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Sunday, February 22, 2026

सुख और दुःख


 प्रश्न: आपके सामने कोई दुःखी व्यक्ति आता है तो क्या आप दुःखी नहीं होते?  निरंतर सुख में कैसे बने रहते हैं?

उत्तर: मानव समाधान में ही निरंतर सुखी है.  दुखी व्यक्ति को देखने पर हमारे मन में उसके दुःख के निराकरण का उपाय आता है, तो हम निरंतर सुखी हैं.  यह दूसरे व्यक्ति में उसकी ज़रूरत के अनुसार ही ट्रांसफर होगा, हमारे इच्छा से ट्रांसफर नहीं होगा।  दुखी व्यक्ति अपने में सुधार करने पर ही सुखी होगा।  समझदार व्यक्ति को सामने व्यक्ति के दुःख को देख कर पीड़ा नहीं होती, क्योंकि उसको दुःख का कारण भी पता रहता है, उसका निवारण कैसे होगा यह भी पता रहता है.  इसमें पीड़ित होने का कोई रास्ता ही नहीं है.  पीड़ा हज़ारों कोस दूर ही रह गया.  जब तक हमे दुःख के कारण और उसके निवारण का पता नहीं है, तब तक हम दुखी को देख कर दुखी होते ही हैं.  लोग मानते हैं कि दूसरों के दुःख देख के वो पीड़ित हो गए तो महान हो गए!  आप ही सोच कर अपने विवेक से निर्णय करो कि क्या ठीक है.  

समाधान से पहले मानव दुखी रहता ही है.  इसी को देख कर पूर्व में कहा गया कि संसार में दुःख ही दुःख है.  विकल्प विधि से हम कह रहे हैं कि समाधान पूर्वक हमे दुःख का कारण पता रहता है, उसके निवारण का अधिकार रहता है.  ऐसे में हमारे दुखी होने का कारण ही नहीं बनता।  

समाधान = सुख, समस्या = दुःख।  अपने में समस्या है इसलिए दूसरों का समस्या हमको दुखी करता है.  अपने में यदि समाधान है तो सामने व्यक्ति के लिए भी समाधान है.  

प्रश्न:  निरंतर सुख की आपकी स्थिति में क्या सारी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं?

उत्तर:  वैध या सकारात्मक इच्छाएं सब रहता हैं.  निषेधात्मक इच्छाएं नहीं रहता हैं.  आपके अनुसार क्या निषेधात्मक इच्छाएं होना चाहिए? निरंतर सुख की इस स्थिति में हर व्यक्ति को होना चाहिए या नहीं?  

प्रश्न: क्या सकारात्मक इच्छाएं दुःख का कारण नहीं है?  मेरी इच्छा है संसार से गरीबी प्रदूषण समाप्त हो जाए, पर संसार में उसके विपरीत ही होता दिख रहा है.  क्या यह मेरे दुःख का कारण नहीं है?

उत्तर: इच्छा होना पर्याप्त नहीं है.  इच्छा के पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होना आवश्यक है.  मानव में शुभेच्छा आदिकाल से है.  उसके पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होने से समाधान होता है.  यह अभी के विज्ञान से नहीं होगा।  मानव लक्ष्य के लिए दिशा निर्धारित करने वाले विज्ञान से यह होगा।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Saturday, February 21, 2026

मानव के reference से सब समझ में आता है

प्रश्न: आप कहते हैं - अस्तित्व में युद्ध-लड़ाई नहीं है.  पर हम जीव संसार में देखते हैं - दो बाघ को एक बाघिन के लिए लड़ते हुए.  बंदरों के एक झुण्ड के सरदार को दूसरे झुण्ड के सरदार से लड़ते हुए.  

