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Thursday, March 26, 2015

जीवन विद्या अध्ययन क्रम

(१) अस्तित्व = जो आँखों से दिखता है और जो आँखों से नहीं दिखता है.

(२) अस्तित्व नित्य वर्तमान है.

(३) अस्तित्व में मानव ही देखने वाली, समझने वाली इकाई के रूप में है.  मानव ही दृष्टा है.

(४) मानव ही अस्तित्व को अध्ययन कर पाता है, जान-समझ पाता है.  

(५) मानव का अध्ययन शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में है. 

(६) जीवन ही देखता है और समझता है. 

इन ६ बिन्दुओं की प्रमाणीकरण विधि का नाम ही "अध्ययन" है.  यह अध्ययन अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन के रूप में सम्भव होना पाया गया है.  इसी तथ्योद्घाटन क्रम में "मध्यस्थ दर्शन - सहअस्तित्ववाद" वांग्मय मानव सम्मुख प्रस्तुत है.  (जिसके प्रणेता श्री ए. नागराज (अमरकंटक) हैं.) 

जो मानव आँखों से देखता है, वह भी जीवन को ही दिखता और समझ में आता है.  जैसे - आँखों से पदार्थ, वनस्पति संसार, शरीर का रूप दिखता है.  रूप = आकार, आयतन, घन.  इसमें से आकार और आयतन ही दिखता है, जो अधिकतम १८० अंश के बराबर होता है.  गणितीय विधि से लेकिन हम आकार, आयतन, घन को भली प्रकार समझ सकते हैं.  गणित मानव की ही कल्पना का प्रवाह है और लय भी है.

हमारी कल्पनायें अनंत के साथ प्रवाह हैं और एक-एक के साथ लय हैं.  इससे प्रत्येक एक हमारी अध्ययन की वस्तु है.  हर एक में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म को मैं पहचानता हूँ, हर व्यक्ति पहचान सकता है.  इस विधि से चारों अवस्थाओं के रूप, गुण, स्वभाव, धर्म को हम पहचान सकते हैं. 

पदार्थ-अवस्था और प्राण-अवस्था को हम रासायनिक-भौतिक योग-संयोगों (रचना-विरचना) के रूप में हम देखते हैं.  जीव-शरीर और मनुष्य-शरीर भी रासायनिक-भौतिक रचना रूप में वर्तमान हैं.  रचना में जो रासायनिक भौतिक द्रव्य रहते हैं, वे विरचित होने के बाद भी अस्तित्व में रहते हैं.  जैसे, मरने के बाद शरीर के हड्डी, मांस, वसा इत्यादि खाद बन जाते हैं.  विरचना क्रम में रस और रासायनिक द्रव्यों में परिवर्तित होकर अस्तित्व में रहते हैं.  इसी प्रकार अस्तित्व में हर वस्तु अविनाशी है.  रासायनिक-भौतिक क्रियाकलाप में भाग लेने वाली सम्पूर्ण वस्तुएं परिवर्तनशील होती हैं.  इसका साक्ष्य मनुष्य और जीव शरीर, वनस्पति संसार का बीज अनुषंगी विधि से रचनाओं का होना और काल-क्रम में विरचित होता हुआ वर्तमान है.  हर जीव शरीर, मानव शरीर गर्भाशय में रचित होता है.  हर वनस्पति का धरती के संयोग से जलवायु, ऊष्मा के दबाव सहित बीज विधि से उद्भिज क्रम में रचनाओं का होना वर्तमान है. 

मानव में जीवन जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने वाली वस्तु है.  जीवन अपने स्वरूप में एक गठन है.  जीवन रचना एक गठन-पूर्ण परमाणु के रूप में है.  इसका साक्ष्य इसकी अक्षय बल, अक्षय शक्तियां और उनकी निरंतरता है.  यह हर मनुष्य में प्रमाणित होता है.  जैसे - आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और अनुभव को कितना भी मैं प्रकाशित, अभिव्यक्त, सम्प्रेषित करता हूँ, उसके बाद भी इन क्रियाओं को करने के लिए अपने में ये शक्तियां यथावत बनी हुई देख-समझ पाता हूँ.  प्रमाणित करने के उपरान्त ये शक्तियाँ पुनः प्रमाणित करने के लिए यथावत संपन्न रहते हुए अनुभव होता है. 

