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Friday, March 16, 2012

मूल्यांकन और समीक्षा

परीक्षण, निरीक्षण और सर्वेक्षण के आधार पर मूल्यांकन होता है.  परीक्षण का मतलब है - वस्तु कैसा है?  निरीक्षण का मतलब है - प्रयोजन क्या है?  सर्वेक्षण का मतलब है - कितना है?

किसी भी वस्तु का परीक्षण किये बिना उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता.  वैसे ही स्वयं का और सामने व्यक्ति का परीक्षण किये बिना हम उसका मूल्यांकन नहीं कर सकते.  स्वयं का परीक्षण करने के बाद ही स्वयं का मूल्यांकन हो पाता है.   वैसा ही दूसरे व्यक्ति के साथ भी है.

स्व-निरीक्षण में अपनी उपयोगिता और प्रयोजन को समझने की बात है.  प्रयोजन ही पूरकता है.  अपनी उपयोगिता और पूरकता (प्रयोजन) को समझे बिना हम दूसरों को क्या समझायेंगे?  यदि प्रयोजन नहीं है तो आडम्बर है.  यदि आडम्बर है तो संसार के लिए हानिप्रद है.

प्रश्न:  मूल्यांकन और समीक्षा में क्या अंतर है?

उत्तर: अनावश्यकता (पूरकता-उपयोगिता के विपरीत कार्य-कलाप) की समीक्षा होती है, आवश्यकता (पूरकता-उपयोगिता सहज कार्य-कलाप) का मूल्यांकन होता है.  अनावश्यकता की समीक्षा नहीं होगी तो अनावश्यकता कम कैसे होगा?  आवश्यकता का मूल्यांकन नहीं होगा तो सही के लिए उत्साहित कैसे होंगे?  मूल्यांकन और समीक्षा दोनों होना आवश्यक है.  आवश्यकता को लेकर प्रोत्साहित कर दिया, गलती को छुपा दिया - यह महान अपराध है.  थोडा भी गलती हो तो उसको उजागर करना चाहिए.  उजागर करने का मतलब - जिसने गलती किया, उसको अवगत कराना.  दूसरे की गलती का प्रचार करने का कोई फायदा नहीं है.

प्रश्न: हम जब दूसरे का मूल्यांकन करें तो यदि हम केवल उसके 'सही' को बताएं, उसकी 'गलती' को न बताएं - तो इसमें क्या परेशानी है?

उत्तर:  गलती करने वाला अपनी गलती को भी 'सही' माने रहता है.  इसलिए आप यदि केवल उसके 'सही' को बताते हैं तो वह मान लेता है कि वह जो कुछ भी कर रहा है (जो उसके हिसाब से 'सही' है) उसको आप प्रोत्साहन कर रहे हैं.  अब आप इस तरह कितना भी सिर कूट लो, क्या परिवर्तन आएगा उससे उसमें?  उसकी गलती का सुधार होगा कैसे?  ऐसा हो रहा है या नहीं?  इसलिए दूसरे का मूल्यांकन करते हुए उसकी गलती को उसे अवगत करायें, फिर सही को भी उसे बताएं.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २०१२, अमरकंटक) 

Wednesday, March 14, 2012

स्वीकृति

न्याय-धर्म-सत्य के साथ प्रिय-हित-लाभ को तोलना नहीं बनता.  न्याय-धर्म-सत्य में प्रिय-हित-लाभ का विलय होता है.  प्रिय-हित-लाभ के विलय होने तक अध्ययन है.  जब विलय हो जाता है तब अनुभव है.

अनुभव के पहले न्याय-धर्म-सत्य भाषा के रूप में रहता है, लेकिन जीना प्रिय-हित-लाभ में ही बना रहता है.  "न्याय-धर्म-सत्य ठीक है" - ऐसा भाषा के रूप में आ जाता है, पर वह "स्वीकृति" नहीं है.  स्वीकृति प्रिय-हित-लाभ की ही रहती है.  सूचना हो जाना स्वीकृति नहीं है.


अभी लोग अपनी अनुकूलता (अच्छा लगने) के अनुसार समझने की इच्छा व्यक्त करते हैं.  सच्चाई को समझने की इच्छा का रंग ही कुछ और होता है!  अपनी अनुकूलता के अनुसार समझने की इच्छा से प्रयास करते हैं तो एक व्यक्ति कुछ समझ लेता है, दूसरा व्यक्ति कुछ और समझ लेता है.  सच्चाई जैसा है - वैसा समझने का प्रयास करते हैं तो आप जैसा समझते हैं, वैसा ही मैं भी समझता हूँ.  सच्चाई अच्छा लगने और बुरा लगने की जगह में नहीं है.

