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Monday, July 4, 2011

सृष्टि दर्शन

मानव ज्ञान-अवस्था का होने के आधार पर पूरी सृष्टि का दर्शन चाहता ही है।

परमाणुओं में परमाणु-अंशों का बढ़ना-घटना, अणुओं में परमाणुओं का संख्या बढ़ना-घटना – इसी का नाम है, रासायनिक-भौतिक संसार।

सृजन = इकाई + इकाई। इसके तीन स्तर हैं. पहला परमाणु के स्तर पर परमाणु-अंशों का जुडना, दूसरा अणु के स्तर पर परमाणुओं का जुडना, तीसरा अणु-रचित रचना के स्तर पर अणुओं का जुडना। विसर्जन = इकाई – इकाई। सृजन और विसर्जन के बीच है – विभव (बने रहना)। विभव ही मानव को सर्वोपरि स्वीकार है। विभव ही मध्यस्थ है. विभव की ही परंपरा होती है। जैसे मानव-शरीर गर्भाशय में रचित होता है, और एक दिन विरचित होता है। इन दोनों के बीच में है “जीना” - जो विभव है।

सभी परमाणु-अंश एक ही स्वरूप के हैं। परमाणु-अंश का और विघटन होता नहीं है। परमाणु-अंश में भी व्यवस्था में होने की प्रवृत्ति है। अकेला परमाणु-अंश प्राकृतिक स्वरूप में पाया नहीं जाता। चुम्बकीय बल है – सत्ता में संपृक्तता वश एक दूसरे के साथ होने की प्रवृत्ति। सत्ता में संपृक्तता वश परमाणु अंशों में भी चुम्बकीय बल सम्पन्नता है, जिससे उनमे घूर्णन गति है, घूर्णन गति के साथ हर परमाणु-अंश का अपना एक वातावरण (प्रभाव क्षेत्र) है। व्यवस्था में होने की प्रवृत्ति और चुम्बकीय-बल सम्पन्नता के साथ ये परमाणु-अंश निश्चित अच्छी दूरी में रह कर वर्तुलात्मक गति करते हुए व्यवस्था को प्रमाणित करते हैं। मध्य में जो परमाणु-अंश होते हैं, उनके बीच भी एक निश्चित दूरी रहती है। इस तरह व्यवस्था को प्रमाणित करने को ही हम ‘आचरण’ कहते हैं। अकेले परमाणु-अंश (जो किसी परमाणु में भागीदारी नहीं कर रहे हैं) अस्तित्व में नगण्य हैं। अकेले परमाणु-अंश की घूर्णन-गति अनिश्चित होती है, जो परमाणु में भागीदारी करते हुए निश्चित हो जाती है।

अनेक प्रजाति के परमाणु उनमे परमाणु-अंशों की संख्या-भेद के आधार पर हैं।

परमाणु में परिवेशीय अंशों में घूर्णन-गति और वर्तुलात्मक-गति के साथ कम्पनात्मक-गति भी आ गयी। नाभिक और परिवेशीय-अंश दो ध्रुव बने रहते है, उसके सापेक्ष में कंपन है। वर्तुलात्मक-गति कागज़ पर जो वृत्त बनाते हैं, वैसा नहीं है। नाभिक के चारों ओर गति-पथ में आगे-पीछे निश्चित सीमा तक झुकना भी होता है – वही कम्पनात्मक गति है. उतना ही झुकता है, जितने में व्यवस्था सुरक्षित रहे। हरेक गति में – चाहे घूर्णन गति हो या वर्तुल गति हो – दो ध्रुव स्थिर रहते हैं, उनके सापेक्ष में कंपन होता है। धरती जो सूर्य के चारों ओर घूमती है – उसमे भी वैसा ही है। चंद्रमा जो धरती के चारों ओर घूमता है – उसमे भी वैसा ही है। कम्पनात्मक गति की शुरुआत परमाणु-अंश से ही है। फिर परमाणु में कम्पनात्मक-गति का निश्चित स्वरूप है, अणु में उससे ज्यादा है, अणु रचित रचना में उससे ज्यादा है, फिर गठन-पूर्ण परमाणु में कम्पनात्मक-गति की पूर्णता है।

