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Wednesday, April 25, 2012

ध्वनि - ताप - विद्युत

परमाणु में गति के स्वरूप को हमने समझा. गति के फल-स्वरूप ही ध्वनि भी होता है, ताप भी होता है, विद्युत भी होता है। ताप, ध्वनि, और विद्युत का मूल स्वरूप परमाणु के स्तर पर है।  ध्वनि, ताप, और विद्युत परस्परता में ही व्यक्त होते हैं, इसी लिए इनको सापेक्ष-शक्तियां या कार्य-ऊर्जा भी कहा है। एक इकाई द्वारा अपने गुणों को व्यक्त करने के लिए दूसरी इकाई की आवश्यकता है ही। 

विद्युत:  सत्ता में संपृक्त होने से परमाणु-अंश चुम्बकीय-बल संपन्न हैं। परिवेशीय अंशों और नाभिक के बीच में चुम्बकीय धार बनती है, जिसके नाभिकीय घूर्णन-गति द्वारा विखंडन पूर्वक विद्युत पैदा होती है। अकेले परमाणु-अंश में विद्युत की पहचान नहीं है। 

जड़ वस्तु में अणुओं में संकोचन और प्रसारण होना पाया जाता है.  उसी के आधार पर उनमे विद्युत ग्राहिता होती है.  विद्युत प्रवाहित होने की स्थिति में यह संकोचन और प्रसारण बढ़ जाता है.  हर प्राण-कोशा में संकोचन-प्रसारण पाया जाता है, इसलिए हर प्राण-अवस्था की रचना विद्युतग्राही है.  चुम्बकीयता वश विद्युत का प्रसव है.  चुम्बकीयता के मूल में साम्यऊर्जा में संपृक्तता है.

ध्वनि:  हर इकाई अपने प्रभाव-क्षेत्र को बना कर रखती है.  दो पदार्थों के प्रभाव-क्षेत्र जब पास में आते हैं तो उनमे संघर्ष/घर्षण से ध्वनि होता है. उससे उनके बीच वायु के कण अनुप्राणित हो जाते हैं, जिससे ध्वनि-तरंग होती है.  परमाणु-अंशों के वातावरण में परस्पर घर्षण के कारण ध्वनि है। दूसरे वस्तु के वातावरण के साथ घर्षण हुए बिना ध्वनि की पहचान नहीं है। 

ताप:  अणु, परमाणु सभी वस्तुएं सक्रिय हैं.  क्रिया के फलस्वरूप ताप होता है.  तापविहीन इकाई नहीं है.  अवस्था के अनुसार इकाई के स्वस्थता में रहने की एक ताप अवधि है, उस ताप को वह इकाई बनाए रखता है.  ताप स्वस्थता के अर्थ में है.

दो वस्तुएं व्यवस्था में साथ रहते हैं तो ताप पैदा होता ही है। जैसे, जीभ और दांत के बीच घर्षण से ताप पैदा होता ही है। वह इसकी स्वभाव-गति है. व्यवस्था में कार्य करते तक स्वभाव-गति है। अव्यवस्था होने पर ताप बढ़ गया या कम हो गया। 

ताप परावर्तित होता है। जैसे – चूल्हे में हाथ डालने पर हाथ जल जाता है, थोडा दूर रखने पर गर्म लगता है, और दूर जाने पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। 

जड़ प्रकृति में एक सीमा तक ताप को सहने की बात रहती है, उसके बाद उसमे विकार पैदा होता है.  चैतन्य प्रकृति (जीव और मानव) में ताप की अनुकूलता के लिए प्रयास होता है.

आवेश को पचाने की शक्ति स्वभाव-गति में ही होती है। परमाणु में ध्वनि, ताप, और विद्युत को (एक सीमा तक) पचाने का प्रावधान रहता है। आवेशित इकाई में ध्वनि, ताप, और विद्युत स्वभाव-गति से अधिक होता है। उसके पास में दूसरी इकाई – जो पहले अपने स्वभाव गति में थी - उस आवेश को अपने में पचाती है, जिससे उसकी गति (कम्पनात्मक, वर्तुलात्मक, घूर्णनात्मक) पहले से बढ़ जाती है। परमाणु में होने वाली मध्यस्थ-क्रिया इस आवेश (बढ़ी हुई गति) को सामान्य बनाती है। 

- श्री ए. नागराज के साथ संवाद के आधार पर (दिसम्बर २००८)