"मुझे जीव-चेतना में नहीं जीना है, मानव-चेतना में ही जीना है" - जब यह निश्चय होता है, तब सच्चाई को समझने की इच्छा से प्रयास होता है.  मानव ने अभी तक जीवों से अच्छा जीना चाहा है, कुछ मायनों में जीवों से अच्छा जिया भी है, पर जीव-चेतना को छोड़ा नहीं है.  इसी जगह में मानव-जाति कराह रहा है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २०१२, अमरकंटक)  

ज्ञानगोचर

ज्ञान व्यापक वस्तु है.  ज्ञान के आधार पर ही चेतना है.  जीव-चेतना में मानव शरीर को जीवन मान करके जीता है - जिससे मानव टूटता है.  वही मानव जीवन को समझता है.  जीवन में ही ज्ञान होता है.  ज्ञानगोचर-विधि से ही जीवन समझ में आता है, सत्य समझ में आता है, सह-अस्तित्व समझ में आता है.  कार्य विधि से यह समझ में नहीं आता है.  ज्ञानगोचर विधि से ही जीवन को समझा जाए, सह-अस्तित्व को समझा जाए, विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति को समझा जाए.  फिर जिया जाए - ठसके से!

प्रश्न: ज्ञानगोचर से क्या आशय है?

उत्तर: जो संवेदनाओं के पकड़ में न आये, पर फिर भी समझ में आये - वह ज्ञानगोचर है.  ज्ञान समझ में आता है, चक्षु में नहीं आता.  जैसे किसी वस्तु में भार है, वह समझ में आता है - पर वह दिखाई नहीं देता है.  भार इस तरह ज्ञानगोचर है.  यहीं से शुरुआत है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २०१२, अमरकंटक) 

Monday, February 6, 2012

समाधि और संयम

प्रश्न: समाधि के बाद आपकी कल्पनाशीलता में क्या हुआ? 

उत्तर: समाधि की अवस्था में मेरे आशा-विचार-इच्छा चुप हो गए.  समाधि के बाद मुझे भूतकाल की पीड़ा, भविष्य की चिंता और वर्तमान से विरोध नहीं रहा.  मेरी कल्पनाशीलता इस स्थिति में तदाकार हो गयी.  यह समाधि के बाद और संयम से पहले की स्थिति थी.  इसमें मूल जिज्ञासा (सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?) का उत्तर पाना शेष रहा.  यह स्थिति संयम करने के लिए आधार बनी.  

संयम में पता चला - सह-अस्तित्व है, नित्य है, सदा-सदा है.  सह-अस्तित्व में जड़-चैतन्य प्रकृति भीगा है, डूबा है, घिरा है - यह देखा.  दृष्टा पद में होते हुए जो चित्रण मेरे सामने आया, उसको मैं स्वीकारता रहा.  

प्रश्न: दृष्टा पद का क्या अर्थ है?

उत्तर:  मैं देखने वाला हूँ और मुझे कुछ दिखता है.  यह दृष्टा-पद है.  आत्मा दृष्टा-पद में होता है. संयम काल में - आत्मा में दृष्टा पद और बुद्धि में बोध के योगफल में मैं देखता रहा.  जिसके फलस्वरूप अनुभव हुआ.  

संयम के बाद स्मरण जुड़ गया.  स्मरण जुड़ने से उसको व्यक्त करना बना.  आत्मा के साक्षी में स्मरण पूर्वक किया गया कार्यकलाप अध्ययन है.  स्मरण चित्त में होता है.  साधना-समाधि-संयम विधि से हो या अध्ययन विधि से हो - दोनों विधियों में आत्मा में दृष्टा-पद और बुद्धि में बोध के योगफल में ही समझा जाता है.  

बुद्धि के अनुरूप आशा, विचार, इच्छा होने पर दृष्टा पद है.  

-  श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २०१२, अमरकंटक) 

संयम काल में अध्ययन

प्रश्न: "संयम काल में आप के सम्मुख प्रकृति प्रस्तुत हुई" - ऐसा आपसे सुनने पर ऐसा लगता है कि प्रकृति में "कर्ता-भाव" है?

