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Sunday, June 14, 2026

मैं समझने वाला हूँ. समझने की वस्तु अस्तित्व है.

 संयम में पहले मेरा स्वरूप समझ में आया.  मैं समझने वाला हूँ - यह आ गया.  मैं क्या चीज़ है? मैं एक परमाणु है, गठनपूर्ण है, इसमें इस इस प्रकार की क्रियाएं हो रही हैं, किस क्रिया से क्या स्पष्ट होता है - यह सब अध्ययन हो गया.  इस आधार पर पूरे अस्तित्व को हम समझने योग्य हो गए.  कुल मिला कर यही तो हुआ है.  सर्वप्रथम मेरा ही अध्ययन मुझको हुआ.  इससे पहले (आदर्शवाद में) बताते थे हम कोई समझने योग्य वस्तु नहीं हूँ, हमको समझ में आ गया कि हम ही तो सब समझने वाला हूँ.  हमको परम्परा ने कैसा बना कर रखा था!  Click point यही है कि मैं ही सब कुछ को समझने वाला हूँ.  इसको अच्छी तरह से बैठा लेने पर बहुत कुछ काम बन जाता है.  मैं अपना अध्ययन कर सकता हूँ, फलस्वरूप संसार का अध्ययन कर सकता हूँ.  सहअस्तित्व विधि से ही मैं अध्ययन करता हूँ.  


मैं समझने वाला हूँ.  समझने की वस्तु अस्तित्व है.  अस्तित्व सहअस्तित्व स्वरूपी है.  सहअस्तित्व में सब कुछ अध्ययन है - यह निकल गया.  अध्ययन के बारे में शुरू किये तो पाँच सूत्र में सब आ गया - लिखा हुआ!  लिख कर आया, फिर एक एक चित्र आने लगा, जैसे - पदार्थावस्था मृद पाषाण मणि धातु के रूप में.  लाखों मिट्टी, लाखों मणि, लाखों धातु की प्रजातियाँ देखी।  इतनी प्रजातियाँ हैं उनके लिए कंप्यूटर को करोड़ वर्ष लगाओ - और बाकी ही रहेगा।  


प्रश्न:  लिखा हुआ आया - इससे क्या आशय है?


उत्तर:  इसके बारे में हमारा सोच ऐसा है, भाषा भी कहीं न कहीं दौड़ते ही रहता है.  भाषा कहीं मरा नहीं है.  शब्द तो मरा नहीं है, यह तो आपको भी पता है.  भाषा भी मरा नहीं है मेरे अनुसार।  मैं जब संयम शुरू किया तो जो तीन चार भाषाएं मैं जानता हूँ, उसमें बहुत सारा बात सुनने में आती थी लेकिन दृश्य नहीं दिखता था.  कई भाषाओ में आया, कुछ को मैं जानता रहा, कुछ को नहीं जानता रहा.  उस स्थिति में ९०% साधक पागल हो सकता है.  संयोग से मैं नहीं हुआ.  मैं सोचता रहा मुझे कर्णनाद तो नहीं हो गया है, उसका मैं उपचार करता रहा.  वो कर्णनाद नहीं था, लेकिन उन ध्वनियों का स्त्रोत मुझे दिखता नहीं रहा.  करीब एक वर्ष तक यह चला.  फिर उसके बाद दृश्य आया.  पहला दृश्य आया - एक पत्थर सामने, वह धीरे धीरे पिघला, पिघल करके फैलता रहा फैलता रहा, उस जगह तक फैला जहाँ वह स्वचालित रूप में काम कर रहा है.  स्वचालित रूप में प्रत्येक सूक्ष्म सूक्ष्मतम भाग सभी काम कर रहे हैं.  इसको देखा।  पता चला परमाणु है, स्वचालित है.  एक दिन के पूरा समय में हुआ यह.  एक moment में नहीं हुआ यह.  होते होते पूरा दिन में १०-१२ घंटे यही रहा.  शरीर अध्यास जब आया तब मुझे यह ज्ञान हुआ परमाणु का स्वरूप ऐसा है!  कभी इच्छा होती थी, इसमें परमाणु कैसे काम कर रहे हैं, पुनः फिर वैसा ही प्रोसेस होता था, फिर दिख जाता था.  यही कई बार रिपीट हुआ.  सर्वप्रथम जो जीवन को देखा था, उसके साथ यह correlate हो गया, गठनपूर्ण होने के रूप में.  भूखे परमाणु को देखा, अजीर्ण परमाणु को देखा, गठनपूर्ण परमाणु के रूप में जीवन को देख लिया।  इन तीनों को देखने के बाद हमको बताने को समझाने को क्या चीज़ बचता है, आप बताओ!  अस्तित्व में तीन ही प्रकार की क्रियाएं हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया और जीवन क्रिया।  इसके अलावा चौथे प्रजाति की क्रिया ही नहीं है.  इन तीन क्रियाओं के permutation combination में चार अवस्थाएं हैं, चार पद हैं.  इतना ही अध्ययन की वस्तु है.   यह अध्ययन होता है तो क्या करना चाहिए यह निकलता है, क्या नहीं करना चाहिए यह भी निकलता है.  क्या है, यह भी निकलता है.  कैसा है, यह भी निकलता है.  कितना है, इसका उत्तर निकलता है - जितना मनुष्य को चाहिए, उससे ज्यादा है.  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)

Saturday, June 13, 2026

प्रकाश, प्रतिबिम्बन


 प्रतिबिम्बन में समय नहीं लगता।  ताप एक अलग चीज़ है.  प्रतिबिम्ब बिम्ब का होता है.  ताप गुण का है.  वस्तु में जो गुण फैला उसको हम ताप कह रहे हैं.  गुण प्रभावित होने में समय लगता है.  किन्तु प्रतिबिम्बन में समय की बात नहीं है.  प्रतिबिम्ब रहता ही है.  


प्रश्न: हम प्रकाश और प्रतिबिम्बन को समझना चाहते हैं.


उत्तर: बिम्ब का प्रतिबिम्ब होता है, उसका अनुबिम्ब होता है, उसका प्रत्यानुबिम्ब होता है.  जैसा - आपका प्रतिबिम्ब मुझ पर है.  मेरा प्रतिबिम्ब आपके प्रतिबिम्ब के साथ तीसरे व्यक्ति पर प्रतिबिंबित है.  वो आपका अनुबिम्ब कहलाया।  इससे आगे चौथे व्यक्ति पर आपका प्रत्यानुबिम्ब हुआ.  इस तरह प्रतिबिम्ब के पुंज बनके इकाइयां एक दूसरे पर प्रतिबिंबित हैं.  यह एक बहुत बढ़िया approach है.  यह यदि soothing way में present करें तो आदमी को पता चलेगा वो अभी तक क्या सोच रहा था, क्या पढ़ रहा था, जबकि वास्तविकता में ये है क्या चीज़!  


जैसे आप मुझ पर प्रतिबिंबित हो, तो केवल आप ही नहीं आप पर हज़ार और प्रतिबिम्बों के साथ आप मुझ पर प्रतिबिंबित हो.  मैं लाख प्रतिबिम्बों के साथ आप पर प्रतिबिंबित हूँ.  इस तरह का काम्प्लेक्स है यह.  जब जितना ज़रूरत है, एक दूसरे से समझ लेते हैं.  


जैसे - शंकराचार्य जी (चंद्रशेखर भारती जी) और रमण महृषि जी के कहने पर हम यहाँ पर आये.  उसमें हम सफल हो गए.  वहाँ से लेकर यहाँ तक उन दोनों का प्रतिबिम्ब कहीं ख़तम हुआ क्या?  उन दोनों के कथन से प्रभावित हो कर मैं आया, वह प्रभाव कहीं ख़तम हुआ?  वो ख़तम नहीं होता, infinite हो गया.  उस प्रतिबिम्ब के साथ ही मैं आपके साथ प्रतिबिंबित हूँ.  इस बीच में कितनी चीज मुझ पर प्रतिबिंबित हुआ होगा, वह कल्पनातीत है, असंख्य है.  उन सबके साथ मैं आपके ऊपर प्रतिबिंबित हूँ.  मुझको आप consider कर रहे हो.  Consider करके अस्तित्व में जो वस्तु बोध होना है, उस चैनल में हम बात कर रहे हैं.  वस्तु बोध होने के लिए आपको बताया - शब्द का अर्थ होता है, अर्थ के स्वरूप में अस्तित्व में वस्तु होता है, वो बोध होने से वस्तु बोध हुआ, उससे पहले शब्द बोध हुआ.  शब्द स्मरण में रहता है.  इसमें कहाँ से कहाँ तक कितना जवाब है, आप ही सोच लो!  Infinite है, सब जगह में वर्तमान है.  


हर वस्तु अपनी अर्हता के अनुसार प्रतिबिंबित है.  हर वस्तु के ऊपर अनेक वस्तुएं प्रतिबिंबित रहते हैं.  हर वस्तु जितनी वस्तुएं उस पर प्रतिबिंबित हैं, उनके समेत ही प्रतिबिंबित होती है.  इतने में पूरा पड़ जायेंगे। 


प्रतिबिम्ब का दूसरा नाम है - प्रकाशन।  वस्तु में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म अविभाज्य है.  प्रतिबिम्ब रूप का होता है.  किन्तु वस्तु में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म निहित रहता ही है.  पहचान जब करने जाते हैं तो इन चारों के साथ ही वस्तु का पहचान पूरा होता है.  अकेले रूप की पहचान करने से हम वस्तु की उपयोगिता को निर्णय कर नहीं पाते हैं.  गुण, स्वभाव, धर्म - ये भूत होते ही नहीं।  यदि इनकी पहचान हुई हो तो ये परम्परा में प्रवेश होते ही हैं.  गुण, स्वभाव, धर्म के आधार पर उपयोगिता की जो पहचान हुई, वो परम्परा में continue होती है.  जो उपयोगी नहीं है, वह drop हो जाता है.  आदिकाल से अभी तक जो उपयोगी है, वो continue हुआ है.  जो उपयोगी नहीं है, वह drop होता गया है. अभी भी मानव द्वारा कुछ चीजें drop होना शेष हैं - जैसे, अपना-पराया की दीवार।  अपना-पराया का दीवार drop होना मानव चेतना विधि से ही होगा, जीव चेतना विधि से होगा नहीं।  इसीलिये मानव चेतना विधि को introduce करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं.  मानव चेतना आने के बाद मानव चेतना परम्परा में निरंतर हो जाती है, जबकि जीव चेतना में से छन के जो उपयोगी है वो continue कर ही रहे हैं.  मानव चेतना से पूर्णतः continuation बन जाती है, शंकाएं समाप्त हो जाती हैं.  उससे अच्छा होने के लिए देव चेतना रखा ही है.  उससे भी अच्छा होने के लिए दिव्य चेतना रखा है.  प्रस्ताव के improvement की सम्भावना को रख कर के हम शुरू किये हैं.  अस्तित्व में models बने हुए हैं.  मैंने इन models को बनाया हो ऐसा नहीं है, मैंने इनको trace किया है.  


प्रतिबिम्ब और ताप में अंतर है.  प्रतिबिम्ब हर वस्तु तक पहुँचता है.  ताप परावर्तित हो कर कम होता  जाता है.  प्रतिबिम्ब यथावत रहता है.  दृष्टिपाट और दृग-बिंदु विधि से जो वस्तु जितना दूर होता है, वह उतना छोटा दिखाई देता है.  


प्रश्न: रंग क्या है?