अनुभव का तात्पर्य समझ की तृप्ति है. समझदारी का तात्पर्य जानना-मानना और उसको प्रमाणित करना ही है. प्रमाणित करने का सम्पूर्ण वस्तु जीवन में ही है.

जीवन की अक्षय-शक्ति और अक्षय बल गठन-पूर्णता का फल है, क्योंकि जितने भी परमाणु रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना में भागीदारी कर रहे हैं, वे सब विकासक्रम में हैं. ऐसे हर परमाणु भार-बंधन और अणु-बंधन के रूप में वर्तमान हैं. जबकि गठन-पूर्ण परमाणु (जीवन) भार-बंधन, अणु-बंधन से मुक्त रहना मुझे, मुझसे और मेरे लिए समझ आता है. जैसे - मैं जितनी भी आशा करता हूँ उसका भार न मुझमें होता है, न जिसका मैं आस्वादन/चयन करता हूँ उसमें आरोपित होता है. जो भी मैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध का आस्वादन करता हूँ, उससे मेरी आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता में कोई न्यूनातिरेक (कम-ज्यादा) न होते हुए, यथावत बना रहता है. इससे पता चलता है, सम्पूर्ण जीवन क्रियाएँ भार-बंधन से मुक्त हैं.

भार-बंधन से मुक्त जीवन आशा-बंधन, विचार-बंधन और इच्छा-बंधन से युक्त है. आशा, विचार, इच्छा बंधन वश ही जीवन का भ्रमित होना पाया जाता है. यह तब समीक्षित होता है, जब जीवन जागृत हो जाता है. भ्रमित अवस्था में जीवन में अविभाज्य रूप में संपन्न होने वाली १० क्रियाओं में से चयन, आस्वादन, विश्लेषण, चित्रण तथा प्रिय-अप्रिय, हित-अहित, लाभ-अलाभ दृष्टियों से तुलन सम्पूर्ण भ्रमात्मक कार्यों में ग्रसित हुआ समीक्षित हुआ है. जीवनगत सम्पूर्ण क्रियाकलापों में से वर्जित क्रियाकलाप ही सम्पूर्ण भ्रम का स्त्रोत स्पष्ट होता है.

जागृति सहज जीवन का कार्यकलाप न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य विधि से संपन्न होता हुआ, प्रमाणित होता हुआ मैं देखा हूँ, समझा हूँ - आप भी समझ सकते हैं. इसके साथ यह भी समीक्षित होता है कि हर मनुष्य के जीवन में न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य दृष्टियां क्रियाशील होने के लिए उन्मुख रहती हैं. भ्रमात्मक क्रियाकलाप में समाविष्ट रहने वाली प्रिय-अप्रिय, हित-अहित, लाभ-अलाभ दृष्टियों की क्रियाशीलता जीव-संसार में जीवों की प्रवृत्त्यों में भी देखने को मिलती हैं.

जीवन सहज न्याय, धर्म, सत्यात्मक दृष्टियाँ चिंतन पूर्वक साक्षात्कार होती हैं और बोधगम्य होती हैं. न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य दृष्टियों का साक्षात्कार होना ही जागृति है. जागृति का प्रमाण स्वरूप जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने के रूप में वर्तमान होना पाया गया है. यही प्रामाणिकता का तात्पर्य है. 

परस्पर संबंधों की पहचान

१. मनुष्य का मनुष्य के साथ
२. मनुष्य का जीवों के साथ
३. मनुष्य का वनस्पतियों के साथ
४. मनुष्य का पदार्थ संसार के साथ
५. मनुष्य का अस्तित्व के साथ

उपरोक्त संबंधों को पहचानने की आवश्यकता है, इसकी सम्भावना और स्त्रोत नित्य समीचीन है. यह कल्पनाशीलता से प्रारम्भ होकर अनुभव में पूर्ण होता है.

