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Wednesday, July 2, 2014

आकर्षण, प्रत्याकर्षण तथा कम्पनात्मक गति

परमाणु में मध्यांश और आश्रित अंशों (परिवेशीय अंशों) के बारे में आपको मैंने बताया है.  मध्यांश का आश्रित अंशों के साथ आकर्षण बना ही रहता है.  जब कभी आश्रित अंश (परमाणु की परस्परता के प्रभाव वश) मध्यांश से दूर भागने लगते हैं, उस स्थिति में मध्यस्थ बल प्रत्याकर्षण के रूप में अपने बल को नियोजित करता है, फलस्वरूप वे अच्छी निश्चित दूरी में पुनः स्थापित हो जाते हैं.  यदि आश्रित अंश बहुत पास में आ जाते हैं तो मध्यांश (मध्यस्थ बल) विकर्षण के रूप में अपने बल को नियोजित करता है, और पुनः उनको अच्छी निश्चित दूरी में अवस्थित करता है.  इसको नियंत्रण कहा. 

इस प्रकार आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक परमाणु में कम्पनात्मक गति होती है, जिससे वह स्वभाव गति में पाया जाता है.  कम्पनात्मक गति नियंत्रण है - जो एक नृत्य है, जो खुशहाली का द्योतक है, उत्सव का द्योतक है, स्वभाव गति का द्योतक है, और मानव भाषा में हंसी-खुशी का द्योतक है.

सत्ता मूल ताकत है.  सत्ता में सम्पृक्त होने के कारण हर वस्तु बल संपन्न है और कार्यशील होने के लिये प्रवृत्त है.  कार्यशील होने के लिए उसमें आकर्षण और प्रत्याकर्षण का योग होना आवश्यक है.  आकर्षण और प्रत्याकर्षण के योगफल में कार्य-गति है.  इस सूत्र की व्याख्या परमाणु करता है, अणु करता है, अणु रचित पिंड करता है, धरती करता है, मानव करता है.  व्याख्यायित किया ही रहता है.

प्रश्न: क्रिया के स्वरूप को समझाइये?

उत्तर: जड़ संसार में श्रम, गति और परिणाम क्रिया को व्याख्यायित करते हैं.  क्रिया का मतलब ही श्रम, गति, परिणाम है.  श्रम, गति, परिणाम पूर्वक प्रत्येक परमाणु में आकर्षण-प्रत्याकर्षण के योगफल में उत्सव होता ही रहता है.  हर इकाई के अंग-अवयवों के बीच ऐसा आकर्षण-प्रत्याकर्षण होता ही रहता है.  जैसे - आपके शरीर में आँख के साथ हाथ, हाथ के साथ पाँव - इनके बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक ही उनकी कार्य गति है.  जबकि आपका शरीर एक ही है.  उसी तरह परमाणु एक ही है, पर उसके अंग-अवयव श्रम-गति-परिणाम पूर्वक उसकी क्रिया की व्याख़्या करते हैं.  क्रिया नित्य अभिव्यक्ति है, नित्य प्रकाशमान है - यह कहीं रुकता ही नहीं है.  इसकी रुकी हुई जगह को कहीं/कभी पहचाना नहीं जा सकता।  यह कहीं/कभी रुका था या रुकेगा - ऐसी परिकल्पना भ्रम है.

चैतन्य संसार में भ्रम और जागृति स्वरूप में क्रिया है.  श्रम, गति, परिणाम स्वरूप में जड़-क्रिया और भ्रम-जागृति स्वरूप में चैतन्य क्रिया है.  और कुछ होता नहीं।  इस अनंत संसार की सम्पूर्ण क्रिया मूलतः इतना ही है.

