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Tuesday, October 6, 2020

निरंतर सुख की सम्भावना

प्रश्न:  आपने लिखा है - "सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति ही मूल्य मूलक विधि से जीने का प्रमाण है, जिसमे निरंतर सुख की सम्भावना दिखने लगती है."  इसको समझाइये.


उत्तर:  जैसे ही मैंने, एक व्यक्ति ने, अनुभव मूलक विधि से जीना शुरू किया तो (मानव परम्परा के) सुख पूर्वक जीने की सम्भावना उदय हो गयी.  परिवार में जब इसको जीने में हम सफल हुए तो यह और सुदृढ़ हुआ.  पूरा मानव जाति जब ऐसे जीने के लिए चल दिया तो अपने आप से अभयता तक पहुँच गया.  यही क्रम है.  मैं स्वयं इसको जिया हूँ.  


जो हम स्वयं जियें, हमारे परिवार में सब वैसे जियें - ऐसा इच्छा होता ही है.  परिवार जब जिए, अडोस पड़ोस भी वैसा जिए - ऐसा इच्छा होता ही है.  अडोस-पड़ोस जब जिए तो पूरा गाँव-शहर ऐसा जिए - ऐसा इच्छा हो जाती है.  यदि ऐसे जीना बन जाता है तो सारा धरती के मानव ऐसा जियें , यह इच्छा बन जाता है.  अपने आप से यह फैलता है.  अपेक्षा भी फैलता है, प्रभाव भी फैलता है.


हम जैसा भी जीते हैं उसका प्रभाव एक वातावरण बनाता ही है.  मानव चेतना में जब हम जीते हैं तो वो जीव चेतना पर अपना प्रभाव डालता है.  जिसके फलस्वरूप जीव चेतना में जीने वाले में भी मानव चेतना में जीने की इच्छा हो ही जाता है.  इसी का नाम है प्रभाव!  कितना सुगम है यह आप सोच लो!  जीव चेतना में जीते हुए व्यक्ति को मानव चेतना में जीते हुए व्यक्ति से प्रेरणा मिलना शुरू होता है.  एक दिन उसमे मानव चेतना को अपनाने की इच्छा हो ही जाता है.  ऐसा चल रहे हैं हम. 


- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

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