न्याय-अन्याय का साक्षात्कार सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन के स्वरूप में होना देखा गया है. जिससे उभय-तृप्ति संपन्न होना देखा गया है.

धर्म-अधर्म का साक्षात्कार और बोध व्यवस्था में प्रमाणित होना देखा गया है. व्यवस्था स्वयं में मानव परंपरा है. इसमें परिवार परंपरा समाहित है. परिवार के साथ ही व्यवस्था की आवश्यकता उदय होना पाया जाता है. व्यवस्था अपने स्वरूप में जीवन में, से, के लिए समाधान (सुख) रूप में होना देखा गया. इस प्रकार मानव-धर्म समाधान (सुख) के रूप में होना देखा गया है.

सर्वतोमुखी समाधान का तात्पर्य सम्पूर्ण आयाम, कोण, दिशा, परिपेक्ष्यों में समाधान और उसकी निरंतरता ही है. यह क्रियाकलाप के रूप में व्यक्त होने के क्रम में परस्पर न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता, मानवीयतापूर्ण शिक्षा संस्कार सुलभता, व स्वास्थ्य संयम सुलभता के रूप में समीचीन है. इसे भली प्रकार से समझा गया है. मानव धर्म सुख, शान्ति, संतोष, आनंद का फलन स्वरूप समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व ही है.

- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (२०/५/१९९५)  

Tuesday, March 24, 2015

जागृति विधि साधना

जागृति जीवन सहज लक्ष्य है.  जागृति-क्रम ही साधना है.  "जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना" जीवन सहज प्रकाशन है.  जीवन में नित्य आचरण रूपी अथवा कार्य रूपी गतिविधियों को जानना-मानना जागृति है.  जीवन में, से, के लिए सतत क्रियाशीलता प्रत्येक मनुष्य में प्रमाणित है.  जैसा - (१) चयन-आस्वादन, (२) विश्लेषण और तुलन, (३) चित्रण और चिंतन, (४) संकल्प और बोध, (५) प्रामाणिकता और अनुभूति।  ये जीवन सहज क्रियाएँ हैं.  ये सब क्रम से मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा में संपन्न होने वाली क्रियाएँ हैं.  ये क्रम से विशाल और सहज प्रभावी हैं. 

(१) मन के प्रभाव-क्षेत्र से अधिक प्रभावी वृत्ति का प्रभाव क्षेत्र है.  इसलिए वृत्ति में होने वाली न्याय, धर्म, सत्य रूपी दृष्टियों से चयन-आस्वादन विश्लेषणों को तुलन करना - यह जागृति विधि साधना है.  इससे मन की गतिविधियों को जानने-मानने की अर्हता स्थापित होती है. 

(२) चित्त में विवेचनाओं के आधार पर वृत्ति के क्रियाकलापों को जानना-मानना जागृति विधि साधना है. 

(३) चित्त के क्रियाकलापों को अवधारणाओं की रोशनी में जानना-मानना जागृति-विधि साधना है. 

(४) अनुभव के प्रकाश में आत्म सहज प्रामाणिकता की कसौटी में सम्पूर्ण बोध को निरीक्षण-परीक्षण करना जागृति विधि साधना है.

आत्मा स्वयं अथवा जीवन स्वयं अस्तित्व सहज वर्तमान होने के कारण अस्तित्व में जिन-जिन अवधारणाओं को प्रामाणिकता की रोशनी में सटीक ठहराया गया है, उसे अस्तित्व सहज रूप में प्रमाणित कर लेना, अस्तित्व में अनुभूति का तात्पर्य है.  या अस्तित्व में होने वाली अनुभव क्रिया है.  यह जाना-माना हुआ का तृप्ति-बिंदु ही है. 

अस्तित्व में प्रत्येक एक को उसकी सम्पूर्णता के साथ जानने-मानने के तृप्ति-बिंदु का अनुभव, निरंतर अनुभव का स्त्रोत होना पाया जाता है.  यही साधना और अभ्यास "जागृति विधि साधना" के नाम से जाना जाता है.

