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Tuesday, April 25, 2017

ईश्वरवाद की समीक्षा

जिज्ञासा के लिए सबसे बाधक तत्व यदि कोई है तो वह है "भय".  ईश्वरवाद को हम जब तक ओढ़े रहेंगे तब तक हम भय से मुक्ति नहीं पाएंगे।  ईश्वरवाद का मतलब है - "ईश्वर सब कुछ करता है."  इस भ्रम को छोड़ देना चाहिए।  ईश्वर की ताकत से ही हम सब भरे हैं, जिसको उपयोग करके हम समाधानित हो सकते हैं, समृद्ध हो सकते हैं - इस ढंग से सोचने की आवश्यकता है.  यह सहअस्तित्ववादी विचार का मूल रूप है.

ईश्वरवादी विधि में सोचा गया - "ईश्वर ही सब कुछ करता है."  इससे मानव का कोई जिम्मेदारी ही नहीं रहा.  हर क्षण ईश्वर से डरते रहो, डर के ईश्वर से प्रार्थना करते रहो.  जो कुछ भी हो रहा है, उन्ही की मर्जी से हो रहा है - ऐसा मानो।  मर गए तो इसका मतलब है ईश्वर रूठ गए.  जी गए तो ईश्वर की कृपा रही.  ऐसी हम व्याख्या देने लगे.  इस तरह डर-भय में जीने वाली बात ईश्वरवाद से आयी.

आदर्शवादी विधि से असंख्य कथाएँ लिखित रूप में आ चुकी हैं.  नर्क के प्रति भय पैदा करना, स्वर्ग के प्रति प्रलोभन पैदा करना - इसी अर्थ में सारी आदर्शवादी कथायें लिखी गयी हैं.

आदर्शवाद मानव को ज्ञानावस्था की इकाई के रूप में पहचान नहीं पाया और मानव को भी एक जीव ही कहा.  जीव में स्वाभाविक रूप से भय की प्रवृत्ति होती है, ऐसा बताये।  भय से मुक्त होने के लिए 'आश्रय' की आवश्यकता होना बताया गया.  मूल आश्रय ईश्वर होना बताया गया.  ईश्वर ही सबके भय को दूर करने वाला है, उनकी कृपा होने की आवश्यकता है - ऐसे ले गए.  इसकी दो शाखाएं निकली - पहले ज्ञान ही एक मात्र बात थी, बाद में भक्ति को भी लोकमान्यता मिली।  भक्ति से भी भय से मुक्ति हो जाती है - ऐसी परिकल्पना दी गयी.  कौन भय से छुड़ायेगा?  इस प्रश्न के उत्तर में ईश्वर के स्थान पर देवी-देवता आ गए.  देवी-देवता को प्रमाणित करने वाला कोई नहीं है, किन्तु देवी-देवता से भय-मुक्ति हो जाएगा - ऐसा सबके मन में भरे.  भय को मानव की स्वाभाविक गति बताया गया.  

कोई भयभीत आदमी ईश्वर को वर करके भय मुक्त हो गया हो, ऐसा प्रमाण मिला नहीं।  न ही कोई व्यक्ति ऐसा घोषणा कर पाया कि मैं भय से मुक्त हो गया हूँ, भय मुक्त विधि से जी रहा हूँ.  जो अपने को भय से मुक्त हो गया मानते हैं, ऐसे "सिद्ध" कहलाने वाले भी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं - "हमको भय से मुक्ति कराओ, दरिद्रता से छुडाओ!"  और जो सिद्ध नहीं हुए हैं, उनको भी ऐसे ही प्रार्थना करना है!  फिर क्या फर्क पड़ा?

ईश्वर है तो वह वस्तु क्या है?  ईश्वर वस्तु (जो कोई वास्तविकता को व्यक्त करे) है या केवल शब्द या भाषा ही है?

ईश्वरवादी विधि में शब्द को प्रमाण माना, वस्तु को प्रमाण माना ही नहीं!  यह ऐसा ही है, जैसे मैं आपको कहूं आप गौण हैं, आपका नाम प्रधान है.  इस प्रकार की बातें आने से मानव और गुमराह हो गया.  मैं अपनी मूर्खता वश, या हठ वश, या परिस्थिति वश, या स्वविवेक वश, या नियति वश कहीं न कहीं इसको लांघ गया.  मैंने सोचा - यह तो कहीं गड़बड़ है, इसकी स्पष्ट रूपरेखा होना आवश्यक है.

