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Friday, June 13, 2008

समझ के करो.



अध्ययन में मन लगना यदि पूरी ईमानदारी के साथ हो जाता है, तब यह पूरा होता है। अध्ययन करने के लिए कोई अतिवाद करने की आवश्यकता नहीं है। अध्ययन करते समय अभी आप जो कर रहे हो, उसके प्रति कोई त्याग-वैराग्य की बात आता नहीं है। आप अध्ययन करते रहो, कोई एक क्षण ऐसा आएगा, कोई ऐसी जगह आयेगी - जब मानव-चेतना आपको स्वीकार हो जायेगी। उस बिन्दु तक अध्ययन है। जिस तरह एक पत्ता पकने के बाद वृक्ष से अपने आप गिर जाता है, उसी तरह हमारी सारी निरर्थकतायें समझदारी संपन्न होने के बाद अपने-आप गिर जाती हैं। पत्ता तोड़ने, और पत्ता गिरने में कितना फर्क है - आप ही सोचिये। अपनी निरर्थकताओं को दूर करने के लिए कोई अलग से प्रयास करने की ज़रूरत नहीं है। अध्ययन एक पूरी तरह wound-less process है।

समझदारी आने के बाद अपने में यह तुलना होती है - हम जिस तरह से दाना-पानी उपार्जित करते हैं, उससे संतुष्ट हो सकते हैं, या नहीं? तुलन करने पर यदि हम पाते हैं कि हमारा वर्तमान तरीका ठीक है, तो किस को क्या तकलीफ है? यदि अनुकूल नहीं होता - तो जीने का दूसरा डिजाईन स्वयं में अपने आप में से ही उभर आता है। एक ही डिजाईन से सभी जियेंगे - यह भी बेवकूफी वाली बात है। हर व्यक्ति के साथ डिजाईन बदलेगा। उसमें एक चीज़ ध्रुव रहेगा - वह है स्वावलंबन की स्थिति। स्वावलंबन की स्थिति = परिवार के सदस्यों के पोषण-संरक्षण और समाज-गति में भागीदारी के लिए आवश्यक साधनों का प्रबंध करना।

यथास्थिति को बनाए रखते हुए अध्ययन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इस स्थिति में आ जाएँ की अगली स्थिति आज की स्थिति से ज्यादा अच्छा है - यह हमको भी स्वीकार होना, और हमारे परिवार को भी स्वीकार होना।

"करना - नहीं करना" - यह मूढ बुद्धि की बात है।
"होना - नहीं होना" - यह विचार बुद्धि की बात है।
"यह ज़रूरत है - यह ज़रूरत नहीं है" - यह विद्वता पूर्ण बुद्धि की बात है।

"होना क्या है" - इस बात पर सोचना। "होना क्या है" - यह स्पष्ट होना चाहिए। "होने" के अर्थ में क्या करना है, क्या नहीं करना है - यह निर्धारित हो जाता है।

पहले लक्ष्य के प्रति स्पष्ट हुआ जाए। ज्ञान निश्चित हो जाता है - फलस्वरूप करना निश्चित हो जाता है। करना निश्चित करके ज्ञान निश्चित होता नहीं।

अभी तक विज्ञानवाद और आदर्शवाद कहते रहा : - "करके समझो!"
अब मध्यस्थ-दर्शन में हम कह रहे हैं - "समझ के करो!" यह सिद्धांत है।

समझने का अधिकार हर व्यक्ति के पास हर अवस्था में रखा हुआ है। चाहे अपराधी मानते रहे, चाहे राजा मानते रहे - सबको समझने का अधिकार समान है। समझने का अवसर युगों-युगों बाद आज आया है - मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान के सफल होने पर। सभी परिस्थितियां समझने के लिए अनुकूल हैं। यदि अपनी परिस्थितियों को बदलने के चक्कर में पहले पड़े - तो बखेडे में जायेंगे। हर व्यक्ति के लिए हर परिस्थिति में समाधान तक पहुँचने का रास्ता है। सामाधानित होने के बाद समृद्धि का डिजाईन अपने आप में से ही उद्गामित होता है। समाधान प्राथमिक है। समाधानित होने में कोई अमीरी, गरीबी, दुष्टता अड़चन नहीं है। यदि समाधान आपका लक्ष्य बनता है - तो हर परिस्थिति आपके अनुकूल ही बनती है, प्रतिकूल बनता ही नहीं! इस बात की महिमा यही है।

समाधान मेरा प्राथमिक लक्ष्य है - जब यह मुझमे तर्क द्वारा निर्णीत होता है - तब अध्ययन में मेरा मन लगता है। नहीं तो मन नहीं लगता।

