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Sunday, July 10, 2016

एक महत्त्वपूर्ण संवाद



विज्ञान विधि से नापने और तौलने की विधियों को विकसित किया गया.  स्थूल और सूक्ष्म स्तर पर कितने भी नापने-तौलने के मापदण्ड निकाले, उससे जो कुछ भी निकला वह मानव को छोड़ के निकला।  नापने और तौलने की विधियों से मानव का अध्ययन नहीं हुआ.  यह हम निष्कर्ष निकाल लिए.

दूसरे, आदर्शवादी भक्ति-विरक्ति विधि से भी मानव का अध्ययन नहीं हुआ.  मानव ही मानव को समझ में न आने से मानव आवारा पशु जैसा हो गया.  पशुओं में जैसे एक सींग मारने वाला होता है और एक भागने वाला होता है - वैसा ही मानवों में भी हो गया.  उसको नाम दिया - "राक्षस मानव" और "पशु मानव".  उसके बाद पशु मानव और राक्षस मानव को एक खाते में डाला - जिसका नाम दिया "अमानव".  अमानव की प्रवृत्ति बताया, अमानव का गुण बताया, स्वभाव बताया और धर्म बताया।  साथ ही बताया कि अमानव में भी सुख की कामना है.  यह आधार है, जहाँ अभी मानव है.  यह आधार स्पष्ट करते हुए बताया कि अमानवीयता में जीते तक मानव में अपराध प्रवृत्ति से मुक्ति नहीं होगी।  न विज्ञान के नाप-तौल विधि से होगी, न आदर्शवाद के भक्ति-विरक्ति विधि से होगी।  अपराध प्रवृत्ति का स्त्रोत अमानवीयता ही है.  अमानवीयता का ही दूसरा नाम है - "जीव चेतना में जीना".

जो Concept है - उसके अनुसार उसकी भाषा होती है.  जैसे - विज्ञान में एक निश्चित अम्ल को इंगित करने के "H2SO4" भाषा का प्रयोग किया।  यह अगर आपको मुश्किल लगता है तो आप इस भाषा को बदल के देखो।  बदलोगे को तो अर्थ विहीन ही होगा।  उससे कोई प्रयोजन नहीं निकलेगा।  प्रयोजन विहीन विधि से भाषा का प्रयोग करना, कार्य करना, विचार प्रकट करना क्या सार्थक होगा?  इसी तरह मध्यस्थ दर्शन का जो Concept है, उसके अनुसार उसकी भाषा है.

इससे पहले वेद-विचार में एक भाषा का प्रयोग किया है - "सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम अप्रियं".  मतलब - सत्य को बोलो, जो प्रिय लगे ऐसे सत्य को बोलो।  जो सत्य अप्रिय लगे ऐसे सत्य को नहीं बताना।  मेरे हिसाब से प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ अमानव की प्रवृत्ति है.  तो मेरे हिसाब से वहाँ लिखा है - अमानव को जो अप्रिय हो, वह सत्य को मत बताओ।  इसका मतलब हुआ - अमानवीयता या अपराध के लिए सहमति देना!   विगत में जो लिखा है उसके अर्थ में जाओगे तो आप पाओगे उसमें बहुत अंतर्विरोध है.  इसलिए मैंने उनका पिंड ही छोड़ दिया।  जबकि मैं वेदों में ५०० ऐसी ऋचाओं को पहचानने की योग्यता रखता हूँ, जिसमें मध्यस्थ दर्शन की पूरी बात को सम्प्रेषित किया जा सकता है.  लेकिन व्यर्थ के वाद विवाद में न पड़ें, इसलिए मैंने "परिभाषा विधि" से अपनी बात को "विकल्प" स्वरूप में प्रस्तुत किया।

परिभाषा सहित मैंने जब भाषा का प्रयोग करना शुरू किया तो लोग मुझे कहे - तुम्हारा भाषा कठिन है!  मेरा उनको उत्तर है - तुमको भाषा कठिन लगती है, क्योंकि तुमको समझना नहीं है.  जो हमको समझना नहीं है, वह हमको कठिन लगता ही है.  जो समझना है, वह सब सुलभ है.