उत्तर: रसायन से रंग है.  सफ़ेद वस्तु अलग रसायन है.  काला वस्तु अलग रसायन है.  प्रकाश में ये वस्तुएं हमको आँख से दिखता है.  प्रकाश के अभाव में न काला दिखता है न सफ़ेद दिखता है.  सूर्य का प्रकाश रंग को पैदा नहीं करता।  


श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)

Friday, June 12, 2026

वस्तु बोध

 


प्रश्न: वस्तु बोध क्या है - इसको उदाहरण के साथ समझाइये।

उत्तर: हम शब्दों का उच्चारण करते हैं, भाषा का प्रयोग करते हैं, किताबों को पढ़ते हैं - इनको सुनने तक तो हम अच्छा बुरा मानते हैं.  यहाँ तक हम पहुँचे हैं.  शब्द से कोई वस्तु को इंगित कराया जाता है - चाहे वह वस्तु कोई कार्य-घटना हो, वस्तु-घटना हो, परिणाम-घटना हो, अस्तित्व में वो बना रहता है.  वह समझ में आना वस्तु-बोध है.  अर्थात शब्द के अर्थ से इंगित वस्तु अस्तित्व में पहचान लेना  वस्तु-बोध है.  

वस्तु का प्रतिबिम्ब सदा-सदा रहता ही है.  वस्तु अपने रूप-गुण-स्वभाव-धर्म सहित प्रतिबिंबित है ही.  इसलिए प्रतिबिम्ब में कोई गति नहीं होता.  बिम्ब का प्रतिबिम्ब होता ही है.  जैसे मैं कुछ बोल रहा हूँ.  वह शब्द तो आप सुनते ही हो.  उस शब्द का अर्थ आप पर प्रतिबिंबित है.  इसीलिये आपको अर्थ समझ में आता है.  जैसे मैंने “पानी” शब्द कहा.  “पानी” शब्द पानी वस्तु नहीं है.  लेकिन मेरे “पानी” कहने से आपको पानी वस्तु का बोध हो जाता है.  इसी तरह, “धरती” कहते हैं - धरती का बोध हो जाता है.  “हवा” कहते हैं, हवा का बोध हो जाता है.  इसी प्रकार “समाधान” कहने से समाधान का बोध होना है, “ज्ञान” कहने से ज्ञान का बोध होना है, “विवेक” कहने से विवेक का बोध होना है, “विज्ञान” कहने से विज्ञान का बोध होना है, “न्याय” कहने से न्याय का बोध होना है, “सत्य” कहने से सत्य का बोध होना है.  हम इसमें चूक जाते हैं.  

सम्पूर्ण वस्तुएँ अस्तित्व में हैं.  अस्तित्व में वस्तु-बोध कराने के लिए हम शब्द का प्रयोग करते हैं.  शब्द के अर्थ में वस्तु इंगित होना होता है.  अस्तित्व में जो कुछ भी वस्तु है वह हर मनुष्य पर प्रतिबिंबित है ही.  व्यापक वस्तु आदमी पर प्रतिबिंबित है, आदमी में से आर पार है, आदमी के सभी ओर घिरा है, आदमी के परस्परता के बीच में रहता ही है.  इस ढंग से व्यापक वस्तु को बोध कराना सुगम हो गया.  व्यापक वस्तु में ही हर वस्तु क्रियाशील है, जिसको अध्ययन करके basic thesis develop किया।  शाश्वत रूप में जो है ही, उसको संप्रेषणा योग्य बनाया।  अस्तित्व व्यापक वस्तु में सम्पृक्त एक एक वस्तु के रूप में नित्य विद्यमान है, नित्य वर्तमान है, नित्य वैभव है.  यह होने से सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व में है.  नहीं है, उसका वस्तु बोध होता नहीं है.  नहीं है, वाले शब्दों से वस्तु बोध नहीं करा सकते।  जैसे - पैर में काँटा गड गया, उससे दर्द नहीं होना चाहिए।  मनुष्य को समस्या नहीं चाहिए।  कांटे का दर्द नहीं चाहिए तो जूता खोज लिया।  समस्या नहीं चाहिए तो समाधान खोज लिया।  अपना-पराया नहीं चाहिए तो मानव चेतना को ढूंढ लिया।  इस प्रकार हमे पता चलता है, होने के रूप में ही सभी वस्तु का बोध है.  न होने के रूप में कोई वस्तु का बोध नहीं होता. न होने वाला “घटना” हो सकता है.  जैसे काँटा गड़ने से पीड़ित होना, समस्या से पीड़ित होना, अपना-पराया से पीड़ित होना - घटना के रूप में है.  इनका उपाय खोजना मानव का काम है.  ईश्वरवादी विधि से सोचते रहे, भगवान् आएंगे सबका उद्धार करेंगे।  हमारे लोगों का उद्धार करेंगे, बाकी सबका नाश करेंगे!  ईर्ष्या, द्वेष, समस्या, दुःख आदि योग संयोग से घटित होते हैं, अस्तित्व में ये होते नहीं हैं.  इनका वस्तु बोध नहीं होता।  मानव ही इस प्रकार की घटनाओं को घटित करने का आधार हुआ.  मानव ने सारी समस्या जीव चेतना विधि से जीने के कारण किया।  अब मानव चेतना विधि से जिया जाए.  उसमें यदि परेशानी  होती है तो देव चेतना को खोजा जाए.  देव चेतना में परेशानी होती है तो दिव्य चेतना को खोजा जाए.  आप लोग अत्याधुनिक संसार से जूझ के आये हो, क्या इसका कोई विरोध हो सकता है?  इस प्रस्ताव का विरोध तो कहीं हो ही नहीं सकता।  

इसी आधार पर मैंने अपना मुँह खोला। यह मानव का वस्तु है. अपने में हज़म करके जाना ठीक नहीं है, संसार के साथ धोखाधड़ी है. कम से कम हम तो धोखाधड़ी न करूँ! यहाँ से शुरू किये। जीव चेतना से मानव ने बहुत सारी वस्तुओं का बोध किया है. अब मानव चेतना विधि से जिन वस्तुओं का बोध होना है, वो बोध हो जायेगी। बोध करा हुआ वस्तुएं ज्यादा हो गया है, बोध नहीं हुआ वस्तुएं कम हैं. जीवन के गुण, जीवन के कार्यकलाप, जीवन का लक्ष्य - उसको हमे पकड़ना है. दूसरा, अस्तित्व का लक्ष्य हमको पकड़ना है. ये दोनों पहचान में आने के बाद मानव का लक्ष्य और मानव चेतना का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है.

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)

Wednesday, June 10, 2026

जीवन के स्वरूप को समझना

 


सामान्य रूप में हम शरीर को ही जीवन मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.  परमाणु में विकास और विकास क्रम को समझा।  परमाणु में अंशों का घटना-बढ़ना देखा जाता है.  यह घटना-बढ़ना क्यों है?  कोई ऐसी स्थिति है, जिसमें घटना-बढ़ना नहीं है, वहाँ तक पहुंचना है.  यह धरती पर भूखे परमाणु और अजीर्ण परमाणु के रूप में मिलते हैं.  सभी अजीर्ण परमाणु विकीरणीयता को प्रसारित करते हैं.   भूखे परमाणु विकीरणीयता प्रसारित नहीं करते।  भूखे परमाणुओं में अंशों को ग्रहण करना और छोड़ना बना रहता ह।  अजीर्ण परमाणुओं में अंशों को छोड़ने की ज्यादा प्रवृत्ति बनी रहती है.  इस प्रकार आदान-प्रदान हो करके अनेक प्रजाति के परमाणु इस धरती पर रचित हुए.  इसकी आवश्यकता ऐसे प्रतीत होती है, प्राणावस्था के प्रकटन के लिए उसका भ्रूण पदार्थावस्था में तैयार होना आवश्यकता रही, इसी लिए इतने सब प्रजाति के परमाणु तैयार हुए.  इस तरह परमाणु में विकास के क्रम में धरती अपने में पदार्थावस्था से समृद्ध हुई.  विकास के स्वरूप को गठनपूर्ण परमाणु के रूप में पहचाना।  गठनपूर्णता का आशय है - गठन में तृप्ति।  मध्यांश से लेकर परिवेशीय अंशों तक भर गए. इससे ज्यादा हो नहीं सकता, इससे कम हो नहीं सकता - इस जगह में आ गए.  इसमें अब न कोई अंश घट सकता है, न बढ़ सकता है.  ऐसा परमाणु अपने में अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त हो जाता है, स्वयं स्फूर्त विधि से.  इसमें मनुष्य का कोई हाथ नहीं है.  


अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त होकर जीवन आशा-बंधन से शुरुआत करता है.  आशा यहाँ है - जीने की आशा.  जीवन पद में संक्रमित होने पर जीने की आशा होना स्वाभाविक है.  जीने के लिए यह अपना कार्य-गति पथ स्थापित करता है, जो अपने में एक आकार होता है.  उस आकार का शरीर भौतिक-रासायनिक रूप में बनी रहती है, उस शरीर को वह चलाता है.  इसी क्रम में मानव शरीर को चलाने के लिए जीवन प्रस्तुत हुआ.  जीव शरीर और मानव शरीर में यही अंतर देखने को मिला, जीव शरीर में कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने का व्यवस्था नहीं है.  मानव शरीर में जीवन सहज कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने की बात देखा गया.  इस आधार पर जीवन जब शरीर को जीवन मानता है तो साढ़े चार क्रियाएं व्यक्त होती हैं.  शरीर को जीवन मानने से चयन-आस्वादन के साथ, तुलन-विश्लेषण में से तुलन में प्रिय-हित-लाभात्मक तुलन करने योग्य होता है, उसके अनुसार चित्रण करता है.  इस ढंग से साढ़े चार क्रिया में जीवन तृप्ति का सम्भावना बना नहीं।  जीवन अतृप्त रहते हुए, जीवन स्वयं को शरीर मानते हुए, जीव चेतना को अपना करके, शरीर को जीवंत बनाते हुए, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध इन्द्रियों को राजी करने के लिए प्रयत्न करते रहा।  इसी क्रम में आहार-आवास-अलंकार और दूरगमन-दूरश्रवण-दूरदर्शन सम्बन्धी वस्तुओं को प्राप्त कर लिया।  इनको प्राप्त करने के बाद भी सुखी नहीं हुआ, तब मानव की परिभाषा से पता चला कि क्या कमी रह गयी.  कमी यह रही - मनाकार को साकार करने में तो मानव सफल हुआ, पर मनः स्वस्थता को प्रमाणित नहीं कर पाया।  मनः स्वस्थता के बारे में पता चला, समाधान ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है.  मनः स्वस्थता यदि प्रमाणित होता है तो सर्वतोमुखी समाधान होता है, जागृति होती है, हम सार्वभौमता-अखंडता में जी पाते हैं.  इन सबके आने से मानव चेतना प्रमाणित होती है.  अभी जीव चेतना में जीते हुए हमें मानव चेतना का पता ही नहीं रहा.  अभी अपने शोध से, अनुसन्धान से पता चला कि जीव चेतना के बाद मानव चेतना है, मानव चेतना के बाद देव चेतना है, देव चेतना के बाद दिव्य चेतना है.  इस प्रकार चेतना विकास की सम्भावना बनी हुई है.  