क्रिया ऊर्जा-सम्पन्नता वश है.  सत्ता ऊर्जा है.  सत्ता पारगामी है.  सत्ता को अवरोध करने वाली एक भी वस्तु नहीं है.  क्रिया एक-एक इकाइयों के रूप में है.  एक-एक होने से आशय है, उसके सभी ओर सत्ता है.  प्रत्येक एक के सभी ओर सत्ता का होना ही 'सीमा' है.  हरेक एक सीमित रूप में रचित है.  इकाई के सभी ओर  सत्ता का होना ही उस इकाई की नियंत्रण रेखा है.  सीमित इकाई गतिशील है.  परस्परता में ही गति की बात है.  परस्परता नहीं तो गति की कोई बात ही नहीं हो सकती।  शून्य में कोई गति नहीं है, जबकि क्रिया (इकाई) के अंग-प्रत्यंगों के बीच गति की बात है.  अंग-अवयवों के बीच गतिशीलता की प्रेरणा इकाई में स्वयं-स्फूर्त प्राप्त है.

प्रश्न: क्रिया और मात्रा (quantum of matter) का क्या अन्तर्सम्बन्ध है?

उत्तर: मात्रा की पहचान क्रिया सहित ही है.  क्रिया के बिना मात्रा की पहचान नहीं है.


प्रश्न: आकर्षण और प्रत्याकर्षण तथा कम्पनात्मक गति को कहाँ देखा जाए, कैसे देखा जाए, और कैसे समझा जाए?

उत्तर: आकर्षण और प्रत्याकर्षण को मानव द्वारा रोजमर्रा की जिंदगी में कई जगह पर पहचाना जा सकता है.  मानव किसी वस्तु को समझने जाता है, तो उस वस्तु को समझने पर वस्तु और मानव की परस्परता में एक सुखद उत्सव होता है.  समझने वाली वस्तु (मानव) और समझने की वस्तु (जैसे - परमाणु) के बीच की दूरी घट कर जो संगीतमय स्थिति में आते हैं - उसका नाम है समझदारी!  मानव में समझने पर तृप्ति है.  वह तृप्ति बिंदु स्वयं में एक कम्पन की स्थिति है, जो एक खुशहाली की स्थिति है.  इसको हर व्यक्ति स्वयं में देख सकता है.  यदि यह साक्षात्कार नहीं होगा, बोध नहीं होगा, अनुभव नहीं होगा तो हमारे में यह खुशहाली होगी नहीं! 

प्रश्न: इस खुशहाली को पाने की विधि क्या है?

उत्तर: अध्ययन, बोध, और अनुभव - उसके बाद प्रामाणिकता की हालत आती है.  अध्ययन की आरंभिक स्थिति है - शब्द, उसके बाद है शब्द से इंगित वस्तु।  इंगित वस्तु स्मरण से चल कर हमारे साक्षात्कार में उदय होना।  दूसरी स्थिति है - जो साक्षात्कार हुआ, वह पूरा स्वीकृत हो जाना, सदा-सदा के लिए जीवन में.  इसी का नाम है - संस्कार या वस्तु-बोध.   वस्तु बोध होने के पश्चात् होता है - अनुभव।  बोध होने और प्रमाणित होने के बीच तृप्ति-बिंदु का नाम है - अनुभव। 

हम किसी वस्तु को समझने जाते हैं, तो वस्तु को समझने पर जब हम तृप्त होने लगते हैं तो वस्तु का स्वभाव, धर्म, प्रयोजन हमारी बुद्धि में निहित हो जाता है - यही समझ है.  यह जब तक नहीं होता है, तब तक हम समझे कहाँ हैं?  शब्दों की सीमा में समझ का प्रमाण होता नहीं है.  शब्दों की सीमा में वार्तालाप हो सकता है, चर्चा हो सकती है.  घटनाओं की चर्चा करके सांत्वना लगाने की बात रहती है, प्रमाण तो होता नहीं है.  मानव में समझने पर तृप्ति है. वह तृप्ति बिंदु स्वयं में एक कम्पन की स्थिति है, जो एक खुशहाली है.  बोध और प्रमाण के बीच कम्पन की यह स्थिति आत्मा में होती है.  एक बार जो वह तृप्ति-बिंदु मिलता है तो फिर वह निरंतर आवंटित होने के लिए बना रहता है.  यही आकर्षण और प्रत्याकर्षण का तृप्ति-बिंदु है. 

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी आश्रम, सितम्बर १९९९)

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