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Saturday, July 18, 2015

स्वानुशासन

समाधान के इस प्रस्ताव में तर्क द्वारा छेद करने की कोई जगह नहीं है.  समस्या की हर बात में छेद रहता ही है.  तर्क का प्रतितर्क देने से समाधान नहीं होता।  समाधान से तर्क संतुष्ट होता है.  समाधान के आगे तर्क करने की ताकत ही समाप्त हो जाता है.  प्रमाण सामने हो, अनुभव सामने हो तो फिर उससे क्या तर्क करेंगे?  मैं स्वयं अनुभव संपन्न हो कर समाधान-समृद्धि का प्रमाण हूँ.  समाधान के साथ तर्क होता ही नहीं है, कुतर्क भी नहीं होता.

अवधारणा होते तक तर्क है, अवधारणा के बाद कोई तर्क नहीं है.  तर्क पुरुषार्थ के साथ है, वहाँ उसका प्रयोग होना भी चाहिए।  किन्तु पुरुषार्थ के बाद परमार्थ में तर्क का प्रयोग नहीं है.  परमार्थ में पुरुषार्थ विलय होता ही है. पुरुषार्थ परमार्थ में समावेश होता ही है.  पुरुषार्थ परमार्थ का समर्थन देता ही है.  यह नियम है, नियति-सम्मत है.

मानव जब से इस धरती पर प्रकट हुआ तभी से न्याय को स्वयंस्फूर्त चाहता है.  न्याय की चाहत मानव में आदि काल से है, पर उसको न्याय मिला नहीं।  मानव को न्याय मिला नहीं पर उसकी चाहना उसमें बरकरार रही.  यह कैसे हो गया?  आप भी न्याय चाहते हैं, मैं भी न्याय चाहता हूँ.  चाहने में हम एक समान हैं.  अब मैं जो पाया हूँ, उसको न्याय माना जाए तो उसको अनुकरण किया जा सकता है, फिर प्रमाणित करके देखा जा सकता है.  अनुकरण करने पर प्रमाणित करने की इच्छा होता ही है.  प्रमाणित करने पर परंपरा बनेगी।  परंपरा की फिर पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता होती है.  परंपरा के रूप में स्थापित हो जाना एक सौभाग्यशाली स्थिति होती है.  न्याय के इस प्रस्ताव में कोई कमी हो तो बताओ?  यदि कमी नहीं है तो प्रभावशील होने की बात है.  उसके लिए एक व्यक्ति से शुरुआत हुई, उससे १००-२०० व्यक्ति प्रभावित हुए, आगे कैसे होगा इसको देखते हैं!  प्रभावित होने का मतलब है, उसको समझने और प्रमाणित करने के लिए सही दिशा में प्रयत्नशील होना।

प्रश्न: न्याय के लिए हमारा प्रयत्नशील होना स्वयंस्फूर्त है या प्रभाववश है - इसको कैसे पहचानें?

उत्तर: न्याय की चाहत आपमें (हर मानव में) स्वयंस्फूर्त है.  अध्ययन विधि से न्याय की प्रेरणा है.  अध्ययन विधि से जागृति की ओर बढ़ते हुए पहला घाट है - साक्षात्कार।  दूसरा घाट है - बोध.  तीसरा घाट है -अनुभव।  अनुभव फिर प्रमाण का स्त्रोत होता है.  प्रमाण का फिर पुनः बोध, फिर चिंतन-चित्रण, फिर तुलन-विश्लेषण, फिर आस्वादन और चयन.  अनुभवमूलक विधि से, इस प्रकार मानव के जीने में न्याय स्वयंस्फूर्त हो जाता है.  इसको जितना भी चाहे मानव विश्लेषण कर सकता है, दूसरों को समझा सकता है.  मानव समझदार होने के बाद उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता विधि से स्वानुशासित होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)

Saturday, April 18, 2015

ऊर्जा और क्रिया

प्रश्न: ऊर्जा और क्रिया का क्या सम्बन्ध है?

उत्तर: सत्ता साम्य ऊर्जा है, जिसमे सम्पृक्त होने से इकाइयां ऊर्जा-संपन्न हैं. ऊर्जा-संपन्न होने से क्रियाशीलता है. क्रियाशीलता का प्रभाव कार्य-ऊर्जा है. प्रभाव के आधार पर ही फल-परिणाम होता है. प्रभाव से ही सृजन, विसर्जन और विभव क्रियाएँ संपन्न होती हैं.


- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)
 

Friday, April 17, 2015

भाव, पूरकता और पहचान

प्रश्न:  "अस्तित्व स्वयं सम्पूर्ण भाव होने के कारण प्रत्येक इकाई में भाव-सम्पन्नता देखने को मिलती है.  मूलतः सहअस्तित्व ही परम भाव होने के कारण अस्तित्व ही परम धर्म हुआ."  यहाँ भाव और सम्पूर्ण भाव से क्या आशय है?

उत्तर:  सूत्र रूप में :- भाव = मौलिकता = स्वभाव

अस्तित्व में व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तु होने के कारण उसे "सम्पूर्ण भाव" कहा गया.  व्यापक वस्तु नित्य पारगामी, पारदर्शी भाव संपन्न है.  एक-एक वस्तु चार अवस्थाओं में अपनी अवस्थाओं के अनुसार भाव (स्वभाव) संपन्न है.  पदार्थावस्था में संगठन-विघटन स्वभाव, प्राणावस्था में सारक-मारक स्वभाव, जीवावस्था में क्रूर-अक्रूर स्वभाव, ज्ञानावस्था में धीरता-वीरता-उदारता दया-कृपा-करुणा स्वभाव। 

स्वभाव गति से पूरकता सिद्ध होती है.

प्रश्न: "स्वभाव हर इकाई में मूल्यों के रूप में वर्तता है"
"मूल्य प्रत्येक इकाई में स्थिर होता है"  - यहाँ वर्तने और स्थिरता से क्या आशय है?

उत्तर: वर्तने का मतलब है - वर्तमान रहना।
स्थिरता का मतलब है - निरंतर रहना।

प्रश्न: "अस्तित्व सहअस्तित्व होने के कारण पूरकता और पहचान नित्य सिद्ध होती है."  पूरकता और पहचान से क्या आशय है?

उत्तर: प्रत्येक एक (इकाई) प्रकाशमान है.  प्रकाशित होने का अर्थ है - स्वयं का पहचान प्रस्तुत करना। 

दो परमाणु-अंशों के बीच पहचान होता है तभी परमाणु निश्चित आचरण या व्यवस्था स्वरूप में कार्य करते हुए देखने को मिलता है.  इस तरह परमाणु अंशों में परस्पर पहचान निश्चित आचरण या व्यवस्था के लिए पूरक हुआ. 

इसके उपरान्त, व्यवस्थित परमाणुओं की परस्परता में विकास-क्रम और विकास के रूप में पहचान और पूरकता होना पाया गया.  विकास (गठन-पूर्णता) पहचान और पूरकता के आधार पर ही घटित होना पाया जाता है.

इसी क्रम में मानव अपने मानवत्व के साथ पहचान होने के उपरान्त परस्परता में पूरकता प्रमाणित होना देखा जाता है. 

श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)

Wednesday, April 8, 2015

नौकरी की औचित्यता

प्रश्न: स्वावलंबन के लिए नौकरी करना क्या उचित है?

उत्तर: जागृत मानव परंपरा में नौकरी का स्थान शून्य है.  भ्रमित मानव परंपरा में नौकरी के लिए स्वीकृति न्यूनतम श्रम, जिम्मेदारी से अधिकतम दूर रहने, और अधिकतम सुविधा-संग्रह के आधार पर होता आया है.  अभी की स्थिति में जिम्मेदारी से मुक्त सुविधा संपन्न होने की अपेक्षा रखने वालों की संख्या में वृद्धि हो गयी है.  इसी कारणवश सर्वाधिक समस्याएं देखने को मिल रहा है.

स्वावलम्बन परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिम्मेदारी का वहन है.  परिवार की जिम्मेदारी वहन करने का प्रमाण सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के साथ समाधान-समृद्धि को प्रमाणित करना है.  परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना ही समृद्धि का स्त्रोत है.  इस पर गंभीरता से सोच-विचार करके आचरण करने की आवश्यकता है. 

- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में, १९ जुलाई २००१)

 

Monday, April 6, 2015

देश-काल की सीमा

प्रश्न: आप कहते हैं - "चैतन्य जड़ से बना नहीं है, विकसित हुआ है".   आपने यह भी कहा है - "जड़ परमाणु चैतन्य पद में संक्रमित हो जाता है".   लेकिन आप यह भी कहते हैं - "जड़ और चैतन्य दोनों हमेशा-हमेशा से थे, हमेशा रहेंगे".  इसको समझाइये।

उत्तर: मानव व्यवहार दर्शन में जड़ और चैतन्य की चर्चा करते हुए परमाणु में विकास के नाम से अवधारणाओं को प्रस्तुत किया है.  उसमें इस बात को स्पष्ट किया है कि विकास-क्रम और विकास मानव को समझ में आता है.  विकसित परमाणु के अर्थ में जीवन क्रियाकलाप प्रमाणित है.   विकासक्रम में भौतिक-रासायनिक क्रियाकलाप प्रमाणित है.  जड़ कब और कैसे चैतन्य होता है? - इस प्रश्न का उत्तर देश और काल की सीमा में आता नहीं है.  हम जो "है" उसका अध्ययन करते हैं.  विकास-क्रम है.  विकास है.  विकास-क्रम और विकास को जोड़ कर देखने से पता लगता है, और हम कह सकते हैं कि जड़ ही चैतन्य हुआ है.  गठन-पूर्णता की यह घटना विकास पूर्वक ही घटित रहना पाया जाता है. 

यह सुनकर विकास को घटित कराने के लिए मानव में प्रवृत्ति होती ही है.  इसके लिए पुनः प्रयोग विधि ही सामने आती है.  प्रयोग विधि देश-काल की सीमा में होती है.  प्रयोग के लिए आपके पास जो साधन हैं, वे यंत्र ही हैं.  जो जिससे बना होता है, वह उससे अधिक होता नहीं है.  मानव जितने भी यंत्र बना पाया है, वे भौतिक संसार से ही बने हैं.  प्राण-संसार के साथ जो प्रयोग हुए हैं, उनका बीज रूप वनस्पति संसार से ही प्राप्त रहना देखा गया है. प्रयोग विधि से विकास (गठनपूर्णता) को सिद्ध नहीं किया जा सकता। 

दूसरे, इस सच्चाई को भी देखा गया है कि अस्तित्व की व्याख्या देश-काल की सीमाओं में हो नहीं पाती।  अस्तित्व की व्याख्या सर्व-देश और सर्व-काल के आधार पर ही है.  देश और काल के आधार पर घटना को पहचानने के क्रम में किसी वस्तु का सच्चाई समझ नहीं आती.  सर्व-देश सर्व-काल के आधार पर सम्पूर्ण वस्तुओं का सच्चाई समझ में आता है.  इस विधि से हम इस निष्कर्ष में आते हैं कि विकास, विकास-क्रम से संक्रमण पूर्वक जुड़ा हुआ है.  यह कब जुड़ा?  यह प्रश्न देश-काल बाधित है.  अतएव इस मुद्दे को अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान परक सत्य के रूप में स्वीकारना ठीक होगा। 

श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से, एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में (१५ मई २००१, अमरकंटक)

चैतन्य पद प्रतिष्ठा

प्रश्न: चैतन्य पद प्रतिष्ठा क्या है?

उत्तर: जड़ प्रकृति परिणामशील है.  हर परिणाम पद अपने में एक यथास्थिति एवं व्यवस्था है.  गठनपूर्ण परमाणु के रूप में परमाणु संक्रमित हुआ रहता है, इसे हम चैतन्य पद कह रहे हैं.  इसके साथ जो प्रतिष्ठा जुडी हुई है वह चैतन्य पद की अक्षुण्णता के अर्थ में है.  एक बार चैतन्य पद में संक्रमित होता है, उसके बाद जड़ पद में वापस लौटता नहीं है.   यह भी स्पष्ट किया है कि चैतन्य परमाणु भार-बंधन और अणु-बंधन से मुक्त रहता है.  जीवन जीने की आशा पूर्वक एक पुन्जाकार कार्य गति पथ को प्रभाव क्षेत्र के रूप में स्थापित करके उस आकार के प्राण कोशाओं से रचित शरीर को स्वयं स्फूर्त संचालित करता है.  जीवन भ्रम वश अपने पुन्जाकार के अनुरूप शरीर को पाकर स्वयं को जीता हुआ मान लेता है, और जब वह शरीर छूट जाता है तो स्वयं को मरा हुआ मान लेता है. 

जीवन का स्वयं को शरीर मान लेना ही भ्रम का स्वरूप है.  मानव परंपरा में शनैः शनैः यह भ्रम आशा बंधन से विचार बंधन, विचार बंधन से इच्छा बंधन होता हुआ आंकलित होता है.  इस भ्रम-बंधन से मुक्ति पाना ही मोक्ष है.  इसीलिये जीवन में, से, के लिए जीवन ज्ञान की आवश्यकता महसूस की गयी.  चैतन्य संसार को अध्ययन गम्य, बोध गम्य कराने के क्रम में चैतन्य पद एवं प्रतिष्ठा को सूत्रित एवं व्याख्यायित किया है. 
 
