समझा हुआ व्यक्ति प्रश्न करने का अधिकार रखता है या न समझा हुआ व्यक्ति प्रश्न करने का अधिकार रखता है?
समझा हुआ व्यक्ति सामने व्यक्ति को समझाने के बाद वह समझा या नहीं समझा, इसको जाँचने के लिए प्रश्न कर सकता है.
न समझा हुआ व्यक्ति क्या प्रश्न करेगा? न समझा हुआ व्यक्ति समझने के लिए इच्छा या चाहत प्रकट करेगा या प्रश्न करेगा? ना समझा हुआ व्यक्ति समझने की चाहत प्रकट कर सकता है क्योंकि उसके पास अनुमान क्षमता है. अनुमान के आधार पर हम सच्चाई को समझना चाहते हैं, समाधान चाहते हैं - इनके लिए हम अपनी आशा व्यक्त कर सकते हैं. न समझा हुआ व्यक्ति समझने के लिए अपना चाहत व्यक्त कर सकता है. चाहत को प्रश्न कहना बेसिरपैर की बात हो गया या नहीं?
विज्ञान युग ने आ कर तर्क का दरवाजा खोल दिया। सब कुछ तर्क-संगत होना आवश्यक है - ऐसा कहा. उनके अनुसार प्रश्न भी तर्क है, उत्तर भी तर्क है. इससे तर्क के लिए तर्क करने की बात शुरू हो गयी. यह उन्होंने अपने डूबने के लिए रास्ता बना लिया। समझा हुआ बात एक से एक जुड़ा रहता है. इसमें प्रश्न क्या हो सकता है? अभी हर दारु पिया हुआ आदमी, हर लम्पट आदमी, हर जगह प्रश्न ही प्रश्न करता है. प्रश्नों की कतार बना देता है. जबकि उसके पास प्रश्न करने का कोई आधार ही नहीं रहता है.
इस बात को generalise करने की ज़रूरत है या नहीं? यद्दपि हमारे प्रस्ताव में मैंने इस तरीके को प्रस्तुत नहीं किया है. जरूरत होने पर इसको प्रस्तुत किया जा सकता है, ऐसा मेरा सोच है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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