अभी सर्वप्रथम मानव चेतना में प्रवेश करने की आवश्यकता है, तभी परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में जीना बनेगा।  इसके साथ हम जीवन की दसों क्रियाओं को प्रमाणित करते हैं.  तुलन जो आधा हुआ था, उसमें न्याय-धर्म-सत्य जुड़ जाता है, उसके बाद चित्त में साक्षात्कार होता है, उसके बाद संकल्प होता है, उसके बाद अनुभव होता है, अनुभव होने के फलस्वरूप प्रमाण होता है, वह प्रमाण पुनः बोध व संकल्प में आता है, पुनः वह चित्त में चिंतन व चित्रण रूप में आता है, उसका पुनः वृत्ति में तुलन होता है, जिससे व्यवहार में न्याय-धर्म-सत्य के प्रमाणित होने का स्वरूप बनता है, जिसका हम आस्वादन करते हैं और प्रमाणित करने के लिए संबंधों का चयन करते हैं.  इस प्रकार मानव सम्बन्ध और प्रकृति सम्बन्ध - इन दोनों संबंधों का हम निर्वाह करते हैं, इस प्रकार व्यवस्था में जीना बन जाता है.  व्यवस्था में जीने के लिए जीवन की दसों क्रियाएं प्रयुक्त होता ही है.  अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में जीना नहीं है तो दसों क्रियाएं प्रमाणित होगा ही नहीं।  जीवन की दसों क्रियाएं जब कभी भी प्रमाणित होगा - अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में ही प्रमाणित होगा.  उसका स्वरूप बना - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जीना।  इस प्रकार दस क्रियायें यदि क्रियान्वित होते हैं तो मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) सुगम हो जाता है.  हरिहर! 


प्रश्न: अभी जो साढ़े चार क्रिया में जी रहे हैं, तो बाकी साढ़े पाँच क्रियाएं कहाँ रहता है? उत्तर: क्रिया तो रहता है, पर प्रकट नहीं रहता है. जीवन का ध्यान उन क्रियाओं की ओर नहीं गया है. जैसे, अपने ही घर में कोई चीज़ ढका रहता है, पड़ा रहता है बरसों - वैसा हो गया. अनदेखी कर दिया। उस ओर ध्यान नहीं दिया। प्रश्न: जीवन में बल का क्या स्वरूप है? उत्तर: जीवन में अलग-अलग बल होता नहीं। अध्ययन के लिए जीवन के चार परिवेशों में बल-शक्ति स्वरूप में बताया है. स्थिति में बल, गति में शक्ति। मन अपने स्थिति में आस्वादन क्रिया है, गति में चयन क्रिया है. मन आस्वादन में बल प्रयोग किया रहता है, चयन में शक्ति के रूप में गतित रहता है. इसी प्रकार वृत्ति में स्थिति में तुलन बल है, उसका गति बनता है वह विश्लेषण है, जो दूर दूर तक पहुँचता है. इसी प्रकार चित्त में साक्षात्कार/चिंतन बल है, वही चित्रण रूप में दूर दूर तक पहुँचती है. उसी प्रकार बुद्धि में बोध बल है, एक तो अध्ययन से सत्य बोध और दूसरे अनुभव मूलक विधि से अनुभव प्रमाण बोध. बुद्धि में बोध स्थिति में ही होता है, संकल्प दूर दूर तक पहुँचती है. इसी प्रकार अनुभव आत्मा का बल होता है, प्रामाणिकता शक्ति होती है - जो प्रमाणित होता है. इस ढंग से पांच बल और पांच शक्तियों को अनुभव करने की बात है. ये बल और शक्तियाँ अक्षय हैं. जीवन शक्तियां और बल - ये घटने वाला नहीं हैं. जितना ज्यादा इनका प्रयोग करते हैं, उतना ज्यादा ये प्रखर होती हैं. शरीर शक्तियां क्षरणशील हैं, जीवन शक्तियाँ अक्षय हैं. जीवन अमर है. जीवन क्रियाओं को देख कर, शरीर क्रियाओं को देख कर - हम जीवन और शरीर को अलग अलग पहचान पाते हैं. आचरण के आधार पर हर वस्तु की पहचान होती है. जैसे कोई पक्षी या जीव के आचरण को देख कर ही हम अंगुलीन्यास कर पाते हैं कि यही वह जीव है. वनस्पतियों के आचरण को देख कर ही हम उनकी पहचान करते हैं. उसी प्रकार लोहे, मिट्टी, पत्थर को उनके आचरण के आधार पर हम उनकी पहचान करते हैं. इसी प्रकार हम जीवन के आचरण और शरीर के आचरण को देख करके जीवन को अपने स्वरूप में पहचानते हैं, शरीर को अपने स्वरूप में पहचानते हैं. इस ढंग से जीवन की दसों क्रियाओं के साथ जागृति पूर्वक जीना बनता है. साढ़े चार क्रिया में भ्रम पूर्वक जीता है. शरीर को जीवन मान लेना भ्रम है. शरीर को शरीर ही माना जाए, जीवन को जीवन ही माना जाए - इसमें कौनसे ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी को तकलीफ है? ना समझें, हठ प्रवृत्ति का प्रयोग करें, भाग जाएँ - यह संभव है. इससे भाग करके कहाँ जाओगे? भागते भागते कहीं न कहीं थकोगे ही. इससे भागना बनता नहीं है. अपनाने में जितना देरी लगाना है वो लगा सकते हैं. इससे भागते हैं, तो थकते ही है. सारी परिस्थितियां इस प्रस्ताव के अनुकूल हो रही हैं. इसी लिए हम सोच रहे हैं कि यह लोकगम्य होगा, लोकव्यापीकरण होगा, सर्वशुभ की प्रवृत्ति मानव में बनेगी, अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में जीने का मौका मिलेगा। प्रश्न: चित्रण क्रिया को स्पष्ट करें? उत्तर: चित्रण दोनो तरीके से होता है - अनुभव मूलक विधि से, और शरीर मूलक विधि से. शरीर मूलक विधि से पाँचों संवेदनाओं को राजी होने या नाराज होने के अर्थ में सहमति और असहमति का चित्रण होता है. जीवन अक्षय बल और शक्ति संपन्न है, उसको कोई भौतिक वस्तु की ज़रूरत नहीं है. जीवन की जरूरत अपने कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु रुपी जागृति को प्रमाणित करना है. इसी लिए वह बारम्बार शरीर यात्रा को करता है. मानव परम्परा में इसकी सम्भावना नहीं होने के कारण बारम्बार असफल हो कर जाता है. इससे पता चलता है - जीवन को अपने ढंग से काम करने योग्य शिक्षा को हमने विकसित नहीं किया, उसको विकसित करने की आवश्यकता है. आचरण को विकसित नहीं किया, आचरण को विकसित करने की आवश्यकता है. संविधान को विकसित नहीं किया, संविधान को विकसित करने की आवश्यकता है. व्यवस्था को विकसित नहीं किया, व्यवस्था को विकसित करने की आवश्यकता है. शिक्षा में प्रवेश कराने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं. सम्बन्ध का चित्रण होता ही है. सम्बन्ध के नाम का चित्रण है, उसके बाद उसके प्रयोजन का चित्रण है. जैसे माँ एक सम्बन्ध का नाम है, माँ के सम्बन्ध का प्रयोजन है - पोषण। शरीर का पोषण, ज्ञान का पोषण, विवेक का पोषण, विज्ञान का पोषण, व्यव्हार का पोषण, भाषा का पोषण। सभी विधा में पोषण। पोषण प्रधान संरक्षण माँ है. संरक्षण प्रधान पोषण पिता है. सभी विधा में मानव मानव-चेतना पूर्वक जिए - यही पोषण का आधार बनता है. जीव चेतना विधि से सभी विधाओं में पोषण करना बन नहीं पाता है. इसी लिए मानव का मानव चेतना में प्रवेश होना आवश्यक है ताकि वह अपनी संतान को मानव चेतना में पारंगत बना सके. तभी माता-पिता की जिम्मेदारी पूरी हुई. संतान को हम पैदा करें, उसका पोषण दूसरा कोई करे - यह कहाँ तक न्याय हुआ? जीव चेतना में संतान पैदा किया, दो चार दिन उसको चूमा चाटा, उसके बाद छोड़ दिया। इस पद्दति को छोड़ के, यदि हर अभिभावक मानव चेतना विधि से अपनी संतान का पोषण-संरक्षण करते हैं तो अखंड-समाज सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना सुगम हो जाता है. इसी क्रम में शिक्षा के स्वरूप का चित्रण होता है, स्वास्थ्य का चित्रण होता है, स्वस्थ रहने की विधि का चित्रण होता है, उसके क्रियान्वयन का चित्रण होता है. मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ हम अनेक प्रकार के यंत्रों को चित्रित करते हैं, उनको प्रयोजित करते हैं. इसी प्रकार विश्वास निर्वाह का चित्रण होता है, सहयोगिता भाव का चित्रण, सहकारिता भाव का चित्रण करने में कोई दिक्क्त नहीं है. नकारात्मक चित्रण इतने किए हैं, सकारात्मक चित्रण भी कर सकते हैं. अपराध का चित्रण सीमित हैं, न्याय पक्ष का चित्रण असीमित है. चित्रण विधि से हमारा विचार परिष्कृत होता है. संकल्प विधि से स्वीकार होता है. अनुभव विधि से प्रमाणित हो जाता है. इस क्रम से हम निकलते हैं तो हमारा सुखी होना बन ही जाता है, हम अपराध मुक्त हो जाते हैं, समृद्धि पूर्वक जीना बन जाता है, समाधान को प्रमाणित करना बन जाता है. सर्वमानव में इसकी आवश्यकता तो बना ही है.


प्रश्न: सृष्टि के डिज़ाइन को देखें,  इसकी बारीकी और सुंदरता को देख के हम बहुत चमत्कृत होते हैं.  जैसे मानव शरीर में देखने के लिए आँख, खाने के लिए दाँत - सब कुछ इतना systematic बना हुआ है.  यह सब स्वयंस्फूर्त विधि से अस्तित्व में प्रकट हुआ है, इस पर विश्वास नहीं बन पाता।


उत्तर: अभी तक यही सोचे कि सृष्टि को बनाने वाला कोई बैठा है.  उस कारण यह भ्रम है.  ऐसा कुछ नहीं है.  अस्तित्व में व्यापक वस्तु का महिमा है, एक-एक वस्तु में स्वीकारने की महिमा है, इन दोनों मिल करके अस्तित्व में पूरा डिज़ाइन अपने आप में स्वयंस्फूर्त है.  दो अंश के परमाणु का तीन अंश वाले परमाणु के रूप में होने को कौन कहा?  यह स्वयंस्फूर्त हुआ.  इसी प्रकार यौगिक क्रिया होने को कौन डिज़ाइन किया?  स्वयं स्फूर्त हुआ.  गठन पूर्ण होने के लिए कौन मजबूर किया?  स्वयं स्फूर्त हुआ.  हम जहाँ पहुंचे हैं, इसके आगे चलने के लिए हमको कोई मजबूर करेगा - ऐसा देखने को मिलता नहीं है.  प्रेरणा एक दूसरे के साथ बना ही है, पर हमको मजबूर करेगा ऐसा कोई नहीं है.  


