प्रश्न: आप कहते हैं - अस्तित्व में युद्ध-लड़ाई नहीं है. पर हम जीव संसार में देखते हैं - दो बाघ को एक बाघिन के लिए लड़ते हुए. बंदरों के एक झुण्ड के सरदार को दूसरे झुण्ड के सरदार से लड़ते हुए.
उत्तर: यौन चेतना के आधार पर जीवों में लड़ाई देखने को मिलता है. और कहीं उनमें लड़ाई देखने को नहीं मिलता। मनुष्य आने पर उसने रूप के आधार पर भी लड़ाई किया, पद के आधार पर भी लड़ाई किया, धन के आधार पर भी लड़ाई किया, बल के आधार पर भी लड़ाई किया।
प्रश्न: जीव संसार में भी यौन चेतना के आधार पर भी लड़ाई क्यों है?
उत्तर: नर-मादा की पहचान प्राणावस्था से शुरू हुआ. एक मादा कोष की तुलना में लाखों-अरबों नर कोशायें होना देखा गया. जीव संसार में इसका उल्टा हुआ. एक नर जीव की तुलना में अनेक मादा जीव होना देखा गया. जैसे - दस गायों के बीच एक बैल रहता है. दूसरा बैल वहाँ आने पर उससे लड़ता है. मानव आने पर नर और नारी दोनों में समानांतर शरीर संवेदना का होना देखा गया. समानांतर शरीर संवेदना के प्रकटन के लिए उसके पहले ये दोनों स्थितियां आवश्यक रही. मानव के reference से यह सब चीज़ समझ में आता है.
मानव आने पर उसने जीवों का अनुकरण किया। साढ़े चार क्रिया में मानव शरीर को जीवन मान करके जिया। उसमे वह स्वयंस्फूर्त नहीं हो पाया। अभी स्वयंस्फूर्त होने की ओर ध्यान दिलाने के लिए हमने प्रस्ताव रखा है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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