- श्रद्धेय ए नागराज की डायरी से (अमरकंटक - ३० नवंबर, १९९२)
 

Sunday, December 21, 2014

अनुसंधान की पृष्ठभूमि


- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन २००९, हैदराबाद 

मध्यस्थ क्रिया के लिये सम क्रिया का प्रयोग


- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन, नवम्बर २०१०, बांदा (उत्तर प्रदेश)

Saturday, November 15, 2014

नित्य वर्तमान

अस्तित्व में सत्ता स्वयं ही मध्यस्थ है क्योंकि सम्पूर्ण प्रकृति सत्ता में सम्पृक्त विधि से ही नित्य वर्तमान है.  इसी विधि से  अस्तित्व सहज पूर्णता सहअस्तित्व रूप में नित्य वर्तमान होना स्पष्ट है.  सत्ता स्थिति पूर्ण होना देखा गया है.  स्थितिपूर्णता का वैभव पारगामीयता और पारदर्शीयता के रूप में दृष्टव्य है. 

सत्तामयता का प्रभाव पारगामीयता और पारदर्शीयता के रूप में व्यक्त है. 

सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अविभाज्य है.  यह अविभाज्यता निरंतर है.  इसीलिये सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति नित्य वर्तमान ही है.  अस्तित्व स्वयं भाग-विभाग नहीं होता है इसीलिये अस्तित्व अखंड-अक्षत होना समझ में आता है.  प्रमुख अनुभव यही है कि सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अनंत रूप में दिखाई पड़ती है.  ये सब (प्रकृति की इकाइयां) भाग-विभाग के रूप में ही सत्ता में दिखाई पड़ती हैं.  इसे सटीक इस प्रकार देखा गया है - व्यवस्था का भाग-विभाग होता नहीं।  अस्तित्व ही व्यवस्था का स्वरूप है. 

सत्ता में होने के कारण हर वस्तु सत्ता में भीगा, डूबा, घिरा दिखाई पड़ता है.  ऐसे दिखने वाली वस्तु में स्वयंस्फूर्त विधि से क्रियाशीलता वर्तमान है.  यह क्रियाशीलता गति, दबाव, प्रभाव के रूप में देखने को मिलता है.  दूसरे विधि से सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति ही स्थिति-गति, परस्परता में दबाव, तरंग पूर्वक आदान-प्रदान सहज विधि से पूरकता, उद्दात्तीकरण, रचना-विरचना के रूप में होना देखने को मिलता है.  और परमाणु में विकास (गठन पूर्णता)  चैतन्य पद में संक्रमण, जीवन पद प्रतिष्ठा होना देखा गया है.   जीवन और रासायनिक-भौतिक पदों के लिए परमाणु ही मूल तत्व होना समझ में आता है.  सत्ता में सम्पृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति में व्यवस्था के मूल तत्व के रूप में परमाणु को देखा जाता है. 

सहअस्तित्व ही अनुभव करने योग्य सम्पूर्ण वस्तु है.  सहअस्तित्व में अनुभव होने की स्थिति में सत्तामयता ही व्यापक होने के कारण अनुभव की वस्तु बनी ही रहती है.  इसी वस्तु में सम्पूर्ण इकाइयाँ दृश्यमान रहते ही हैं. परम सत्य  सहअस्तित्व में जब अनुभूत होते हैं, उसी समय सत्तामयता में अभिभूत होना स्वाभाविक है.  अभिभूत होने का तात्पर्य सत्ता पारगामी, व्यापक, पारदर्शी होना अनुभव में आता है.  अनुभव करने वाला वस्तु जीवन ही होता है.  सत्तामयता पारगामी होने का अनुभव ही प्रधान तथ्य है. 

