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Monday, April 29, 2019

प्रमाण की ही परंपरा होती है


मेरे गुरु जी (रमण मह्रिषी और आचार्य चंद्रशेखर भारती) ने मुझे कुछ कहा (साधना के लिए मार्गदर्शन दिया) - उस प्रभाव को मैंने स्वीकार कर लिया.  उस स्वीकृति के आधार पर (साधना पूर्वक) मैं प्रमाण-सिद्ध हो गया.  उसके बाद उनका प्रभाव कहाँ ख़त्म होगा?  यदि मैं प्रमाण-सिद्ध नहीं होता तो वह प्रभाव ख़त्म होता ही!  एक दूसरे के साथ होने वाली चीज़ है - प्रमाण.  प्रमाण की ही परंपरा होती है. 

जैसे - आपको मैंने कुछ समझाया, या आपने जो अध्ययन किया - यदि वह आपके जीवन में प्रमाणित हो गया तो वह अक्षय हो गया कि नहीं?  सदा के लिए हो गया तो अक्षय हो गया.  आप इसी को किसी दूसरे को समझा पाए - इस ढंग से परंपरा पूर्वक यह अक्षय होता है.  परंपरा में जो सकारात्मकता प्रवाहित होती है - वह अक्षय होती है.  नकारात्मकता कहीं न कहीं जा कर ख़त्म हो जाती है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Monday, April 15, 2019

क्रिया से क्रिया की तृप्ति संभव नहीं है

प्रश्न:  आपने मानव व्यव्हार दर्शन में लिखा है - "विषयासक्त मानव क्रिया से क्रिया की तृप्ति चाहता है, जो संभव नहीं है.  संवेदन क्रिया से ह्रास व विकास ही संभव है".  इसको समझाइये.

उत्तर:  जैसे - शरीर क्रिया (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) से शरीर क्रिया की तृप्ति पाने का प्रयास करना.  वह संभव नहीं है.  तृप्ति मन में होती है - जो शरीर क्रिया से नहीं होती.  संवेदन क्रिया शरीर से सम्बद्ध है - जो जड़ है.  जड़ विकासक्रम में है.  तृप्ति विकास (जीवन जागृति) के साथ होती है - जो एषणात्रय स्वरूप में जीने से होता है, जहाँ संज्ञानीयता में संवेदनाएं नियंत्रित रहती हैं.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Thursday, April 11, 2019

तर्क सच्चाई तक पहुँचने का सेतु है

तर्क सच्चाई (तात्विकता) तक पहुँचने का एक सेतु है.  कारण, कार्य, फल-परिणाम में सामंजस्यता करते हुए तर्क है.  तर्क साधन है, साध्य नहीं है.  तर्क को साध्य मान लेने से आदमी बतंगड़ बन जाता है.  उसका तर्क ख़त्म ही नहीं होता है!  इसी को वितंडावाद कहा है.  विज्ञान ने तर्क-सम्मत होने से शुरुआत की, किन्तु उसमे भूल यहाँ हो गयी जब उसने यह मान लिया कि आदमी सिद्धांत (नियम) बनाता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अमरकंटक)

समझदारी से सोचा जाए!

संसार में मानव परंपरा है.  मानव परंपरा ज्ञान-अवस्था में है.  इसके प्रमाण में मानव ने अपना भाषा विकसित किया.  भाषा को ज्ञान के स्वरूप में ही माना.  इस "ज्ञान" को फिर न्याय में लगाया.  फिर रहस्यमयी स्वर्ग-नर्क में लगाया.  इसमें काफी समय लगाया.  इस से समाधान नहीं निकला, बल्कि समस्या निकला - और फिर विज्ञान का प्रकटन हुआ.  विज्ञान धरती के साथ भक्कम अपराध करने में टूट पड़ा, जिससे धरती बीमार हो गयी.  यहाँ तक हम पहुँच गए.  अब क्या किया जाए?  समझदारी से सोचा जाए!  समझदारी से मानव का परिभाषा मिला - "मनाकार को साकार करने वाला और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला".  यहाँ पता चला मनाकार को साकार करना तो प्रकारांतर से होता रहा है, पर मनः स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा है.  उसको भरा जाये!  इसको भरने के लिए चेतना विकास - मूल्य शिक्षा बताया.  जीव चेतना से मानव चेतना श्रेष्ठ, मानव चेतना से देव चेतना श्रेष्ठतर, देव चेतना से दिव्य चेतना श्रेष्ठतम.  इन तीनो को अध्ययन कराने की व्यवस्था दे दी.  चेतना विकसित होने पर मूल्यों का प्रकटन सहज होता है.  जिससे धरती को अखंड राष्ट्र, सर्व मानव को एक जाति, एक धर्म स्वरूप में पहचानना बन जाता है.  इस आधार पर सार्वभौम व्यवस्था होती है.  सहअस्तित्व विधि से व्यवस्था ही होता है, शासन नहीं होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अमरकंटक)

Thursday, March 14, 2019

साम्य ऊर्जा मनुष्य प्रकृति में ज्ञान स्वरूप में है.