उत्तर: यौन चेतना के आधार पर जीवों में लड़ाई देखने को मिलता है.  और कहीं उनमें लड़ाई देखने को नहीं मिलता।  मनुष्य आने पर उसने रूप के आधार पर भी लड़ाई किया, पद के आधार पर भी लड़ाई किया, धन के आधार पर भी लड़ाई किया, बल के आधार पर भी लड़ाई किया।  


प्रश्न: जीव संसार में भी यौन चेतना के आधार पर भी लड़ाई क्यों है?  


उत्तर: नर-मादा की पहचान प्राणावस्था से शुरू हुआ.  एक मादा कोष की तुलना में लाखों-अरबों नर कोशायें होना देखा गया.  जीव संसार में इसका उल्टा हुआ.  एक नर जीव की तुलना में अनेक मादा जीव होना देखा गया.  जैसे - दस गायों के बीच एक बैल रहता है.  दूसरा बैल वहाँ आने पर उससे लड़ता है.  मानव आने पर नर और नारी दोनों में समानांतर शरीर संवेदना का होना देखा गया.  समानांतर शरीर संवेदना के प्रकटन के लिए उसके पहले ये दोनों स्थितियां आवश्यक रही.  मानव के reference से यह सब चीज़ समझ में आता है.  


मानव आने पर उसने जीवों का अनुकरण किया।  साढ़े चार क्रिया में मानव शरीर को जीवन मान करके जिया।  उसमे वह स्वयंस्फूर्त नहीं हो पाया।  अभी स्वयंस्फूर्त होने की ओर ध्यान दिलाने के लिए हमने प्रस्ताव रखा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Friday, February 20, 2026

प्रकृति में स्वयंस्फूर्त क्रियाकलाप

 भौतिक और रासायनिक वस्तुओं के मूल में परमाणु है, विज्ञान ऐसा मानता है.  रासायनिक वस्तुओं के मूल में यौगिक क्रिया है - यह भी मानते हैं.  ये क्रियाएं स्वयंस्फूर्त हैं - यह बताना इनसे बना नहीं।  विज्ञान व्यवस्था को समझा नहीं है.  

यहाँ हमने व्यवस्था को निश्चित आचरण स्वरूप में प्रतिपादित किया है.  दो अंश का परमाणु अपना निश्चित आचरण करता है.  दो सौ अंश का परमाणु भी अपना निश्चित आचरण करता है.  किसी निश्चित संख्या के अंशों से गठित परमाणु का आचरण सदा के लिए निश्चित होता है.  दूसरे, हर परमाणु अपने में स्वयंस्फूर्त क्रिया करता है.  व्यापक वस्तु में भीगे रहने से ऊर्जा संपन्न है, फलस्वरूप स्वयंस्फूर्त क्रिया करता है, व्यवस्था में रहता है.  एक दूसरे की परस्परता के दबाव से विकार भी होता है, जिससे परमाणु में प्रस्थापन और विस्थापन होना पाया जाता है.  विस्थापन होकर भी व्यवस्था में रहता है, प्रस्थापन हो कर भी व्यवस्था में रहता है.  

वैसे ही गठनपूर्ण परमाणु (जीवन) भी निश्चित आचरण करता है.  जीवन की दस क्रियाओं के रूप में उसको समझाया है.  शरीर रचना गर्भाशय में होता है.  शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव होता है.  सहअस्तित्व नित्य प्रभावी है - इस आधार पर शरीर और जीवन का सहअस्तित्व हो गया.  सहअस्तित्व के कारण से शरीर और जीवन का मिलन होता है.  शरीर जीवन के चलाने योग्य होना स्वयंस्फूर्त रासायनिक क्रिया से होता है.  परमाणु में स्वयंस्फूर्त क्रिया रही, परमाणु से रचित रचनाओं में भी स्वयंस्फूर्त क्रिया आ गयी.  विज्ञान के अनुसार यह सब खींचतान से हो रहा है.  