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)


Sunday, July 3, 2016

जीवन शरीर सत्ता - भाग 3




तो इस ढंग से भ्रम और जागृति की दूरी कितना है आपको पता लग गया.  जागृति होती है - अस्तित्व को सहअस्तित्व स्वरूप में समझने सेसहअस्तित्व में विकास क्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति को सटीक समझने से.

प्रश्न:  व्यापक वस्तु में तदाकार होने के लिए क्या करें?

उत्तर-  व्यापक वस्तु की महिमा समझ में आने पर ही उसमें तदाकार होना बनता है.  "व्यापक" शब्द सुनने मात्र से तदाकार नहीं होगा।  उसका महिमा ज्ञान होना आवश्यक है.  क्या महिमा?  साम्य ऊर्जा की व्यापकता, पारगामीयिता और पारदर्शीयता स्पष्ट होना।  

स्वयं में ज्ञान और ऊर्जा संपन्नता के आधार पर व्यापक वस्तु का पारगामी होना समझ में आता है.  हर वस्तु ऊर्जा सम्पन्न है, इसलिए ऊर्जा का पारगामी होना समझ में आता है.   इसको अपने में ही ज्ञान करना पड़ता है.  विवेचना करना पड़ेगा, उसको अनुभव करना पड़ेगा।  यहीं से अनुभव शुरू होता है. 

"सत्ता में सम्पृक्तता" के आधार को स्वीकारने के बाद अभी जो शरीर को जीवन मान कर जीते थे, उससे हम एक कदम आगे हो गए.  उसके बाद आगे अध्ययन  क्रम में ये चारों भाग आ गए - विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति। 

इस तरह इन चारों अवस्थाओं के संबंध में हम निर्भ्रम हो गए. जागृति के बारे में निर्भ्रम हो गए.  इसका नाम है ज्ञान संपन्नता। ऐसे ज्ञान संपन्न होने के बाद हम साम्य ऊर्जा (व्यापक वस्तु) में तदाकार होते हैं.  

पहले ऊर्जा में तदाकार होगा, ऐसा होगा नहीं है.  विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम और जागृति का समझ अध्ययन से आता है.  आकर के इसमें हम यदि जागृति को प्रमाणित करना शुरू किए तो "ज्ञान व्यापक है" ये पता लगता है.  तब मानव को अनुभव होता है कि ऊर्जा में, ज्ञान में हम तदाकार हैं ही!  मानव को साम्य ऊर्जा ज्ञान स्वरूप में प्राप्त है.  साम्य ऊर्जा में ही सब कुछ है, ज्ञान में ही सब कुछ है.  मानव को स्पष्ट होता है कि उसका सब कुछ ज्ञान के अंतर्गत है.

अध्ययन पूर्वक तीनों अवस्थाओं का दृष्टा होना, और जागृति में तद्रूप होना।

ज्ञान में तदाकार हो गए तो फलस्वरूप ज्ञान के बारे में सोचा, ज्ञान व्यापक है और ऊर्जा भी व्यापक है.  इसलिए ऊर्जा ही ज्ञान रूप में प्राप्त है.  "ज्ञान व्यापक है" ये समझ में आया. "ऊर्जा व्यापक है" ये समझ में आया. 
ये दोनों एक ही वस्तु है या अलग अलग है, इसका विवेचना होती है.  विवेचना होकर निष्कर्ष निकलता है - व्यापक वस्तु ही मानव को ज्ञान रूप में प्राप्त है.

प्रश्न- यह विवेचना जीवन के किस स्तर पर होती है?  विवेचना क्या बुद्धि की क्रिया है?

उत्तर- अनुभव के अनुरूप सोच-विचार करके निर्णय करना  = विवेचना।  अनुभव के बाद बुद्धि, चित्त, वृत्ति ये तीनों के योग में होता है विवेचना।  अनुभव के बाद होती है विवेचना।  यही विवेक है.  

तीन अवस्थाओं का दृष्टा होना अध्ययन से आता है.  तदाकार विधि से पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था क्या स्वरूप में है उसका हम दृष्टा हो जाते हैं.  तदाकार का मतलब उनमें जो क्रिया हो रही है उसका ज्ञाता हो जाना।
उनके रूप, गुण, स्वभाव और धर्म के साथ में अपने मन को लगाने पर उनका दृष्टा बन जाते हैं - उसके बाद आता है अनुभव।  अनुभव के साथ जागृति।  जागृति में जीवन के साथ और ज्ञान के साथ तद्रूप होने वाला बात आ गया.  