परमाणु में कोई आँख कान नाक कुछ भी नहीं है, पर क्रिया तो है ही.  किन्तु उसमें ध्वनि होता है, विद्युत् होता है, चुंबकीयता होता है.  इसमें सम विषम और मध्यस्थ कार्य प्रणाली देखने को मिली।  सम में अपने में कुछ समा लेता है, विषम में अपने से कुछ विसर्जित कर देता है, मध्यस्थ में अपने को बनाये रखता है.  स्वयं स्फूर्त विधि से यह करता है.  रचना प्राण कोशाओं से शुरू होता है.  काई बनने के बाद एक कोशीय, द्विकोशीय, फिर बहुकोशीय रचना होता है.  बहुकोशीय रचना में अनेक अंग प्रत्यंग बनने लगते हैं.  मच्छर, मक्खी, भुनगी, कीड़ा - इन सबमें कुछ अंग बने हैं, कुछ बने नहीं हैं.  फिर चिड़िया बना, तोता बना - उनमें बहुत सारे अंग बन गए.  उसके बाद गाय, भालू आ गया - उसमे और बहुत सारे अंग बन गए.  फिर मनुष्य आ गया - जिसमें और अंग आ गए.  यह रचना में विकास क्यों हुआ? क्योंकि मानव द्वारा ही अस्तित्व के प्रतिबिम्ब को स्वीकारना और मानव परम्परा में प्रमाणित करना बनता है.  इसका सिद्धांत बताया - सभी कुछ प्रतिबिंबित है.  सहअस्तित्व स्वयं में प्रतिबिंबित है.  सहअस्तित्व के प्रतिबिम्ब का स्वीकृति मानव में ही होता है.  बाकी सारे प्रकृति बिना प्रतिबिम्ब को स्वीकारे सहअस्तित्व में रहते ही हैं.  मानव ज्ञान से लेकर कार्य तक, कार्य से लेकर फल-परिणाम तक, फल-परिणाम से लेकर पुनः ज्ञान तक एक दूसरे के साथ जाँचने का अधिकार रखता है.  ये अधिकार कहाँ से आ गया?  कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के आधार पर, उसके तृप्ति बिंदु पाने के आधार पर यह जाँचने का अधिकार आया.  यह करने पर मानव में समाधान पैदा होना मौलिक है.  समाधान पैदा होना इस आधार पर हुआ कि अस्तित्व सहज रूप में प्रत्येक एक अपने में समाधानित है.  मनुष्येत्तर प्रकृति यांत्रिक रूप में समाधानित है.  मानव को चेतना रूप में भी समाधानित होना है और यांत्रिक रूप में भी समाधानित होना है.  इसके लिए प्रकटन क्रम में शरीर रचना की खूबियाँ बनी, जीवन होता ही है, शरीर रचना की खूबी के आधार पर जीवन अपने को प्रस्तुत करना बन गया.  शरीर ऐसा नहीं रहा बाकी जीव शरीरों में, इसलिए जीवन ऐसे प्रस्तुत नहीं कर पाया।  जीवों में शरीर ही प्रस्तुत हुआ, जहाँ जीवन शरीर के अनुरूप ही काम किया। मानव में जीवन के अनुरूप शरीर के काम करने की व्यवस्था रही, फलस्वरूप जागृति प्रमाणित हो गयी.  


प्रश्न:  मच्छर-मक्खी जैसे जीव, जिनमें जीवन नहीं है - उनमें दर्द (pain) की पहचान होती है क्या?


उत्तर: उनमें प्राणकोशायें काम करते रहते हैं.  उनमें अंग-अवयवों की कमी के कारण से दर्द की पहचान नहीं हो पाती।  जिन जीवों में सप्त धातुओं से रचित शरीर है, समृद्ध मेधस है, और उसके साथ जीवन है - उनमे दर्द को स्वीकारने वाली बात होती है.  इनमे मानव संकेतों को ग्रहण करने की बात रहती है.  ऐसे जीवों में शरीर के अनुरूप वंशानुषंगीय विधि से जीवन काम किया, इसलिए जीवन व्यक्त नहीं हो पाया।  वहाँ बाघ के शरीर में बाघ के अनुसार जीवन काम करता है, गाय के शरीर में गाय के अनुसार जीवन काम करता है.  मानव शरीर में मन जैसा चाहता है वैसा करने वाली बात हो गयी.  मानव को क्या करना चाहिए?  मानव ने जैसा भी किया सुखी होने के लिए किया।  सुखी हो गया तो उसको अपनाना है.  मानव जैसे काम करने से सुखी होता है, उसके बाद देवता जैसे काम करने से सुखी होता है, उसके बाद दिव्य मानव जैसे काम करने से सुखी होता है.  यह स्पष्ट होने के बाद मानव चेतना के साथ आचरण को जोड़ा, शिक्षा को जोड़ा, व्यवस्था को जोड़ा, संविधान को जोड़ा - इन चारों को जोड़ने से परम्परा से जोड़ दिया।  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)

Monday, April 13, 2026

जिम्मेदारी से सत्यापन

“मैं समझा हूँ, जिया हूँ, प्रमाणित हूँ.  हर व्यक्ति समझ सकता है, जी सकता है, प्रमाणित हो सकता है.”  ऐसा मैंने कई जगह पर सत्यापन किया है.  

समझने, जीने और प्रमाणित होने को लेकर हर व्यक्ति अपने अधिकार से ही सत्यापन करेगा।  यदि ऐसा सत्यापन नहीं करना बनता है तो reference के साथ यही कहना बनेगा कि ऐसा किताब में लिखा है.  दोनों में कितना अंतर हो गया?  यदि जिम्मेदारी है तो सत्यापन ही होगा।  जिम्मेदारी नहीं है तो सूचना ही होगा, reference ही होगा।  जिम्मेदारी यही है - मैं जिया हूँ, आप जी सकते हैं, हर व्यक्ति जी सकता है.  मैंने इसी जिम्मेदारी से सत्यापन किया है.  

हर व्यक्ति में कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता प्रकृति प्रदत्त है.  इसके आधार पर ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी तीनों समझ सकते हैं, जी सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं.  जीना ही प्रमाण है.  

मुझसे कई लोगों ने पूछा है - इससे आगे भी क्या कोई अवस्था होगा?  भौतिकवादी विचार के अनुसार विकास कहीं रुकता नहीं है.  मेरे अनुसार निर्भ्रमता से आगे कोई ज़रूरत नहीं बनती है, जरूरत पड़ेगा तो आगे चलके आप बता देना!  हम काहे को रोकें?  यहाँ तक हम स्पष्ट हैं, इसमें हमको संतुष्टि है, इस प्रकार की संतुष्टि आपको भी मिल सकती है.  इसमें अतृप्ति की जगह नहीं है.  अतृप्ति होगा तो पुनः शोध होगा। आप स्वयं शोध करो, अनुसन्धान करो!   हम किसी के लिए दरवाजा बंद नहीं कर रहे हैं.  अनुसन्धान होगा समाधि-संयम विधि से ही.  अज्ञात को ज्ञात करना।  संयम से अज्ञात ज्ञात होता है, इस बात को आपको बता दिया।  कैसे संयम करना है - वह भी बता दिया।  हमने कैसे संयम किया वह आपको बता दिया।  पहले पतंजलि ने क्या बताया है, वह भी आपको बता दिया।  पतंजलि ने संयम के बारे में जो बताया है, वह सिद्धि प्राप्त करने के लिए है, यह मुझको समझ में आया.   

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)


Friday, April 10, 2026

इस प्रस्ताव का प्रहार

वास्तविकता के साथ तर्क नहीं होता।  वास्तविकता को या तो स्वीकारना होता है या अस्वीकारना होता है.  वास्तविकता को अस्वीकारने की स्थिति में हीनता आता ही है.  हीनता दुर्बलता है कि हम ये नहीं कर सकते, हम ये नहीं समझ सकते, हम ऐसा जी नहीं सकते.  इन तीन बातों में से किसी न किसी को लेकर हीनता होती है.  सच्चाई यही है - यह समझ में आने के बाद ऐसा जी नहीं सकते तो कुंठा, निराशा कुछ न कुछ तो होता ही है.  इससे आदमी प्रताड़ित होता ही है.  यही इस प्रस्ताव का प्रहार है.  इसमें सुधरने का रास्ता यही है.  स्वयंस्फूर्त विधि से सुधरना।  

प्रश्न:  सच्चाई यही है - यह समझ में आने पर तो आत्मविश्वास आना चाहिए, हीनता क्यों आएगा?


उत्तर: व्यक्ति परिस्थितिवश प्रताड़ित होता है तो हीनता का शिकार होगा ही.  सच्चाई समझ में आने के बाद आचरण में नहीं ला पाता है, तो यह सब होता है.  सच्चाई समझ में आने के बाद उसको जीना ही पड़ता है.   यह समझ को आचरण में ला कर स्वयंस्फूर्त होने का प्रेरणा है.  समझ को आचरण नहीं करेंगे तो कुंठा, हीनता का शिकार होना पड़ेगा।  कुंठा, हीनता मनुष्य को स्वीकार नहीं है. 


संसार के भ्रम में आसक्त रहते हैं इसीलिये देरी लगता है, नहीं तो इतना देर लगना नहीं चाहिए।  आराम से सोच-विचार के, पूरा समझने के बाद जीने के लिए तैयारी करो - ऐसा मेरा कहना है.  साधना विधि में मेरे साथ क्या था - पूरा जिज्ञासा होने के बाद, जिसके बिना मैं जी नहीं सकता, यह स्थिति अपने में आने के बाद अनुसन्धान करने की बात थी।  जिज्ञासा में थोड़ी भी कमी होती तो हम निकल नहीं पाते।  अब आपके लिए समझने के लिए स्त्रोत हो गया, समझने के बाद स्वाभाविक रूप में जीना बनता है.  जबतक समझने में आनाकानी करते हैं, यही समय लगाता है. 


सीधा सीधा समझने में युवा पीढ़ी में रास्ता है, उसके बाद थोड़ा टेढ़ी मेड़ी होता है, समय लगता है.  युवा पीढ़ी में सीधा सीधा ज्ञान स्वीकार हो जाता है, इसमें कोई मजबूर करने की ज़रूरत नहीं रहती.  कोई भी मुद्दे को सुना, स्वीकार हुआ, फिर उसके detail में गए, जीने की कला तक पहुंचे।  उसके बाद दूसरे मुद्दे पर चले, तीसरे मुद्दे पर चले - ऐसे तो अध्ययन ही होता है.  मुद्दे इने-गिने ही हैं.  सभी मुद्दे ज्ञान विवेक विज्ञान से जुड़े हैं.  विज्ञान व्यवस्था के पांच आयामों से जुड़ा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

