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Saturday, October 15, 2016

सहअस्तित्व में प्रकटनशीलता - भाग १


मैंने जो साधना, समाधि, संयम पूर्वक अध्ययन किया, उसमें  सर्वप्रथम सह-अस्तित्व को देखा (मतलब समझा)।  सत्ता में संपृक्त प्रकृति स्वरूप में मैंने सह-अस्तित्व को पहचाना।  सहअस्तित्व स्वरूप में जड़-चैतन्य प्रकृति को जो देखा - यही "परम सत्य" है, "नित्य वर्तमान" यही है.  उससे यह स्पष्ट हो गया कि जगत शाश्वत है - इसमें कुछ पैदा नहीं होता है, न कुछ मरता है.  जगत में 'परिवर्तन' होता है और 'परिणाम' होता है - यह पता चल गया.  (जड़-जगत में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन होता है और उसमें गठनशील परमाणुओं के रूप में परिणाम की अवधियां हैं.  चैतन्य जगत में केवल गुणात्मक परिवर्तन होता है और उसमे गठनपूर्ण परमाणु के रूप में 'परिणाम का अमरत्व' है.)  जड़-जगत में रचना-विरचना होती है, नाश कुछ नहीं होता।  (चैतन्य-प्रकृति में नाश भी नहीं होता और रचना-विरचना भी नहीं होती)

 प्रश्न: सत्ता में संपृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति किस प्रकार से चार अवस्थाओं को प्रकट करती है?
उत्तर: सहअस्तित्व में प्रकटनशीलता स्वाभाविक है.  सहअस्तित्व के चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट होने के लिए प्रकृति में तीन प्रकार की क्रियाएं हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया और जीवन क्रिया।  इन तीनों क्रियाओं का एक दूसरे से जोड़-जुगाड़ से चार अवस्थाएं बनते हैं.  यदि इनके आपस में जुड़ने से कुछ रह गया तो चार अवस्थाएं प्रकट नहीं होता।  इस प्रकटन को "करने वाला" कोई नहीं है।  यह प्रकटन स्वयंस्फूर्त होता है, किसी बाहरी हस्तक्षेप के कारण नहीं होता। 

प्रश्न:  चार अवस्थाओं के प्रकटन में सत्ता का क्या रोल है? 

उत्तर: सत्ता या परमात्मा का "करने वाले" के रूप में कोई रोल नहीं है.  सत्ता जड़-चैतन्य प्रकृति में प्रेरणा स्वरूप में प्राप्त है. परमात्मा में भीगे रहने से जड़ प्रकृति में क्रिया करने के लिए प्रेरणा है.  यह प्रेरणा न कभी बढ़ता है न घटता है. 

प्रश्न:  प्रकृति की क्रियाशीलता से सत्ता (व्यापक वस्तु) पर क्या प्रभाव पड़ता है या सत्ता में क्या अंतर आता है? 

उत्तर: प्रकृति की क्रियाशीलता से व्यापक वस्तु में कोई क्षति (घटना-बढ़ना) होता ही नहीं है.  व्यापक वस्तु में भीगे होने से प्रकृति को क्रिया की प्रेरणा सदा मिलता रहता है.  अभी मिला, बाद में नहीं मिला - ऐसा कुछ होता नहीं है.  यह प्रेरणा हर छोटे से छोटे वस्तु से लेकर बड़े से बड़े वस्तु तक समान स्वरूप में है.  परमाणु अंश में भी क्रियाशीलता देखी जाती है. 

प्रश्न: इस प्रकटन क्रम में क्या कोई व्यतिरेक हो सकता है?
उत्तर: सहअस्तित्व के प्राकृतिक स्वरूप में कोई भी प्रकटन होने के बाद उसकी "परंपरा" है.  इसमें व्यतिरेक केवल भ्रमित-मानव की प्रवृत्ति और कार्य-व्यवहार से होता है.  भ्रमित मानव को छोड़ कर विखंडन प्रवृत्ति किसी में नहीं है.  भ्रमित मानव यदि परमाणु अंश का भी टुकड़ा कर दे, तो भी हरेक टुकड़ा घूर्णन गति करता रहता है, और एक दूसरे  से जुड़के वे टुकड़े पुनः परमाणु अंश हो जाते हैं.  परमाणु अंश का स्वरूप सभी प्रजातियों के परमाणुओं में समान है.  समानता की शुरुआत परमाणु अंश से है. 

प्रश्न:  पदार्थावस्था के परमाणु अंश से शुरू करते हुए ज्ञान-अवस्था के मानव तक के प्रकटन क्रम को समझाइये?

उत्तर: अनेक संख्यात्मक परमाणु अंशों के योग से अनेक प्रजातियों के परमाणु हुए.  ऐसे भौतिक परमाणु जितने प्रजाति के होने हैं, वे सब होने के बाद भौतिक संसार तृप्त हो जाता है.  इस तृप्ति के फलस्वरूप उन परमाणुओं में यौगिक क्रिया करने की प्रवृत्ति बन जाती है.   स्वयंस्फूर्त विधि से यौगिक होते हैं.  यौगिक के प्रकटन में सम्पूर्ण प्रजातियों के परमाणु (भूखे और अजीर्ण) पूरक हो जाते हैं, सहायक हो जाते हैं.  सहअस्तित्व में प्रकटनशीलता का यह पहला घाट है. 

