग से पाषाण युग, पाषाण युग से धातु युग, धातु युग से कबीला युग, कबीला युग से ग्राम युग तक मानव किस बात को समझदारी (ज्ञान) मानता रहा?  उस समझदारी को आर्थिक आयाम में उसने कैसे प्रयोग किया?  मानव-मानव के बीच व्यवहार में कैसे प्रयोग किया?  जंगल-ज़मीन के साथ अपनी शक्तियों को कैसे उपयोग किया? और उसका परिणाम क्या निकला?  इसी के अंतर्गत राज्य, संस्कृति, कला, अलंकार आदि आ जाता है.  उसके बाद राज युग में क्या आश्वासन मिला, यह आश्वासन कितना सार्थक हुआ?  युद्ध और मार-काट को हम नहीं पढ़ायेंगे.  हम यह पढ़ाएंगे - जंगल युग से राज युग तक प्रगति की क्या कड़ियाँ बनी?  राक्षस मानव और पशु मानव के संघर्ष में मानव कैसा परेशान हुआ?  यहाँ से आज मानवीयता के इतिहास को शुरू करने तक कैसे आ गया?  यह हम पढ़ाएंगे.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी)

Wednesday, September 6, 2017

श्रम-गति-परिणाम




सत्ता मूल ताकत है.  जो सभी वस्तुओं में पारगामी है.  सत्ता में भीगे होने के आधार पर हर वस्तु बल संपन्न है और कार्यशील होने के लिए प्रवृत्त है.  कार्यशील होने के लिए वस्तु में आकर्षण और प्रत्याकर्षण का योग होना आवश्यक है.

परमाणु में क्रिया का मतलब ही श्रम-गति-परिणाम है.  श्रम-गति-परिणाम पूर्वक प्रत्येक परमाणु में आकर्षण-प्रत्याकर्षण के योगफल में उत्सव होता ही रहता है.  हर इकाई के अंग-अवयवों के बीच ऐसा आकर्षण-प्रत्याकर्षण होता ही रहता है.  जैसे - आपके शरीर में आँख के साथ हाथ, हाथ के साथ पाँव - इनके बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक ही उनकी कार्य गति है.  जबकि आपका शरीर एक ही है.  उसी तरह परमाणु एक ही है, पर उसमें श्रम, गति और परिणाम - ये तीनो उसकी क्रिया की व्याख़्या करते हैं.  श्रम और गति के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने पर कार्य-गति का स्वरूप (परिणाम) बनता है.  गति और परिणाम के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने से कार्य-गति का स्वरूप (श्रम) बनता है.  श्रम और परिणाम के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने से कार्य-गति का स्वरूप (गति) बनता है.  क्रिया नित्य अभिव्यक्ति है, नित्य प्रकाशमान है - यह कहीं रुकता ही नहीं है.  इसकी रुकी हुई जगह को कहीं/कभी पहचाना नहीं जा सकता।  यह निरंतर है.  परस्परता में ही गति की बात है.  परस्परता नहीं तो गति की कोई बात ही नहीं हो सकती।  विकासशील परमाणुओं में कम से कम दो अंशों का गठन है, जिनमे आकर्षण-प्रत्याकर्षण और उसके फलन में कम्पनात्मक गति और वर्तुलात्मक गति बना ही रहता है.  कम्पनात्मक गति और वर्तुलात्मक गति परमाणु की कार्यशीलता का ही स्वरूप है.  हर परमाणु कार्यरत है - ऊर्जा सम्पन्नता वश, बल सम्पन्नता वश, चुम्बकीय बल सम्पन्नता वश.  परमाणु में क्रियाशीलता के लिए स्वयं में ही प्रेरणा-विधि और कार्य-विधि बनी है.   जड़ परमाणुओं में श्रमशीलता भी है, गतिशीलता भी है, परिणामशीलता भी है.  ये तीनो - श्रमशीलता, गतिशीलता, परिणामशीलता - एक दूसरे के लिए प्रेरक हैं.

