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Friday, February 8, 2008

अध्ययन मनुष्य का मनुष्य के साथ ही होता है।

किताब से सूचना है। अध्ययन मनुष्य का मनुष्य के साथ ही होता है। दो व्यक्ति के बिना प्रमाण का प्रश्न ही नहीं है।  संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता का यदि प्रमाण होना है, तो दो व्यक्तियों का होना ही है। संज्ञानशीलता प्रमाणित होने के लिए - दो आदमियों में एक समझाने वाला, एक समझने वाला। समझने वाला समझने पर, और समझाने वाला समझा पाने पर स्वाभाविक रुप में संज्ञानशीलता प्रमाणित होती है।

संज्ञानशीलता प्रमाणित होने के बाद उसको अभ्यास रुप में लाने में कहीं भी अड़चन नहीं है। जैसे मुझे मेरी बात को प्रमाणित करने में अभी तक तो कोई अड़चन नहीं है। "हम सुनेंगे नहीं" और "हम करेंगे नहीं" - इन्ही दो कालम में लोग खडे हैं अभी। किन्तु इसका विरोध करना किसी से बनता नहीं है।

भाषा का प्रयोजन है - सूचना तक पहुँचना। भाषा अध्ययन का आरंभिक भाग है।
सुनाने पर, देखने पर आपको सूचना होता है। सुनने पर सर्वाधिक सूचना पहुँचता है, उससे कम देखने पर, उससे कम और बाक़ी संवेदनाओं से।

"मैं प्रमाणित हूँ" - यह आप के स्वीकारने पर आप प्रभावित होते हैं। उससे पहले तक आप जिज्ञासु बने रहते हैं। अध्ययन करने की इच्छा प्रकट करने तक आ जाते हैं। अध्ययन तभी होता है - जब स्वयम में यह स्वीकार हो जाता है, कि अध्ययन कराने वाला प्रमाणित है। यही "व्यक्ति प्रमाण" का आधार है।

अध्ययन एकांत में नहीं है। अध्ययन प्रमाण के साथ ही है। इसको highlight करने की जरूरत है। आज की दुनिया के लिए यह एक vigorous point है।

रासायनिक-भौतिक वस्तुएं सभी कारीगरी विधि से हमको समझ में आते हैं। जैसे जंगल से करंज के बीज बटोर के लाना एक कारीगरी है। उसका तेल बनाना, और फिर उसका डीज़ल बनाना एक कारीगरी है। इन सबको मिला कर हम गति या दूरगमन के लिए प्रयोग करते हैं।

जीवन और व्यापक को हम कारीगरी विधि से नहीं समझ सकते.  जीवन को हम अध्ययन विधि से समझते हैं। व्यापक को हम अध्ययन विधि से समझते हैं।

मानव के पास कल्पनाशीलता है।
मानव सच्चाई को चाहता है।
मानव को सच्चाई का भास-आभास होता है।
इस आधार पर पठन से अध्ययन की प्रवृत्ति बनती है।

अब जैसे आपको सूचना मिली - कि "सत्य" है, "न्याय" है, "समाधान" है
यही तीन प्रधान मुद्दे हैं अस्तित्व में। इन प्रधान मुद्दों के आधार पर (मध्यस्थ दर्शन की) सारी सूचनाएं हैं। इन सूचनाओं के आधार पर हमें लगता है, सत्य कोई वस्तु है!

अध्यात्मवादियों ने भी सत्य का कुछ प्रतिपादन किया शब्दों में.  उससे उनको कुछ सच्चाई भासी - तभी तो उसके लिए न्योछावर हुए हैं वे लोग।

अब यहाँ मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादन है - "सहअस्तित्व ही परम सत्य है"।  सहअस्तित्व होने के आधार पर, प्रकृति और व्यापक वस्तु सतत होने के आधार पर, मनुष्य के अध्ययन करने की सम्भावना बन गयी।  अध्ययन पूर्वक हम इस जगह पर पहुंच जाते हैं कि सत्य ऐसा ही है!

पहले "ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या" बताया था। और मिथ्या सत्य को अध्ययन कैसे करेगा - करके रास्ता बंद था।  अब मध्यस्थ दर्शन के अनुसार - स्थितिपूर्ण सत्ता में स्थितिशील प्रकृति सम्पृक्त है। पूर्णता के अर्थ में सम्पृक्त है।

- श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (अगुस्त २००६, अमरकंटक)

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