यौगिक विधि में सर्वप्रथम जल का प्रकटन हुआ.  यौगिक विधि द्वारा ही धरती पर प्राणावस्था का प्रकटन हुआ.  प्राणावस्था में जितना प्रजाति का भी झाड़, पौधा, औषधि, वनस्पति सब कुछ होना था, उतना होने के बाद जब प्राणावस्था  तृप्त हो गयी तब जीवावस्था के शरीरों की शुरुआत हुई.  जीवावस्था में भुनगी-कीड़ा से चलकर पक्षियों तक, पक्षियों से चल के पशुओं तक जलचर, थलचर, नभचर जीवों का प्रकटन हुआ, जिसमें अंडज और पिण्डज दोनों विधियों से शरीर रचना का होना स्पष्ट हुआ.  जीवावस्था में अनेक प्रकार के जीवों का प्रकटन हुआ जो उनकी आहार पद्दति के अनुसार दो वर्गों में - शाकाहारी और मांसाहारी हुए.  इनमे शाकाहारी जीवों में मांसाहारी जीवों  की अपेक्षा प्रजनन क्रिया अधिक होना देखा गया.  शाकाहारी जीव संसार के संख्या में संतुलन के अर्थ में माँसाहारी जीवों का प्रकटन हुआ - यह मुझे समझ में आया.  जीवावस्था के सभी वंश परंपराएं स्थापित होने के बाद मानव शरीर रचना प्रकट हुई.  मानव शरीर रचना पहले किसी जीव शरीर में ही तैयार हुआ, उसके बाद मानव शरीर परंपरा शुरू हुई,  हर प्रकटन में ऐसा ही है - अगला स्वरूप का भ्रूण पिछले में तैयार होता है, और अगला स्वरूप पिछले से भिन्न हो जाता है.  जैसे - ४ पत्ती वाले पौधे से ५० पत्ती वाले पौधे का प्रकटन हो जाता है.  प्राणकोशाओं  के प्राणसूत्रों में निहित रचना विधि में परिवर्तन होने के आधार पर यह होता है.  यह प्रकटन उत्सव, खुशहाली, प्रसन्नता, संतुलन, और नियंत्रण के आधार पर होता है.  मानव के प्रकटन से पहले धरती पर सघन वन, पर्याप्त जल, औषधि और सम्पूर्ण प्रकार के जीव संसार तैयार हो चुका  था.  इन्ही के बीच मानव पला.  इस तरह सहअस्तित्व सहज प्रकटन विधि से घोर प्रयास और घोर प्रक्रिया पूर्वक मानव का धरती पर प्रकटन हुआ.

प्रश्न: तो मानव में परेशानी कैसे और कब से शुरू हुई?

उत्तर:  मानव में परेशानी शुरू हुई भ्रम से!   भ्रम कहाँ से आया?  - जीवचेतना से.  मानव शरीर रचना में यह विशेषता आयी कि जीवन अपनी कल्पनाशीलता और कर्मस्वतंत्रता को प्रकाशित कर सके.  मानव के प्रकटन से पहले जीव संसार प्रकट हो चुका था, इसलिए मानव ने अपनी कल्पनाशीलता का प्रयोग करते हुए जीवों का अनुकरण किया, पहले जीवों के जैसा जीने का प्रयत्न किया फिर जीवों से अच्छा जीने का प्रयत्न किया।   इसके लिए जीवचेतना का ही प्रयोग किया। 

मानव ने अपने प्रकटन के साथ ही (भ्रम वश) प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ना शुरू किया।  पहले कृषि के लिए वन का संहार करना शुरू किया।  फिर विज्ञान आने के बाद खनिज का शोषण शुरू कर दिया।  वन और खनिज के संतुलन से ही ऋतु  संतुलन है. ऋतु  संतुलन के बिना मानव सुखी नहीं हो सकता।  मानव शरीर के लिए आवश्यक आहार पैदा नहीं हो सकता।  यह जो मैं बता रहा हूँ इसके महत्त्व को कैसे उजागर करोगे, सोचना!  यह वृथा नहीं जाना चाहिए!

मानव ने अपनी कल्पनाशीलता और कर्मस्वतंत्रता का प्रयोग करते हुए मनाकार  को साकार करने का काम आवश्यकता से अधिक कर दिया, जबकि मनःस्वस्थता का भाग वीरान पड़ा रहा.  मनाकार को साकार करने में अतिवाद किया है यह धरती के बीमार होने से गवाहित हो गया है.  धरती के बीमार होने पर अब हम पुनर्विचार कर रहे हैं - ऐसा कैसे हो गया?  इसका उत्तर यही निकलता है - मानव के जीव चेतना में जीने से ऐसा हुआ. 

प्रश्न:  आपके अनुसंधान के मूल में जो जिज्ञासा थी - "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा हुआ?" - उसका क्या उत्तर मिला?

उत्तर:  असत्य पैदा नहीं हुआ है.  अस्तित्व में कुछ भी असत्य नहीं है.  सहअस्तित्व रुपी अस्तित्व में असत्य का कोई स्थान ही नहीं है.  इसका मतलब, शास्त्रों में जो 'ब्रह्म सत्य - जगत मिथ्या' लिखा है - यह गलत हो गया.  इसकी जगह होना चाहिए - "ब्रह्म सत्य - जगत शाश्वत'.  इस तरह वेद विचार से मिली मूल स्वीकृति ही बदल गयी.   

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित  (जनवरी २००७, अमरकंटक)

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