मात्रा (इकाई) की पहचान क्रिया सहित ही है.  क्रिया के बिना मात्रा की पहचान नहीं है.  कुछ भी निष्क्रिय मात्रा आप नहीं पाओगे.  क्रिया का व्याख्या जड़ संसार में श्रम-गति-परिणाम है.  चैतन्य संसार में भ्रम और जागृति स्वरूप में क्रिया है.  श्रम, गति, परिणाम स्वरूप में जड़-क्रिया और भ्रम-जागृति स्वरूप में चैतन्य क्रिया है.  और कुछ होता नहीं।  इस अनंत संसार की सम्पूर्ण क्रिया मूलतः इतना ही है.

क्रिया ऊर्जा-सम्पन्नता वश है.  सत्ता ऊर्जा है.  सत्ता पारगामी है.  सत्ता को अवरोध करने वाली एक भी वस्तु नहीं है.  पहले इस सत्य को अपनी अवधारणा में लाओ.  क्रिया एक-एक इकाइयों के रूप में है.  एक-एक होने से आशय है, उसके सभी ओर सत्ता है.  प्रत्येक एक के सभी ओर सत्ता का होना ही 'सीमा' है.  हरेक एक सीमित रूप में रचित है.  इकाई के सभी ओर  सत्ता का होना ही उस इकाई की नियंत्रण रेखा है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी आश्रम, सितम्बर १९९९)

Monday, August 7, 2017

जाँचने का मतलब

अध्ययन कराने वाला "प्रवर्तनशील" होता है.  प्रवर्तनशीलता = मनुष्य की प्रवृत्ति को ध्यानाकर्षण करना।  अध्ययन जो करा रहा है उसको सही "मान" करके आप अध्ययन शुरू करते हैं.  वह ज्ञान, विवेक, विज्ञान को लेकर जो प्रस्तावित करता है, उसको जाँचा जाए.  जाँचने के क्रम में कुछ समझ नहीं आता है तो उसको प्रवर्तनशील व्यक्ति समझाने की ताकत रखता है.  उसको स्पष्ट कर लिया जाए.  जाँचने के बाद यदि कुछ गलत निकलता है तो उस पर चर्चा या परामर्श हो सकता है.

 "सत्य यही है" - आपको मेरा ऐसा कहना अजीब लग सकता है, क्योंकि आपका अब तक ऐसा सुनने का अभ्यास  नहीं है.

प्रश्न: ज्ञान को जाँचने से आपका क्या आशय है?

उत्तर:  ज्ञान से प्रयोजन पूरा होता है या नहीं - जाँचने का मतलब यही है.  प्रयोजन है - अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था।  पहले यह सोचिये कि अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था चाहिए या नहीं चाहिए?  फिर यह सोचिये कि उसके लिए यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है या नहीं?  अध्ययन पूर्वक हम इस जगह पर आ जाते हैं कि यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है.  यदि इस जगह नहीं आ पाते हैं तो इस प्रस्ताव के अनुसार कोई नहीं चलेगा।  हम बात करते ही रह जाएंगे युगों तक!  अध्ययन में पूर्णतया तत्पर होना ही होगा।

मूल से फल और फल से मूल तक जाँचा जाए.  मूल ज्ञान है.  फल व्यवस्था है.  इन दोनों के साथ तालमेल बनता है या नहीं - इसको जाँचा जाए.  जाँचने का अधिकार हर मानव में कल्पनाशीलता स्वरूप में रखा है.  मूल तक जाने के लिए अध्ययन है.  फल तक जाने के लिए व्यवहाराभ्यास और कर्माभ्यास है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अछोटी)

Tuesday, July 4, 2017

जानने का प्रमाण ही मानना है.


अनुभव की रौशनी और स्मरण - इन दोनों के बीच में वस्तु-बोध होता है.  इसी का नाम अध्ययन है.

मानव के करने, सोचने, बोलने और प्रमाणित करने में उसके तृप्त होने की स्थिति का नाम अनुभव है.

हम जो बोध किये और जो प्रमाणित किये इन दोनों में तृप्ति को पाना ही समाधान है.