प्रश्न- जीवन और ज्ञान के साथ तद्रूप होने का मतलब क्या हुआ?

उत्तर- जीवन के साथ जो ज्ञान संबंध रखता है उसके साथ तद्रूप होने वाली बात आ गई.  ज्ञान जो है, वह सर्वत्र फैला हुआ है - इसका हम तद्रूप अवस्था में पाते हैं.  ज्ञान जो है, वह एक जगह में नहीं है.  अभी मानव जो ज्ञान का भाग-विभाग करना चाह रहे हैं, वह बर्बादी का काम है.  

सार रूप में - हम चारों अवस्थाओं का तदाकार विधि से दृष्टा  हुए, जिसके फलन में अनुभव की जगह में आ गए. 
शरीर के दृष्टा हो गए और अनुभव में जीवन आ गया.  अनुभव पूर्वक ज्ञान जीवन के साथ जुड़ गया.  ज्ञान को विवेचना किए तो पता चला ज्ञान व्यापक है.  

प्रश्न- ज्ञान जीवन के साथ जुड़ गया - इसका मतलब क्या हुआ?

उत्तर- जीवन ज्ञान सम्पन्न हो गया.  जीवन ज्ञान होना ही ज्ञान है.  अस्तित्व दर्शन ज्ञान लिखा है.  अस्तित्व को दृश्य रूप में हम प्रतिपादित किया है.  जीवन को जीवन ही समझता है इसका नाम है ज्ञान।  सहअस्तित्व और जीवन ज्ञान के फलस्वरूप में मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान।  इतना ही तो काम है.


श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००८, अमरकंटक)

जीवन शरीर सत्ता - भाग 2




प्रश्न- अशारीरिक स्थिति में जीवन एक स्थान से दूसरे स्थान पर कैसे पहुँचता है?

उत्तर- जीवन जिस ओर जाता है उसको पहचानने में उसको देर नहीं लगती।  ये वैसे ही है - जैसे मनुष्य एक के बाद दूसरा पैर बढ़ाता है तो अगला पैर जमीन पर ही रखता है.  वैसे ही जीवन को अपने रास्ता को पहचानने में कोई तकलीफ नहीं है.  और हर व्यक्ति के साथ जीवन रहता ही है.  दूसरा जीवन कहाँ पहुँचा है उसके आधार पर जीवन दूसरे स्थान पर जाता है.  जीवन की गति को जीवन जानता है.  जीवन की भाषा को जीवन जानता है. जीवन जीवन से बात करता भी है.  

किन्तु मानव परंपरा में जीवन-ज्ञान के बिना यह सफल नहीं हो पाता.  जबकि सम्मान आदि मूल्यों को प्रमाणित होने की आवश्यकता मानव परंपरा में ही है.

प्रश्न- तो जीवन अशारीरिक अवस्था में भी आपस बात कर सकते हैं - किन्तु मानव परंपरा में शरीर के साथ आने पर में भ्रम में आ जाते हैं, क्या ऐसा है?
उत्तर- यह भ्रम और जागृति का बात है.  भ्रम और जागृति मानव परंपरा में ही प्रमाणित होता है और कहीं प्रमाणित होता नहीं।  जैसा दिव्य आत्मा को शरीर की जरूरत न होते हुए भी, यदि उनको प्रमाणित होना है तो मानव शरीर को चलाते हुए ही होंगे। 

मानव शरीर का केवल प्रयोजन है - जागृति प्रमाणित होना।  जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करे, उस जगह में मानव जाति इस धरती पर अब तक आया नहीं है.  शरीर को ही सजाने धजने में ही यह पूरता नहीं है.  

जैसा - मैं शरीर छोड़ देता हूँ,  मुझे तीनों चेतना (मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना) का ज्ञान है, किन्तु यदि  मुझे प्रमाणित होना है तो वह शरीर के द्वारा ही होगा। मुझे (जीवन स्वरूप में) अपने में संतुष्ट रहना हैतो मैं चुप रह सकता हूँ.  जीवन को काल की बाधा नहीं, दूरी की बाधा नहीं।   भौतिक वस्तु की बाधा है ही नहीं जीवन को.  शरीर छोड़ने के बाद जीवन को भौतिक वस्तु की जरूरत है ही नहीं।  यदि जीवन को प्रमाणित होना है तो उसको शरीर लेना आवश्यक है.  