प्रश्न: परावर्तन और प्रत्यावर्तन को जीवन के सन्दर्भ में समझाएं?

उत्तर: जीवन गति = परावर्तन, जीवन गति के प्रभाव क्षेत्र व्यापी फल-परिणामों को मूल्यांकित करना और स्वीकारना = प्रत्यावर्तन

इसे प्रत्येक व्यक्ति सदा-सदा करता ही रहता है.  इसे आप भी निरीक्षण-परीक्षण कर सकते हैं. 

जीवन सहज परावर्तन-प्रत्यावर्तन क्रिया विधि से मानव अध्ययन, शोध व अनुसंधान करने में सफल होता आया है.  कुछ भागों में सफल होना अभी शेष है.  जैसे - जीवन गति (या परावर्तन) के संवेदनशीलता सीमा में अनुकूलता-प्रतिकूलता का मूल्यांकन करने में (या प्रत्यावर्तन में) मानव सफल हुआ है, जिसका अध्ययन सुलभ हुआ है, जो आहार-आवास-अलंकार और दूरगमन, दूरदर्शन, दूरश्रवण सम्बन्धी वस्तुओं को प्राप्त कर लेने की सीमा में दृष्टव्य है.  इस तरह मनाकार को साकार करने में जीवन सहज परावर्तन-प्रत्यावर्तन क्रिया विधि से मानव सफल हुआ है.

मनः स्वस्थता को परावर्तन-प्रत्यावर्तन पूर्वक प्रमाणित करने में मानव असफल रहा है.  इस रिक्तता को भरने के लिए संज्ञानीयता (सह-अस्तित्व रुपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ) हेतु आवश्यकीय अध्ययन के सन्दर्भ में मध्यस्थ दर्शन प्रस्तुत हुआ है.  इसे प्रत्येक मानव को अध्ययन करना ही होगा। 

- श्री ए नागराज की डायरी से, एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में (२८ अप्रैल २००१, अमरकंटक)

Sunday, March 29, 2015

जीवन कार्यकलाप

प्रत्येक जीवन एक अनुस्यूत क्रिया है.  जीवन में मनन, विचार, इच्छा, बोध एवं अनुभव अविभाज्य और अनिवार्य क्रियाएँ हैं. 

मन - मनन क्रिया

मनन क्रिया मान्यताओं पर आधारित जीवन गति है.

मनन सीमावर्ती मान्यताएं चयन और आस्वादन के रूप में गण्य होती हैं.  चयन क्रियाएँ अधिकांशतः रूचिमूलक होती हैं, और रुचियाँ सर्वाधिक इन्द्रिय सन्निकर्ष पूर्वक ही प्रमाणित हो पाती हैं.  इन्द्रिय-सन्निकर्ष = इन्द्रियों के योग वियोग में होने वाले प्रभाव व स्वीकृतियां।  शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों के अनुकूल अर्थात "अच्छा लगने" वाले योग, संयोग, वियोगात्मक मान्यताएं चयन और आस्वादन के रूप में व्यक्त, सम्प्रेषित व प्रकाशित होती हैं।  शरीर को जीवन समझते पर्यन्त जीवन की सम्पूर्ण शक्तियां इन्द्रिय सन्निकर्ष के अर्थ में कार्यरत पायी जाती हैं.  यही भ्रम का मूल कारण है.  भ्रम का अर्थ है - अस्तित्व में नियति सहज भाव को कम, ज्यादा या नहीं मूल्याङ्कन करना।  निर्भ्रम का अर्थ है - जो जैसा है, उसको वैसा ही मूल्याङ्कन करना।  यह जागृति पूर्वक होता है.  इस प्रकार मनन क्रिया में भ्रम और निर्भ्रम का स्पष्ट स्वरूप अभिहित (स्पष्ट) होता है.  अतः चयन एवं आस्वादन क्रियाएँ इन्द्रिय सन्निकर्ष सीमावर्ती होने से भ्रमित मनन है.  निर्भ्रम मनन का तात्पर्य जीवन-तृप्ति यथा प्रामाणिकता, समाधान, सह-अस्तित्व एवं अभय पूर्वक चयन और आस्वादन क्रिया संपादित होने से है. 

वृत्ति - विचार क्रिया

विचार क्रिया विश्लेषण एवं तुलनों पर आधारित जीवन गति है.

