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Saturday, April 24, 2010

प्रयोजन की पहचान

प्रश्न: मध्यस्थ-दर्शन के आने से पहले भी मनुष्य के प्रयोजन की बात की गयी है। आप "मानव सहज प्रयोजन" की जो बात करते हैं, वह उससे कैसे भिन्न है?

उत्तर: पहले भक्ति-विरक्ति एक विचार का आधार हुआ। इसमें संलग्न साधकों का सम्मान हुआ, लेकिन उनकी साधना से जो "फल" मिलना चाहिए था - वह मिला नहीं! उसका लोकव्यापीकरण हुआ नहीं! भक्ति-विरक्ति का प्रतिपादन शब्द-भाषा के रूप में रखा हुआ है। उसको आप भी पढ़ सकते हैं। उसको लेकर साधकों ने जो साधना किया उसका फल उनको मिला या नहीं यह भी पता नहीं लगा, परंपरा में उसके पहुँचने की कोई गवाही भी नहीं मिली। उस प्रतिपादन में भक्ति-विरक्ति करने को ही प्रयोजन माना है। जबकि यहाँ हम कह रहे हैं - भक्ति-विरक्ति से जो "फल" पाना है वह प्रयोजन है। वह फल भक्ति-विरक्ति से नहीं मिला। इसीलिये मैं कहता हूँ - भक्ति-विरक्ति से प्रयोजन को पाना शेष रहा।

इसके विपरीत भौतिकवादियों ने सुविधा-संग्रह को मनुष्य का प्रयोजन मान लिया। सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिंदु मिला नहीं - इसीलिये प्रयोजन के लिए पुनर्विचार की ज़रुरत आ गयी।

अनुभव-मूलक विधि से मनुष्य अस्तित्व में अपने प्रयोजन को प्रमाणित करता है। अनुभव संपन्न होने के लिए मध्यस्थ-दर्शन का अध्ययन के लिए प्रस्ताव है। इसकी आवश्यकता है या नहीं - इसके बारे में आप सोचिये!

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अमरकंटक)

आभार: प्रवीण-आतिशी मानव-स्थली, भोपाल।

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