उपकार प्रवृत्ति विकसित चेतना में होता ही है.  उपकार करने की उत्कंठा आ गई वो शरीर के द्वारा प्रकट होगा ही.  अपने स्वयं की तृप्ति को प्रकट करने के लिए.  

अभी हम जो कर रहे हैं किस बात के लिए कर रहे हैं? हमारे साथ जितने भी लोग प्राण दे रहे हैं, किसके लिए? स्वयं की तृप्ति के लिए.  अभी जो आप अपना अमूल्य समय लेकर आए हो, किसलिए? अपनी तृप्ति के लिए, संसार के साथ उपकार के लिए.  आपका इतना यात्रा  इसी दो शब्द में आता है.  गलत हो तो बताओ?
इसके अलावा कोई उद्देश्य ही नहीं बनता है.  अपने साथ अभी जितने भी हैं  - सभी इसी उद्देश्य से हैं.  कोई ज्यादा करते हैं कोई कम करते हैं.  

उपकार निरामय है.  किसी पर कोई भी एहसान नहीं है.   निरामय...आमय का मतलब है पाप, निरामय का मतलब है निष्पाप।  

प्रश्न: प्रकटन क्रम में परिवर्तन किस प्रकार होता गया है?

उत्तर:  जड़ संसार में  मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन।  जीवनी क्रम में  शरीर में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन।  ऐसा होते होते मानव शरीर तक हम पहुँचते हैं.  

मानव शरीर को चलाते हुए जीवन शरीर के साथ तदाकार होकर रह गया, जीवन को अपने प्रमाणित करने की जगह आना चाहिए था - वह नहीं हुआ.  जीवन अपने जागृति के बारे में विस्मृत होता गया.  इसी का नाम है भ्रम। 
शरीर को जीवन समझ लिया।  शरीर के आकार में अपने आप को ढाल लिया और वहीं फँस गया.  इतना ही बात है.  

प्रश्न- तो जीवन जागृति में तदाकार-तद्रूप होने से रह गया?

उत्तर:  तदाकार-तद्रूप प्रक्रिया जीवन में ही होती है. शरीर के किसी अंग में यह प्रक्रिया नहीं होती।   इसी आधार पर जीवन ज्ञान होना बहुत जरूरी है.   विकास क्रम में ही शरीर रचना बनी है.   जीवन अपने जागृति को प्रमाणित करने योग्य शरीर बनते तक रचना क्रम है. जीवन भ्रमवश शरीर को जीवन मानना शुरू कर दिया है, वहीं से गिर पड़ा है.

जीवन और शरीर का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए।  शरीर विकास क्रम में है और जीवन जागृति क्रम से जागृति के लिए है.  जीवन या तो जागृत है या जागृति क्रम में है.  ये ज्ञान होना चाहिए।  

जागृति क्रम से  जागृति तक शिक्षा एक मात्र विधि है.  

जीवन के ज्ञान स्वरूपी साम्य ऊर्जा से तदाकार होने से, अपने आप से, उसमें शरीर से तदाकार होने वाली प्रवृत्ति खत्म हो जाती है.

ज्ञान को नापा-तौला या संख्याकरण नहीं किया जा सकता।  ज्ञान को टुकड़े करके तराजू में तोलेंगे - ऐसा व्यवस्था नहीं है.  ज्ञान का टुकड़ा होता नहीं, ज्ञान को बेचा नहीं जा सकता।  हर व्यक्ति के साथ ज्ञान प्रमाणित होता है.  इसलिए ज्ञान लोकव्यापीकरण करने के लिए वस्तु है.  धर्म (धर्म= सुखपूर्वक जीने की आशा) लोकव्यापीकरण करने के लिए वस्तु है.  इसलिए धर्म को रोज जीने का बात होता है ज्ञान पूर्वक रोज जीना होता है.  धर्मपूर्वक जीते हैं तो ज्ञान पूर्वक जीना होता है.  ज्ञान और धर्म अलग अलग हो ही नहीं सकता। 

