This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
ANNOUNCEMENTS
Monday, July 5, 2010
मानव में ऊर्जा-सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है
मानव में ऊर्जा-सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है। भ्रमित रहते तक ऊर्जा का प्रयोग मनुष्य चार विषयों और पांच संवेदनाओं के रूप में करता है। जागृत होने पर ऊर्जा का प्रयोग मनुष्य तीन ईश्नाओं और उपकार में करता है।
प्रश्न: चार विषयों के लिए क्या "ज्ञान" शब्द का प्रयोग उचित है?
उत्तर: ज्ञान के बिना प्रवृत्ति नहीं है। विषयों के ज्ञान से ही विषयों में प्रवृत्ति है। उसी तरह संवेदनाओं के ज्ञान से संवेदनाओं में प्रवृत्ति है। ईश्नाओं के ज्ञान से ईश्नाओं में प्रवृत्ति है। उपकार के ज्ञान से उपकार में प्रवृत्ति है। ज्ञान के चार स्तर हैं। जिस स्तर के ज्ञान को अपनाते हैं, उसी की व्याख्या अपने जीने में करने लगते हैं। विषयों में प्रवृत्ति और संवेदनाओं में प्रवृत्ति जीव-चेतना की सीमा है। ईश्नाओं में प्रवृत्ति और उपकार में प्रवृत्ति से मानव-चेतना की शुरुआत है।
पांच संवेदनाएं और चार विषय - यह जीव चेतना की सीमा है। तीन ईश्नाओं पूर्वक जीने से मानव-चेतना की शुरुआत है। इसमें संवेदनाएं नियंत्रित रहती हैं। जीव चेतना में संवेदनाएं नियंत्रित नहीं रहती हैं। इतना ही अंतर है। मानव चेतना से उपकार की शुरुआत है।
मानव चेतना सहज ज्ञान को मध्यस्थ-दर्शन में प्रतिपादित किया गया है। जिससे सहअस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान में पारंगत होना और प्रमाणित होना संभव है। जिससे ज्ञान सम्मत विवेक और विवेक सम्मत विज्ञान पूर्वक जीना होता है।
व्यापक वस्तु के प्रतिरूप का नाम है - "ज्ञान"। मानव में ऊर्जा-सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है। व्यापक वस्तु ही मानव द्वारा "ज्ञान" के नाम से प्रकाशित होता है। व्यापक वस्तु को जो हम अभिव्यक्त कर सकते हैं, संप्रेषित कर सकते हैं, आचरण में ला सकते हैं - उसका नाम है "ज्ञान"। ज्ञान के चार स्तर बताये हैं - जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। जीव-चेतना से मानव-चेतना श्रेष्ठ है। मानव-चेतना से देव-चेतना श्रेष्ठतर है। देव-चेतना से दिव्य-चेतना श्रेष्ठतर है। जिस स्तर पर आप जीना चाहें - जियें! हमारा कोई आग्रह नहीं है - आप ऐसे ही जियें।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
प्रश्न: चार विषयों के लिए क्या "ज्ञान" शब्द का प्रयोग उचित है?
उत्तर: ज्ञान के बिना प्रवृत्ति नहीं है। विषयों के ज्ञान से ही विषयों में प्रवृत्ति है। उसी तरह संवेदनाओं के ज्ञान से संवेदनाओं में प्रवृत्ति है। ईश्नाओं के ज्ञान से ईश्नाओं में प्रवृत्ति है। उपकार के ज्ञान से उपकार में प्रवृत्ति है। ज्ञान के चार स्तर हैं। जिस स्तर के ज्ञान को अपनाते हैं, उसी की व्याख्या अपने जीने में करने लगते हैं। विषयों में प्रवृत्ति और संवेदनाओं में प्रवृत्ति जीव-चेतना की सीमा है। ईश्नाओं में प्रवृत्ति और उपकार में प्रवृत्ति से मानव-चेतना की शुरुआत है।
पांच संवेदनाएं और चार विषय - यह जीव चेतना की सीमा है। तीन ईश्नाओं पूर्वक जीने से मानव-चेतना की शुरुआत है। इसमें संवेदनाएं नियंत्रित रहती हैं। जीव चेतना में संवेदनाएं नियंत्रित नहीं रहती हैं। इतना ही अंतर है। मानव चेतना से उपकार की शुरुआत है।
मानव चेतना सहज ज्ञान को मध्यस्थ-दर्शन में प्रतिपादित किया गया है। जिससे सहअस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान में पारंगत होना और प्रमाणित होना संभव है। जिससे ज्ञान सम्मत विवेक और विवेक सम्मत विज्ञान पूर्वक जीना होता है।
व्यापक वस्तु के प्रतिरूप का नाम है - "ज्ञान"। मानव में ऊर्जा-सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है। व्यापक वस्तु ही मानव द्वारा "ज्ञान" के नाम से प्रकाशित होता है। व्यापक वस्तु को जो हम अभिव्यक्त कर सकते हैं, संप्रेषित कर सकते हैं, आचरण में ला सकते हैं - उसका नाम है "ज्ञान"। ज्ञान के चार स्तर बताये हैं - जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। जीव-चेतना से मानव-चेतना श्रेष्ठ है। मानव-चेतना से देव-चेतना श्रेष्ठतर है। देव-चेतना से दिव्य-चेतना श्रेष्ठतर है। जिस स्तर पर आप जीना चाहें - जियें! हमारा कोई आग्रह नहीं है - आप ऐसे ही जियें।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
