अनुभव में कल्पनाशीलता विलय होता है. फिर अनुभव के आधार पर हमारी कल्पनाशीलता काम करना शुरू कर देता है.
प्रश्न: आपने साधना पूर्वक समाधि की स्थिति को प्राप्त किया। समाधि की क्या उपलब्धि रही?
उत्तर: समाधि की स्थिति में मेरा आशा, विचार, इच्छा चुप रहा. समाधि की उपलब्धि है - मुझमे भूतकाल की पीड़ा, भविष्य की चिंता और वर्तमान से विरोध समाप्त हो गया. ऐसा मेरी कल्पनाशीलता स्वीकार लिया, उसमें तदाकार हो गया. समाधि के बाद भी मेरे प्रश्नों के उत्तर पाने की इच्छा शेष रहा. यह संयम करने के लिए आधार बना.
प्रश्न: संयम में क्या हुआ?
उत्तर: संयम में जो कुछ भी प्रकृति ने बताया उसका अध्ययन किया। अध्ययन करने से यह पता चला - सहअस्तित्व है, सदा-सदा है, नित्य है. सहअस्तित्व स्वरूप में सम्पूर्ण प्रकृति भीगा हुआ है, डूबा हुआ है, घिरा हुआ है. जो देखा, उसका नामकरण कल्पनाशीलता के आधार पर किया।
संयम काल में दृष्टा पद से जो चित्रण चित्त में दिखता रहा, वह बुद्धि में स्वीकार होता रहा. अनुभव हुआ. फिर उसको बताने योग्य हुए.
संयम काल में जो चित्रण मेरे सामने आया उसको मैंने दृष्टा पद प्रतिष्ठा से स्वीकारा। चित्रण शब्द के रूप में भी हो सकता है, चित्र के रूप में हो सकता है.
दृष्टा पद प्रतिष्ठा मतलब - मैं देखने वाला हूँ, दिखने वाला वस्तु कुछ है. इसमें कल्पनाशीलता का कोई योग नहीं है. मैं दृष्टा पद में रहा और देख पाया।
प्रश्न: इसमें देखने वाला कौन है?
उत्तर: देखने वाला आत्मा है. आत्मा दृष्टा पद में होता है. बुद्धि बोध पद में होता है. बुद्धि में बोध पद और आत्मा में दृष्टा पद, इनके योग में चित्त में चित्रणों को देखता रहा. अध्ययन आत्मा के साक्षी में स्मरण पूर्वक किया गया प्रक्रिया है. आत्मा दृष्टा पद में होता है, उसके साक्षी में. स्मरण चित्त में होता है.
अध्ययन इसी विधि से होता है. संयम विधि से करें तो भी, अनुभवगामी विधि से करें तो भी.
फिर जो बुद्धि में स्वीकार हुआ, वो अनुभव मूलक विधि से स्मृति में आया. अनुभव का बोध पूर्वक स्मरण स्थिर होता है. फिर उसको बताये हैं.
संयम काल में दृष्टा पद से वास्तविकताओं को देखते रहे. संयम के बाद स्मरण जुड़ गया. स्मरण जुड़ने से उसको व्यक्त कर दिया।
अभी जो आप अध्ययन करते हो, उसमे शब्द का अर्थ स्मरण है, या स्वीकृति है? जब तक स्वीकारते नहीं है, स्मरण अपना पैतड़ाबाजी बजाता रहता है.
- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (नवम्बर २०१२, अमरकंटक)