उत्तर:  प्रकृति में कार्य-भाव है.  कर्ता-भाव के लिए चेतना चाहिए.  चेतना जीव-प्रकृति और मानव-प्रकृति में है.  जीव-प्रकृति कार्य-भाव के साथ कर्तव्य-भाव में रह गया.  मानव-प्रकृति में कार्य-भाव, कर्तव्य-भाव और फल-परिणाम भाव ये सभी हैं.  जैसा मैंने प्रस्तुत किया है, वैसे ही प्रकृति मेरे सम्मुख प्रकट हुई.  मैंने उसमे कोई जोड़ घटाव नहीं किया है.  उसी को आपको अध्ययन पूर्वक साक्षात्कार करना है, बोध करना है, अनुभव करना है.  अनुभव होता है तो प्रमाण होगा.  प्रमाण का स्वीकृति बुद्धि में होता है.  प्रमाण की स्वीकृति के बाद प्रमाणित "करने" के लिए चिन्तन होता है, चित्रण होता है, तुलन होता है.  न्याय-धर्म-सत्य के तुलन के साथ यदि हमारा मन जुड़ जाता है, तो कार्य-व्यवहार में मूल्य मूल्यांकन विधि से हम जियेंगे ही.  

परंपरागत साधना विधि से मैंने प्रकृति को सीधे-सीधे देख लिया.  देखे हुए को मैंने अक्षर बद्ध कर दिया.  वह आपके लिए अध्ययन की वस्तु है.  अब अध्ययन ही साधना है.  

प्रश्न:  संयम काल में आपके सम्मुख जो ध्वनि, चित्र और भाषा के रूप में प्रकृति प्रस्तुत हो रही थी - ऐसा कैसे हो गया?

उत्तर: - मेरी जिज्ञासा अस्तित्व के सन्दर्भ में ही रहा.  मेरी जिज्ञासा और किसी बात का नहीं रहा.  यह पूरा अध्ययन जो मुझे हुआ वह जिज्ञासा के ही फल में हुआ.  

प्रश्न: मैं जब जिज्ञासा करता हूँ तो आप उसका उत्तर करते हैं, तो मेरे लिए प्रकृति कर्ता-पद में है.  आप के लिए  समझाने वाला कर्ता कौन था?  

उत्तर: सहअस्तित्व.  सहअस्तित्व ज्ञान-अवस्था के मानव को समझा ही रहा है - जंगल युग से अब तक.  जंगल-युग से पाषाण-युग के लिए मानव को सहअस्तित्व ने समझाया है कि नहीं?  पाषाण-युग से धातु-युग तक मानव को सह-अस्तित्व ने समझाया है कि नहीं?  धातु-युग से बारूद-युग तक मानव को सहअस्तित्व ने समझाया है या नहीं?  अभी बारूद-युग में मानव जी रहा है.  अब मेरी जिज्ञासा अस्तित्व के बारे में थी - इसलिए सहअस्तित्व रूप में वह प्रकट हो गया.  यही तो हुआ है.  अस्तित्व के बारे में मेरा प्रश्न था - "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?"  उसका उत्तर में यह सब हुआ.  

सहअस्तित्व मानव को जीवों से अच्छा जीने की प्रेरणा देता ही रहा है.  जीवों से अच्छा मानव जी भी रहा है. मानव का अभी तक का इतिहास सह-अस्तित्व की प्रेरणा से ही है.  सहअस्तित्व की यह प्रेरणा "सहअस्तित्व के प्रतिरूप" होने के अर्थ में है.  मानव जाति जीवों से अच्छा जीने की जगह में आ कर रुक गया था.  जीवों से अच्छा जीने के लिए ही मानव सुविधा-संग्रह और संघर्ष में रत है.  मानव जाति के इस तरह रुक जाने से उसके आगे की कड़ी जोड़ दिया.  सह-अस्तित्व ने जो मुझ को जोड़ा - वह ज्ञान रूप में रहा.  उसको भाषा रूप में मैंने जोड़ा.  इस तरह ज्ञान को भाषा में कहा जा सकता है - ऐसा सिद्ध हुआ.  अध्ययन-विधि को गढ़ने में मेरा कल्पनाशीलता जुड़ा है.  

प्रश्न: क्या संयम काल में जो आपने देखा, उसमे आपकी कल्पना प्रयोग हुई?