सम्पूर्णता और पूर्णता
पूर्ण में समाहित रहने के कारण प्रकृति में पूर्णता की तृषा है। सत्ता को पूर्ण कहा है। पूर्ण से आशय है - न घटना, न बढ़ना। पूर्ण में समाहित होने से प्रकृति में परिवर्तनहीन होने ( पूर्णता ) और व्यवस्था में होने (सम्पूर्णता) की प्रवृत्ति है। व्यवस्था (परंपरा के स्वरूप में रहना) भी निरंतरता के अर्थ में है।
सम्पूर्णता के लिए प्रवृत्ति जड़-प्रकृति में है। पूर्णता के लिए प्रवृत्ति जीवन (चैतन्य प्रकृति) में है।
पूर्णता का स्वरूप है - गठन-पूर्णता, क्रिया-पूर्णता, आचरण-पूर्णता। पूर्णता का मतलब - "ज्यादा-कम से मुक्त"।
गठन-पूर्णता = निश्चित गठन = जो परमाणु-अंशों के घटने-बढ़ने या ज्यादा-कम होने से मुक्त है।
क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता में - समाधान न ज्यादा है, न कम है। समृद्धि न ज्यादा है, न कम है। अभय (विश्वास) न ज्यादा है, न कम है। सह-अस्तित्व (सत्य) न ज्यादा है, न कम है।
क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता जो शेष है - उसके लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है। हम सत्ता में भीगे हैं, उसके प्रति जागृत होना, उसका दृष्टा होना, उसको प्रमाणित करना अभी शेष है। जीवन ही है जो स्वयं को पहचानता है, और सर्वस्व को पहचानता है। अभी भ्रमित-स्थिति में जीवन स्वयं को शरीर स्वरूप में पहचाना हुआ है - जिसको "जीव-चेतना" कहा है। स्वयं को पहचानना, और सर्वस्व को पहचानना ही तो कुल मिला करके अध्ययन है, जिसके फलस्वरूप व्यवस्था को पहचानना और निर्वाह करना बनता है।
स्थितिपूर्ण सत्ता में स्थितिशील प्रकृति संपृक्त होने के कारण हरेक वस्तु स्वयं में व्यवस्था है, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करती है। मानव में भी यह होने के लिए अध्ययन है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
सम्पूर्णता के लिए प्रवृत्ति जड़-प्रकृति में है। पूर्णता के लिए प्रवृत्ति जीवन (चैतन्य प्रकृति) में है।
पूर्णता का स्वरूप है - गठन-पूर्णता, क्रिया-पूर्णता, आचरण-पूर्णता। पूर्णता का मतलब - "ज्यादा-कम से मुक्त"।
गठन-पूर्णता = निश्चित गठन = जो परमाणु-अंशों के घटने-बढ़ने या ज्यादा-कम होने से मुक्त है।
क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता में - समाधान न ज्यादा है, न कम है। समृद्धि न ज्यादा है, न कम है। अभय (विश्वास) न ज्यादा है, न कम है। सह-अस्तित्व (सत्य) न ज्यादा है, न कम है।
क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता जो शेष है - उसके लिए मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है। हम सत्ता में भीगे हैं, उसके प्रति जागृत होना, उसका दृष्टा होना, उसको प्रमाणित करना अभी शेष है। जीवन ही है जो स्वयं को पहचानता है, और सर्वस्व को पहचानता है। अभी भ्रमित-स्थिति में जीवन स्वयं को शरीर स्वरूप में पहचाना हुआ है - जिसको "जीव-चेतना" कहा है। स्वयं को पहचानना, और सर्वस्व को पहचानना ही तो कुल मिला करके अध्ययन है, जिसके फलस्वरूप व्यवस्था को पहचानना और निर्वाह करना बनता है।
स्थितिपूर्ण सत्ता में स्थितिशील प्रकृति संपृक्त होने के कारण हरेक वस्तु स्वयं में व्यवस्था है, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करती है। मानव में भी यह होने के लिए अध्ययन है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
नियंत्रण
व्यापक में प्रकृति डूबा हुआ, भीगा हुआ, और घिरा हुआ है। भीगा हुआ से ऊर्जा-सम्पन्नता है। डूबा हुआ से क्रियाशीलता है। घिरा हुआ से नियंत्रण है। भीगा हुआ के साथ डूबा हुआ और घिरा हुआ बना ही है।
प्रश्न: व्यापक से इकाई घिरे होने से वह नियंत्रित कैसे है?