ज्ञान-सम्पन्नता के बाद ही प्रक्रिया पक्का हो जाता है। प्रक्रिया से ज्ञान स्पष्ट नहीं होता। विगत में "कर के समझो" पर जोर दिया गया। उसी को तप माना। अब आपके सामने यह प्रस्ताव है - "समझ के करो!" इससे trial and error वाली सारी कथा ही समाप्त हो गयी। trial and error में घाटे की स्थिति भी आ सकती है। समझ के करो - पूरी तरह economical है। इस तरह इस बात के साथ "छोड़ने-पकड़ने' का झंझट ही समाप्त हो गया। पहले समझ लो - फ़िर निर्णय करो, क्या छोड़ना है - क्या पकड़ना है!  समझने के बाद क्या आवश्यक है, क्या अनावश्यक है - यह स्वयं में विश्लेषित हो जाता है। आवश्यक को पकड़ना, या पकड़े रहना होता है। अनावश्यकता को छोड़ना होता है। "त्याग" की परिभाषा ही है - "अनावश्यकता का विसर्जन"।

समझने में कोई "मात्रा" नहीं होती। ज्यादा समझे-कम समझे जैसी कोई बात नहीं होती। या तो समझे, या समझने की अपेक्षा रही। १० क्रिया में समझे, ४.५ क्रिया में समझने की अपेक्षा रही। समझना = बोध। बोध अपूर्ण नहीं होता।

हमारे पूर्वजों ने - ऋषि, मह्रिषी, सिद्ध, महापुरुषों ने - अनेक तरह की "अभ्यास विधियां" सुझाई जिसमें "करके समझो!" वाली बात को प्रस्तावित किया गया। इन अभ्यास-विधियों को "तप" माना। "तप" के लोकसुलभ होने का कोई रास्ता वे निकाल नहीं पाये।

तर्क विधि से यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है। व्यवहारिक विधि से इसके पूरा पड़ने के लिए आपको इसे समझना ही पड़ेगा। और दूसरा कोई रास्ता नहीं है। यदि समझ में आ गया तो आपसे छूटने वाली कोई बात नहीं है। यदि समझ में आ गया है - तो आपसे कुछ क्यों छूटेगा?

"समझ" शब्द स्वयं (जीवन) में जागृति हो जाने को ही इंगित करता है। उससे पहले "सुनी हुई बात" ही है।

समझ "ज्यादा" और "कम" की उपाधियों से मुक्त है। "समझे हैं" या "नहीं समझे हैं" - इतना ही है।

सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व को समझना, और जीवन को समझना। ये दोनों यदि समझ में आता है, तो बाकी सब उससे अपने आप निकल आता है।

दृष्टा समझ में आने पर दृश्य स्पष्ट होता है। जीवन ही दृष्टा है। जीवन ४.५ क्रिया में कितने भाग का दृष्टा है, और १० क्रिया में कितने भाग का दृष्टा है - यह मध्यस्थ-दर्शन में स्पष्ट किया गया है। ४.५ क्रियाओं द्वारा जीवन संवेदनाओं का दृष्टा रहता है। १० क्रिया के साथ जीवन सह-अस्तित्व में दृष्टा है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

जीवन में अतृप्ति को आवेशित क्रियाकलाप से भर नहीं सकते.

जीवन में अनुभव से पहले अतृप्ति (अधूरापन या खोखलापन) रहता है। इस अतृप्ति के रहते हमारी सतही-मानसिकता (४.५ क्रिया) में जीते हुए भी जीवन आवेशित क्रिया-कलाप को पूरा स्वीकारता नहीं है। जैसे सुविधा-संग्रह में ग्रस्त लाभोन्माद में चलते चलते किसी जगह पर पहुँच जाने के बाद "यह सही है" - ऐसा हम मान नहीं सकते। बाकी दोनों आवेशों के साथ (कामोन्माद और भोगोन्माद) के साथ भी ऐसा ही है। यह इसलिए है - क्योंकि जीवन में निहित अतृप्ति को इन उन्मादों से किसी तरह भी भरा नहीं जा सकता। कुछ दूर चलने पर खालीपन फ़िर कचोटने लगता है। यह सभी के साथ है। यही जीवन में सच्चाई के लिए शोध का स्त्रोत है। इसी खालीपन के सहारे हम अध्ययन पूर्वक उन्मादों के चक्र-व्यूहों से बुचक सकते हैं। इस खालीपन को भरने का एक मात्र उपाय सहअस्तित्व में अध्ययन ही है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