सत्ता में अनुभव के उपरान्त ही दृष्टा पद प्रतिष्ठा निरंतर होना देखा गया है.  इसी अनुभव के अनन्तर सह-अस्तित्व सहज सम्पूर्ण दृश्य, जीवन प्रकाश में समझ आता है.  जीवन प्रकाश का प्रयोग अर्थात परावर्तन, अनुभव मूलक विधि से प्रामाणिकता के रूप में बोध, संकल्प क्रिया सहित मानव परंपरा में परावर्तित होता है.  जागृतिपूर्ण जीवन क्रियाकलाप अनुभवमूलक ज्ञान को सदा-सदा के लिए व्यवहार और प्रयोगों में प्रमाणित कर देता है.  यही मानव परंपरा सहज आवश्यकता है. 

- अनुभवात्मक अध्यात्मवाद से 

अनुसन्धान का मूल

(मध्यस्थ दर्शन के) इस अनुसन्धान के मूल में रूढ़ियों के प्रति अविश्वास, कट्टरपंथ के प्रति अविश्वास रहा है.  सार रूप में वेदान्त रूप में "मोक्ष और बंधन" पर जो कुछ भी वांग्मय उपलब्ध है, इस पर हुई शंका।  परिणामतः निदिध्यासन, समाधि, मनोनिरोध, दृष्टाविधि के लिए जो कुछ भी उपदेश हैं उसी के आधार पर प्रयत्न और अभ्यास किया गया.  निर्विचार स्थिति को प्राप्त करने के बाद परंपरा जिसको समाधि, निदिध्यासन, पूर्ण बोध, निर्वाण कुछ भी नाम लिया है, इसी स्थली में मूल शंका का उत्तर नहीं मिल पाया।  परिणामतः इसके विकल्प के लिए तत्पर हुए.  पूर्ववर्ती इशारों के अनुसार 'संयम' का एक ध्वनि थी.  उस ध्वनि को संयम में तत्परता को बनाया गया.  आकाश (शून्य) में संयम किया।  निर्विचार स्थिति में अस्तित्व स्वीकार/बोध सहित सभी ओर आकाश में समायी हुई वस्तु दिखती रही, इसलिए आकाश में संयम करने की तत्परता बनी.  कुछ समय के उपरान्त ही अस्तित्व सह-अस्तित्व के रूप में यथावत देखने को मिला।  अस्तित्व में ही 'जीवन' को देखा गया.  अस्तित्व में अनुभूत हो कर जागृत हुए.  ऐसे अनुभव के पश्चात अस्तित्व सहज विधि से हर व्यक्ति अनुभव योग्य होना देखा गया.  अनुभव करने वाली वस्तु को 'जीवन' रूप में देखा गया.  इसी आधार पर "अनुभवात्मक अध्यात्मवाद" को प्रस्तुत करने में सत्य सहज प्रवृत्ति उद्गमित हुई.  यह मानव सम्मुख प्रस्तुत है. 

- अनुभवात्मक अध्यात्मवाद से

Tuesday, November 11, 2014

इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर

सहअस्तित्व (सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति) समझ में आने पर यह पहचानना सुलभ हो गया कि ज्ञान और इन्द्रियों के संयुक्त स्वरूप की मानव संज्ञा है.  ज्ञान का धारक-वाहक जीवन है.  जीवंत शरीर में इन्द्रिय व्यापार (इन्द्रियों का कार्यकलाप - जैसे देखना, सुनना, चखना, सूंघना, छूना) है.  जीवन शरीर को जीवंत बनाता है, फलस्वरूप इन्द्रिय व्यापार होता है.  

इन्द्रियों से जीवन को कुछ संकेत मिलता है, जिससे जो पहचान जीवन को होता है उसको "इन्द्रियगोचर" कहा.

इन्द्रियों के बिना भी जीवन को ज्ञान विधि से संकेत मिलता है.  उसको "ज्ञानगोचर" कहा.

ज्ञान की प्रसारण विधि जीवन में समाहित है.  इन्द्रियगोचर होने के लिए भी ज्ञान का प्रसारण आवश्यक है.  ज्ञानगोचर होने के लिए तो ज्ञान का प्रसारण आवश्यक है ही.  ज्ञान का प्रसारण जीवन में ही होता है - और किसी चीज (भौतिक-रासायनिक वस्तु) में होता नहीं। 

"ज्ञान सम्पन्नता जीवन में है" - इस बात को स्वीकारा जा सकता है.  ऐसे ज्ञान के कुछ भाग को जीवन इन्द्रियों द्वारा भी पहचानता है. 