विचार सहित ही मानव शरीर में जीवंतता प्रमाणित हो पाती है.  अधिकांशतः विश्लेषण की सम्पूर्ण वस्तु भौतिक एवं रासायनिक रूप तक ही सीमित रहती है, एवं गुणों का विश्लेषण न्यूनतम ही होता है. 

प्रत्येक इकाई अपनी सम्पूर्णता में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म का अविभाज्य वर्तमान होती है.  अतः इसका यथार्थ विश्लेषण इसकी सम्पूर्णता, अर्थात चारों आयामों के विश्लेषण से ही संभावित है.  इस तरह केवल रूप और गुण किसी इकाई की सम्पूर्णता विश्लेषित नहीं होती, फलतः जागृति प्रमाणित नहीं होती।  जीवन के जागृति क्रम में विश्लेषण एक सोपान है.  जागृत विश्लेषणों के आधार पर प्राप्त निष्कर्षों का तुलन जीवन सहज है.  प्रत्येक मनुष्य प्रियप्रिय, हिताहित, लाभालाभ, न्यायान्याय, धर्माधर्म और सत्यासत्य तुलन क्रिया को व्यक्त करता है.  यह क्रम से वरीय होते हैं.  यही विकास का प्रधान कसौटी है.  इस कसौटी में जब क्रम से न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य का प्रभेद जब स्वत्व के रूप में उजागर हो जाता है, तभी इन मुद्दों में जागृति का पद पाता है.  इस प्रकार न्याय, धर्म और सत्य को जानने, मानने व उसके गतिक्रम को पहचानने व निर्वाह करने का तुलनात्मक विचारक्रम जागृति को प्रशस्त करता है. 

चित्त - इच्छा क्रिया

इच्छा क्रिया चिंतन व चित्रण पर आधारित जीवन गति है एवं चित्त में संपादित होती है.

सम्पूर्ण विश्लेषणात्मक एवं तुलनात्मक विचारों का सम्पादन करना ही चित्त की चित्रण क्रिया है, जिससे प्रवर्तन का मार्ग प्रशस्त हो जाता है.  प्रशस्त होने का तात्पर्य प्रकाशन से है.  चित्रण क्रिया प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ सीमावर्ती होने की स्थिति में पुनः इन्द्रिय सन्निकर्ष अवधि में ही सर्वाधिक विनियोजित हो जाता है.  इससे वरीय न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य विचारों को चित्रित करने की स्थिति में मनुष्य जीवन सहज ही व्यवहारिक हो जाता है.    व्यवहारिक होने का तात्पर्य समाज न्याय का पात्र और समाज न्याय प्रदान करने की योग्यता सम्पन्नता है.  यही जागृति और समाधान का तात्पर्य है.  इस प्रकार चित्रण क्रिया से जागृत और अजागृत मानव का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है. 

चिंतन क्रिया जीवन में विवेचनात्मक प्रक्रिया है.  विवेचना स्वयं प्रयोजन व उसकी क्रम-बद्धता को पहचानने और निर्वाह करने की प्रक्रिया है.  यह प्रक्रिया शरीर यात्रा और जीवन तृप्ति के संतुलन अथवा संतुलन बिंदु को पहचानने के अर्थ में नित्य क्रियाशील है.  जीवन तृप्ति का अर्थ व्यवहार में अभयता, समाधान एवं सह-अस्तित्व ही है.  यह चिंतन से निष्कर्षात्मक होने की अभिव्यक्तियाँ हैं. 

बुद्धि - बोध क्रिया

बोध क्रिया 'अवधारणा' व 'संकल्प' पर आधारित जीवन गति है. 

अवधारणा मुख्यतः स्वभाव और धर्म से सम्बंधित है.