ज्ञान में तदाकार होने पर जो शरीर की सीमा समझ में आ गई - उस मर्यादा का पालन करना होता है.  ज्ञान के अर्थ में शरीर का उपयोग करना होता है.  अभी भ्रम वश शरीर के अर्थ में जीवन का उपयोग हो रहा है.  कितना बड़ी भारी पूँजी कितना छोटा काम में लगकर के अपव्यय हो रहा है, आप सोच लो.  यदि ज्ञान में अनुभव होता है तो अपने आप से संवेदना नियंत्रित होगा कि नहीं होगा? अपने आप से होगा।  झकमारी है वो!  आराम से होने वाली बात है.

यदि व्यापक वस्तु समझ में आ गया, तो व्यापक वस्तु में हम तदाकार हो गए.  मानव में व्यापक वस्तु ही ज्ञान कहलाया।  विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति...इसका ज्ञान हो गया.  

ज्ञान होने से मनुष्य को "मानव पद" में जीने का अधिकार बना.  इस ज्ञान के बिना "मानव पद" में कोई जीता नहीं है.  (भ्रमित रहते) कल्पना की शक्ति जितना है उतना मानव जी लिया, लेकिन उतना पर्याप्त नहीं हुआ.  मानव की कल्पना में अभी सारा भ्रम बसा हुआ है. 

भ्रमित जीते तक मानव में कल्पना शक्ति, कर्म स्वतन्त्रता की मदद किया।  इससे शरीर की अनुकूलता को डिज़ाइन किया।  उसमें विवश रहा.  इतना ही बात हुआ.  चार विषय, और पाँच संवेदनाएँ - इतने के अंदर ही वो रह गया.  इतने के अंदर द्वेष, अपना-पराया दूर होता नहीं है.  इन दोनों नियंत्रित होने के बाद ही मनुष्य एषणात्रय में काम करता है.  उपकार कर पाता है. पुत्तेष्णा, वित्तेष्णा, लोकेषणा सहित "मानव" संसार में उपकार करना शुरुआत करता है.  "देव मानव" में पुत्तेष्णा और वित्तेषणा शिथिल होता है और लोकेषणा प्रधान होता है.  तीनों एषणाएँ शिथिल होते हुए उपकार प्रबल हो जाता है- "दिव्य मानव" में.  इतना ही बात है.  

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००८, अमरकंटक)

जीवन शरीर सत्ता - भाग १




विकास क्रम में प्रत्येक परमाणु अंश भी दूसरे परमाणु अंश को पहचान करके वो व्यवस्था में भागीदारी करते हैं.

जैसे - दो अंश के परमाणु में,मध्य में एक अंश रहता है उसके चारों तरफ दूसरा अंश चक्कर लगाता रहता है. उस परमाणु का आचरण निश्चित होता है. उसी प्रकार से सभी परमाणुओं का आचरण निश्चित है.  ये सब परमाणु विकास क्रम में पाये जाते हैं.

यही परमाणुएँ निश्चित गठन पूर्वक समर्थ होने के बाद रासायनिक क्रिया को शुरू करते हैं. वो अपने आप में स्वयं स्फूर्त विधि से रासायनिक क्रियाओं में उद्यत होते हैं. फलस्वरूप  रसायन बनता है.  

रसायन के बाद प्राणकोशा इसी स्वयं स्फूर्त विधि से बनता है.  प्राणकोषाएं जब साँस लेना शुरू करते हैं तब उनमें अपने आप रचना विधि आ जाता है. कोई इंजीनियर के डिज़ाइन की जरूरत नहीं है, इसके लिए - यह अपने आप आता है.  फिर रचना विधि में स्वयं स्फूर्त उत्तरोत्तर विकास होता जाता है.  यह वैसे ही है - जैसे एक आदमी ने खोली (कमरा) बनाया।  उसको सफलता पूर्वक बनाने के बाद उसे उससे अच्छा बनाना अपने आप से आ गया. इस क्रम से चलते चलते 275 मंजिल कीअट्टालिका उससे बनाना बन गया.  

इस तरह भौतिक-रासायनिक संसार पूरा "विकास क्रम" में है.  