न्याय-धर्म-सत्य प्रमाणित होने की आवश्यकता

सबसे कम समय में समझ में आने वाली बात सत्य है, उसके बाद धर्म है, उसके बाद न्याय है, उसके बाद संतुलन है, उसके बाद नियंत्रण है, उसके बाद नियम है.  इस तरह यह क्रम से बना है.  सत्य समझ में आने से ये सब क्रम से समझ आता है.  सत्य सबसे पहले समझ में आता है.  सत्य के आधार पर ही धर्म, धर्म के आधार पर न्याय, न्याय के आधार पर संतुलन, संतुलन के आधार पर नियंत्रण, नियंत्रण के आधार पर नियम समझ में आता है.  समझ का पूरा खाका इतना ही है.  मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम, नियंत्रण और संतुलन प्रकट है.  मानव को यह समझ में नहीं आया है, भाड़ झोंकने चला गया, उससे जहाँ पहुंचना था पहुँच गया.  मानव में न्याय-धर्म-सत्य समझ में आने के बाद नियम-नियंत्रण-संतुलन समझ में आता है, उसके पहले आता नहीं है.  मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम-नियंत्रण-संतुलन वर्तमान रहता है.  मानव में न्याय-धर्म-सत्य शिक्षा विधि में, व्यवस्था विधि में, कार्य विधि में प्रमाणित होने की आवश्यकता थी, वह आया नहीं।  न्याय-धर्म-सत्य समझ नहीं आने के कारण मानव ने मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ अपराध किया, जिससे मनुष्येत्तर प्रकृति असंतुलित-अनियंत्रित हो गयी.  न्याय व्यावहारिक होता है.  न्याय पूर्वक जीने की स्थिति में ही हम नियम, नियंत्रण, संतुलन को पहचान पाते हैं, उसके प्रयोजन को पहचान पाते हैं, निर्वाह कर पाते हैं.  इसके अलावा और कोई तरीका नहीं है.  इसके आगे पैसे के आधार पर, डंडे के आधार पर जो अहंकार को बनाये हैं, उसका सत्यानाश होगा या नहीं?  पैसे और डंडे के आधार पर जो अहंकार बनाये हैं, उसका मृत्यु होगा।  reservation और specialisation के आधार पर जो अहंकार बनाये हैं, उसका मृत्यु होगा।  ये चारों मानव द्वारा बनाये गए अहंकार का स्त्रोत हैं.  यह विज्ञान विधि से आया है.  इससे पहले आदर्शवाद में ज्ञान बहुत दुर्लभ है, ऐसी चर्चा करते रहे.  ज्ञान किसी विशेष गुण वाले के लिए ही है - ऐसा पहले सोचा गया.  अभी हम कह रहे हैं, सभी को ज्ञान सुलभ है, सभी ज्ञान संपन्न होने का अधिकार रखते हैं, उसके योग्य शिक्षा-संस्कार बनाने की ज़रूरत है.  इसमें कोई-कोई पुण्यशील काम करेंगे, ऐसा मेरा सोच है.  स्वयंस्फूर्त विधि से मानव न्याय करे, इसके योग्य शिक्षा-संस्कार को प्रस्तुत करने की आवश्यकता था, वह कर दिया।  शिक्षा-संस्कार विधि से ही आदमी अपराध करने में स्वयंस्फूर्त हुआ है, शिक्षा-संस्कार विधि से आदमी न्याय करने में स्वयंस्फूर्त होगा।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

पुनर्विचार के लिए विकल्प

आदर्शवाद के इतिहास में मतभेद तो बहुत हुए हैं.  पहले अद्वैत विचार में  “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या”, “एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति” के ऊपर बहुत सारा रचनात्मक रूप से कहा गया.  उसके बाद आया - ब्रह्म सत्य, देवता भी सत्य।  देवताओं में भी जीव जगत को पैदा करने, बनाये रखने और संहार करने की शक्ति है.  तब ब्रह्मा विष्णु महेश - तीन देवता आ गए.  इससे उपासना तंत्र शुरू हुए.  वेद विहित था उपासना।  पहले विष्णु आगम तंत्र आया, फिर शिव आगम तंत्र, फिर बताया ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों शक्ति के अधीन हैं - इस आधार पर शाक्त आगम तंत्र आया.  ऋषिकुल से गुरुकुल आने के क्रम में  इनके मतभेदों से काफी परेशान हुए हैं.  ऋषिकुल से गुरुकुल, गुरुकुल से कुलगुरूकुल, कुलगुरुकुल से आचार्यकुल।  अभी धर्म गद्दियां आचार्य कुल विधि से हैं.  आचार्य कुल के आने के बाद भी परिवार में कोई कुलगुरु होता ही रहा.  विज्ञान के सम्मुख ये तर्क की कसौटी में ये टिक नहीं पा रहे हैं. धीरे धीरे कुलगुरु परम्परा समाप्त होता जा रहा है, जिसको परिवार में नैतिक शिक्षा का आधार माने थे.  शिक्षा संस्थानों में मानव के शिक्षा की बात भौतिकवादी विधि से विज्ञान विधि से शुरू हुई.  होते होते विज्ञान विधि धरती को ही ले डूबा।  इस ढंग से मानव इस धरती पर रहने योग्य नहीं हुआ.  एक तरफ आदर्शवाद में मतभेद, दूसरी तरफ भौतिकवाद में अपराध।  भौतिकवादी विधि से अपराध करने की छूट रही, आदर्शवादी विधि में मतभेद से कलह करने की व्यवस्था बना.  मतभेदों के आधार पर ही अनेक धर्म गद्दियां स्थापित हुई, अनेक समुदाय हुए.  मतभेद के आधार पर विरोधाभास रहा ही.  इन विरोधों को बंद करने के लिए राजा आया.  राजा को नियंत्रित करने के लिए धर्म गद्दी बैठा।  इस ढंग से धर्म गद्दी के पास रोटी खाने की व्यवस्था बन गयी.  अच्छा होने के लिए सोचा था, लेकिन अच्छा हुआ नहीं।  अब उजागर करने का मुद्दा यही है - ये सारे अच्छा चाहते हुए धरती के बीमार होने की जगह पहुँच गए.  तब पता चला कि अभी तक अपराध विधि से चले हैं.  इसीलिये पुनर्विचार के लिए विकल्प प्रस्तुत है.  पुनर्विचार करना हो तो ठीक, नहीं करना हो तो ठीक.  विकल्प को प्रस्तुत करने का यही विधि है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, April 6, 2026

सुन्दर बात

परमाणु में विकास और रचना में विकास - ये दोनों मिलकर के मानव परम्परा तक पहुंचे।  यह प्रतिपादन न हमको विज्ञान से मिलता है, न ईश्वरवाद से मिलता है.  

अनुसन्धान है:  परिणाम का अमरत्व (गठन पूर्णता), श्रम का विश्राम (क्रिया पूर्णता), गति का गंतव्य (आचरण पूर्णता)


अभी तक इसका जिक्र परम्परा में था नहीं।  न भौतिकवाद कर पाया, न आदर्शवाद कर पाया।  इन तीनों बातों को बोध कराने के लिए क्या ये कुछ किये हैं?  


अनुभव ज्ञान आपके सम्मुख प्रस्तुत किया, यदि मानव चाहते हैं तो इस ज्ञान को अपना सकते हैं.  सुन्दर बात इतना ही है.  हर मानव समझदार होना चाहता है, किसी आयु के बाद हर व्यक्ति अपने आप को समझदार मानता ही है.  यह दोनों बात सर्वेक्षित हो गयी.  इस आधार पर आशा रखकर इस प्रस्ताव को प्रस्तुत किये।  यदि यह नहीं होता तो इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने का कोई जगह ही नहीं था.  पूरा मानव परम्परा ही जब अपकृत्यों में लगा है तो इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने का जगह कहाँ है? मानव का आशय के आधार पर इस प्रस्ताव को प्रस्तुत किया है.  पहले एक दो व्यक्तियों को यह बात स्वीकार होने में काफी समय लगा.  दो से चार, चार से चालीस, चालीस से चार हज़ार होने में कम समय लगा.  मानव परम्परा में यह ज्ञान समा जाना चाहिए।  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Thursday, April 2, 2026

मानवीयता - देव मानवीयता - दिव्य मानवीयता

क्रियापूर्णता होने पर सतर्कता पूर्ण होता है, जो मानवीयता है.  अब क्रियापूर्णता तो है ही, सजगता के साथ आचरण पूर्णता की ओर चले.  सतर्कता पूर्ण सजगता सहित देव मानवीयता है.  सजगता पूर्ण सहजता सहित दिव्य मानवीयता है. 


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

उपदेश

उपदेश है:  जाने हुए को मान लो, माने हुए को जान लो.

उपदेश की परिभाषा है - उपाय सहित आदेश।  


स्वयं का आदेश होने पर हम स्वयंस्फूर्त होते हैं.  हमारा संकल्प ही आदेश है.  इसके आधार पर हम काम करते ही हैं.  स्वयं भी आदेश का पालन करते हैं, वैसे ही संसार द्वारा पालन करने की इच्छा रखते हैं.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Wednesday, April 1, 2026

ऊर्जा, चेतना, ज्ञान

 व्यापक वस्तु में प्रत्येक एक वस्तु अविभाज्य है.  प्रत्येक एक ऊर्जा संपन्न है, चेतना संपन्न है, ज्ञान संपन्न है.  व्यापक वस्तु रासायनिक भौतिक संसार में ऊर्जा, जीव संसार में चेतना और मानव संसार में ज्ञान स्वरूप में प्राप्त है.  रासायनिक भौतिक संसार कोई गलती करते नहीं हैं, जीव संसार कोई गलती करते नहीं हैं, मानव तमाम गलती करता है.  मानव ज्ञान स्वरूप में जीने का अवसर पाया किन्तु जीवों के सदृश जीने गया.  मानव द्वारा जीवन और शरीर के भेद को पहचानना, जीवन की आवश्यकता को पूरा करना, शरीर की आवश्यकता को पूरा करना।  जीवन के लिए समाधान चाहिए, न्याय चाहिए, सत्य में अनुभूत रहना चाहिए - इनको पूरा करते हुए जी पाते हैं तो मानव जिया, नहीं तो जीव जिया।  जैसा जीना हो जी लो.  


व्यापक वस्तु और एक-एक वस्तु है - यह पहला सिद्धांत है.  व्यापक वस्तु में एक-एक वस्तु डूबा-भीगा-घिरा है - यह दूसरा सिद्धांत है.  ऊर्जा सम्पन्नता, चेतना सम्पन्नता, ज्ञान सम्पन्नता - यह तीसरा सिद्धांत है.  मानव ज्ञान सम्पन्नता को प्रमाणित करता है - यह चौथा सिद्धांत है.  मानव में ही संज्ञानीयता पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहते हैं - यह पांचवा सिद्धांत है.  यह सन्देश सभी भाषाओं में दौड़ने की आवश्यकता अब आ गयी है.  सभी भाषाओं में इस प्रस्ताव को ले जाने का आधार है - हर भाषा को कारण-गुण-गणित के संयुक्त रूप में पहचानना।  सभी भाषा वालों में समझदारी को लेकर समानता है.  हर भाषा में परिभाषाएं होंगी।  परिभाषा के आधार पर हर भाषा में दर्शन, वाद, शास्त्र प्रकट होंगे और व्यवस्था को व्याख्यायित करने के लिए संविधान होगा।  समझदारी को स्पष्ट करने के लिए दर्शन, जीने की विधि को स्पष्ट करने के लिए वाद और शास्त्र।  


इन सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है, लोग सहमत होते हैं, कोई कोई involve भी होते हैं - यह तो आ गया.  प्रतिबद्ध होने के बाद कोई-कोई जी पा रहे हैं, कोई-कोई नहीं जी पा रहे हैं - यह भी आ गया.  इस प्रस्ताव के प्रभाव को यहाँ तक तो शोध कर लिया है.  अब ज्यादा लोग और सभी लोग कैसे involve होंगे, इस बारे में काम हो सकता है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, March 30, 2026

जो छूटना चाहता है, उसके लिए सीधा रास्ता बना है.

