प्रश्न: आपके सामने कोई दुःखी व्यक्ति आता है तो क्या आप दुःखी नहीं होते? निरंतर सुख में कैसे बने रहते हैं?
उत्तर: मानव समाधान में ही निरंतर सुखी है. दुखी व्यक्ति को देखने पर हमारे मन में उसके दुःख के निराकरण का उपाय आता है, तो हम निरंतर सुखी हैं. यह दूसरे व्यक्ति में उसकी ज़रूरत के अनुसार ही ट्रांसफर होगा, हमारे इच्छा से ट्रांसफर नहीं होगा। दुखी व्यक्ति अपने में सुधार करने पर ही सुखी होगा। समझदार व्यक्ति को सामने व्यक्ति के दुःख को देख कर पीड़ा नहीं होती, क्योंकि उसको दुःख का कारण भी पता रहता है, उसका निवारण कैसे होगा यह भी पता रहता है. इसमें पीड़ित होने का कोई रास्ता ही नहीं है. पीड़ा हज़ारों कोस दूर ही रह गया. जब तक हमे दुःख के कारण और उसके निवारण का पता नहीं है, तब तक हम दुखी को देख कर दुखी होते ही हैं. लोग मानते हैं कि दूसरों के दुःख देख के वो पीड़ित हो गए तो महान हो गए! आप ही सोच कर अपने विवेक से निर्णय करो कि क्या ठीक है.
समाधान से पहले मानव दुखी रहता ही है. इसी को देख कर पूर्व में कहा गया कि संसार में दुःख ही दुःख है. विकल्प विधि से हम कह रहे हैं कि समाधान पूर्वक हमे दुःख का कारण पता रहता है, उसके निवारण का अधिकार रहता है. ऐसे में हमारे दुखी होने का कारण ही नहीं बनता।
समाधान = सुख, समस्या = दुःख। अपने में समस्या है इसलिए दूसरों का समस्या हमको दुखी करता है. अपने में यदि समाधान है तो सामने व्यक्ति के लिए भी समाधान है.
प्रश्न: निरंतर सुख की आपकी स्थिति में क्या सारी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं?
उत्तर: वैध या सकारात्मक इच्छाएं सब रहता हैं. निषेधात्मक इच्छाएं नहीं रहता हैं. आपके अनुसार क्या निषेधात्मक इच्छाएं होना चाहिए? निरंतर सुख की इस स्थिति में हर व्यक्ति को होना चाहिए या नहीं?
प्रश्न: क्या सकारात्मक इच्छाएं दुःख का कारण नहीं है? मेरी इच्छा है संसार से गरीबी प्रदूषण समाप्त हो जाए, पर संसार में उसके विपरीत ही होता दिख रहा है. क्या यह मेरे दुःख का कारण नहीं है?
उत्तर: इच्छा होना पर्याप्त नहीं है. इच्छा के पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होना आवश्यक है. मानव में शुभेच्छा आदिकाल से है. उसके पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होने से समाधान होता है. यह अभी के विज्ञान से नहीं होगा। मानव लक्ष्य के लिए दिशा निर्धारित करने वाले विज्ञान से यह होगा।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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