भौतिक और रासायनिक वस्तुओं के मूल में परमाणु है, विज्ञान ऐसा मानता है. रासायनिक वस्तुओं के मूल में यौगिक क्रिया है - यह भी मानते हैं. ये क्रियाएं स्वयंस्फूर्त हैं - यह बताना इनसे बना नहीं। विज्ञान व्यवस्था को समझा नहीं है.
यहाँ हमने व्यवस्था को निश्चित आचरण स्वरूप में प्रतिपादित किया है. दो अंश का परमाणु अपना निश्चित आचरण करता है. दो सौ अंश का परमाणु भी अपना निश्चित आचरण करता है. किसी निश्चित संख्या के अंशों से गठित परमाणु का आचरण सदा के लिए निश्चित होता है. दूसरे, हर परमाणु अपने में स्वयंस्फूर्त क्रिया करता है. व्यापक वस्तु में भीगे रहने से ऊर्जा संपन्न है, फलस्वरूप स्वयंस्फूर्त क्रिया करता है, व्यवस्था में रहता है. एक दूसरे की परस्परता के दबाव से विकार भी होता है, जिससे परमाणु में प्रस्थापन और विस्थापन होना पाया जाता है. विस्थापन होकर भी व्यवस्था में रहता है, प्रस्थापन हो कर भी व्यवस्था में रहता है.
वैसे ही गठनपूर्ण परमाणु (जीवन) भी निश्चित आचरण करता है. जीवन की दस क्रियाओं के रूप में उसको समझाया है. शरीर रचना गर्भाशय में होता है. शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव होता है. सहअस्तित्व नित्य प्रभावी है - इस आधार पर शरीर और जीवन का सहअस्तित्व हो गया. सहअस्तित्व के कारण से शरीर और जीवन का मिलन होता है. शरीर जीवन के चलाने योग्य होना स्वयंस्फूर्त रासायनिक क्रिया से होता है. परमाणु में स्वयंस्फूर्त क्रिया रही, परमाणु से रचित रचनाओं में भी स्वयंस्फूर्त क्रिया आ गयी. विज्ञान के अनुसार यह सब खींचतान से हो रहा है.
शरीर रचना ऐसा हुआ जो जीवन की दस क्रियाओं में से कुछ क्रियाओं (आशा, विचार, इच्छा) को व्यक्त करने योग्य हुआ. बाकी क्रियाओं को व्यक्त होने के लिए स्वयंस्फूर्त होने की आवश्यकता रहा. शरीर को जीवन मानने से वह नहीं हुआ. जीवन अलग है - उसकी आवश्यकता अलग है, शरीर अलग है - उसकी आवश्यकता अलग है. इन दोनों का अध्ययन होने पर जीवन स्वयं स्फूर्त विधि से दस क्रियाओं को व्यक्त करते हुए देखा। इतना ही बात है. दस क्रियाओं को व्यक्त न करने से मानव जीवों के सदृश जी गया. जीव जानवर जैसे जीते हैं, उसी मानसिकता से जी गया. ऐसे में उसने जीवों से अच्छा जीने का प्रयास किया। इस तरह चार विषयों के स्थान पर पाँच संवेदनाओं के आधार पर जीने लगा. वह भी जीव चेतना में ही हो गयी. यहाँ तक मानव अभी तक पहुँचा है. इसके आगे मानव चेतना को introduce करने के लिए हमने काम किया है. पहले यह विद्वानों को पटता नहीं रहा, अब यह विद्वानों को पट रहा है. पिछले २०-३० वर्ष में जो परिवर्तन हुआ है, वह यही है. विज्ञान के विद्वानों को यह पट रहा है, ईश्वरवादी विद्वानों को यह अभी भी नहीं पट रहा है. इसका यह कारण है, विज्ञानी इस बात में convince हो गए कि हम व्यवस्था में नहीं हैं, पर हम व्यवस्था को चाहते हैं. मतलब हम कहीं न कहीं चूक गए. दूसरे, हमने व्यवस्था को न पहचान कर जो कुछ भी किया, उससे धरती ही बीमार हो गया. धरती ही नहीं रहेगा तो आदमी कहाँ रहेगा? मध्यस्थ दर्शन के मूल प्रतिपादनों पर वे convince हो गए, यह मैं नहीं कह रहा हूँ. लेकिन इस भाग में तो वे convince हो गए हैं.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
No comments:
Post a Comment