ANNOUNCEMENTS



Friday, April 17, 2015

भाव, पूरकता और पहचान

प्रश्न:  "अस्तित्व स्वयं सम्पूर्ण भाव होने के कारण प्रत्येक इकाई में भाव-सम्पन्नता देखने को मिलती है.  मूलतः सहअस्तित्व ही परम भाव होने के कारण अस्तित्व ही परम धर्म हुआ."  यहाँ भाव और सम्पूर्ण भाव से क्या आशय है?

उत्तर:  सूत्र रूप में :- भाव = मौलिकता = स्वभाव

अस्तित्व में व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तु होने के कारण उसे "सम्पूर्ण भाव" कहा गया.  व्यापक वस्तु नित्य पारगामी, पारदर्शी भाव संपन्न है.  एक-एक वस्तु चार अवस्थाओं में अपनी अवस्थाओं के अनुसार भाव (स्वभाव) संपन्न है.  पदार्थावस्था में संगठन-विघटन स्वभाव, प्राणावस्था में सारक-मारक स्वभाव, जीवावस्था में क्रूर-अक्रूर स्वभाव, ज्ञानावस्था में धीरता-वीरता-उदारता दया-कृपा-करुणा स्वभाव। 

स्वभाव गति से पूरकता सिद्ध होती है.

प्रश्न: "स्वभाव हर इकाई में मूल्यों के रूप में वर्तता है"
"मूल्य प्रत्येक इकाई में स्थिर होता है"  - यहाँ वर्तने और स्थिरता से क्या आशय है?

उत्तर: वर्तने का मतलब है - वर्तमान रहना।
स्थिरता का मतलब है - निरंतर रहना।

प्रश्न: "अस्तित्व सहअस्तित्व होने के कारण पूरकता और पहचान नित्य सिद्ध होती है."  पूरकता और पहचान से क्या आशय है?

उत्तर: प्रत्येक एक (इकाई) प्रकाशमान है.  प्रकाशित होने का अर्थ है - स्वयं का पहचान प्रस्तुत करना। 

दो परमाणु-अंशों के बीच पहचान होता है तभी परमाणु निश्चित आचरण या व्यवस्था स्वरूप में कार्य करते हुए देखने को मिलता है.  इस तरह परमाणु अंशों में परस्पर पहचान निश्चित आचरण या व्यवस्था के लिए पूरक हुआ. 

इसके उपरान्त, व्यवस्थित परमाणुओं की परस्परता में विकास-क्रम और विकास के रूप में पहचान और पूरकता होना पाया गया.  विकास (गठन-पूर्णता) पहचान और पूरकता के आधार पर ही घटित होना पाया जाता है.

इसी क्रम में मानव अपने मानवत्व के साथ पहचान होने के उपरान्त परस्परता में पूरकता प्रमाणित होना देखा जाता है. 

- श्री ए नागराज की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)

1 comment:

Shobhit said...

Dear Rakesh Bhai,
This is comment relates only subtly to the post -
Template for a typical idealist principle is - “For X you ‘must become’ Y” - does this model work ?
Do idealist principles work ?
If they did then shouldn’t we be having reduced number of wars, violence and abuse in the society ?
If the idealist principles worked then shouldn’t there be reduced number of disagreements in our personal lives.
Does idealism scale ?
If you think about it, anything that can scale, by definition, is something that is applicable to everyone. If it is not applicable to you then the idea stops at you and cannot grow. Are temple/church goers increasing or decreasing in number ? Should we try new means to increase that number or should we try to understand whats missing in the current sense of religion and worship ?
Does religion scale in its current sense ?
Does politics scale in its current sense ?

Would it not be convenient if everyone had the same notion for religion, politics, business etc ?
Is there any harm in having unambiguos definitions for real world concepts ?
If perceptions are different then how can we scale mutual agreeements ?
If harmony is desired then shouldn’t we be wanting to scale mutual agreements.
With so many disagreements around the world causing mass destruction to both life and earth, as earthlings, shouldn’t we prioritize finding these set of definitions of real world concepts that scale universally and then use our logic to comprehend them. Fortunately, Madhyasth darshan has already done the heavy lifting for you. It is a discovery ,by Shree A Nagraj of Amarkantak, India, of universal definitions of everything that matters. If you are a seeker of truth then the Madhyastha darshan is your snitch.
(Let me know if this makes sense to you )