अभी सरकार स्वयं शराब बनाने, कसाईखाने का लाइसेंस देती है.  वन काटने, खनिजों का दोहन करने के लिए विभाग ही बना है.  इस तरह अपराध परम्परा में सभी सरकार पल रहा है.  आदमी को अपराधी बनाने के लिए शिक्षा परम्परा काम कर रहा है.  अपराध को पनपाने के लिए सरकार काम कर रहा है.  सभी इसमें दसों उंगली फंस गए हैं.  फिर भी इससे जो छूटना चाहता है, उसके लिए सीधा रास्ता बना है.  उनके लिए रास्ता बंद नहीं हो पाया है.  इससे जो छूटना चाहता है, उसको पकड़ने वाला कोई नहीं है.  जैसे मैं छूटना चाहा - मुझे कौन पकड़ा?  कोई अड़चन पैदा नहीं किया, कोई अवरोध नहीं है.  अभी तक शिक्षा विधा में इस प्रस्ताव में यह ठीक नहीं है, कहने वाला कोई लाल पैदा हुआ नहीं।  सरकार में कोई लाल पैदा हुआ नहीं।  मैं डाकुओं, व्यभिचारियों, सतत झूठ बोलने वालों से भी बात किया हूँ - उनके पास भी इसको रोकने का कोई जुगाड़ नहीं है.  अतः सहीपन का रास्ता बना ही है, उसको रोकने वाला कोई नहीं है.  एक तरफ हर व्यक्ति समझदार होना चाहता है, दूसरे तरफ उसको रोकने वाला कोई नहीं है.  समझदारी पूर्वक मनुष्य स्वेच्छा से जियेगा।  इस तरह मैंने आजादी का अनुभव किया।  इसमें कोई मजबूरी की बात नहीं है, थोपने की बात नहीं है, स्वयं स्फूर्त विधि से जैसे जीना है जिए.  


  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Saturday, March 28, 2026

कुछ कौतुहल वाले प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न: अस्तित्व में ज्यादा धरतियां समृद्ध हैं या कम धरतियां समृद्ध हैं?

उत्तर: कम धरतियां समृद्ध हैं.  


प्रश्न: कुछ धरतियाँ आवेशित स्थिति में दिखती हैं.  जैसे सूरज।  वो कैसे उस स्थिति तक पहुंचे?


उत्तर: जहाँ जहाँ सूरज है, वहाँ आदमी ने बर्बाद करके सूरज बनाया है.  


प्रश्न: क्या किन्हीं धरतियों पर मानव जागृत भी हैं?


उत्तर: कई धरतियों पर जागृत मानव हैं.   


प्रश्न: यदि अस्तित्व अनंत है, जिसमें अनंत धरतियां हैं तो हमारी धरती से हर कोण पर किसी न किसी दूरी पर कोई धरती होनी चाहिए।  


उत्तर: कोई न कोई पदार्थ होना चाहिए, वह रहता ही है.  


प्रश्न: पर आँख से तो ऐसा दीखता नहीं है.


उत्तर:  आँख से बहुत सीमित ही दीखता है.  ज्ञान दृष्टि से पता चलता है, अनंत धरतियां हैं, बहुत सारी धरतियों पर मानव जागृत है. यहाँ भी जागृत होने का रास्ता आ गया है.  है इसीलिये यहाँ आया, नहीं होता तो कहाँ से आता.  


प्रश्न: इस धरती पर जितने जीवन परमाणु हैं, क्या वे इसी धरती के द्रव्य से बने हैं?


उत्तर: सभी धरती पर जीवन परमाणु तैयार होना है, ऐसा कोई नियम नहीं है.  परमाणु का गठनपूर्ण होना किसी एक धरती पर होना पर्याप्त है.  एक आधा तोला द्रव्य में असंख्य परमाणु होते हैं.  उतना गठनपूर्ण परमाणु सारे संसार के लिए पर्याप्त हो जाते हैं.  


प्रश्न: कोई धरती कब समृद्ध होगी, इसकी क्या कोई गति है?  


उत्तर: यह मनुष्य का हविस है.  नियति विधि से जीवन बनना होता है, धरती पर चारों अवस्थाओं का प्रकट होना होता है.  इसमें जहाँ जहाँ मानव है, उसको सऊर से जीने की आवश्यकता है.  यह आवश्यकता पूरा होने के लिए हमने प्रस्ताव प्रस्तुत किये।  यदि इस धरती पर जागृति प्रमाणित होती है तो भविष्य में हो सकता है यहाँ से जागृत जीवन जिन धरतियों पर राक्षस मानव, पशु मानव रह रहे हैं, वहाँ पहुंचेंगे!  यह बहुत साधारण बात है.  


धरती के समृद्ध होना मानव के हाथ में नहीं है.  मानव के हाथ में है - वह जीव चेतना में भी जी सकता है, मानव चेतना में भी जी सकता है, देव चेतना में भी जी सकता है, दिव्य चेतना में भी जी सकता है.  क्योंकि मानव को कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता नियति प्रदत्त है.  


प्रश्न: एक परमाणु के गठनपूर्ण होने के बाद उसकी क्या अग्रिम गति है?  


उत्तर: पहले आशा बंधन में आएगा, फिर विचार बंधन में आएगा, फिर इच्छा बंधन में आएगा, फिर बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न करेगा।  बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न चाहे आज कर लो, कल कर लो, या करोड़ वर्षों के बाद कर लो.  इस धरती पर आदमी तीनों बंधनों से पीड़ित हो चुका है, पीड़ित करना हो चुका है.  बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न होना शेष है.  उसके लिए प्रस्ताव है.  भौतिकवादी विधि से इसका कोई दवाई निकला नहीं, आदर्शवादी विधि से इसका कोई दवाई निकला नहीं - इसलिए विकल्प विधि को प्रस्तुत किया।  


जीवों में जीवन के आशा बंधन के साथ जीने की बात रहती है.  मानव में आशा बंधन, विचार बंधन और इच्छा बंधन ये तीनों हैं.  इन तीनों बंधनों से मुक्ति के लिए इच्छा हो जाना जल्दी भी हो सकता है, देर से भी हो सकता है.  धरती के बीमार होने के बाद समझदार होने की बाध्यता तो आती ही है।  अभी भी समझदार होंगे या नहीं, इसको कौन बताएगा?  मानव के सम्मुख एक प्रस्ताव आया है, इस आधार पर हम आशा कर रहे हैं कि मानव इसको अपनाएगा।  हमारा सत्यापन तो यहीं तक है.  इसीलिये कह रहे हैं जीजान लगाकर पूरी बात को वेबसाइट में रखा जाए.  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Tuesday, March 24, 2026

भौतिक क्रिया के समृद्ध होने से आशय

प्रश्न: आपने लिखा है, भौतिक क्रिया के समृद्ध होने के उपरान्त यौगिक क्रिया में प्रवृत्त हुआ.  भौतिक क्रिया के समृद्ध होने से क्या आशय है?  


उत्तर: जितने प्रकार के परमाणु की प्रजातियाँ होना है, उनके प्रकट होने के उपरान्त यौगिक क्रिया में प्रवृत्त हुआ.  यही भौतिक क्रिया के समृद्ध होने का अर्थ है.  परमाणुओं की प्रजातियाँ, परमाणुओं से अणुओं की प्रजातियाँ, अणुओं की रचनायें ये सब इसमें शामिल हैं.  सभी मृद, पाषाण, मणि और धातु क समृद्ध होने के बाद ही यौगिक संसार है.  यौगिक विधि में सबसे पहले रसायन पानी का प्रकटन हुआ.  जिसमें एक जलने वाला है, एक जलाने वाला है - ये दोनों मिलकर प्यास बुझाने वाले हो गए.  धरती पर पानी खड़ा होता है. धरती अम्ल और क्षार पानी को देता है, जिससे अम्ल और क्षार के विभिन्न अनुपातों से विभिन्न रस-रसायनों का प्रकटन हुआ.  वही आगे चल करके पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व में परिणित होते हैं.  पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व के योगफल में अनेक परम्पराएं बनी.  पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व का योग ही बीज है.  


पहले प्राकृतिक विधि से बीज बनता है, फिर उसके बाद उसका परम्परा होता है.  हरेक आगे स्थिति के लिए बीज पीछे स्थिति में बना रहता है.  पदार्थावस्था में बीज रूप बनकर के प्राणावस्था में प्रकटन और परम्परा।  प्राणावस्था अपने में समृद्ध होकर के जीवावस्था का बीज तैयार करना, जीवावस्था प्रकट होना और परम्परा स्वरूप में स्थापित होना।  वैसे ही जीवावस्था में ज्ञानावस्था का बीज होना, ज्ञानावस्था प्रकट होना और परम्परा होना।  यह सब क्रम से हुआ है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

दर्शन के अंग्रेजी अनुवाद के लिये मार्गदर्शन

दर्शन के अंग्रेजी अनुवाद के लिए परम्परा के शब्दों को वापरना चाहिए, और उसकी परिभाषा कारण-गुण-गणित विधि से प्रतिपादित होना चाहिए।  यदि यह होता है तो सर्वशुभ होने का रास्ता बन पाता है.  यह नहीं होता है तो नहीं होगा.  इसमें अपने को धारारत करने की बात, आजीवन निष्ठा से काम करने की बात है.  एक दिन की बात नहीं है यह.  यह fictional program नहीं है.  यह परम्परा की विधि से है, आर्यश्रेय विधि से है, अनंत काल के लिए विधि से है.  इसमें कहीं रुकने की बात नहीं है, enrich होने की बात हो सकती है.  क्या enrich करना है?  कारण-गुण-गणित को संप्रेषणा में enrich करना है.  कुल मिला कर सम्पूर्ण अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन के लिए मूल कारण सहअस्तित्व ही है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

मनाकार को साकार करना और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करना

 धरती मानव के रहने के अनुकूल हुआ तब मानव का प्रकटन हुआ.  मानव को अपनी परिभाषा के अनुसार मनः स्वस्थता की ओर जाना था, वह नहीं गया.  मनाकार को साकार करने से मनः स्वस्थता हो जाएगा, ऐसा सोचा - पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।  इसका विरोध भी हुआ, उसको कोई माना नहीं।  विरोध को मानने से कोई प्रवृत्ति बनता नहीं है.  

प्रश्न: मनः स्वस्थता के अभाव में यह तो होना ही था, इसलिए हो गया.  क्या ऐसा सोचना सही है?

उत्तर: यह होना था या नहीं होना था - इसको हम आज तय नहीं कर पाते हैं.  धरती यदि अपने को सुधार लिया तो कहेंगे यह होना था इसलिए हो गया.  यदि धरती अपने को नहीं सुधार पाया तो यही कहेंगे - आदमी नहीं होने वाली बात को कर लिया, दुर्घटना ग्रस्त हो गया।  सच्चाई तो इतना ही है.  

प्रश्न: किसी भी धरती पर जागृति क्रम के बाद ही जागृति आ सकती है, और जागृति क्रम में मानव गलती करता ही है.  ऐसे सोचने में क्या दिक्कत है?

उत्तर: इसको हम कैसे कहें?  दोनों हो सकता है - सीधा-सीधा पहुंचे हों, या गलती कर-करके पहुंचे हों.  हम अपनी भड़ास के मारे ऐसा कहते हैं, क्योंकि हम ऐसे हैं.  मानव परिभाषा के अनुसार मनाकार को साकार करना और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करना होता है.  जिसमें से कहीं पहले मनः स्वस्थता के लिए प्रयत्न हुआ हो सकता है.  जैसे इसी धरती पर आदर्शवाद मनः स्वस्थता के लिए पहले प्रयत्न किया, वो रहस्यमय होने के कारण प्रमाणित नहीं हुआ.  ज्ञान के बारे में जिज्ञासा आदर्शवादियों ने पैदा किया।  यदि वे सफल हो जाते तो यह दुर्घटना काहे को होती?  धरती घायल होने वाली बात क्यों होती?  ज्ञान को लेकर परिकल्पना जंगल युग से है.  ऋषिकुल जंगल युग की है.  

कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता हर मानव के पास है ही.  इसमें दोनों साथ-साथ विकसित हो सकता है या एक पहले विकसित हो, दूसरा बाद में हो - यह हो सकता है.  इस धरती पर मानव ने पहले कर्म स्वतंत्रता की तृप्ति के लिए कल्पनाशीलता का प्रयोग किया, जिससे मनाकार को साकार करना हो गया किन्तु मनःस्वस्थता का भाग वीरान रहा।  मनः स्वस्थता की ओर गया तो पता चला मनाकार को साकार करते करते धरती ही बीमार हो गयी.  अब दूसरे धरती पर जाने की शेखचिल्ली बातें करते हैं.   