कारण के अनुसार कार्य और कार्य के अनुसार कारण हो जाना तृप्ति है, वही समाधान है.

कार्य और कारण की परस्पर तृप्ति, विचार और कार्य की परापर तृप्ति, विचार और निर्णय की परस्पर तृप्ति, पाए हुए ज्ञान और उसके वितरण में तृप्ति - (अनुभव मूलक विधि से) ये तृप्तियाँ मिलती रहती हैं, इस तरह मानव के निरंतर तृप्ति का रास्ता बना हुआ है.  जबकि भ्रमवश हम अतृप्ति को अपने जीने का घर बना लिए हैं.

जीवन के दो अवयवों के बीच जो संगीत होता है, वही तृप्ति है.

जानना मानने के अनुसार हो, मानना जानने के अनुसार हो - वह तृप्ति है.  दूसरे - जानना मानने का विरोध न करे और मानना जानने का विरोध न करे - वह तृप्ति है.

जानने वाला भाग मानने वाले भाग को स्वीकार रहा है और मानने में जानना स्वीकार हो रहा है - यह तृप्ति बिंदु अनुभव है.  इसी तरह मानने और पहचानने में तृप्ति, पहचानने और निर्वाह करने में तृप्ति.

जो जाने-माने हैं उसी को हम पहचानने-निर्वाह करने में हम प्रमाणित करते हैं.

जानने की वस्तु है - सहअस्तित्व, विकास क्रम, विकास, जागृतिक्रम और जागृति.  जो हमने जाना उसको प्रमाणित करने के तरीके के साथ ही उसको 'मानना' होता है.  जानने और मानने के तृप्ति-बिंदु तक पहुँचते हैं तो हम प्रमाणित करने में सफल हो जाते हैं.

जानने की प्रक्रिया है अध्ययन.  अध्ययन करने के क्रम में हम इस स्थिति में आ जाते हैं कि "मैं प्रमाणित कर सकता हूँ" - तब हम "मान" लिए.

प्रश्न: "जानने" और "मानने" की बीच क्या दूरी है?

उत्तर:  जानने  और मानने के बीच दूरी हमारी बेवकूफी ही है!  यदि दूरी है तो जाने ही नहीं है.  जानने का प्रमाण ही मानना है.  यह आज के बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोगों पर बड़ा प्रहार लग सकता है.

जानने का प्रमाण मानना है. मानने का प्रमाण पहचानना है.  पहचानने का प्रमाण निर्वाह करना है.  निर्वाह करने का प्रमाण में प्रमाण को पुनः जानना है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९७) 

Sunday, June 25, 2017

साथी-सहयोगी सम्बन्ध में न्याय

प्रश्न: हम इस दर्शन के अध्ययन-अभ्यास क्रम में समृद्धि को प्रमाणित करने के प्रयास में कृषि कार्य कर रहे हैं.  हमारे सहयोग के लिए कुछ लोग आते हैं, जिनको हम यहाँ के अभी के रेट के अनुसार पारिश्रमिक देते हैं.  हमको कई बार लगता है वह उनके लिए बहुत कम है.  तो क्या करें?  

उत्तर:  आपको लगता है कम दे रहे हैं, तो ज्यादा दे दो!  यही उसका उत्तर है.

प्रश्न: पर ज्यादा देने की भी हमारी हैसियत नहीं है... फिर क्या करें?

उत्तर: यदि नहीं दे सकते हैं तो ऐसे मान कर शुरू करें, अभी जो मान्यता है उसके अनुसार हम देंगे.  अभी परंपरा में जितना देते हैं उससे थोड़ा ज्यादा, अपनी हैसियत के अनुसार,  दे दिया और संतुष्टि पा लिया - ऐसे चल सकते हैं.  आगे उनके समझदार होने पर उनके साथ समानता और भागीदारी करेंगे.

प्रश्न:  क्या हम सहयोग न लें?

