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Sunday, April 4, 2010

सह-अस्तित्व में बोध

भ्रम के सम्मुख जब जागृति प्रस्तुत होता है तो भ्रम की अनावश्यकता स्वीकार हो जाती है। यह जीवन में जागृति की ओर विवश करने वाली गति है।

जीवन स्वयं को भी जानने वाला है, और सर्वस्व को भी जानने वाला है। सर्वस्व को जानने पर "दृष्टा पद" और उसको जीने में प्रमाणित करने को "जागृति" कहा है।

सह-अस्तित्व ही बोध का सम्पूर्ण वस्तु है। सह-अस्तित्व में ही जीवन है। सह-अस्तित्व में ही जीवन-ज्ञान होता है। सह-अस्तित्व में ही मानव है। सह-अस्तित्व में ही मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान होता है। सह-अस्तित्व "में" ही अध्ययन है। सह-अस्तित्व से विभाजित करके कोई अध्ययन पूरा होता नहीं है।

प्रमाणित व्यक्ति के "अनुभव की रोशनी" में ही अध्ययन होता है। प्रमाण के आधार पर दूसरों में अनुभव की आवश्यकता का पता चलना - यह सर्वशुभ सम्मत प्रयोजन है। अनुभव किया हुआ व्यक्ति ही अनुभव-गामी पद्दति से अध्ययन करा सकता है। मेरे अनुभव के साक्षी में आप अध्ययन करते हो। अनुभव के बाद आप स्वयं साक्षी (दृष्टा) हो जाते हो। अनुभव के साक्षी में ही अध्ययन पूर्ण होता है।

अध्ययन विधि से सह-अस्तित्व स्वरूपी सत्य बोध होता है, फलतः अनुभव होता है। जानने-मानने की संतुलन-स्थिति का नाम है - बोध। अध्ययन विधि से बोध होता है - वह अनुभव-मूलक विधि से प्रमाण स्वरूप में आता है। प्रमाण से तृप्ति मिलती है। अनुभव-प्रमाण "बीज-स्वरूप" में हो जाता है, जिसको फिर "बोया" जा सकता है। अनुभव एक से अनेक में अंतरित हो सकता है। यह सर्व-शुभ है। सर्व-शुभ में स्व-शुभ समाया रहता है। प्रमाणित होने की ताकत स्वयं में बने रहने से स्वयं की तृप्ति बनी रहती है। यह तृप्ति जब चित्त के स्तर पर आती है - तब "समाधान" कहलाती है। अनुभव मूलक विधि से जीने पर ही समाधान होता है। जीव-चेतना विधि से जीने पर जीने में समाधान बनता नहीं है।

तदाकार विधि से चित्त बुद्धि में अनुभूत होता है - तद्रूप अवस्था में। जब चित्त बुद्धि के आकार में हो जाता है तो बुद्धि में बोध चित्त में चिंतन स्वरूप में आता है। उसी के अनुरूप प्रमाणित होने के लिए चित्रण होना शुरू करता है। रूप और गुण का ही चित्रण होता है, स्व-भाव और धर्म समझा रहता है। इस प्रकार चिंतन-चित्रण के अनुरूप वृत्ति में तुलन-विश्लेषण, और मन में चयन-आस्वादन होता है। मन वृत्ति में अनुभूत होता है - मतलब अनुभव मूलक वृत्ति के स्वरूप में मन हो जाता है। इसी प्रकार वृत्ति चित्त में, चित्त बुद्धि में और बुद्धि आत्मा में अनुभूत होता है। आत्मा सह-अस्तित्व में अनुभूत होता है। पूरा जीवन अनुभव के आकार में हो जाता है। आत्मा में सह-अस्तित्व का जानना-मानना "सुनिश्चित" बना रहता है, जो मन द्वारा जीने में क्रियान्वित होता रहता है। इसको "जागृति" नाम दिया।

मूल्यांकन क्रम में - आत्मा बुद्धि का, बुद्धि चित्त का, चित्त वृत्ति का, और वृत्ति मन का मूल्यांकन करता है। मन शरीर और व्यवहार का मूल्यांकन करता है। अनुभव संपन्न होने के बाद -"आत्मा जानता-मानता है" - इसकी गवाही पहले बुद्धि में ही होती है। अनुभव का प्रभाव पहले बुद्धि पर ही आता है। बुद्धि इस अनुभव-प्रमाण बोध को प्रमाणित किया या नहीं - यह आत्मा में ही मूल्यांकित होता है। अनुभव-संपन्न आत्मा यह मूल्यांकित करती है कि अनुभवप्रमाण बोध को बुद्धि सदुपयोग किया या नहीं? बुद्धि का दृष्टा आत्मा है। इसी तरह अनुभव-मूलक विधि से चित्त का दृष्टा बुद्धि, वृत्ति का दृष्टा चित्त, मन का दृष्टा वृत्ति, शरीर और व्यवहार का दृष्टा मन होता है।

पदार्थ ही जीवन स्वरूप में है। परमाणु ही विकसित हो कर, गठन-पूर्ण हो कर जीवन पद प्रतिष्ठा में आता है। वही जीवन जागृत हो कर प्रमाणित होता है। यही "समाधानात्मक भौतिकवाद" का मूल आधार है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

आभार: प्रवीण-आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)

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