शरीर रचना ऐसा हुआ जो जीवन की दस क्रियाओं में से कुछ क्रियाओं (आशा, विचार, इच्छा) को व्यक्त करने योग्य हुआ.  बाकी क्रियाओं को व्यक्त होने के लिए स्वयंस्फूर्त होने की आवश्यकता रहा.  शरीर को जीवन मानने से वह नहीं हुआ.  जीवन अलग है - उसकी आवश्यकता अलग है, शरीर अलग है - उसकी आवश्यकता अलग है. इन दोनों का अध्ययन होने पर जीवन स्वयं स्फूर्त विधि से दस क्रियाओं को व्यक्त करते हुए देखा।  इतना ही बात है.  दस क्रियाओं को व्यक्त न करने से मानव जीवों के सदृश जी गया.  जीव जानवर जैसे जीते हैं, उसी मानसिकता से जी गया.  ऐसे में उसने जीवों से अच्छा जीने का प्रयास किया।  इस तरह चार विषयों के स्थान पर पाँच संवेदनाओं के आधार पर जीने लगा.  वह भी जीव चेतना में ही हो गयी.  यहाँ तक मानव अभी तक पहुँचा है.  इसके आगे मानव चेतना को introduce करने के लिए हमने काम किया है.  पहले यह विद्वानों को पटता नहीं रहा, अब यह विद्वानों को पट रहा है.  पिछले २०-३० वर्ष में जो परिवर्तन हुआ है, वह यही है.  विज्ञान के विद्वानों को यह पट रहा है, ईश्वरवादी विद्वानों को यह अभी भी नहीं पट रहा है.  इसका यह कारण है, विज्ञानी इस बात में convince हो गए कि हम व्यवस्था में नहीं हैं, पर हम व्यवस्था को चाहते हैं.  मतलब हम कहीं न कहीं चूक गए.  दूसरे, हमने व्यवस्था को न पहचान कर जो कुछ भी किया, उससे धरती ही बीमार हो गया.  धरती ही नहीं रहेगा तो आदमी कहाँ रहेगा?  मध्यस्थ दर्शन के मूल प्रतिपादनों पर वे convince हो गए, यह मैं नहीं कह रहा हूँ.  लेकिन इस भाग में तो वे convince हो गए हैं.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Monday, February 9, 2026

आशा, विचार, इच्छा बोध के लिए स्त्रोत हैं

 

जीवन में बुद्धि और आत्मा कारण क्रियाएं हैं.  सूक्ष्म क्रियाओं के रूप में मन, वृत्ति और चित्त को बताया है.  स्थूल क्रिया के रूप में शरीर को बताया है.  

जीवन में जो सम विषम है - वे सूक्ष्म क्रियाओं की सीमा में है, condition के साथ.  condition से मुक्त कारण क्रियाएं ही हैं.  सूक्ष्म क्रिया से कारण क्रिया का पहला जो खेप है - बुद्धि में बोध होना।  बुद्धि में बोध हुए बिना आत्मा में अनुभव होता ही नहीं।  बोध होने के लिए स्त्रोत बताया है - मन (आशा), वृत्ति (विचार) और चित्त (इच्छा).  इन तीनों के आधार पर मानव साढ़े चार क्रियाओं में जीता ही है.  साढ़े चार क्रिया बोध के लिए स्त्रोत हैं, न कि ये स्वतन्त्र हैं.  इन्ही को स्वतन्त्र मानने से लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद है.  इनको स्वतन्त्र मानने से ही सभी अवैध बातों को वैध मान लिया।  

मन, वृत्ति और चित्त की क्रियाएं कारण क्रियाओं के लिए स्त्रोत हैं.  इसी के द्वारा बोध होता है.  बोध होने के बाद अनुभव स्वयंस्फूर्त होता है.  अनुभव के लिए आपको कुछ करना नहीं है.  बोध तक ही पुरुषार्थ है.  

शरीर द्वारा सूक्ष्म क्रियाओं को message मिलता है.  सूक्ष्म क्रियाओं द्वारा बुद्धि को message मिलता है.  बुद्धि को message मिलने से आत्मा में अनुभव होता है.  सिंधु से बिंदु तक पहुँचने का काम यही है.  सिंधु तक पहुँचने को लेकर आप expert हो, मुझसे अधिक ही प्रयास करते होंगे।  ताकि हमसे अच्छे प्रस्तुत हो जाएँ।  प्रस्तुति को लेकर मैंने बताया - मूल वस्तु को तो और कोई नहीं करेगा।  तुलनात्मक विधि से आगे की प्रस्तुतियां होंगी।  विगत (आदर्शवाद और भौतिकवाद) की तुलना में मध्यस्थ दर्शन की आवश्यकता कैसे आयी, इसका क्या प्रयोजन है, इसका क्या उपकार है - सभी बात पर thesis बन सकती है.  समीक्षा वही है.  शब्दों को चोरी करके कुछ होना नहीं है.  सत्यानंद जी, गायत्री परिवार, अरविन्द मिशन, ओशो - इन चार लोगों के साथ इसको test किया।  इन सबको साहित्य चोर या भाषा चोर माना गया.  ये अपने तूल में पूर्व बात को स्वाहा करते हैं, उससे कुछ निकलता नहीं है.  चोरी से किसका क्या कल्याण होगा, आप बताओ?  इन चार से बड़ा कोई मिशन नहीं है.  बाकी सब इन्ही के चट्टे-बट्टे हैं.  

प्रश्न:  तुलनात्मक विधि क्या है?  

उत्तर: किसी भी मुद्दे पर भौतिकवाद यह कहता है, आदर्शवाद यह कहता है, सहअस्तित्ववाद यह कहता है.  

प्रश्न: आपने कहा - "आशा, विचार, इच्छा बोध के लिए स्त्रोत हैं."  इसको समझाइये।

उत्तर:  आशा के बिना हम किसी की बात सुनेंगे ही नहीं।  सुनेंगे नहीं तो विचार में वह आएगा ही नहीं।  विचार में नहीं आएगा तो चित्त में वह चित्रित नहीं हो पायेगा।  चित्त में सच्चाई का चित्रण संवेदनशीलता के साथ ही होता है.  चित्त में सच्चाई से तदाकार होने पर उसका चित्रण होता है.  फिर उसका बोध हो जाता है.  सच्चाई का बोध हो जाता है.  शरीर से सम्बंधित चित्त तक ही रहता है.  

प्रश्न:  आशा, विचार, इच्छा सच्चाई के लिए स्त्रोत है - यह विगत से बिलकुल नयी बात लगती है.

उत्तर: विगत में तो वही भाड़ झोंकने वाला ही बात है.  भाड़ झोंकने का मतलब है - शिकायत पैदा करना, समस्या पैदा करना, दुःख पैदा करना।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर २०११, अमरकंटक)

चिंतन का अधिकार



अनुभव मूलक विधि से चिंतन का अधिकार पाने के लिए आत्मसात करना पड़ता है.  recording सब सूचना है.  मैं जो सब लिखा हूँ - वह सब भी सूचना है.  प्रमाणित होना मानव को ही है.  प्रमाणित होने के लिए आत्मसात करोगे या नहीं?

-> आत्मसात ही करना है!

मुख्य बात इतना ही है। जिस जिज्ञासा से आप लोग आये हैं, उसके लिए इतनी ही बात है। आत्मसात करना हर व्यक्ति का अधिकार है। एक व्यक्ति का अधिकार नहीं है। क्योंकि हर व्यक्ति जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है। जीवन के बिना कोई मानव होता ही नहीं है।

सूचनाओं को लेकर उनको प्रकट करने के काम में आप पारंगत हैं.  किन्तु चिंतन की वस्तु के रूप में अनुभव को पाने की बात जो है, उसको पाने में अभी भी विलम्ब है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर २०११, अमरकंटक)

संयम काल


 प्रश्न:  आपने बताया है - संयम काल में आपने कहीं-कहीं संस्कृत भाषा में लिखा हुआ भी देखा।  यह कैसे?

उत्तर: संयम काल में घटना के रूप में देखा, उसका नाम भी देखा।  कोई घटना होगा तो उसका नाम भी होगा ही.  संयम काल में जो सच्चाई देखा, उसका नाम भी आ गया.  यह जो लिपि आया वह चित्रण में आया.  

प्रश्न:  यह संस्कृत भाषा में ही क्यों आया?  अन्य भाषा में क्यों नहीं आया?

उत्तर:  अनेक भाषा में आया होगा।  उसमे से एक भाषा हमको याद था, वो देख लिया।  

प्रश्न:  संयम के समय चित्त-वृत्ति काम करता है, या चुप रहता है?

उत्तर:  संयम काल में मन से लेकर आत्मा तक पाँचों स्तर काम करता है.  समाधि काल में मन, वृत्ति, चित्त चुप रहता है, बुद्धि-आत्मा तो पहले से ही चुप रहते हैं.  संयम में सब खुल जाते हैं.  पारंगत होने के बाद दसों काम करने लग जाते हैं.  

समाधि तक पहुँचते तक नकारात्मक सब समाप्त हो गया था.  उससे कुछ हुआ नहीं।  सही बात को पाना शेष रहा.  तभी तो हुआ.  

प्रश्न:  अभी हमारे पास पूर्व स्मृतियों से नकारात्मक भी आ जाता है, फिर कैसे होगा?

उत्तर:  इसी लिए अध्ययन है.  अध्ययन में सही बात को प्रस्तुत किया है.  

प्रश्न:  संयम काल में आपको बहुत सारी ध्वनियाँ सुनने को मिला, वह क्या था?

उत्तर:  संयम होने की सम्भावना उदय होने पर, दसों क्रियाएं एकत्र होने के क्रम में, बहुत सारा ध्वनियाँ सुनने को मिला।  उसके बाद स्पष्ट होना शुरू किया।  समझने के क्रम में समय लगता ही है.  

प्रश्न:  ये ध्वनियाँ आपको चित्त में सुनाई दी या बुद्धि में? 

उत्तर:  ये ध्वनियाँ चित्त में ही सुनाई दी थी.  बुद्धि में शब्द का अर्थ ही बनता है.  

प्रश्न: हम लोगों के दसों क्रियाएं चालू होने के पहले कोई ध्वनियाँ सुनाई देंगी क्या?

उत्तर:  नहीं।  उसके पहले तर्क रहेगा।  तर्क ख़त्म होगा तब अनुभव होगा।  अध्ययन विधि में एक-एक मुद्दे पर तर्क ख़त्म होगा।  एक मुद्दे पर तर्क ख़त्म हुआ तो दूसरे मुद्दे पर तर्क ख़त्म होने का आसरा बन जाता है.  ऐसे चल के अध्ययन पूरा होता है.  अध्ययन पूरा होना मतलब सहअस्तित्व अनुभव में आना, मतलब सत्ता में सम्पृक्त सम्पूर्ण प्रकृति अनुभव में आना.  सम्पूर्ण प्रकृति विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति स्वरूप में समझ में आना.  इतना समझ में आ गया तो अध्ययन हुआ.  इतना ही देखा है मैंने।  इसको स्पष्ट करने में इतना पोथी हो गया.  

प्रश्न:  आप जब संयम शुरू करते थे तो पहले क्या समाधि में पहुँच जाते थे?

उत्तर: पहले समाधि, उसके बाद ध्यान, उसके बाद धारणा।  इस तरह चुप रहने से वस्तु के पास तक पहुँच गए.  तब यथार्थ समझ में आ गया.  

समाधि के बाद ध्यान में मेरी जिज्ञासा रुपी लक्ष्य आ गया.  धारणा में वह जिज्ञासा ही विस्तृत हुआ.  सत्य से मिथ्या कैसे पैदा हुआ?  यही तो मूल प्रश्न था.  