उत्तर: सहयोग न लें यह कौन कहता है?  जैसे आपके यहाँ जोतना, बोना और काटने का काम है.  सरकार ने मानो १०० रुपया रोजी तय किया है - उसके अनुसार हमने उनको दे दिया.

मैं भी १९५० से अपने उत्पादन कार्य में सहयोग लेता रहा हूँ.  मैंने यह देखा है - १९५० में एक आदमी एक दिन में जितना काम करता था आज उसका दस प्रतिशत भी काम नहीं करता.  जबकि पैसा बढ़ा है.  उसके बावजूद मैं अपने विवेक से इसको संतुलित बना कर चलता हूँ.

प्रश्न: एक व्यापारी भी तो अपने काम के लिए सहयोगियों को रखता है, और उनको बाज़ार के रेट के अनुसार मेहनताना देता है.  तो हममे और उस व्यापारी में फर्क क्या हुआ?

उत्तर: व्यापारी केवल उनसे अपने लाभ के लिए काम निकालता है.  हमारा सहयोगी के साथ जुड़ाव उसको समझदार बनाने, या उपकार करने तक है.  सहयोगी के समझदार होने पर ही उत्पादन कार्य के फल में उनके साथ भागीदारी का सुख मिलेगा, उससे पहले नहीं.

प्रश्न: यदि उनका समझदारी की तरफ कोई रुझान नहीं हो तो?

उत्तर: तो उनके साथ अभी जो परंपरा में है उसके अनुसार चलना होगा.  दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है.

हमारे घर पर भी एक लड़का सेवा करता था.  कुछ समय हमारे साथ रहने के बाद वही लड़का समझने की इच्छा हमसे व्यक्त किया.  उसकी हमने व्यवस्था कर दिया.

प्रश्न:  परंपरा के अनुसार ही उनको देने से हमको जो असंतुष्टि होती है, उसका क्या?

उत्तर: अपनी संतुष्टि के अनुसार उनको उससे थोडा ज्यादा दे दिया, जैसे - त्योहारों पर, उत्सव पर आदि.

ज्ञान विधि से जिनका हम सहयोग लेते हैं उनके श्रम का मूल्यांकन करते हैं, यह आ पाता है तो हमे उस सम्बन्ध में संतुष्टि होता है.  यह नहीं आ पाता है तो संतुष्टि नहीं होता.

समझदार होने पर ही सहयोगी को संतुष्टि होगा, उससे पहले नहीं.  समझदारी होने पर उपयोगिता के आधार पर प्रतिफल और उससे संतुष्टि होता है.

साथी-सहयोगी सम्बन्ध में सफल होना समानता में ही है.  समझदारी में ही समानता होती है, भौतिक वस्तुओं में समानता होती नहीं है.

इसमें मूल मुद्दा है - साथी और सहयोगी दोनों को समझदार बनना.  दूसरे - सहयोगी द्वारा अपने श्रम का मूल्यांकन स्वयं करना, साथी द्वारा भी वह मूल्यांकन होना, दोनों मूल्यांकन में साम्यता होना, फलन में उभय तृप्ति होना.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २००८, भोपाल) 

Friday, June 16, 2017

अध्ययन के लिए गति

प्रश्न: हम अपने अध्ययन को गति देने के लिए क्या करें?

उत्तर: अध्ययन में रुचि पैदा हो जाए तो अध्ययन के लिए गति बनेगी।  हमारी निष्ठा हमारी इच्छा या रुचि या प्राथमिकता पर निर्भर है.  जिस बात को हम प्राथमिक मानते हैं उसमें हमारी पूरी निष्ठा रहती है.  इच्छा के तीन स्तर हैं - कारण इच्छा, सूक्ष्म इच्छा और तीव्र इच्छा।  इन तीनों स्तरों में से किसी स्तर पर हमारी अध्ययन करने की इच्छा भी है.  जो बात तीव्र इच्छा के स्तर पर आ जाती है, फिर उसको करना ही होता है - और कोई रास्ता नहीं है.  अध्ययन के लिए तीव्र इच्छा बनने के लिए अपनी 'उपयोगिता' को पहचानने की आवश्यकता है.  हम जब स्वयं "उपयोगी" हो जाते हैं तो हमारा "उपकार" करना बनता ही है.  हम स्वयं उपयोगी नहीं हैं तो हम उपकार कैसे करेंगे?