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


प्रकाशमानता, प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब

हर वस्तु प्रकाशमान है.  इसका प्रमाण है, वस्तुएं एक दूसरे को पहचानती हैं.  एक परमाणु अंश दूसरे परमाणु अंश को पहचानता है, इसीलिये परमाणु गठन होता है.  इसी प्रकार अनेक अंशों का पहचान भी एक दूसरे के साथ होती है.   इसी क्रम में एक परमाणु दूसरे परमाणु को पहचानता है.  इसका प्रमाण है - अणु.  एक अणु दूसरे अणु को पहचानता है.  इसका प्रमाण है - अणु रचित रचना।  यह धरती एक अणु रचित रचना है.  एक दूसरे के पहचानने के आधार पर प्रतिबिम्बन समझ में आता है. 


इसके बाद आता है, प्रत्येक वस्तु अनंत कोण संपन्न है.  इस आधार पर प्रत्येक कोण में स्थित पदार्थ एक दूसरे को पहचानते हैं.  या सभी ओर से वस्तु को पहचाना जाता है.  कोण हर वस्तु में समायी है.  अभी प्रचलित विज्ञान इसका उल्टा बताता है.  प्रचलित विज्ञान के अनुसार वस्तु में कोण नहीं समाया है, कोण बनाता है आदमी। 


इसके बाद आता है, अनुबिम्ब।  अनुबिम्ब का मतलब है - प्रतिबिम्ब का प्रतिबिम्ब।  प्रतिबिम्ब के आधार पर पहचान हुई, अनुबिम्ब के आधार पर प्रभाव पड़ा.   जैसे, आपका प्रतिबिम्ब मुझ पर है, आपकी पहचान को जो मैं समझा हूँ उसे मैं अपने बच्चों को समझा देता हूँ, यह मेरे बच्चों पर आपका अनुबिम्ब हुआ.  इस तरह एक वस्तु दूसरी वस्तु को प्रतिबिम्बन विधि से पहचानती है.  अनेक वस्तुएं एक वस्तु को अनुबिंबन विधि से पहचानती हैं.  यह पहचान सहअस्तित्व में होने-रहने के लिए होता है.  जैसे मैं आपको पहचानता हूँ, आपके साथ जीने के लिए.  अनुबिंबन विधि से अनेक व्यक्ति आपके साथ जीने के लिए आ जाते हैं.  मेरे साथ जीने के लिए पहले एक भी व्यक्ति नहीं था.  पहले कुछ व्यक्ति हुए, फिर बहुत सारे व्यक्ति हो गए - यह अनुबिंबन विधि से हुआ.  प्रतिबिम्ब और अनुबिम्ब भौतिक-रासायनिक वस्तु में है ही, सहअस्तित्व में रहने के लिए.  इसी आधार पर धरती पर रचना प्रवृत्ति सफल हुआ है.  धरती स्वयं एक रचना है - अनंत अणुओं परमाणुओं से बनी.  यह रचना प्रतिबिम्ब-अनुबिम्ब विधि से सार्थक हो गयी. 


प्रत्यानुबिम्ब है - अनुबिम्ब का प्रतिबिम्ब।  प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब और प्रत्यानुबिम्ब में वस्तु ट्रांसफर नहीं होता है, वस्तु का प्रभाव ट्रांसफर होता है.  प्रत्यानुबिम्ब विधि से वस्तु का प्रभाव क्षेत्र बन गया.  प्रत्यानुबिम्ब विधि से मानव परम्परा में लोकव्यापीकरण होता है, जो है - ज्ञान का प्रभाव।  जिनके साथ हम जीते हैं, उनपर हमारा प्रतिबिम्ब रहता ही है.  वो जिन जिन के साथ जीते हैं, उन पर हमारा अनुबिम्ब रहता ही है.  वो जिन जिन से सम्बन्ध में रहते हैं, उनके सीमा तक हमारा प्रभाव क्षेत्र रहता है.  मानव का प्रभाव क्षेत्र ज्ञान या समझदारी रूप में होता है.  समझदारी समान है - इस धरती पर हो या अन्य धरती पर हो.  समझदारी का धारक-वाहक मानव है.  इस ढंग से प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब और प्रत्यानुबिम्ब का प्रयोजन है - सहअस्तित्व में होना और रहना।    


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Friday, March 6, 2026

विज्ञानमय कोष

 प्रश्न:  “भ्रमित मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को प्रकाशित करते हुए, विज्ञानमय कोष के सक्रिय न होने के कारण, कर्म करते समय स्वतन्त्र और फल भोगते समय परतंत्र है.” - इसको समझाइये।

उत्तर:  शरीर मूलक विधि से मानव जीवन में चित्त का अधूरा भाग (चित्रण) काम करता रहता है, इसलिए ऐसा होता है.  यही जीव चेतना है.  जीव चेतना में विज्ञानमय कोष सक्रिय नहीं रहता है.  अनुभवमूलक विधि से ही विज्ञानमय कोष सक्रिय होता है, जो ज्ञान-विवेक-विज्ञान सम्पन्नता है.  आत्मा और बुद्धि में ही विज्ञानमय कोष है.  इनकी क्रियाशीलता से ही पूरा जीवन अनुभव को प्रमाणित कर पाता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Thursday, March 5, 2026

परम्परा विधि से अध्ययन

अर्थ समझ में आना साक्षात्कार है.  वस्तु वास्तविकता को व्यक्त करता है.  साक्षात्कार का मतलब है - वस्तु को होने और रहने के रूप में पहचानना।  अस्तित्व में सभी कुछ होने और रहने के स्वरूप में है.  एक के बाद एक वस्तु का क्रमिक रूप में साक्षात्कार होता है.  चारों अवस्थाओं का पूरा साक्षात्कार होता है, तो अनुभव होता ही है.  अध्ययन विधि में साक्षात्कार में ही जो समय लगना है वो लगता है.  

आत्मा में अनुभव करने की क्षमता रहता ही है.  इसके साक्षी में हम अध्ययन करते हैं.  अध्ययन कराने वाला अपने अनुभव की रौशनी में ही अध्ययन कराता हैं.  अध्ययन करने वाले के साथ “स्मरण” और “साक्षी” रहता है.  अध्ययन कराने वाले के साथ “प्रमाण” रहता है.  इस तरह परम्परा विधि से अध्ययन होता है.  इस विधि में अध्ययन करने वाला भी होगा, अध्ययन कराने वाला भी होगा।  किसी व्यक्ति को स्वीकारे बिना अध्ययन कैसे होगा?     


पहले साक्षात्कार का अवधारणा बोध होता है, जिसका संकल्प होता है.  इसका नाम है प्रतीति।  अर्थात, साक्षात्कार होने से प्रमाणित करना संभव है, यह प्रतीत होता है.  सहअस्तित्व में अनुभव होता है.  फिर अनुभव होने पर अनुभव का बोध होता है, जिससे संकल्प अब ऋतम्भरा हो गया.  ऋतम्भरा का मतलब - सत्य पूर्ण संकल्प।  अनुभव मूलक विधि से ही ऋतम्भरा आता है, उससे पहले आता नहीं है. अर्थात अब सत्य को प्रमाणित कर सकते हैं, या प्रमाणित करने की योग्यता आ गयी.   प्रमाणित करने की योग्यता के साथ चित्त में चिंतन होता है, उसके उपरान्त चित्रण, तुलन, विश्लेषण, आस्वादन, चयन क्रिया विधि से प्रमाणित होना हो जाता है.  चयन तो मानव परम्परा में ही होगा, चारों अवस्थाओं के साथ ही होगा।  प्रमाणित होने के क्रम में मूल्यों की अभिव्यक्ति है.  संबंधों का निर्वाह होने से मूल्यों का निर्वाह होता है.  संबंधों का निर्वाह नहीं हो पाना ही भ्रम है.  जीव चेतना में संबंधों का निर्वाह नहीं हो पाता है.  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Tuesday, March 3, 2026

जीने का common model

जंगल युग से ग्राम युग, ग्राम युग से राज युग, राज युग से विज्ञान युग तक इतना समय जो मानव धरती पर जिया, उसके करने से धरती बीमार हो गयी.  धरती बीमार होने पर आगे पीढ़ी कहाँ रहेगा?  इस अपराध से मुक्ति का उपाय खोजना होगा या नहीं?  भौतिकवादी विधि से इसका कोई उत्तर नहीं है, आदर्शवादी विधि से इसका कोई उत्तर नहीं है.  सहअस्तित्ववादी विधि से इसके लिए प्रस्ताव है.  

भौतिकवादी विधि से मानव के जीने का मॉडल निकला - सुविधा-संग्रह।  आदर्शवादी विधि से मानव के जीने का मॉडल निकला - भक्ति-विरक्ति।  अपने-पराये का दूरी भक्ति-विरक्ति बनाया ही है.  विरक्ति का पालन करने वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्तियों से दूर हो गया या नहीं?  सुविधा-संग्रह के चलते अमीरी-गरीबी की दूरियाँ हो गयी या नहीं?  ये दूरियाँ बने हुए कैसे सर्वमानव का जीने का common model बने, आप ही बताओ!  बल्कि इनके चलते धरती बीमार हो गयी. 

सहअस्तित्ववादी विधि से जीने का common model launch किया - समाधान-समृद्धि।  क्या इसको challenge किया जा सकता है?  इससे दूर भागा जा सकता है, इसको challenge किया नहीं जा सकता।  समाधान-समृद्धि पूर्वक हर परिवार जी सकता है.  समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि।  यह चाहिए या नहीं चाहिए?  

मानव अनादिकाल से शुभ चाह ही रहा है.  इस क्रम में मनाकार को साकार तो वह कर लिया, किन्तु मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने का पक्ष वीरान रहा है.  उसके लिए यह प्रस्ताव है.  मनः स्वस्थता को प्रमाणित किये बिना मानव के जीने का common model कैसे निकलेगा?  इससे पहले आदर्शवाद और भौतिकवाद मानव के जीने का common model नहीं निकाल पाया।  जीने का common model के लिए प्रयास किया जाए या नहीं किया जाए?  जीने के common model का प्रमाण मैं हूँ. यह आपको स्वीकार होता है तो आप में किसी कोने में जो जिम्मेदारी है, उसको निर्वाह किया जाए.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, March 2, 2026

परिवर्तन की सम्भावना

मध्यम वर्गीय कहलाने वाले जो intellects हैं, उन में यह कामना दिखती है कि और कुछ सटीक होना चाहिए, इनमे सत्य के प्रति अपेक्षा है।  अतः ये लोग पहले समझेंगे।  इसीलिये परिवर्तन की सम्भावना है, ऐसा मैं मानता हूँ.  जो निम्न वर्गीय कहलाने वाले अभाव ग्रस्त लोग हैं उनसे कुछ नहीं होगा, उच्च वर्गीय कहलाने वाले जो बहुत ज्यादा संग्रह-सुविधा में लिप्त हो गए हैं - उनसे भी कुछ नहीं होगा।  मध्यम वर्गीय लोग समझने के बाद निम्न वर्गीय लोग समझेंगे, उसके बाद उच्च वर्गीय लोग समझेंगे।

 - श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Sunday, March 1, 2026

सहीपन के लिए संकल्प

हर पीढ़ी का अगली पीढ़ी के साथ generation gap जो दिखता है, उसकी जरूरत है या नहीं?  generation gap की ज़रूरत महसूस होता है, तो जो चल रहा है उसी के साथ continue किया जाए.  generation gap का जरूरत महसूस नहीं होता है तो इस विकल्प को सोचा जाए.