जीवन एक गठन पूर्ण परमाणु है - जो "विकास" की स्थिति है.   "जागृति क्रम" में एक जीवनी क्रम होता है, जहाँ जीवों में, शरीर रचना (वंश) के अनुसार जीवन शरीर को चलाता है.  यह गरीबी है जीव-संसार में.  क्योंकि यहाँ अक्षय और अमर जीवन शक्तियाँ क्षयशील और मरणशील शरीर के अनुसार काम करती हैं.  मानव भी समझदारी से पहले इसी गरीबी में है - और भ्रमवश मनुष्येत्तर संसार पर शासन करने गया, इनके साथ जीना सीखा नहीं।  इतना ही बात है|

मानव में जीवों की तुलना में कर्म स्वतन्त्रता और कल्पनाशीलता  की बात जुड़ गया.  मन:स्वस्थता के बिना कल्पनाशीलता की तृप्ति बिन्दु मिलती नहीं।  कल्पनाशीलता के सहारे मानव ने कर्मस्वतन्त्रता का प्रयोग किया।  किन्तु कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु को नहीं पहचाना।  कल्पनाशीलता की तृप्ति बिंदु है समाधान।  समाधान समझदारी से होता है.  समझदारी है - सह अस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान - विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम जागृति - ये चारों भाग समझ में आना. किसमें? व्यापक वस्तु में. व्यापक वस्तु आधार है - उसको भुलवा नहीं देना।

प्रश्न- जीवनी क्रम में जीवन का क्या कार्यरूप होता है? 

उत्तर- हर जीवन अपने में एक पुँजाकार बनाता है - वो एक आकार है, उस आकार का एक शरीर मिलता है जिसको वो चलाता है.  इतना ही सिद्धान्त है.  हर जीवन एक ही आकार में पुँजाकार बनाना है, ऐसा कोई विधा नहीं। जीवन का जो आकार बनाने का जो कार्य है वो जीने के आशा के आधार पर होता है.  गठन पूर्णता के साथ ही जीवन में जीने की आशा, और जीने की आशा के अनुरूप पूँजाकार। बस इतना ही है.

प्रश्न- अगर मान लो जीवन के पुँजाकार के अनुसार शरीर रचना धरती पर तब तक तैयार नहीं हुई हो तो?

उत्तर-  उसके तैयार होने तक जीवन इंतजार करता रहता है.  जीवन के लिए समय का बाधा नहीं। दूरी की बाधा नहीं है. शरीर के लिए दूरी की बाधा है, समय की बाधा है. 

प्रश्न- जीवन के लिए कोई समय की बाधा नहीं है, इसका मतलब क्या हुआ?

उत्तर-  समय जो हम गिनते हैं,  एक दो सेकंड, मिनट, घंटा, दिन, महीने...  जीवन के लिए वह कोई बाधा नहीं है - क्योंकि जीवन अमर है और अक्षय है.   समय का मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में उपयोग जो करता है, वो ठीक है.  लेकिन भ्रम में मानव इस बारे में अज्ञात रहता है कि जीवन ही इसको उपयोग कर रहा है. भ्रम पर्यन्त जीवन स्वयं को शरीर माना रहता है.   जबकि शरीर केवल चमड़े का खोल मात्र है.  शरीर जीवन नहीं है.  शरीर जीवन का साधन है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००८, अमरकंटक)

नित्य वर्तमानता



जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन २००६, कानपुर


Saturday, July 2, 2016

यथास्थिति से अनुभव तक


"तृप्ति बिंदु तक पहुंचे नहीं हैं, तृप्ति बिंदु के लिए कोई रास्ता चाहिए" - यहाँ से हम शुरू करते है.  "तृप्ति कहाँ है?" - ढूँढ़ते हुए यह प्रस्ताव सामने आता है, उसको हम जांचना शुरू करते हैं.  इसको जांचने के क्रम में वरीयता (प्राथमिकता) समाधान-समृद्धि के पक्ष में हो जाती है, बाकी सब secondary हो जाता है.  वरीयता को बनाये रखने के लिए फिर हम मे प्रयत्न शुरू हो जाता है.  यह प्रयत्न एक दिन पूर्णता तक पहुँच जाता है.  

प्रौढ़अवस्था में पहुँचने के बाद वरीयता को लेकर निष्कर्ष निकालना स्व-निरीक्षण विधि से ही होता है.  बाल्यकाल में मार्गदर्शन विधि से होता है.  