सम्पूर्ण इकाइयाँ चार अवस्थाओं के रूप में गण्य हैं.  प्रधम - पदार्थावस्था, जो मृद, पाषाण, मणि, धातु व उसके विकार के रूप में वर्तमान हैं.  द्वितीय - प्राणावस्था, जो वनस्पति और उसके बीजानुषंगीय पंरपरा एवं उसके विकारों के रूप में विद्यमान है.  तृतीय - जीवावस्था, जो मनुष्येत्तर जीव व उसके वंशानुषंगीय परंपरा पूर्वक आहार-विहार विन्यास के रूप में वर्तमान है.  चतृर्थ - ज्ञानावस्था, मानव एवं उसकी संस्कारनुषंगीय परंपरा पूर्वक आहार, विहार, व्यवस्था, अभ्यास, अनुसंधान, एवं शिक्षा के रूप में अभिव्यक्त एवं प्रकाशित है, तथा पशुमानव, राक्षसमानव, मानव, देवमानव, दिव्यमानव की कोटि में गण्य है.  पशुमानव व राक्षसमानव असामाजिक, मानव सामाजिक तथा देवमानव  व दिव्यमानव सामाजिकता के प्रेरणा स्त्रोत होते हैं.  ये जागृतिक्रम तथा अवधारणाओं के आधार पर होने वाले प्रवर्तन हैं.  ऐसे प्रवर्तन तीन स्वरूप में गण्य हैं - रुचिमूलक, मूल्यमूलक और लक्ष्यमूलक।  रुचिमूलक प्रवर्तन में मनुष्य पशुमानव व राक्षसमानव के अर्थ को प्रकाशित करता है.  मूल्य मूलक प्रवर्तन रत मनुष्य मानवीयता को व्यक्त, सम्प्रेषित, व प्रकाशित करता है, जो स्वयं में व्यवस्था है.  लक्ष्य मूलक प्रवर्तन जीवन जागृति के अर्थ में सार्थक अभिव्यक्ति करता है एवं देवमानव व दिव्यमानव की कोटि में ख्यात होता है.  साथ ही मानवीयता से देवमानवीयता की ओर गति एवं दिशा का प्रेरक तथा कारक भी होता है.  इस प्रकार अवधारणाओं के आधार पर मानव तीन प्रकार से प्रवर्तित होता हुआ मिलता है.  ऐसा प्रवर्तन मूलतः संकल्प के रूप में होता है. 

संकल्प अवधारणाओं के प्रति प्रतिबद्धता ही है. 

रुचिमूलक प्रणाली के प्रति प्रतिबद्धता हठवादिता कहलाती है एवं मूल्यमूलक तथा लक्ष्यमूलक प्रणालियों के प्रति सम्पूर्ण प्रतिबद्धताएं निष्ठा के रूप में गण्य होती है.   

आत्मा - अनुभव क्रिया

अनुभव क्रिया आनंद और प्रामाणिकता पर आधारित जीवन गति है.

आनंद ही संतोष, शान्ति व सुख के नाम से इंगित होता है तथा प्रामाणिकता गति में व्यक्त होती है.  यही प्रत्येक मनुष्य का अभीष्ट एवं वर है.  प्रामाणिकता मूलक अवधारणाएं अभिव्यक्ति एवं सम्प्रेष्णा में समाधान के रूप में तथा व्यवहार में न्याय के रूप में प्रकाशित होती हैं.  इसी तारतम्य में धर्मपूर्ण विचार व न्याय पूर्ण व्यवहार एवं नियमपूर्ण व्यवसाय हैं, और ऐसी मनन क्रिया शिष्टता के रूप में व्यक्त होती है. 

जाने हुए को मानने और माने हुए को जानने के क्रम में अनुभव क्रिया नित्य समीचीन और प्रसवशील है, क्योंकि अनुभव के अनन्तर अनुभव का उदय होता ही है.  यही जीवन जागृति व अनुभव क्रम है. 

अस्तु! जीवन विद्या में पारंगत व्यक्ति स्वयं में विश्वास और श्रेष्ठता के प्रति सम्मान के अर्थ में समीचीन है.  जीवन विद्या पर आधारित शिक्षा के द्वारा राष्ट्रीय चरित्र में सार्वभौमता समीचीन होने की पूर्ण सम्भावना है.  इसे चरितार्थ करना ही हमारी प्रतिज्ञा है. 

शिक्षा संस्थानों में जीवन विद्या का क्रियान्वयन तीन चरणो में समपन्न होता है: -

प्रथम चरण: - अस्तित्व में जीवन, जीवनी क्रम और जीवन जागृति  सम्बन्धी सम्पूर्ण अवधारणा, अर्थात जीवन दर्शन को चिंतनाभ्यास पूर्वक हृदयंगम करना।

द्वितीय चरण: - जीवन की महिमा, प्रक्रिया व स्वरूप के प्रति जागृति व प्रामाणिकता पूर्वक पारंगत होना तथा व्यवहार में चरितार्थ करना।

तृतीय चरण: - जीवन विद्या के प्रबोधन पूर्वक चिंतन में आरूढ़ होने तथा व्यवहाराभ्यास पूर्वक प्रामाणिक होने का मूल्यांकन करना। 

(श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से)