मानव ज्ञानावस्था की इकाई है - जो इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर विधि से सम्पूर्ण है.  ज्ञान स्थिति में रहता है, इन्द्रियगोचर विधि से प्रमाणित होता है.  ज्ञान मानव परंपरा में इन्द्रियगोचर विधि से आता है.  इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान प्रकाशित होता है.  हर मानव में जीवन क्रियाशील रहता है.  इन्द्रियों से जो ज्ञान झलकता है, उसके मूल में जाने की व्यवस्था मानव में बनी हुई है.  उसके लिए पहले कल्पनाशीलता का प्रयोग होता है, जिससे ज्ञान वस्तु के रूप में साक्षात्कार होता है.  फलस्वरूप बोध और अनुभव होता है, जिससे प्रमाणित होने की शुरुआत होती है.  यह इसका पूरा स्वरूप है.

ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर के बारे में विगत में भी चर्चा हुई है, पर वे इस निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाये कि मानव ज्ञान और इन्द्रियों का संयुक्त स्वरूप है.  आदर्शवाद ने बताया - "ईश्वर ज्ञान का स्वरूप है."  ईश्वर ज्ञान का स्वरूप है - यह मध्यस्थ दर्शन के परिशीलन से भी निकलता है, किन्तु ज्ञान को पहचानने वाला जीवन ही है.  ईश्वर स्वरूपी ज्ञान का धारक-वाहक जीवन ही है.  आदर्शवाद ने कहा - "ईश्वर सत्य है.  सत्य ही ज्ञान है".   साथ ही ज्ञान को अव्यक्त और अनिर्वचनीय बताया।  इसके स्थान पर मध्यस्थ दर्शन ने प्रतिपादित किया -  "ईश्वर स्वरूपी सत्य को प्रमाणित करने वाला (व्यक्त करने वाला, सम्प्रेषित करने वाला) मानव ही है, जो जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है".  मध्यस्थ दर्शन के ऐसा प्रतिपादित करने से किसको क्या तकलीफ है? 

चैतन्यता (जीवन) को पहचानना मूल मुद्दा है.  इसी के आधार पर सह-अस्तित्व को पहचानने  की कोशिश है.  इसी के आधार पर मानव को पहचानने की कोशिश है.  इसी के आधार पर चारों अवस्थाओं को पहचानने की कोशिश है.  इसी के आधार पर जीने की कोशिश है. 

जीवन की पहचान न होने के आधार पर हम मान लेते हैं - इन्द्रियों में ज्ञान है.  इन्द्रियों में ज्ञान होना मान कर आगे उसका शोध करते हुए बताया - ज्ञान का स्त्रोत मेधस (brain) है.  पहले ह्रदय को ज्ञान का स्त्रोत बताते थे, बाद में मेधस को बताने लगे.  जबकि सच्चाई यह है कि जीवन ही ज्ञान का धारक-वाहक है, न कि मेधस।  जीवन ही ज्ञान संपन्न होता है या भ्रमित रहता है.  भ्रमित रहने का आधार है - जीवन का शरीर को जीवन मान लेना।  मानने वाली वस्तु जीवन ही है और कुछ भी नहीं। 

शरीर में होने वाले इन्द्रिय व्यापार का दृष्टा जीवन ही होता है.  ज्ञान से जो पहचान होता है, या जो ज्ञानगोचर होता है उसका दृष्टा जीवन ही होता है. इन दोनों का दृष्टा होने से जीवन जागृत होता है.  जागृत होने पर ज्ञानमूलक विधि से जीने का अभ्यास होता है.  जिससे मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व) और जीवन मूल्य (सुख, शान्ति, संतोष, आनंद) दोनों साथ-साथ प्रमाणित होता है.  इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर के संयुक्त रूप में मानव लक्ष्य प्रमाणित होता है. 

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)