व्यवस्था का सूत्र

व्यापक वस्तु में प्रकृति की इकाइयां डूबी, भीगी और घिरी है.  व्यापक वस्तु पारगामी होने के आधार पर सभी इकाइयां इसमें भीगी है.  परमाणु-अंश भी भीगा हुआ है, इसीलिये ऊर्जा संपन्न है, इसीलिये परमाणु क्रियाशील है.  क्रिया का स्वरूप बना – श्रम, गति, परिणाम.  अकेले परमाणु-अंश में गति तो दिखता है, पर श्रम और परिणाम नहीं दिखता है.  परमाणु-अंश जब परमाणु के रूप में स्वयं-स्फूर्त विधि से गठित हो जाता है – तो श्रम-गति-परिणाम के स्वरूप में वह परमाणु एक निश्चित आचरण को व्यक्त करता है.  दो अंश के परमाणु का आचरण भी निश्चित है.  परमाणु व्यवस्था का मूल स्वरूप है.  जो कुछ भी अस्तित्व में प्रकाशित है - वह व्यवस्था के सूत्र पर ही निर्भर है.  मानव के अस्तित्व में प्रकाशित होने का आधार व्यवस्था है.  व्यवस्था में जीने के आधार पर ही मानव समाधान-समृद्धि पूर्वक जी सकता है, फलस्वरूप आगे चलकरके अभय और सहअस्तित्व को प्रमाणित कर पाता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक).

Tuesday, April 10, 2012

व्यंजना और अनुभव

प्रश्न: “व्यंजना” से क्या आशय है?

उत्तर: हर मानव में, हर आयु में कल्पनाशीलता है. कल्पनाशीलता में जो कुछ भी आकार आता है, वह व्यंजना है. वही साक्षात्कार होने का आधार बनता है. हर शब्द का अर्थ होता है, अर्थ के स्वरूप में जो वस्तु है उसका आकार यदि कल्पना में आ गया तो व्यंजित हो गया, उस पर विश्वास हो गया तो साक्षात्कार हो गया. व्यंजना का अधिकार चित्त में चित्रण करने के रूप में है, बुद्धि में बोध करने के रूप में है और आत्मा में अनुभव करने के रूप में है.

प्रश्न: अनुभव क्या है?

उत्तर: अनुक्रम से होने वाले उदय को अनुभव नाम दिया है. सह-अस्तित्व में चारों अवस्थाएं कैसे उदय हुई हैं इसको जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना – इसका नाम है अनुभव. ये चारों बात (जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना) आता है तो अनुभव है, अन्यथा अनुभव नहीं है. अनुभव ही मूल्य अनुभूति का अधिकार है, जिसको व्यक्त करना क्रम से होता है. मूल्य अनुभूति का कोई क्रम नहीं है. अनुभव में सभी मूल्य समाया है.

प्रश्न: “अनुभव से अधिक उदय ही अनुमान है” – इससे क्या आशय है?

उत्तर: न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जीना मेरे अनुभव में है. मैं ऐसा जी ही सकता हूँ, साथ में मैं अनुमान करता हूँ – सभी मेरे जैसे न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जी सकते हैं. इस तरह अनुमान अनुभव से अधिक हुआ या नहीं?


- नवम्बर २००९, अछोटी अध्ययन शिविर के प्रतिभागियों के साथ संवाद पर आधारित.

काल वादी ज्ञान

क्रिया की अवधि का नाम है – काल. जैसे सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक धरती की घुर्णन क्रिया की अवधि को “एक दिन” कहते हैं. क्रिया की अवधि का विभाजन करने का अधिकार मानव के पास आया, कल्पनाशीलता की बदौलत. जैसे एक दिन के २४ विभाजन करके २४ घंटे, १ घंटे के ६० विभाजन करके ६० मिनट, आदि. मानव ने इस विभाजित अवधि में क्रिया को पहचानने का प्रयास किया. “काल की अवधि में क्रिया हो रही है” – ऐसा मान लेते हैं. जबकि क्रिया विभाजित होती नहीं है. क्रिया निरंतर बनी ही रहती है. “काल के अनुसार क्रिया होती है” – मानव ने ऐसा उल्टा सोच लिया. यहीं से बेवकूफी की शुरुआत है. काल की अवधि में क्रिया की गणना करने का प्रयास करना बुद्धूपन हुआ कि नहीं? यही “बुद्धिमत्ता” सारे अनर्थ करने का आधार बना है.

काल की गणना मानव की कल्पनाशीलता द्वारा है. अस्तित्व में “काल” शब्द से इंगित कोई वस्तु नहीं है. हम यह गणना नहीं कर सकते हैं – पदार्थ कब हुआ था? हम यह गणना नहीं कर सकते हैं – जीव कब हुआ था? हम यदि ऐसी कोई गणना करते हैं तो वह हमारी ‘इच्छा’ या ‘कल्पना’ के अनुसार ही होगा, ‘अनुभव’ के आधार पर नहीं होगा. अस्तित्व-धर्म के आधार पर काल की गणना नहीं है. पुष्टि-धर्म के आधार पर काल की गणना नहीं है. वंश अनुरूप जीने की आशा धर्म के आधार पर काल की गणना नहीं है. हम यही कह सकते हैं – मानव से पहले जीव-संसार था, जीव-संसार के पहले वनस्पति-संसार था, वनस्पति-संसार के पहले पदार्थ संसार था – इतनी हम गणना कर सकते हैं.