ईश्वरवाद के अभ्यास, साधना, योग आदि उपक्रमों से मैं गुजरा हूँ.  मैंने यह निष्कर्ष निकाला - ये सारे उपक्रम, अभ्यास विधियों का उपयोग करना कोई अनुचित नहीं है यदि समझदारी को प्राप्त करना लक्ष्य हो तो.  यदि समझदारी लक्ष्य नहीं है, केवल पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, जप-तप आदि करने को ही समझदारी का प्रमाण बताना चाहेंगे तो वह सार्थक नहीं होगा।

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)   

जीवन बल और शक्ति

Sunday, April 23, 2017

ध्यान देना होगा

प्रश्न:  ज्ञान यदि हमको "प्राप्त" ही है तो वह हमारे अनुभव में कैसे नहीं है, हम इसको प्रमाणित क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

उत्तर: "प्राप्त" को पहचान सके इसीलिये अध्ययन है.  प्राप्त ज्ञान में अनुभव करने के लिए अध्ययन को जोड़ दिया.  जो "है" - उसी का अध्ययन कर सकते हैं.  जो "है ही नहीं" - उसका कैसे अध्ययन करोगे?  अध्ययन की प्रक्रिया मानव परंपरा में उपलब्ध नहीं थी - उसको जोड़ दिया.

सत्ता में सम्पृक्तता (भीगे रहना) ही जीवन में ज्ञान के प्राप्त रहने का आधार  है.  जीवन को ज्ञान प्राप्त करने के लिए "प्रयत्न" नहीं करना पड़ता.  ज्ञान प्राप्त रहता ही है.  ज्ञान से संपन्न होने के लिए मानव को कोई प्रयत्न नहीं करना है.  प्राप्त ज्ञान को कार्य रूप में परिणित करने के लिए मानव को प्रयत्न करना होता है.  शरीर द्वारा ज्ञान को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करने के लिए पूरा अध्ययन है.  अध्ययन ही अभ्यास है, साधना है.

अध्ययन एक synchronization प्रोग्राम है, उसको प्रगट करना एक expansion प्रोग्राम है.  समझने में एक बिंदु तक पहुँचने की बात है.  Expansion अभिव्यक्ति में है.  समझने की विधि में expansion को लगाओगे तो कभी समझ नहीं आएगा.  इसी में रुका है.  अध्यवसायिक विधि में या intellectually रुकावट वहीं है.  नहीं तो अभी तक पार ही न पा जाते!  Synchronization की जगह Expansion को लगा देते हैं - यहीं रुका है.   आप अपना शोध करोगे तो यही पाओगे.  ७०० करोड़ आदमी अपने को शोध करें तो यही पायेंगे.  आप शोध ही नहीं करें तो हम नमन के अलावा क्या कर सकते हैं?

प्रश्न:  Synchronization की जगह Expansion में न जाएँ, इसके लिए हम क्या करें?

उत्तर:  ध्यान देना होगा.  अध्ययन के लिए ध्यान देना होता है, अनुभव के बाद ध्यान बना रहता है.  मन लगाना ही ध्यान देना है.  मन लगेगा तो अध्ययन होगा, मन नहीं लगेगा तो अध्ययन नहीं होगा - किसी का भी!  जैसे - मेरा  अनुसंधान करने में मन लगा, तभी मैं अनुसंधान कर पाया.  मेरा मन नहीं लगता तो मैं कहाँ से अनुसंधान करता?  उसी तरह अध्ययन के लिए भी मन लगाना पड़ता है.  मैंने तीस वर्ष मन लगाया - आप तीस दिन तो मन को लगाओ!  आप तीन वर्ष तो मन को लगाओ! 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अछोटी, जुलाई २०११)

Tuesday, April 18, 2017

भाषा की शैली

प्रश्न: आपकी भाषा शैली के बारे में कुछ बताइये.  हम दर्शन को दूसरी भाषाओँ में ले जाते समय किन बातों का ध्यान रखें?