उत्तर: घिरा होना ही नियंत्रण है। व्यापक से इकाई घिरा न हो तो उसका इकाइत्व कैसे पहचान में आएगा? नियंत्रण का मतलब है - निश्चित आचरण की निरंतरता।
प्रश्न: जड़ प्रकृति में नियंत्रण कैसे है?
उत्तर: हर जड़-इकाई व्यापक वस्तु से घिरी है, इसलिए नियंत्रित है। जड़ वस्तु में अनियंत्रित करने वाली कोई बात नहीं है।
प्रश्न: मनुष्य भी तो व्यापक में घिरा है, फिर वह नियंत्रित क्यों नहीं है?
उत्तर: मनुष्य नियंत्रण चाहता है। पर अपनी मनमानी के अनुसार नियंत्रण चाहता है, उसमें वह असफल हो गया है। पूरा मानव-जाति इसमें असफल हो गया है। असफल होने के बाद हम पुनर्विचार कर रहे हैं।
अनियंत्रित होने के लिए मनुष्य ने प्रयत्न किया, पर हो नहीं पाया। इसके आधार पर पता चलता है, नियंत्रित रहना जरूरी है। मनुष्य के लिए क्या नियंत्रित रहना जरूरी है? इसका शोध करने पर पता चलता है - संवेदनाएं नियंत्रित रहना जरूरी है। संवेदनाएं नियंत्रित कैसे रहेंगी? - इसका शोध करते हैं तो पता लगता है - समझ पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहेंगी। सत्ता में हम घिरे हैं - यह समझ में आने पर संवेदनाएं नियंत्रित रहती हैं। सत्ता के बिना चेतना नहीं है। चेतना के बिना मानव-चेतना नहीं है। मानव-चेतना के बिना संवेदनाएं नियंत्रित नहीं हैं।
प्रश्न: मनुष्य भी तो व्यापक में सदा डूबा-भीगा-घिरा रहता है, फिर अध्ययन-पूर्वक अनुभव के बाद उसमें तात्विक रूप में ऐसा क्या हो जाता है कि वह निश्चित-आचरण को प्रमाणित करने लगता है?
उत्तर: अध्ययन पूर्वक अनुभव करने से जीवन की प्रवृत्ति बदल जाती है। मनुष्य में तात्विकता उसकी प्रवृत्ति भी है। प्रवृत्ति बदलती है तो आचरण परिवर्तित हो जाता है। कल्पनाशीलता प्रवृत्ति के रूप में है। कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिंदु ज्ञानशीलता या समझ है। ज्ञान-पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित हो जाती हैं। संवेदनाएं नियंत्रित होने पर मनुष्य द्वारा निश्चित आचरण पूर्वक समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना बनता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
प्रश्न: व्यापक से इकाई घिरे होने से वह नियंत्रित कैसे है?
उत्तर: घिरा होना ही नियंत्रण है। व्यापक से इकाई घिरा न हो तो उसका इकाइत्व कैसे पहचान में आएगा? नियंत्रण का मतलब है - निश्चित आचरण की निरंतरता।
प्रश्न: जड़ प्रकृति में नियंत्रण कैसे है?
उत्तर: हर जड़-इकाई व्यापक वस्तु से घिरी है, इसलिए नियंत्रित है। जड़ वस्तु में अनियंत्रित करने वाली कोई बात नहीं है।
प्रश्न: मनुष्य भी तो व्यापक में घिरा है, फिर वह नियंत्रित क्यों नहीं है?