उत्तर: - नहीं.  मैंने दृष्टा-पद से अध्ययन किया है, कल्पना से अध्ययन नहीं किया है.  समाधि, ध्यान और धारणा - इन तीनो के एकत्र होने पर संयम होता है.  इसमें कल्पनाशीलता के होने की सम्भावना ही नहीं है.  जो मैंने देखा वह बोध के रूप में आ गया.  आशा, विचार और इच्छा बुद्धि के अनुसार काम करने के लिए तैयार हुआ.  दृष्टा-पद में दृश्य के साथ ही सम्बन्ध है, और बीच में कुछ नहीं है.  

अब आपको अध्ययन विधि से बोध और अनुभव की जगह पहुंचना है.  अध्ययन में आशा विचार इच्छा का प्रयोग है.  आशा विचार इच्छा के बिना अध्ययन कैसे करेंगे?  अध्ययन यदि आपमें होना शुरू होता है तो आशा-विचार-इच्छा गौण हो गए.  शब्द का अर्थ होता है, अर्थ के स्वरूप में अस्तित्व में वस्तु रहता है.  वस्तु का स्वरूप जब समझ में आता है तो उस समय में आशा-विचार-इच्छा बुद्धि के अनुरूप रहते हैं.  

बोध के पूर्व तक कल्पनाशीलता पहुँचता है.  आशा विचार इच्छा का अस्पष्ट रहना ही कल्पनाशीलता है. अस्पष्ट रहने से ही वेदना है - उसी का नाम है संवेदना.  वेदना का मतलब है दर्द, दर्द का मतलब है प्रश्न, प्रश्न का मतलब है अज्ञात.  आदर्शवाद ने भक्ति-विरक्ति विधि से "अज्ञात" के प्रति आस्था को जोड़ा था, जबकि अज्ञात के प्रति आस्था स्थिर हो नहीं सकता.  भौतिकवाद ने सुविधा-संग्रह में लगा दिया, जिसका कभी पूर्ति होता नहीं है.  

कल्पनाशीलता ही मानव में आगे विकास का आधार है.  कल्पनाशीलता नहीं हो तो आगे विकास कैसे हो? अध्ययन विधि से चलते हुए, अनुभव में कल्पनाशीलता विलय होता है.  फिर अनुभव के बाद अनुभव के आधार पर कल्पनाशीलता काम करता है.  अनुभव होने के पश्चात आप जब प्रकट होंगे तो उसमे आशा-विचार-इच्छा फिर से जुड़ेगी.   

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २०१२, अमरकंटक) 

संयम

प्रश्न: समाधि तक पहुँचने के क्रम में आप "निषेधनी" विधि से चले - जिसमे आप सभी "गलत" पर निषेध लगाते चले गए.  समाधि में पहुँचने पर आपके आशा, विचार और इच्छा चुप हो गए, लेकिन उसमे ज्ञान नहीं हुआ.  "सही" को स्वीकारने और प्रमाणित करने के लिए आपने संयम किया.  अभी हम जो चल रहे हैं - उसमे सही के साथ साथ गलत भी हमारी कल्पना में आ जाता है.  ऐसे में हमारे लिए अनुभव तक पहुँचने का क्या उपाय है?

उत्तर:  उसी के लिए तो अध्ययन है.  "सही" बात को समझने के लिए ही अध्ययन है.  अध्ययन में "गलत" का कोई प्रस्ताव ही नहीं है.  अध्ययन विधि से एक एक मुद्दे पर तर्क समाप्त होता है.  एक मुद्दे पर तर्क समाप्त होता है, तो दूसरे मुद्दे पर तर्क समाप्त होने का आसरा बन जाता है.  ऐसे हो कर के अध्ययन पूरा होता है.  अध्ययन पूरा होना = सहअस्तित्व अनुभव में आना.  सहअस्तित्व में सम्पूर्ण प्रकृति अनुभव में आना.  सम्पूर्ण प्रकृति विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम और जागृति स्वरूप में प्रमाणित है.  इतना समझ में आता है तो अध्ययन हुआ.  इतना ही मैंने अपने संयम में देखा है. 

प्रश्न: समाधि में आपको शरीर का अध्यास नहीं रहता था.  क्या संयम में शरीर का अध्यास होता था?

उत्तर: हाँ.   समाधि में शरीर से कोई संवेदनाओं का ज्ञान नहीं रहता.  संयम में शरीर संवेदनाओं का ज्ञान भी होता है.  जीवन की दसों क्रियाओं की अभिव्यक्ति संयम में है.  

समाधि के बाद लक्ष्य का ध्यान, जो धारणा में विस्तृत हुआ.  लक्ष्य था - अपनी जिज्ञासा का उत्तर पाना, कि "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा हुआ?"  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २०११, अमरकंटक)