- नवम्बर २००९, अछोटी अध्ययन शिविर के प्रतिभागियों के साथ संवाद पर आधारित.

मानव का अधिकार

“होने” का नाम है - अस्तित्व. “रहने” का नाम है – अधिकार. अस्तित्व सह-अस्तित्व है. सह-अस्तित्व = व्यापक वस्तु में एक-एक वस्तुएं अविभाज्य वर्तमान हैं. अस्तित्व चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट है. पदार्थ-अवस्था, प्राण-अवस्था, जीव-अवस्था, और ज्ञान-अवस्था के रूप में जो है – वही अस्तित्व है. पदार्थ-अवस्था का “अधिकार” या “रहने” का स्वरूप है – होने को बनाए रखना. प्राण-अवस्था का “अधिकार” है – अस्तित्व सहित पुष्टि. एक से अनेक स्वरूप में अवतरित होने का अधिकार प्राण-अवस्था में है. जीव-अवस्था में वंश के अनुसार रहने का “अधिकार” है. जैसे – गाय का बछड़ा गाय-वंश के अनुसार रहने का अधिकार के साथ ही जन्म लेता है. मानव (ज्ञान-अवस्था) में देखते हैं तो उसके “रहने” का निश्चित स्वरूप या “मानव का अधिकार” तय ही नहीं हुआ! इसका कारण है – मानव का अध्ययन नहीं हुआ. हर मानव अभी अपने अलग स्वरूप में काम करता है. अभी मानव अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग स्वरूप में काम करता है. इस कारण से मानव के निश्चित आचरण का स्वरूप स्पष्ट नहीं हो पाया. स्पष्ट होने की ज़रूरत है या नहीं?

मानव चेतना के साथ “मानव का आचरण” या “मानव का अधिकार” स्पष्ट होता है. मानवत्व मानव-चेतना के साथ है. मानव चेतना पूर्वक यदि मानव जीता है तो वह भ्रम मुक्त हो सकता है और अपराध मुक्त हो सकता है. मानव चेतना की शिक्षा देने से बच्चों में मानवत्व आ सकता है. “मानव का अधिकार” है – रूप, पद, बल, धन और बुद्धि. इसमें से रूप, पद, बल और धन के अधिकार को मानव उपयोग कर चुका है. इस तरह मानव का आचरण स्पष्ट नहीं हुआ. इसके प्रमाण में नर-नारी में समानता आया नहीं, अमीरी-गरीबी में संतुलन इससे हुआ नहीं. मानव ने बुद्धि के अधिकार का प्रयोग नहीं किया है. बुद्धि के अधिकार का प्रयोग करने का मतलब है - समझदारी पूर्वक जीना. मानव को अधिकार पूर्वक जीने के लिए “समझदारी” का उपार्जन करना आवश्यक है.

- नवम्बर २००९, अछोटी अध्ययन शिविर के प्रतिभागियों के साथ संवाद पर आधारित.

Sunday, March 18, 2012

अनुभव शिविर

प्रश्न: हर वर्ष जो यह अनुभव शिविर आयोजित किया जाता है, उसका क्या आशय है?

उत्तर: अनुभव शिविर का आशय है - अनुभव मूलक विधि से जिया जाए.  मुख्य बात इतना ही है.  इसी आशय को व्यक्त करने के लिए हर वर्ष अनुभव शिविर का आयोजन किया जाता है.  इस आशय को व्यक्त करें या न करें?  इसके लिए कई लोग सहमत होते हैं, कई लोग सहमत नहीं हो पाते हैं.  ज्यादा लोग शब्द रूप में सहमत हो पाते हैं, कार्य रूप में ज्यादा लोग सहमत नहीं हो पाते हैं.  अधिकाँश लोग इसके पक्षधर हैं यह तो पता चलता है.  प्रमाण होना अभी शेष है.  ऐसी स्थिति में हम अभी हैं.  प्रमाण होने के लिए कई लोग तैयार हो पायेंगे - मेरे अनुसार.  सहमत होगा तो स्वीकार होगा, स्वीकार होगा तो अध्ययन होगा, अध्ययन होगा तो अनुभव होगा, अनुभव होगा तो प्रमाण होगा.  इतनी सीढियां हैं, जिनको पार करना है.  कोई जल्दी नहीं है!  धीरे-धीरे हो, किन्तु सही हो.

प्रश्न: अनुभव मूलक विधि से कैसे जिया जाए?