प्रचलित-विज्ञान ने विखंडन-विधि को अपनाया है। विखंडन-विधि से प्रकृति में व्यवस्था की प्रवृत्ति दिखती ही नहीं है। विखंडन-विधि आवेश पैदा करके ही होती है। इसलिए विखंडन-विधि से हम व्यवस्था को प्रमाणित कर नहीं पायेंगे। मैंने विखंडन-विधि से प्रकृति को नहीं देखा, समग्रता विधि से देखा। समग्रता-विधि से प्रकृति में व्यवस्था की प्रवृत्ति को देखा। व्यवस्था में होने की प्रवृत्ति की परमाणु-अंश से ही शुरुआत है। परमाणु-अंशों में व्यवस्था की प्रवृत्ति से ही परमाणु में व्यवस्था और व्यवस्था में प्रवृत्ति आया है। परमाणु व्यवस्था का मूल स्वरूप है और उसमे सभी भूखे, अजीर्ण, और तृप्त प्रकार के परमाणुओं में व्यवस्था में होने-रहने की प्रवृत्ति है। इसी क्रम में व्यवस्था के अर्थ में ही इन भूखे और अजीर्ण परमाणुओं का मिल कर अणु बनना, और अणुओं का मिल कर अणु-रचित रचना बनना है। धरती भी एक अणु-रचित रचना है। धरती अपने में एक व्यवस्था है. धरती के व्यवस्था होने का प्रमाण है – इस पर चारों अवस्थाओं का प्रकट होना।

प्रश्न: आप ने जिस पैने-पन से परमाणु के सूक्ष्म-सूक्ष्मतम स्वरूप को देखा, क्या अध्ययन-विधि से हमको भी वैसा दिखेगा?

उत्तर: - बिलकुल दिखेगा! जो मुद्दा आप को समझाया उसकी स्वीकृति की आप में पूरी निरंतरता हो जाती है, तो वह आपको दिख ही गया। दिखने का मतलब ही समझना है। स्वीकारने के बाद आपको व्यवस्था का अनुभव होगा। अनुभव में जैसे मुझे तृप्ति हुई, “वैसी ही” तृप्ति आपको होगी। अनुभव केवल व्यवस्था का ही होता है, और कुछ भी नहीं होता। निश्चित आचरण के स्वरूप को व्यवस्था कहा है। जो मुझ को दिखा (समझ में आया) उसी को मैं समझाता हूँ। समझाता हूँ तो आप के समझ में आता है। समझने के बाद, अनुभवमूलक विधि से आपका व्यवस्था में जीना बनता है। व्यवस्था में जीना बनता है तो वह प्रमाण नहीं तो और क्या है? जीने में ही अनुभव व्यक्त होता है. जैसे मैं व्यक्त होता हूँ, उससे अच्छा आप व्यक्त हो ही सकते हैं।

कोई भी वस्तु का हम अध्ययन करते हैं, उसकी दो ही विधियाँ हैं – शोध विधि और अनुसंधान विधि। परंपरा से जो मिलता है, उसको हम शोध करते हैं। परंपरा जो देने में असमर्थ होता है, उसके लिए हम अनुसंधान करते हैं। अनुसंधान या तो विखंडन विधि से कर सकते हैं, या समाधि-संयम विधि से कर सकते हैं। मुझसे जो आप को सूचना मिलता है, उसको आप शोध करते हो। आपके शोध से आप व्यवस्था के प्रति सुस्पष्ट हो जाते हो। वह आप के जीने में सही निकलता है, तो आप उसको प्रमाण मानते हो।

जड़ (संपृक्तता) से फल (मानवीयता पूर्ण आचरण में जीना) तक मैंने देखा है, फल से जड़ तक आपको देखना है. इतना ही है। फल से जड़ को पकड़ना (शोध विधि) कोई दूर नहीं है। किन्तु जड़ से फल को पकड़ना (अनुसन्धान विधि) काफी दूर है। यह पूरा प्रस्ताव मानवीयता पूर्ण आचरण में जीने के अर्थ में ही है। प्राकृतिक रूप में “होना” जड़ है, “रहना” (मानवीयता पूर्ण आचरण) फल है। फल की स्वीकृति होता है, उससे जिज्ञासा बनती है, फिर जड़ को समझने में फिर देर नहीं लगती है। फल से जड़ की कल्पना करना सुगम है। जड़ से फल को प्राप्त करना (अनुसन्धान विधि या साधना विधि) काफी अनिश्चयता के साथ है। लोकव्यापीकरण के लिए अध्ययन-विधि ही सुगम है।

परमाणु का अध्ययन करने के लिए तर्क-विधि है, या प्रयोग विधि है, तीसरे साधना विधि (समाधि-संयम) है। तर्क विधि से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो प्रयोग की आवश्यकता होती है। प्रयोग विधि से परमाणु का अध्ययन करने के लिए विखंडन विधि ही है। उससे व्यवस्था का कोई अनुभव होता नहीं है। परमाणु का तर्क-सम्मत विधि से अध्ययन करने के लिए यह प्रस्ताव पर्याप्त है। साधना विधि सभी के लिए सुगम नहीं है।


- बाबा श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

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