प्रश्न: प्रौढ़ अवस्था में क्या परेशानी है? 

प्रौढ़ व्यक्ति पहले से अपने को समझदार माना रहता है - यह उसकी परेशानी है. 

प्रश्न: स्वनिरीक्षण कैसे होता है?

अभी तक हम जैसे जी रहे हैं उससे हमको तृप्ति हो रहा है या नहीं इसका निरीक्षण।  यदि तृप्ति मिल गया है, तो उसी को किया जाए.  यदि तृप्ति नहीं मिला है तो हमको और कुछ समझने की ज़रुरत है, यह निष्कर्ष निकलता है.  तब यह प्रस्ताव सामने आता है. 

स्वनिरीक्षण ही आधार है, मानव में समझ के लिए प्रयास उदय होने के लिए.  दबाव या आरोप से यह नहीं निकलता।

इस क्रम में - चर्चा में, सूचना में और तर्क में यह आता है - "अभी हम सुविधा-संग्रह के लिए काम कर रहे हैं, जिसका  कोई तृप्ति-बिंदु ही नहीं है."  सूचना के आधार पर स्व निरीक्षण पूर्वक यह निष्कर्ष निकल जाता है.  फिर समझदारी को परिपूर्ण करने की प्रवृत्ति होती है. "तृप्ति बिंदु कहाँ है?" - वहाँ पहुँचने के लिए सोच शुरू हो जाती है. हम यहाँ से कैसे निकलें - यह सोच शुरू हो जाती है.  तृप्ति को लेकर समझ की सूचना प्रस्ताव के रूप में फिर मिलती है.

कैसे निकलें - यह लोगों की अलग-अलग परिस्थिति अनुसार उनका अलग-अलग फॉर्मेट होगा, लेकिन सभी में साम्य बात होगी - अध्ययन विधि।

अध्ययन का स्त्रोत (प्रमाणित व्यक्ति) और अध्ययन की इच्छा (जिज्ञासु विद्यार्थी) - ये दोनों मिलने से स्पष्ट हो जाता है कि मानव के जीने का लक्ष्य क्या है, मानव के जीने का सही तौर तरीका क्या है, वैसे जीने के फल-परिणाम क्या है.  इस तरह स्वयं में वरीयता (प्राथमिकता) बन जाती है कि हमको समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना है.

प्रश्न: आज की स्थिति में मैं नौकरी कर रहा हूँ, इस प्रस्ताव को सुनने पर वह मुझे "गलत" लगता है.  क्योंकि मुझे लगता है - मैं अव्यवस्था में भागीदार हूँ... 

उत्तर:  उसको अभी "गलत" या "सही" मत ठहराओ।  यह पूरा नहीं पड़ रहा है - इतना रखो.  तृप्ति के लिए क्या हो सकता है, इसके लिए आपके पास सूचना आया - समाधान-समृद्धि पूर्वक तृप्ति हो सकती है, जिसके लिए दर्शन का अध्ययन पूर्वक ज्ञान-विवेक-विज्ञान संपन्न होना आवश्यक है.

अध्ययन से अनुभव पूर्वक ज्ञान-विवेक-विज्ञान स्पष्ट हो जाता है. ज्ञान-विवेक-विज्ञान को जीने का डिज़ाइन समाधान-समृद्धि स्वरूप में  मानवीयता पूर्ण आचरण स्पष्ट हो जाता है.  उसको प्रमाणित करने के लिए अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है.  उसको लोकव्यापीकरण करने के लिए शिक्षा विधि स्पष्ट हो जाती है.  इसको आचरण करने पर तृप्त रहना बन जाता है, समाधानित रहना बन जाता है, समृद्ध रहना बन जाता है.

प्रश्न:  आप कहते हैं अनुभव से पहले मानव में सही जीने का डिज़ाइन ही नहीं बनता।  तो क्या आप यह कह रहे हैं कि मैं नौकरी करते-करते अध्ययन करता रहूँ और फिर अनुभव करूँ और फिर जीने का डिज़ाइन बनाऊं?