उत्तर: मनुष्य नियंत्रण चाहता है। पर अपनी मनमानी के अनुसार नियंत्रण चाहता है, उसमें वह असफल हो गया है। पूरा मानव-जाति इसमें असफल हो गया है। असफल होने के बाद हम पुनर्विचार कर रहे हैं।
अनियंत्रित होने के लिए मनुष्य ने प्रयत्न किया, पर हो नहीं पाया। इसके आधार पर पता चलता है, नियंत्रित रहना जरूरी है। मनुष्य के लिए क्या नियंत्रित रहना जरूरी है? इसका शोध करने पर पता चलता है - संवेदनाएं नियंत्रित रहना जरूरी है। संवेदनाएं नियंत्रित कैसे रहेंगी? - इसका शोध करते हैं तो पता लगता है - समझ पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहेंगी। सत्ता में हम घिरे हैं - यह समझ में आने पर संवेदनाएं नियंत्रित रहती हैं। सत्ता के बिना चेतना नहीं है। चेतना के बिना मानव-चेतना नहीं है। मानव-चेतना के बिना संवेदनाएं नियंत्रित नहीं हैं।
प्रश्न: मनुष्य भी तो व्यापक में सदा डूबा-भीगा-घिरा रहता है, फिर अध्ययन-पूर्वक अनुभव के बाद उसमें तात्विक रूप में ऐसा क्या हो जाता है कि वह निश्चित-आचरण को प्रमाणित करने लगता है?
उत्तर: अध्ययन पूर्वक अनुभव करने से जीवन की प्रवृत्ति बदल जाती है। मनुष्य में तात्विकता उसकी प्रवृत्ति भी है। प्रवृत्ति बदलती है तो आचरण परिवर्तित हो जाता है। कल्पनाशीलता प्रवृत्ति के रूप में है। कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिंदु ज्ञानशीलता या समझ है। ज्ञान-पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित हो जाती हैं। संवेदनाएं नियंत्रित होने पर मनुष्य द्वारा निश्चित आचरण पूर्वक समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना बनता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
Sunday, July 4, 2010
अनुमान, अनुक्रम, अनुभव
अनुमान से अनुभव तक पहुँचते हैं। अनुभव होता है, तो अनुमान सही है। अनुभव नहीं होता, तो अनुमान सही नहीं है। अनुमान करने की ताकत कल्पनाशीलता के स्वरूप में हर व्यक्ति के पास है। उसके सहारे अनुभव तक पहुँच सकते हैं। जीने में जो प्रमाणित हो सके, वह अनुमान सही है। जीना प्रमाण ही होता है, अनुमान नहीं होता। जीने के अलावा और किसी चीज को प्रमाण कैसे माना जाए? "मैं प्रमाणित स्वरूप में जी रहा हूँ" - इस जगह आपको आना है।
अनुक्रम से अनुभव होता है। जो कुछ भी होना हुआ है, और जो कुछ भी होना है - वह अनुक्रम है। अनुक्रम का अर्थ है - एक से एक जुडी हुई श्रंखला विधि। इस विधि को पूरा समझने से अनुमान होता है। अनुमान होने के बाद अनुभव होता है। अनुभव होने के बाद प्रयोजन सिद्ध होता है, प्रमाण होता है। मानव के सुधरने के लिए, सुसज्जित होने के लिए यही विधि है।
अध्ययन में यदि मन लगता है तो अनुभव हो जाएगा।
अध्ययन में मन नहीं लगता है तो अनुभव नहीं होगा।
अनुभव के पहले प्रमाण नहीं है। अनुभव के पहले अनुकरण-अनुसरण विधि से "अच्छा लगने" की स्थिति में आ जाते हैं, "अच्छा होना" नहीं होता। केवल अनुसरण-अनुकरण पर्याप्त नहीं है। जीने में प्रमाणित होने पर ही "अच्छा होना" होता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
अनुक्रम से अनुभव होता है। जो कुछ भी होना हुआ है, और जो कुछ भी होना है - वह अनुक्रम है। अनुक्रम का अर्थ है - एक से एक जुडी हुई श्रंखला विधि। इस विधि को पूरा समझने से अनुमान होता है। अनुमान होने के बाद अनुभव होता है। अनुभव होने के बाद प्रयोजन सिद्ध होता है, प्रमाण होता है। मानव के सुधरने के लिए, सुसज्जित होने के लिए यही विधि है।
अध्ययन में यदि मन लगता है तो अनुभव हो जाएगा।
अध्ययन में मन नहीं लगता है तो अनुभव नहीं होगा।
अनुभव के पहले प्रमाण नहीं है। अनुभव के पहले अनुकरण-अनुसरण विधि से "अच्छा लगने" की स्थिति में आ जाते हैं, "अच्छा होना" नहीं होता। केवल अनुसरण-अनुकरण पर्याप्त नहीं है। जीने में प्रमाणित होने पर ही "अच्छा होना" होता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
Subscribe to:
Posts (Atom)