जो कुछ भी प्रकृति में प्रकटन हुआ है वह नियम से हुआ है.  नियम के मूल में आशय होता है.  वह आशय क्या है?  वह आशय साम्य ऊर्जा (सत्ता) है.  साम्य ऊर्जा मनुष्य प्रकृति में ज्ञान स्वरूप में है.  वह ज्ञान प्रमाणित हो जाए - इसलिए मानव तक प्रकृति में प्रकटन हुआ.  एक तरफ़ परमाणु में गठनपूर्णता और दूसरी तरफ रचना में विकास होते हुए मानव शरीर रचना का प्रकटन हुआ.  मानव शरीर रचना द्वारा ही जीवन सहज कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता प्रमाणित है.  उसके आधार पर मानव में ज्ञान की आवश्यकता है.  मानव की परिभाषा है - मनाकार को साकार करने वाला और मनः स्वस्थता का आशावादी व प्रमाणित करने वाला. मनाकार को साकार करने में मानव सफल हुआ है, मनः स्वस्थता का प्रमाणित होना अभी शेष है. उसकी आवश्यकता आपको भी लगती है, मुझे भी लगती है - इस आधार पर हम काम कर रहे हैं.

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अछोटी)

Monday, December 24, 2018

अनुभव पूरा होता है, उसका अभिव्यक्ति क्रम से होता है.




अनुभव पूरा होता है, उसका अभिव्यक्ति क्रम से होता है.  जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन के लिए अनुभव एक साथ ही होता है.  वह क्रम से मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना के रूप में प्रमाणित होता है.  अनुभव होने पर दृष्टा पद में हो गए.  मैं समझ गया हूँ - इस जगह में रहते हैं.  समझा हुए को वितरित करना मानव परंपरा में ही होगा.  इसमें पहले मानव चेतना ही वितरित होगी, फिर देव चेतना, फिर दिव्य चेतना.  ऐसा क्रम बना है.

अनुभव के बिना मानव चेतना आएगा नहीं.  पूरे धरती पर मानव चेतना के प्रमाणित होने के स्वरूप में कम से कम ५% लोग अनुभव संपन्न रहेंगे ही, भले ही बाकी लोग उनका अनुकरण करते रहे.  अनुभव सम्पन्नता के साथ देव चेतना और दिव्य चेतना में प्रमाणित होने का अधिकार बना ही रहता है.  परिस्थितियाँ जैसे-जैसे बनती जाती हैं, वैसे-वैसे उसका प्रकटन होता जाता है.

दिव्यचेतना के धरती पर प्रमाणित होने का अर्थ है - सभी लोग मानव चेतना और देव चेतना में जी रहे हैं.  तभी दिव्य चेतना का वैभव है.  दिव्य चेतना के आने के बाद धरती पर कोई प्रश्न ही नहीं है!  उसके बाद मानव इस धरती को अरबों-खरबों वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है.  यह धरती अपने में शून्याकर्षण में है.  यह ख़त्म होने वाला नहीं है.  मानव यदि बर्बाद न करे तो यह धरती सदा के लिए है.

- श्रद्धेय श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Wednesday, December 12, 2018

परिवार की बात विगत के शास्त्रों में नहीं है.



बोलना कोई जीना नहीं है.  जीने में समाधान ही होगा, समृद्धि ही होगा - और इसके अलावा कुछ भी नहीं होगा.  बोलना एक 'सूचना' है.  'जीना' प्रमाण है.  जीने में समाधान-समृद्धि ही प्रमाण है - और कुछ प्रमाण होता नहीं है.  आप कहीं से भी ले आओ - मानव लक्ष्य इन दोनों में ही ध्रुवीकृत होता है.  परिवार का डिजाईन समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने से निकलता है.

"परिवार" शब्द मानव परंपरा में है किन्तु शास्त्रों में नहीं है.  शास्त्रों में परिवार की बात करते तो उसका डिजाईन बताना पड़ता!  मध्यस्थ दर्शन के पहले जो कुछ भी शास्त्रों में है - उसमें परिवार का कोई डिजाईन नहीं है.  परिवार का डिजाईन बताने की अर्हता विगत के शास्त्रकारों के पास नहीं है.  वहां "व्यक्ति" से सीधे "समाज" की बात की गयी है.  यहाँ (मध्यस्थ दर्शन) के अलावा परिवार के बारे में कोई चूं नहीं किया है!  परिवार का लिंक ही छूट गया - इसलिए दूरी बनी रही.  सहअस्तित्व विधि को छोड़ करके इस लिंक को कोई नहीं जोड़ सकता.  व्यक्ति और समाज के बीच परिवार एक सेतु है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)