अभी आपके सामने पूरा वांग्मय है और इस वांग्मय को प्रस्तुत करने वाला जीता-जागता आदमी मौजूद है - इस नसीब को ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग किया जाए.  अपनी जिज्ञासा को स्पष्ट पहचाना जाए.  जो बात आपको स्पष्ट नहीं हुआ है, उसको मुझ से समझ लिया जाए.

मैं जो जीता हूँ, उसमे कोई समस्या नहीं है.  मेरे जीने के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े भाग में समाधान ही है. मेरी सभी करतूत से समाधान ही मिलता है, समस्या मिलता ही नहीं है.  सभी मोड़ मुद्दे पर समाधान मिलता है तो सुखी होने के अलावा और क्या होगा?  उसी तरह सबको जीना है.

प्रश्न: कैसे पता करें कि हमे इस प्रस्ताव को लेकर क्या स्पष्ट नहीं है?

उत्तर: मानव के जीने के चार आयाम हैं - (१) आचरण, (२) संविधान (विधि), (३) शिक्षा, (४) व्यवस्था।   जो बात इन चारों आयामों में समाधान प्रस्तुत करे उसको सर्वमानव के लिए सही माना जाए.  इन चारों आयामों में इस प्रस्ताव के अनुसार समाधान का सूत्र-व्याख्या हुआ या नहीं, इसको आजमाना। आजमाने का मतलब है - हम दूसरे को समझाने में सफल हुए या नहीं?  यही स्वयं को आजमाना है.  इस आजमाने से पता लगेगा क्या स्पष्ट है, क्या स्पष्ट नहीं है.

प्रश्न:  अपनी निष्ठा का कैसे मूल्याँकन करें?

उत्तर:  इस प्रस्ताव पर सोच-विचार के बाद जो योजना बनती है, उसको क्रियान्वयन करने के लिए हम क्या किये, कितना किये, यही कर रहे हैं या और कुछ भी कर रहे हैं - इसके आधार पर अपनी निष्ठा का मूल्यांकन है.

प्रश्न:  "अनुभव के लिए तीव्र इच्छा" का क्या मतलब है?

उत्तर: इसका मतलब है - अनुभव मूलक विधि से ही हम पार पायेंगे, दूसरा कोई रास्ता नहीं है.  अनुभवगामी पद्दति में तर्क कुछ दूर तक उपयोगी है, पर तर्क बोध और अनुभव तक पहुंचेगा - ऐसा नहीं है.  बोध और अनुभव अपने में होने वाला निर्धारण ही है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, भोपाल)

Wednesday, June 14, 2017

समझ के करो

हर जगह "करके समझो" के स्थान पर "समझ के करो" - चाहे उत्पादन में, या शिक्षा में, या आचरण में, या संविधान में.  समझ के करने में हम हर स्थिति में अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था सूत्र-व्याख्या में जी पाते हैं.

"समझ के करने" से व्यर्थ के प्रयोग करने से हम बच सकते हैं.  "समझ के करने" पर हर प्रयोग सार्थक होता है.

 इस तरह अच्छे ढंग से, अच्छे मन से यदि हम चलें तो उपकार कर सकते हैं.  अभी तक आरामदेहिता को खोजते हुए जो चलते रहे उसमे थोड़ा परिवर्तन होगा।  आरामदेहिता को खोजने की जगह उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता को पहचानने की जगह में हम आ जाते हैं.  इसके लिए हमको मूल्यमूलक और लक्ष्यमूलक विधि से काम करना होगा।  रूचिमूलक विधि (आरामदेहिता को खोजना) से आदमी अब तक चला है - उससे कोई उपकार हुआ नहीं।  अब (समझ के) लक्ष्यमूलक और मूल्यमूलक विधि से प्रयोग करने की आवश्यकता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, भोपाल )