भाषा अपने में स्वतन्त्र नहीं है, मानव द्वारा रचित शैली द्वारा नियंत्रित है.  शैली का एक आयाम है - कर्ता, कारण, कार्य, फल-परिणाम इनमे से किसको महत्त्व या प्राथमिकता देनी है उसको पहले रखना.  दर्शन में कारण को महत्त्व दिया है.  वाद में कर्ता को महत्त्व दिया है.  शास्त्र में कार्य को महत्त्व दिया है.  संविधान में फल-परिणाम को महत्त्व दिया है.

लिंग के आधार पर विभक्तियों को कम या समाप्त कर दिया.  इस प्रस्ताव को दूसरी भाषाओँ में ले जाते समय इस बात का ध्यान रहे.

प्रश्न:  शैली क्या समय के साथ बदलती है?

मूल वस्तु बदलता नहीं है, उसको बताने का तरीका समय के साथ बदल जाता है.

प्रश्न:  आपने अपनी समझ को बताने के लिए शब्दों का चुनाव कैसे किया?

उत्तर:  मैंने जब वस्तु को देखा तो उसको बताने के लिए नाम अपने आप से मुझ में आने लगा.  शब्द को मैंने बुलाया नहीं, शब्द अपने आप से आने लगा.  उसमें से एक शब्द को लगा दिया.

मैंने प्रयत्न पूर्वक इस दर्शन को व्यक्त किया, ऐसा नहीं है.  यह स्वाभाविक रूप में हुआ.  समझने के बाद सबको ऐसा ही होगा.  समझ के लिखा जाए तो लाभ होगा.

-श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Thursday, April 13, 2017

रोटी, बेटी, राज्य और धर्म

मानव जाति अनेक समुदायों में अभी बँट गया है.  इन समुदायों का एक दूसरे के साथ कोई तालमेल नहीं है.  सबका अपने ढंग का नाच-गाना, अपने ढंग का पहनावा, अपने ढंग का रहन-सहन, अपने ढंग का खान-पान.

अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था के लिए रोटी, बेटी, राज्य और धर्म में एकता होना जरूरी है.  अभी मानव इस जगह में नहीं है.  इसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है.  चेतना विकास - मूल्य शिक्षा इसको जोड़ता है.  

रोटी-बेटी में एकता होने पर हम अखंड-समाज का अनुभव करते हैं.  

प्रश्न:  "रोटी-बेटी में एकता" का क्या अर्थ है?

उत्तर:  "रोटी में एकता" का मतलब है - हम सब मानव साथ में एक प्रकार के आहार को खा सकें।  आज की स्थिति में सबकी रोटी (आहार) अलग अलग है.  रोटी में एकता के लिए मानव को अपनी आहार पद्दति को तय करना होगा।  ऐसा आहार शाकाहार ही हो सकता है.  "बेटी में एकता" का मतलब है - हम किसी भी परिवार में विवाह सम्बन्ध तय कर सकें।  ऐसा हुए बिना "अखंड समाज" हुआ - कैसे माना जाए?  रोटी-बेटी संस्कृति-सभ्यता से जुड़ी बात है.

प्रश्न: राज्य और धर्म में एकता होने का क्या अर्थ है?

उत्तर: राज्य नीति  (तन मन धन रुपी अर्थ की सुरक्षा) और धर्म नीति (तन मन धन रुपी अर्थ का सदुपयोग) विधि (क़ानून) और व्यवस्था से जुड़ी हैं.  राज्य और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं.  राज्य के बिना धर्म और धर्म के बिना राज्य नहीं हो सकता।  

अभी हर राष्ट्र अपनी सीमा के अंतर्गत अपनी-अपनी विधि और व्यवस्था की बात करता है.  भारत भी करता है.  नेपाल भी करता है.  हर राष्ट्र विखंडित होता गया है.  एकता को लेकर काम ही नहीं किया।  अभी ऐसा सोचते हैं - विखंडित करने से हम ज्यादा प्रगति करते हैं.  सार्वभौम व्यवस्था के लिए धरती को एक "अखंड राष्ट्र" के रूप में पहचानना होगा। 

सार्वभौम व्यवस्था (अखंड राष्ट्र) स्वरूप में राज्य के पहुँचने के लिए "अखंड समाज" होना बहुत आवश्यक है.  अखंड समाज के बिना सार्वभौम व्यवस्था होगा नहीं।

प्रश्न: हमारी इस विखंडनवादी सोच से तो "अखंड समाज" भी कैसे बनेगा?  फिर रास्ता क्या है?