लक्ष्य के लिए प्राथमिकता तय करने का उपाय

यह कुल मिला कर श्रेष्ठ क्या है - इसको तय करने की बात है।

जीव-चेतना में हम जितना भी करते हैं, उसका गम्य स्थली सुविधा-संग्रह ही है। सुविधा-संग्रह में पहुँचना अच्छा लगता तो है - पर इसका कोई तृप्ति-बिन्दु नहीं है। सुविधा-संग्रह का तृप्ति बिन्दु अभी तक किसी को मिला नहीं है, आगे मिलने की सम्भावना भी नहीं है। इस जगह में हमको पहुँचना है। यहाँ यदि पहुँच जाते हैं, तो मानो हममे मानव-चेतना की अपेक्षा बन गयी। मानव-चेतना को पाने के लिए हमारा मन जो लगता है, उसे हम "ध्यान" कहते हैं। ध्यान देना = मन लगना। अध्ययन में यदि मन लगता है, तो शनै-शनै हम मानव-चेतना को लेकर स्पष्ट होते जाते हैं। एक दिन ऐसा बिन्दु आता है, जब वह हमारा स्वत्व हो जाता है। उसी बिन्दु से जागृति प्रकट होती है।

ध्यान, अभ्यास आदि की जो परम्परा-गत विधियाँ हैं, वे इसको नहीं छूती। इन विधियों से स्वयं का प्रयोजन और दूसरों का उपकार - दोनों सिद्ध नहीं होता।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

Sunday, May 18, 2008

ज्ञान और मनुष्य

इकाइयों की परस्परता में खाली स्थली जैसे जो दिखती है - वह खाली नहीं है, ऊर्जा है। यह ऊर्जा सब में पारगामी है - परमाणु अंश से धरती तक में। पारगामी होने का गवाही है - इकाइयों की ऊर्जा सम्पन्नता। मानव में ऊर्जा सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है।

मानव में ज्ञान १३ स्वरूपों में करने के रूप में प्रकट होता है।
चार विषयों का ज्ञान (आहार, निद्रा, भय, मैथुन)
पाँच संवेदनाओं का ज्ञान (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)
तीन ईषणाओं का ज्ञान (पुत्तेष्णा, वित्तेष्णा, और लोकेष्णा)
और उपकार का ज्ञान (समझे हुए को समझाना, सीखे हुए को सिखाना, किए हुए को कराना )

ज्ञान के बिना मानव में यह सब नहीं होता। चार विषयों को समझे बिना हम उनको उपयोग नहीं कर सकते। पाँच संवेदनाओं को समझे हुए बिना हम उनका उपयोग नहीं कर सकते। उसी तरह ईषणाओं और उपकार को समझे बिना हम उनको नहीं कर सकते। वह समझना ही ज्ञान है।

मानव में व्यापक ज्ञान के रूप में काम कर रहा है। उपरोक्त १३ स्वरूपों में जो भी मानव काम करता है - उसके मूल में ज्ञान रहता है। इनमें से चार विषयों को पहचानने की बात जीव-संसार में भी है। जीव जानवर चार विषयों में जीने के अर्थ में पाँच संवेदनाओं का उपयोग करते हैं। (जैसे - जीव जानवर गंध को इस्तेमाल करके अपने आहार को खोजते हैं।) जबकि मनुष्य पाँच संवेदनाओं को राजी रखने के लिए विषयों को पहचानता है। (जैसे - मनुष्य अपनी रस-इन्द्रियों को राजी रखने के लिए आहार ढूँढता है। ) यह संवेदनाओं को राजी रखने की बात मनुष्य में है, जो जीवों में नहीं है। यह मनुष्य और जीवों में मौलिक अन्तर है।

मनुष्य जो कुछ भी करता है - उसके मूल में "अच्छा लगने" की इच्छा है। सबसे पहले मनुष्य को संवेदनाओं में ही अच्छा लगता है। यही मानव की कल्पना-शीलता और कर्म-स्वतंत्रता का पहला प्रभाव है। इसी आधार पर मानव को ज्ञान-अवस्था में कहा है। मनुष्य का सारा क्रिया-कलाप सुख की अपेक्षा में है - यहीं से मानव का अध्ययन शुरू होता है। इस विधि से जब हम मानव का अध्ययन करने जाते हैं - तो यह विगत के इतिहास में जो कुछ भी हुआ, उससे जुड़ता नहीं है। इसके साथ विगत का सारा screen ख़त्म। मानव के अध्ययन का reference-point यह हुआ, न की विगत की कोई भी चीज़।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

Monday, May 12, 2008

प्रश्न, शंका, और जिज्ञासा में भेद

प्रश्न = वस्तु क्यों और कैसा है? (जैसे मैं क्यों हूँ, और मुझे कैसे रहना है? जैसे - यह अस्तित्व क्यों है, और कैसा है?)