उत्तर: उसके लिए सत्ता में संपृक्त प्रकृति रूपी सहअस्तित्व को अनुभव करना है.  सहअस्तित्व स्वरूप में अस्तित्व को समझने से विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति अनुभव में आता है.  अनुभव का स्वरूप इतना ही बिंदु रूप में है.  इसको जब व्यक्त करने जाते हैं तो सिन्धु रूप में हो जाते हैं.  अनुभव के साथ अपने निश्चयन को जोड़ करके हम इतने विस्तार हो जाते हैं.  सबको समझाने योग्य हो जाते हैं.  कितना भी समझायें, और समझाने के लिए वस्तु स्वयं में बना ही रहता है.  मैंने अनुभव को समाधि-संयम विधि से पाया, उसको अध्ययन विधि से प्रस्तुत किया.  देखिये अब कैसे हो पाता है.


प्रश्न: यदि मेरे आगे अध्ययन विधि से अनुभव प्राप्त किये हुए कुछ लोग खड़े होते तो शायद मेरा उत्साह और निष्ठा इस मार्ग के प्रति कहीं ज्यादा होता.  

उत्तर: "उस व्यक्ति को अनुभव क्यों नहीं हुआ - इसलिए हमको भी नहीं होगा."  इस विचार को लेकर चलते हैं तो हम फ़ैल जाते हैं, उससे कोई फायदा नहीं है.  फायदा होने वाली बात है - "यदि एक व्यक्ति अनुभव मूलक विधि से जी सकता है, तो मैं भी जी सकता हूँ.  यदि एक व्यक्ति समझा है तो मैं भी समझ सकता हूँ.  यदि एक व्यक्ति प्रमाणित हुआ है, तो मैं भी प्रमाणित हो सकता हूँ."  इस तरह से सोचने से हम आगे बढ़ सकते हैं.  "सभी पहले समझ जाएँ, उसके बाद हम समझेंगे" - यह व्यर्थ की बात है.  जिम्मेदारी को झटकारने का कोई मूल्य नहीं है.  जिम्मेदारी स्वीकारने का मूल्य है.  "एक व्यक्ति समझा है, जिया है, प्रमाणित है - वैसे ही मैं भी समझ सकता हूँ, जी सकता हूँ, प्रमाणित हो सकता हूँ."  इस तर्क से हम पहुँच सकते हैं.

"सामने व्यक्ति सुधरे, तब मैं सुधरूंगा" - यह विचार प्राचीन काल से है.  इसी आधार पर व्यक्तिवाद और समुदायवाद पनपा है.  व्यक्तिवाद और समुदायवाद कहाँ पहुँच गया उसका आप ही मूल्यांकन करिए!


प्रश्न: अध्ययन में अपनी निष्ठा को कैसे बढायें?

उत्तर: प्राथमिकता विधि से.  अध्ययन करना है, यह प्राथमिक हो जाए तो आप अध्ययन करेंगे.  और कुछ यदि  प्राथमिकता में है, तो उसी को आप करते रहोगे.  यदि आपको अध्ययन नहीं करना है, और कुछ भाड़ झोंकना है - तो भाड़ ही झोंकिये!  इससे किसको क्या तकलीफ है?  भाड़ झोंको, अध्ययन करो, या साधना करो - ये ही तीन रास्ते हैं आदमी के पास.


प्रश्न:  आपके प्रस्ताव के अनुसार मानव या तो "भ्रमित" है या "जागृत" है.  भ्रम और जागृति के बीच क्या है?

उत्तर:  भ्रम और जागृति के बीच कड़ी है - अध्ययन.  या फिर है - अनुसंधान.  जो करना है, वही कर लो!  भ्रम = समस्या.  जागृति = समाधान.  समाधान चाहिए या नहीं?  समाधान प्राप्त करने के लिए दो ही विधियाँ हैं - विकल्पात्मक अध्ययन अथवा अनुसन्धान.  सामान्य रूप में अध्ययन विधि सुगम है, अनुसंधान विधि कठिन है.


प्रश्न:  आपने अनुसंधान के लिए जो प्रयास शुरू किया था, उस समय मानव जाति की क्या स्थिति थी?

उत्तर: मैंने जब शुरू किया तब भी आदमी उलझा हुआ ही था.  कई लोगों ने मेरी जिज्ञासा को उचित माना, कई लोगों ने उचित नहीं माना.  जिन्होंने उचित नहीं माना उनको मैंने नकारा नहीं, जिन्होंने उचित माना उनको धन्यवाद देते हुए मैं यहाँ चले आया.  इस अनुसंधान में मैं सफल हो गया.  अब मैंने जो पाया उसको नीच से नीच आदमी, दुष्ट से दुष्ट आदमी भी नकारता नहीं है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २०१२, अमरकंटक)