उत्तर:  विखंडनवादी सोच ही संयुक्त परिवार से एकल परिवार (nuclear family) की ओर ले गया.  मियाँ-बीवी  राजी रहें - इतने से अखंड समाज होता हो तो कर लो!  अखंड समाज सर्वमानव के साथ होता है.  उसके लिए एकल परिवार में जीना क्या पर्याप्त होगा?  

अखंड समाज के लिए सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में संबंधों को पहचानना होगा।  सभी मानव सम्बन्धी हैं.  कम से कम मित्र सम्बन्ध सबके साथ है.  सम्बन्ध के आधार पर पहचान और मूल्यों का निर्वाह।  मूल्यों का निर्वाह ही निष्ठा है.  पहले परिवार में व्यवस्था और परिवार में न्याय।  उससे पहले मानव में स्वयं में विश्वास।  समझदार होने, समाधान संपन्न होने, समृद्धि को प्रमाणित करने योग्य होने - ये तीनों के जुड़ने से स्वयं में विश्वास होता है.  

इसका रास्ता शिक्षा है.  हर स्नातक को इन तीनों के योग्य बनाना हम चाह रहे हैं.  समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने से ही मानवों में एक दूसरे के भय से मुक्ति की बात होती है.  यह अभयता ही अखंड समाज का स्वरूप है.  

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

Tuesday, March 7, 2017

विकीरणीय पदार्थ का धरती पर प्रयोजन

प्रश्न: विकीरणीय पदार्थ क्या हैं और उनके धरती पर प्रकटन का क्या प्रयोजन है?

उत्तर: अजीर्ण परमाणुओं के रूप में विकिरणीय पदार्थ हैं.  अजीर्ण परमाणुओं का प्रभाव विकीरणीयता है. विकीरणीयता ही ब्रह्माण्डीय किरणों के रूप में काम करता रहता है.  ऋतु संतुलन का आधार यही है.  पानी बनने का आधार यही है.  धरती पर जलने वाले पदार्थ और जलाने वाले पदार्थ के योग से प्यास बुझाने वाले पदार्थ के बनने में विकीरणीय पदार्थ उत्प्रेरक (catalyst) है.  जो वस्तु प्राकृतिक रूप में पानी बनने का आधार है, वह मानव के हस्तक्षेप से यदि विघटित/विखंडन करने का आधार बन जाए तो कितना देर लगेगा पानी को धरती से समाप्त होने में?  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)

साम्य सत्ता, कार्य ऊर्जा, प्रकटन और प्रवृत्ति



साम्य सत्ता एक दूसरे के बीच खाली स्थली के रूप में सब जगह दिखता है.  दो व्यक्तियों के बीच में तो यह है ही - इससे इस बात का अनुमान कर सकते हैं यही वस्तु दो धरती के बीच में भी है, दो जानवरों के बीच में, दो अणुओं, दो परमाणुओं, दो परमाणु अंशों के बीच में भी है.  दो इकाइयों के बीच में सत्ता होने का प्रयोजन है - उनके एक दूसरे को पहचानने की व्यवस्था हो जाना।  एक दूसरे के बीच खाली स्थली नहीं होती तो वे एक दूसरे को पहचान ही नहीं सकते थे.  सत्ता की "पारदर्शीयता" के फलस्वरूप ही एक दूसरे को पहचानना बनता है.

सत्ता एक "प्राप्त" वस्तु है.  प्रत्येक एक में यह "पारगामी" है.  एक परमाणु अंश, परमाणु, अणु, पत्थर, धरती, मनुष्य - सबमें यह पारगामी है.  पारगामीयता के प्रमाण में ऊर्जा सम्पन्नता है.  ऊर्जा सम्पन्नता वश क्रियाशीलता है.  क्रिया करने के पहले से ही जो प्राप्त रहता है, उसका नाम है - साम्य ऊर्जा।  साम्य ऊर्जा सबको प्राप्त है.  साम्य ऊर्जा प्राप्त होने से सभी  क्रियाशील हैं.   सत्ता ही साम्य ऊर्जा है - जिसमें संपृक्त होने से जड़ चैतन्य संसार क्रियाशील है.  क्रियाशीलता के फलस्वरूप "कार्य ऊर्जा" बनती है.  उपयोगिता-पूरकता स्वरूप में कार्य-ऊर्जा है.  कार्य ऊर्जा का प्रयोजन है - एक दूसरे का विकास।  जिससे अग्रिम प्रकटन होता है.  पिछली अवस्था में अगली अवस्था का भ्रूण रूप रहता है, फलस्वरूप अग्रिम अवस्था प्रकट होता है.  सहअस्तित्व इस तरह नित्य और निरंतर प्रकटनशील है.  सहअस्तित्व के नित्य और निरंतर प्रकटनशील होने के आधार पर मानव भी प्रकट हो गया.  मानव के प्रकट होने का प्रयोजन है - वह सहअस्तित्व के प्रतिरूप स्वरूप में काम करे.  सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान के अनुरूप जीवन को सार्थक बनाये।  इससे बच के निकलने का कोई रास्ता नहीं है.