नहीं।  इसमें थोड़ा और सोचने की ज़रूरत है.  आप जहाँ हैं वहाँ रहते हुए इस बात का पठन तो कर ही सकते हैं.  फिर उसके बाद समझने की बात आती है.  अध्ययन विधि से आप वहाँ रहते हुए साक्षात्कार-बोध तक पहुँच सकते हैं, पर अनुभव बिंदु छुटा रहेगा।  अनुभव हुआ तो वह नौकरी वाला स्वरूप रहेगा नहीं।

प्रश्न:  अनुभव बिंदु कब तक छुटा रहेगा?

जब तक आपमें अनुभव की आवश्यकता सबसे प्राथमिक न हो जाए, और जब तक जिन साधनों को जोड़ने के लिए आप नौकरी करने निकले थे - वह पूरी न हो जाए तब तक.  नौकरी छूटने पर आप अनुभव करने के योग्य हो गए क्योंकि नौकरी में रहते हुए अध्ययन पूर्वक आप अनुभव के दरवाजे पर आ चुके होंगे।  अनुभव होने के बाद प्रमाणित होना ही बनता है.

अनुभव के लिए हममे अपेक्षा और साधनों को लेकर हमारी अपेक्षा इन दोनों के बीच में दूरी समाप्त हो जाने पर (यानि अध्ययन को पूरा कर लेने के बाद और साधनों को प्राप्त कर लेने के बाद) अनुभव होता है.  इसका कारण है - हम अभी तक जैसा जीने के तरीके को अच्छा मान लिए हैं, जब उसके लिए आवश्यक साधनों के निकटवर्ती स्थिति तक हम पहुँच जाएँ, तभी उसको लेकर जो हम नौकरी आदि उपक्रम किये, उससे हम मुक्त हो सकते हैं.





अभी जो बताया इस ओर चलने से अनुभव प्रमाण की वरीयता और आवश्यकता हम में बलवती होती जाती है.  बोध होते तक अनुभव प्रमाण की वरीयता सर्वोपरि होकर स्थिर हो जाती है.  तब तक साधनों को जमा करने को लेकर ९०% तक हमको वह अजीर्ण (जरूरत से ज्यादा) हो गया है, ऐसा लगने लगता है.  हमारा ही मन है, साधनों को 'ज्यादा है' मानना - हमारा ही मन है उनको 'कम है' मानना।  फिर अनुभव होने के बाद जो साहस बन जाता है उससे फिर हम रुक ही नहीं सकते।

प्रश्न:  यह एक शरीर यात्रा की बात है या अनेक शरीर यात्राओं की?  

एक ही शरीर यात्रा में समझ, एक ही शरीर यात्रा में समृद्धि, एक ही शरीर यात्रा में प्रमाण।

इन सब बातों को सोच करके हमको इस रास्ते पर चलने के लिए अपनी तैयारी बनाने की ज़रूरत है.  यह भी बात सही है - यह बात स्वयं में प्रवेश होने पर, या साक्षात्कार होने पर यह एक दिन अनुभव तक पहुँचता ही है.   अनुभव होने के बाद उससे पहले जो हम भ्रम-वश वरीयता क्रम बनाये थे - वह ध्वस्त होता ही है.  इस सब को ध्यान में रखते हुए आप निर्णय लो.  ताकि "हम ऐसा नहीं समझे थे, तैसा नहीं समझे थे" - इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप न हों.  अच्छी तरह से सोच के, अच्छी तरह से समझ के, अच्छी तरह से निर्धारित करके, अनुभव करके अपनी प्रतिबद्धता को स्थिर बनाया जाए.

समाधान से यदि हम भली प्रकार से संपन्न हो जाते हैं तो समृद्धि अपने-आप भावी हो जाती है.   समृद्धि के लिए हज़ार रास्ते रखे हैं.

समझदारी हासिल करने में समय लगता है.  साक्षात्कार होने तक.  दस तरह की चीजों में हमारा ध्यान बंटा रहता है, इसके लिए पूरा समय दे नहीं पाते हैं.  इसलिए धीरे-धीरे होगा, कोई आपत्ति नहीं है.  किन्तु साक्षात्कार के बाद यह रुकेगा नहीं।  साक्षात्कार होगा तो बोध होगा ही, अनुभव होगा ही, अनुभव प्रमाण होगा ही.  दूसरा कुछ होता ही नहीं है.


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक )