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Sunday, February 9, 2014

स्थिति गति

प्रश्न: "स्थिति गति" से क्या आशय है?

उत्तर: अस्तित्व में हर वस्तु की स्थिति गति है.  स्थिति का मतलब है - होना।  गति का मतलब है - रहना।   स्थिति और गति अविभाज्य है. 

स्थिति या होने का मूल स्वरूप है - सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति।  प्रकृति की हर इकाई में "होने" के लिए प्रतिबद्धता है.  होने की निश्चित स्थितियाँ हैं.  जैसे - दो अंश का परमाणु  "होने" की एक निश्चित स्थिति है.  पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था, जीव अवस्था और ज्ञान अवस्था - होने की निश्चित स्थितियाँ है.   होने की इन स्थितियों में एक क्रम है.

गति के तीन स्वरूप हैं - (१) स्थानांतरण (२) परिवर्तन (३) व्यवस्था में भागीदारी।  हर स्थिति की गति के यही तीन स्वरूप हैं.

अभी प्रचलित विज्ञान गति को कुछ सीमा तक पहचाना है, पर स्थिति को पहचाना नहीं है. 

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Thursday, January 16, 2014

उपयोग विधि, कार्य विधि, होने की विधि

चारों अवस्थाओं की उपयोग विधि, कार्य विधि और होने की विधि है.  उपयोग और कार्य विधि रूप और गुण की सीमा तक है, जो साक्षात्कार, बोध और अनुभव की वस्तु नहीं है.  होने की विधि अनुक्रम है, स्वभाव और धर्म है, जो साक्षात्कार, बोध और अनुभव की वस्तु है.  पदार्थ-अवस्था से प्राण-अवस्था का होना कैसे हुआ?  प्राण-अवस्था से जीव-अवस्था का होना कैसे हुआ?  जीव-अवस्था से ज्ञान-अवस्था का होना कैसे हुआ?  भ्रमित ज्ञान अवस्था से जागृत ज्ञान अवस्था का होना कैसे हुआ? यह होने का कड़ी से कड़ी जुड़ा होना अनुक्रम है.

रूप, गुण, स्वभाव और धर्म चारों सत्य हैं.  अस्तित्व में रूप है ही, गुण है ही, स्वभाव है ही, धर्म है ही.  रूप और गुण चित्रण तक रहता है, जो स्वभाव और धर्म से सम्मत होता है.  स्वभाव और धर्म आगे साक्षात्कार होकर बुद्धि तक जाता है.  फिर केवल धर्म अनुभव में जाता है.  समझने से आशय साक्षात्कार, बोध और अनुभव ही है.  अनुभव होने पर रूप, गुण, स्वभाव और धर्म को संयुक्त रूप में पहचानने और निर्वाह करने की अर्हता आ जाती है.  इससे मानव के जीने में (अनुभव, विचार और कार्य-व्यव्हार में) प्रमाण प्रवाहित होता है. 

होना समग्र का है.  अस्तित्व धर्म सभी अवस्थाओं में साम्य है.  इसलिए होने को समग्रता में ही समझा जाता है.  होने को टुकड़ों में समझा नहीं जाता।  समग्र का होना एक साथ ही समझ आता है.  पानी अनुभव में आ जाए, मानव अनुभव में न आये - ऐसा होता नहीं है.  मानव होने के केंद्र में है.  मानव के होने के अर्थ में मनुष्येत्तर प्रकृति का होना है.  इसलिए समझ के टुकड़े नहीं होते।  मानव अभी पानी को उपयोग और कार्य के अर्थ में ही पहचानता है, उसके "होने" के अर्थ में नहीं। 

साक्षात्कार, बोध और अनुभव में कोई काल और तर्क नहीं होता।  तर्क रूप और गुण की सीमा में है.  सारी देर साक्षात्कार तक पहुँचने में ही है.  कल्पनाशीलता में समझने के लिए प्राथमिकता बनने में ही जो समय लगता है, वह लगता है.  साक्षात्कार होने पर बोध और अनुभव तत्काल होता है.  या तो "समझे" या "नहीं समझे" - ऐसा ही है. 

उपयोग विधि और कार्य विधि इन्द्रियगोचर है.  होने की विधि ज्ञानगोचर है.  होने की विधि को समझने के लिए अध्ययन है.  इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर के संयुक्त रूप में मानव अस्तित्व में देखता है, करता है और भोगता है. 

प्रश्न: हम अभी जहां खड़े हैं, वहाँ से समझने के लिए प्राथमिकता बनाने के लिए क्या करें?

उत्तर: हम जहाँ हैं, वहीं से आगे का रास्ता बना सकते हैं.  समझदारी के इस प्रस्ताव से सहमति तो हो ही जाती है.  न्याय, समाधान और सत्य को नकारना किसी से बनता नहीं है.  सहमति के साथ अध्ययन में निष्ठा जोड़ने की आवश्यकता है.  अपने जीने के लक्ष्य को परिवर्तित करने की आवश्यकता है.  लक्ष्य को सुविधा-संग्रह के स्थान पर समाधान-समृद्धि में स्थिर करने पर हम अभी जो रोटी-पानी के लिए करते हैं उसको साधन मानें न कि साध्य।  मानवीयता पूर्ण आचरण को विचार में अपनाने से इस समझ के प्रति हम ईमानदार होते हैं. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Sunday, December 1, 2013

मौलिकता

प्रश्न: मौलिकता क्या है?

उत्तर: हर वस्तु में उसकी प्रजाति की मौलिकता है.  जैसे - दो अंश के परमाणु की एक मौलिकता है, जो दो अंश वाले परमाणुओं की प्रजाति में ही देखने को मिलती है.  तीन अंश वालों में दो अंश वाली मौलिकता नहीं मिलती, वहाँ तीन अंश वाली मौलिकता मिलती है।  उसी प्रकार प्राण-अवस्था में दूब प्रजाति की एक मौलिकता है, जो दूब प्रजाति में ही मिलेगी, आम प्रजाति में नहीं।  इसी प्रकार जीव-अवस्था में वंश प्रजाति के अनुसार मौलिकता स्पष्ट होती है.  मौलिकता है -  उस प्रजाति की उपयोगिता और पूरकता।  स्वयं में उपयोगी, अन्य के लिए पूरक।

प्रश्न: मानव के लिए "मौलिकता" के इस सूत्र की क्या व्याख्या है?

उत्तर: मानव में ज्ञान के आधार पर मौलिकता स्पष्ट होती है.  मानव ज्ञान विधि से मौलिक है.  मानव ज्ञान-अवस्था का है और मानवों में जातियों की विविधता नहीं है.  सभी मानव एक ही जाति के हैं.  मानव में पूरकता-उपयोगिता का स्वरूप बहु-आयामी है.  मानव में मौलिकता (पूरकता-उपयोगिता) मानव-लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व) और जीवन-मूल्य (सुख, शान्ति, संतोष, आनंद) के अर्थ में है.  यह ज्ञान का वैभव है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००८, अमरकंटक)

Sunday, November 10, 2013

मानव की पहचान



ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर के संयुक्त रूप में मानव की पहचान है.  मानव में समझदारी ज्ञानगोचर है.  ईमानदारी ज्ञानगोचर है.  जिम्मेदारी ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर दोनों है.  भागीदारी इन्द्रियगोचर है.

सहअस्तित्व अपने में ज्ञानगोचर है.  सहअस्तित्व को समझे बिना मानव अपने में ज्ञानगोचर को पहचान ही नहीं सकता।  इसलिए सहअस्तित्व को पहचानना, सहअस्तित्व में जीवन को पहचानना, सहअस्तित्व में शरीर रचना को पहचानना, फिर शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव को पहचानना।

ज्ञानगोचर विधि से मानव में "निर्णय" (या निश्चयन) है.
इन्द्रियगोचर विधि से मानव में "गति" (व्यव्हार और कार्य) है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक) 

Saturday, April 13, 2013

अध्ययन और कार्यक्रम

प्रश्न: हम जो इस दर्शन के लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में लगे हैं, क्या वह हमारे अध्ययन के लिए सहायक है या बाधक है?

उत्तर: सहायक है।

प्रश्न: अध्ययन और लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में अपनी भागीदारी के संतुलन को कैसे पहचाने?

उत्तर:  कार्यक्रम में भागीदारी आपके अध्ययन के लिए सहायक हो, वही संतुलन  है।

- अनुभव शिविर २०१३ में श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित

Wednesday, March 13, 2013

जिज्ञासा समझने के लिए तैयारी है


प्रश्न: अनुभव की स्थिति के बारे में तो आपने तीन प्रमाण (अनुभव प्रमाण, व्यवहार प्रमाण और प्रयोग प्रमाण) बताया।  अनुभव के पहले की क्या स्थितियां होती हैं?

उत्तर: अनुभव के पहले है - अध्ययन।  अध्ययन के पहले है - पठन।  पठन के पहले है - अपेक्षा।  अपेक्षा के पहले है - जिज्ञासा।  जिज्ञासा के पहले है - शंका।  जिज्ञासा समझने के लिए तैयारी है।

प्रश्न: "जीव चेतना" से "मानव चेतना" तक के विकास में क्या कोई "क्रम" है या नहीं?

उत्तर: विकल्प का अध्ययन ही क्रम है।

प्रश्न:  अध्ययन पूर्वक हम अनुभव की ओर अग्रसर हो रहे हैं या नहीं - इसकी जाँच का क्या मापदंड है?

उत्तर: अध्ययन करते हैं तो समझ में आ रहा है।  समझ में आ रहा है तो आप मे विश्वास हो रहा है।  विश्वास हो रहा है तो और समझ में आ रहा है।  इस तरह पूरा समझ में आने के बाद प्रमाणित होता है।

प्रश्न: प्रमाण के पहले क्या व्यक्ति के "जीने" में कोई गुणात्मक परिवर्तन दिखेगा?

उत्तर: जब कभी प्रमाणित होगा, तभी दिखेगा।  उसके पहले जैसा सामान्य आदमी को दिखता है, वैसा ही दिखेगा।  अभी तक सामान्य आदमी में ऐसा है - जब तक जीता है, झगडा।  मरने के बाद, पूजा!  भ्रम होता है और जागृति होता है, और कुछ होता ही नहीं है।


प्रश्न: बहुत सारे अंतर्विरोधों में जो मैं पहले रहता था, अब वे मुझमे नहीं दिखते।  अभी मुझे अनुभव तो नहीं हुआ है, पर इसको मैं "उपलब्धि" के रूप में देखूँ या नहीं?

उत्तर: वह उपलब्धि कैसे हुआ?  इस विकल्प के अध्ययन पूर्वक हुआ या आपके पूर्व विचार के आधार पर हुआ?  विकल्प के अध्ययन पूर्वक हुआ तो उसे उपलब्धि के रूप में देखें, किन्तु वहाँ रुकें नहीं।  प्रमाणित होने तक नहीं रुकना।  प्रमाणित नहीं होता है तो आपकी उपलब्धि आप तक ही है।  वह व्यक्तिवाद है।  अनुभव पूर्वक प्रमाणित होने पर आप संसार के लिए उपकारी होंगे।


प्रश्न: इस विकल्पात्मक दर्शन द्वारा प्रस्तावित सभी बिंदुओं पर मुझे विश्वास है, इसके बावजूद "जीने" की जगह में मुझे स्वयं में कमी दिखती है।  इसका क्या कारण है?

उत्तर: इसका कारण है आपका "पूर्वाभ्यास"।  जो भी हम पहले कल्पना किये हैं या अभ्यास किये हैं, उसका स्मरण ही अवरोध है।  ऐसे में मानवीयता में विश्वास होते हुए अमानवीयता में जीते हैं।  मानवीयता की अपेक्षा जीवन के अनुसार है।  अमानवीयता में जीना अभी की परंपरा है।  ऐसे सोच के देखिये।  यह स्थिति समाधान होने तक है।  यदि समाधान होता है तो वह जीने में आता ही है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अनुभव शिविर, जनवरी २०१३, अमरकंटक)

Monday, March 4, 2013

सर्वमानव के लिये प्रस्ताव


मैंने इस प्रस्ताव को "सर्वमानव" के लिये प्रस्तुत किया है।  इस प्रस्ताव के बारे में "सर्वमानव" के आधार पर बात हो सकती है, न कि किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष के आधार पर।  आपसे "सर्वमानव" के आधार पर बात करना नहीं बन रहा है, यही परेशानी है।

जब यह प्रस्ताव अनुसंधानित हुआ तो मानव जाति इसके प्रति "अज्ञात" था, इस प्रस्ताव की परंपरा नहीं था, "सर्वमानव" के लिए इसकी परंपरा हो, इसलिए प्रस्तुत कर दिया।  सर्वमानव को क्या चाहिए?  सर्वमानव को "सुख" चाहिए - यह पहचाना।  सुख समाधान के बिना होता नहीं है।  समाधान अनुभव के बिना होता नहीं है।  अनुभव सहअस्तित्व में ही होता है।

अध्ययन के लिए सहमत होना और अध्ययन होना दो अलग-अलग बातें हैं।  अध्ययन होने पर स्वत्व होता है।

इस प्रस्ताव को मानव जाति द्वारा परंपरा स्वरूप में अपनाने की पूर्वभूमि बन चुकी है।  मानव जाति सूली पर चढ़ चुका है।  इस धरती पर से विदा होने की स्थिति में आ चुका है।  मानव जाति की तैयारी है, तभी इसको प्रस्तुत किया है।  आपको समझ में आता है तो आप इसको जी कर प्रेरणा दे सकते हैं।  बिना समझे हम  भाषाई प्रेरक होंगे, अनुभव करके हम जीते जागते प्रेरक होंगे।  दोनों में फर्क है या नहीं?

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अनुभव शिविर, अमरकंटक - जनवरी, २०१३)