सत्ता जड़ प्रकृति को 'ऊर्जा' स्वरूप में प्राप्त है तथा चैतन्य प्रकृति को 'ज्ञान' स्वरूप में प्राप्त है.

प्रश्न: तो क्या प्रकृति में प्रकटन (पहले जड़ फिर चैतन्य) के साथ साथ सत्ता में भी प्रकटन (पहले ऊर्जा फिर ज्ञान) हो गया?  क्या सत्ता दो स्वरूप में पैदा हो गया?

उत्तर: नहीं! सत्ता एक ही वस्तु है, उसके दो नाम हैं.  जड़ के साथ उसे "ऊर्जा" कहते हैं, चैतन्य के साथ उसे "ज्ञान" कहते हैं.

जड़-चैतन्य प्रकृति सत्ता में संपृक्त है.  जड़ प्रकृति के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ऊर्जा कह रहे हैं.  चैतन्य प्रकृति (जीवन) के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ज्ञान कह रहे हैं.  ऊर्जा है, इसीलिये जड़ प्रकृति कार्यरत है.  ज्ञान है, इसीलिये चैतन्य प्रकृति कार्यरत है.  कार्यरत न हो ऐसा कोई जड़ या चैतन्य वस्तु नहीं है.


प्रश्न: चेतना क्या है?

उत्तर:  चेतना ज्ञान का ही (चैतन्य प्रकृति द्वारा) प्रकाशन है.  ज्ञान के प्रकाशन की चार स्थितियाँ हैं - जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना और दिव्य चेतना।  "चेतना विकास" अध्ययन की वस्तु बन गयी!

चैतन्य वस्तु (जीवन) अपनी "प्रवृत्ति" के अनुसार चेतना को व्यक्त करती है.  चार विषयों में प्रवृत्ति, पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति, तीन ऐषणाओं में प्रवृत्ति और उपकार में प्रवृत्ति।  प्रवृत्ति के अनुसार ये चार स्थितियाँ हैं.  चार विषयों और पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति जीव चेतना की सीमा में है.  लोकेषणा में प्रवृत्ति देवचेतना की सीमा में है.  उपकार प्रवृत्ति दिव्य चेतना की सीमा में है.

प्रश्न: प्रवृत्ति और योग्यता में क्या भेद है?

उत्तर: प्रवृत्ति के अनुसार योग्यता (प्रकाशन क्रिया) प्रकट होती है.  न कि योग्यता के अनुसार प्रवृत्ति।

प्रवृत्ति ही प्रकट होता है.  प्रकटन के अनुसार ही नामकरण है.  पदार्थावस्था एक नाम है.  प्राणावस्था एक नाम है.  जीवावस्था एक नाम है.  ज्ञानावस्था एक नाम है.  ज्ञानावस्था की प्रवृत्ति का परिशीलन करने गए तो चेतना के चार स्तर पहचान में आ गए.  प्रवृत्ति के अनुसार ही मानव जीता है.  प्रवृत्ति ही स्वभाव के रूप में आता है.

सहअस्तित्व प्रकटन क्रम में प्रवृत्ति में परिवर्तन हुआ है.  जड़ प्रकृति में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन हुआ है.  चैतन्य प्रकृति केवल गुणात्मक परिवर्तन होता है.  गठनपूर्णता पर्यन्त मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन है.  गठनपूर्णता उपरान्त केवल गुणात्मक परिवर्तन है.  गुणात्मक परिवर्तन की स्थिति के अनुसार प्रवृत्तियाँ हैं.  प्रवृत्तियों के प्रकाशन का नाम "योग्यता" है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)