प्रश्न: संयम काल में क्या शरीर संवेदना का पता चलता है?

उत्तर:  संयम में संवेदना रहता ही है, तभी संयम होता है. संयम काल में स्मृति में समाधि रहना चाहिए।  स्मृति ही बोध में पहुँचता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २०११, अमरकंटक)

Saturday, February 7, 2026

संयम काल में दृश्य

 


अनुभव में कल्पनाशीलता विलय होता है.  फिर अनुभव के आधार पर हमारी कल्पनाशीलता काम करना शुरू कर देता है.   

प्रश्न:  आपने साधना पूर्वक समाधि की स्थिति को प्राप्त किया।  समाधि की क्या उपलब्धि रही?

उत्तर: समाधि की स्थिति में मेरा आशा, विचार, इच्छा चुप रहा.  समाधि की उपलब्धि है - मुझमे भूतकाल की पीड़ा, भविष्य की चिंता और वर्तमान से विरोध समाप्त हो गया.  ऐसा मेरी कल्पनाशीलता स्वीकार लिया, उसमें तदाकार हो गया.  समाधि के बाद भी मेरे प्रश्नों के उत्तर पाने की इच्छा शेष रहा.  यह संयम करने के लिए आधार बना.  

प्रश्न: संयम में क्या हुआ?

उत्तर: संयम में जो कुछ भी प्रकृति ने बताया उसका अध्ययन किया।  अध्ययन करने से यह पता चला - सहअस्तित्व है, सदा-सदा है, नित्य है.   सहअस्तित्व स्वरूप में सम्पूर्ण प्रकृति भीगा हुआ है, डूबा हुआ है, घिरा हुआ है.  जो देखा, उसका नामकरण कल्पनाशीलता के आधार पर किया।

संयम काल में दृष्टा पद से जो चित्रण चित्त में दिखता रहा, वह बुद्धि में स्वीकार होता रहा.  अनुभव हुआ.  फिर उसको बताने योग्य हुए.  

संयम काल में जो चित्रण मेरे सामने आया उसको मैंने दृष्टा पद प्रतिष्ठा से स्वीकारा।  चित्रण शब्द के रूप में भी हो सकता है, चित्र के रूप में हो सकता है.  

दृष्टा पद प्रतिष्ठा मतलब - मैं देखने वाला हूँ, दिखने वाला वस्तु कुछ है.  इसमें कल्पनाशीलता का कोई योग नहीं है.  मैं दृष्टा पद में रहा और देख पाया।

प्रश्न:  इसमें देखने वाला कौन है?

उत्तर:  देखने वाला आत्मा है.  आत्मा दृष्टा पद में होता है.  बुद्धि बोध पद में होता है.  बुद्धि में बोध पद और आत्मा में दृष्टा पद, इनके योग में चित्त में चित्रणों को देखता रहा.  अध्ययन आत्मा के साक्षी में स्मरण पूर्वक किया गया प्रक्रिया है.  आत्मा दृष्टा पद में होता है, उसके साक्षी में.  स्मरण चित्त में होता है.  

अध्ययन इसी विधि से होता है.  समाधि-संयम विधि से करें तो भी, अनुभवगामी विधि से करें तो भी.  

फिर जो बुद्धि में स्वीकार हुआ, वो अनुभव मूलक विधि से स्मृति में आया.  अनुभव का बोध पूर्वक स्मरण स्थिर होता है.  फिर उसको बताये हैं.  

संयम काल में दृष्टा पद से वास्तविकताओं को देखते रहे.  संयम के बाद स्मरण जुड़ गया.  स्मरण जुड़ने से उसको व्यक्त कर दिया।  

अभी जो आप अध्ययन करते हो, उसमे शब्द का अर्थ स्मरण है, या स्वीकृति है?  जब तक स्वीकारते नहीं है, स्मरण अपना पैतड़ाबाजी बजाता रहता है.  

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (नवम्बर २०१२, अमरकंटक)