शंका = जो हमको समझ में नहीं आया, उसके प्रति हम शंका करते हैं।

जिज्ञासा = जो अस्पष्ट है, उसको स्पष्ट करने के अर्थ में जिज्ञासा है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

जीवन ही जीवन को कैसे देखता (समझता) है?

मन का दृष्टा वृत्ति होता है। मन में निरंतर जो आस्वादन की क्रिया चल रही है - उसको वृत्ति देखता है, मूल्यांकित करता है, विश्लेषित करता है। मनुष्य में कल्पनाशीलता के ज्ञान-सम्पन्नता को छूने का पहला घाट यही है। स्वयं में निरंतर आस्वादन क्रिया हो रही है - इसको देख पाना मनुष्य में ही सम्भव है। जीव-जानवर इस तरह नहीं देख पाते। इसीलिए जीव-जानवर अपने शरीर वंश की व्यवस्था के अनुसार विषयों में जीते रहते हैं।

वृत्ति का दृष्टा चित्त होता है। यह मनुष्य में कल्पनाशीलता के ज्ञान-सम्पन्नता को छूने का दूसरा घाट है। वृत्ति द्वारा मन का किया गया विश्लेषण कहाँ तक ठीक हुआ? कहाँ तक न्याय है? कहाँ तक धर्म है? कहाँ तक सत्य है? चित्त में उपरोक्त का मूल्यांकन होता है। यही अध्ययन है। न्याय, धर्म, और सत्य को अस्तित्व में वास्तविकताओं के रूप में पहचानने का प्रयास ही अध्ययन है।

इसी क्रम में बुद्धि चित्त का दृष्टा होता है। अर्थात बुद्धि चित्त के क्रियाकलाप का दृष्टा रहता है। सह-अस्तित्व सहज अध्ययन की स्वीकृति बुद्धि में ही होती है। बुद्धि में बोध होने के लिए सर्व-सुलभ विधि अध्ययन-विधि ही है। अध्ययन के लिए मन को लगा देना ही अभ्यास है।

आत्मा बुद्धि का दृष्टा होता है। अध्ययन पूर्वक बुद्धि में सत्य-बोध पूर्ण होने पर आत्मा का सह-अस्तित्व में अनुभव करना भावी हो जाता है। जीवन का मध्यांश (आत्मा) अनुभव करने के योग्य रहता ही है। बुद्धि में बोध के बाद आत्मा सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में अनुभव करता ही है। जब आत्मा अस्तित्व में अनुभव करता है तो सारा जीवन अनुभव में भीग जाता है। मन वृत्ति में, वृत्ति चित्त में, चित्त बुद्धि में, बुद्धि आत्मा में, और आत्मा सह-अस्तित्व में अनुभव करता है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

अकेलापन हमारा दूसरों को ग़लत चाहने वाला मान लेने के कारण होता है.

प्रश्न: अकेलापन क्या है?  अकेलापन कैसे दूर हो?

उत्तर: अकेलेपन के मूल में यह मान्यता है - "मैं तो सही हूँ, लेकिन संसार ग़लत है और सही करने योग्य नहीं है।" अकेलापन असहअस्तित्ववादी है। अकेलापन सहज नहीं है। इस बात की सच्चाई को अपने में जांचने की ज़रूरत है।

अकेलेपन को दूर करने का इलाज है, इस बात की सच्चाई को स्वीकार लेना कि - "संसार सही (अच्छाई) को ही चाहता है।" "मैं अच्छा चाहता हूँ" - यह स्वीकृति हम में होती ही है। संसार को भी जब अच्छाई के लगावदार के रूप में जब हम स्वीकार लेते हैं - तो हमारा अकेलापन भाग जाता है। संसार से विश्वास करने का सूत्र मिल जाता है।

समझने के क्रम में विद्यार्थियों के बीच में विश्वास का सूत्र - "समझ" लक्ष्य की समानता है। "बाकी विद्यार्थीजन भी मेरी तरह समझना, और समझ कर जीना चाहते हैं, और उसी के लिए प्रयासरत हैं।" - यह स्वीकारने पर ही साथियों के बीच विश्वास और स्नेह का सूत्र निकलता है। यह प्रतिस्पर्धा से बिल्कुल भिन्न स्थिति है - इसमें परस्पर पूरकता है।

स्वयम समझे होने पर संसार को समझ सकने योग्य मानने पर ही हम संसार के साथ व्यवहार कर सकते हैं। संसार को पापी, अज्ञानी, स्वार्थी मान कर हम किसी को कुछ समझा नहीं पायेंगे। "समझाने की जिम्मेदारी " को हम संसार के साथ इस तरह विश्वास करने के बाद ही स्वीकार सकते हैं। यही दया, कृपा, और करुणा का सूत्र है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (२००८)