इस विकल्प से समझदारी पूरा होता है या नहीं, यह जांचने का अधिकार आपके पास है.  


जहाँ कहीं भी आप हैं, उसमें श्रम से जी सकते हैं या नहीं - इसको तय करने में आप समर्थ हैं.


फिर हमारी जो अभी जिम्मेदारियां हैं - बच्चे हैं, बड़े हैं उनकी तरफ.  उसके लिए जो अभी तक हमने उपार्जित किया, वो पर्याप्त है या नहीं।  उसको आप judge कर सकते हैं.


इन चार बातों पर यदि आप निष्कर्ष निकाल लें तो आगे की बात सोच सकते हैं.  इनमें से कोई भी बात छोड़ करके आप भाग नहीं सकते।  


सहीपन के लिए यदि हम संकल्प करते हैं तो वह आराम से सफल हो जाता है.  इसके विपरीत आदर्शवाद में बताया गया था - श्रेयांसि बहु विघ्नानि भवन्ति महतामपि।  अर्थात, सहीपन के लिए तुम चलना चाहते हो, तो विध्न बहुत हैं.  मेरा सोचना इससे बिल्कुल विपरीत है.  श्रेय के लिए कोई काम करता है तो उसके लिए बहुत सहायता बन ही जाती है.  सहीपन के लिए आदमी प्रयत्न करने से कोई तकलीफ नहीं है, सभी सुखद है.  मेरे अनुभव के अनुसार ऐसा ही है.  सहीपन के लिए अवधारणा न होने से तकलीफ होती ही है.  मनमानी कुछ करेंगे तो विध्न होगा ही.   


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

जीव और मानव

 प्रश्न: जीव शरीरों को संचालित करने वाले जीवन और मनुष्य शरीर को संचालित करने वाले जीवन में क्या अंतर है?

उत्तर:  मनुष्य शरीर को चलाने वाला जीवन कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को व्यक्त करता है, जबकि जीव शरीर को चलाने वाला जीवन ऐसा नहीं करता।  मनुष्य शरीर में मेधस रचना ऐसी बनी है जिससे जीवन का कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता प्रकट होता है.  जीव शरीरों के मेधस तंत्र में यह व्यवस्था नहीं है.  बहुत से जीवों में मानव के संकेत ग्रहण करने का अधिकार रखा है, किन्तु अपनी कल्पनाशीलता-कर्मस्वतंत्रता उनमे कुछ नहीं है.  इससे जीव कर्म करते समय भी परतंत्र है, फल भोगते समय भी परतंत्र है.  मानव कर्म करते समय में स्वतन्त्र है, फल भोगते समय परतंत्र है.  इसके आगे मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु की खोज करता है.  जीवों में यह बात नहीं है.  उनका आचरण उनके वंश परंपरा के अनुसार ही रहता है.  मानव में ज्ञान के अनुसार आचरण करने का प्रावधान है.  यह अभी तक तय ही नहीं हो पाया।  कैसा आचरण होना चाहिए - इसको बताने वाले एक से बढ़ कर एक अहमता वाले संसार में बैठे हैं!  


मानव और देवमानव में ये अंतर है कि मानव minimum beautiful है, उससे अच्छा देवमानव है. उसके लिए प्रयत्न मानव में होती रहती है.  मानव द्वारा दिव्यमानव पद को प्राप्त करने के लिए देवमानव बीच में स्थिति है.  दिव्यमानव पद में पहुँचने के बाद पुनः वापस नहीं होता।  वह संक्रमण है.  इस तरह - गठन पूर्णता के साथ जीव चेतना की सीमा में जीना होता है.  मानव चेतना में जीने से क्रिया पूर्णता हो गयी.  दिव्य चेतना में पहुँचने के बाद आचरण पूर्णता हो गयी.  पूर्णता के ये तीन stages हैं.  मानव पद में जो आचरण निश्चित हो गया, वह आचरण देवमानव भी करेगा, दिव्यमानव भी करेगा।  मानवीयता पूर्ण आचरण इनमें यथावत बना रहता है.  इनमें अंतर केवल उपकार करने में होता है.  मानव जितना उपकार करता है उससे ज्यादा देव मानव उपकार करता है, पूर्ण रूप में दिव्य मानव उपकार करता है.  आचरण में तीनों समान हैं.  इसीलिए मानव पद को base माना है.  इसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता।  मानव का आचरण, स्वभाव और दृष्टि पूर्वक जीना संभव है या नहीं - इसको आप जाँचिए।  यदि संभव है तो हम क्या प्रमाणित हो पाते हैं या नहीं - इसको सोचा जा सकता है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Saturday, February 28, 2026

विकास और जागृति

अनुभव होने के रूप में होता है या और किसी रूप में होता है?  होना मतलब अस्तित्व।  हवा के होने के आधार पर हवा का अनुभव है.  धरती के होने के आधार पर धरती का अनुभव है.  पानी के होने के आधार पर पानी का अनुभव है.  होने का ही अध्ययन है, होने का ही अनुभव है.  होने का अनुभव पूर्वक ही न्याय धर्म सत्य पूर्वक जीना प्रमाणित होता है.  

विज्ञान ने ऐसा माना - हमको जो बर्बाद करना है, वो अध्ययन है.  हमको जो बर्बाद करना है, वो प्रयोग है.  इसको सुविधा-संग्रह के आधार पर विकास मान लिया।  दूसरे, जो ज्यादा मार-पीट कर सके उसको ज्यादा विकसित मान लिया।  और कोई आधार नहीं है.  इस ढंग से जो होना था, वह हो ही चुका है.


अब यह सोचा जाए - न्याय पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  समाधान पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  सत्य पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  इसके साथ नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  इस तरह इन 6 बिंदुओं में हम विकास और जागृति को पहचान सकते हैं.  अब हमको निर्णय करना है - शोषण और मारपीट करना विकास और जागृति है या न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जीना विकास और जागृति है?


अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है.  इसी से, इसी में, इसी के लिए अध्ययन है.  इसको छोड़ करके हम जो कुछ अध्ययन करते हैं वो मिथ्या हो जाता है, अपराध के लिए रास्ता बन जाता है.  सहअस्तित्व को भुलावा दे कर हमने कुछ भी अध्ययन किया, तो वह अपराध की जगह में पहुँच जाता है या चुप होने की जगह में पहुँच जाता है.  प्रयोग में आ जाएंगे तो अपराध करेंगे, रहस्य में फंसेंगे तो चुप हो जायेंगे।  यह बात तयशुदा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Friday, February 27, 2026

प्रश्न करने का अधिकार

समझा हुआ व्यक्ति प्रश्न करने का अधिकार रखता है या न समझा हुआ व्यक्ति प्रश्न करने का अधिकार रखता है?   

समझा हुआ व्यक्ति सामने व्यक्ति को समझाने के बाद वह समझा या नहीं समझा, इसको जाँचने के लिए प्रश्न कर सकता है. 

न समझा हुआ व्यक्ति क्या प्रश्न करेगा?  न समझा हुआ व्यक्ति समझने के लिए इच्छा या चाहत प्रकट करेगा या प्रश्न करेगा?  ना समझा हुआ व्यक्ति समझने की चाहत प्रकट कर सकता है क्योंकि उसके पास अनुमान क्षमता है.  अनुमान के आधार पर हम सच्चाई को समझना चाहते हैं, समाधान चाहते हैं - इनके लिए हम अपनी आशा व्यक्त कर सकते हैं.  न समझा हुआ व्यक्ति समझने के लिए अपना चाहत व्यक्त कर सकता है.  चाहत को प्रश्न कहना बेसिरपैर की बात हो गया या नहीं? 

विज्ञान युग ने आ कर तर्क का दरवाजा खोल दिया।  सब कुछ तर्क-संगत होना आवश्यक है - ऐसा कहा.  उनके अनुसार प्रश्न भी तर्क है, उत्तर भी तर्क है.  इससे तर्क के लिए तर्क करने की बात शुरू हो गयी.  यह उन्होंने अपने डूबने के लिए रास्ता बना लिया।  समझा हुआ बात एक से एक जुड़ा रहता है.  इसमें प्रश्न क्या हो सकता है?  अभी हर दारु पिया हुआ आदमी, हर लम्पट आदमी, हर जगह प्रश्न ही प्रश्न करता है.  प्रश्नों की कतार बना देता है.  जबकि उसके पास प्रश्न करने का कोई आधार ही नहीं रहता है.  

इस बात को generalise करने की ज़रूरत है या नहीं?  यद्दपि हमारे प्रस्ताव में मैंने इस तरीके को प्रस्तुत नहीं किया है.  जरूरत होने पर इसको प्रस्तुत किया जा सकता है, ऐसा मेरा सोच है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Monday, February 23, 2026

आदर्श का मतलब है - मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर

जिसको आदर्श माना, उसको परम पूज्य मानना।  उनको सम्मानजनक विधि से सम्बोधन करना, उनको खाना खिलाना आदि को पुण्य मानना।  इससे हमारे सभी पापों से मुक्ति होती है - ऐसा भी मानना।  हम बहुत ऐश्वर्यवान हो जाएंगे - यह भी मानना।  यही आदर्शवादी परम्परा में बताया गया है.  आदर्श का केंद्र बनाया जैसे  - एक पत्थर को, एक झाड़ को, एक नदी को.  कुल मिलाकर आदर्श है - हमारी मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर.  इससे अधिक कुछ निकलता है?  उसी प्रकार देवी-देवताओं और अवतारों को आदर्श बनाया - क्यों, मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर.  उससे पहले ज्ञान को आदर्श बनाया - क्यों, वो भी मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर.  मनोकामनाएं पूरा होते-होते धरती ही बीमार हो गया.  

अब यह सब चलेगा नहीं।  अब वही चलेगा जिससे मानवीयता पूर्ण आचरण स्पष्ट होता हो, संविधान स्पष्ट होता हो, शिक्षा स्पष्ट होता हो, और व्यवस्था स्पष्ट होता हो.  इन चार बातों को यदि हम शिक्षा विधि से दे पाएं तो वह चलेगा, बाकी कुछ भी नहीं चलेगा।  

इसीलिए मध्यस्थ दर्शन में लिखा - प्रतीक प्राप्ति नहीं है, उपमा उपलब्धि नहीं है.  

मनुष्य समझदार हो कर समाधानित होता है, सुखी होता है.  भ्रमित रह कर समस्या पैदा करता है, दुखी रहता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Sunday, February 22, 2026

सुख और दुःख


 प्रश्न: आपके सामने कोई दुःखी व्यक्ति आता है तो क्या आप दुःखी नहीं होते?  निरंतर सुख में कैसे बने रहते हैं?

उत्तर: मानव समाधान में ही निरंतर सुखी है.  दुखी व्यक्ति को देखने पर हमारे मन में उसके दुःख के निराकरण का उपाय आता है, तो हम निरंतर सुखी हैं.  यह दूसरे व्यक्ति में उसकी ज़रूरत के अनुसार ही ट्रांसफर होगा, हमारे इच्छा से ट्रांसफर नहीं होगा।  दुखी व्यक्ति अपने में सुधार करने पर ही सुखी होगा।  समझदार व्यक्ति को सामने व्यक्ति के दुःख को देख कर पीड़ा नहीं होती, क्योंकि उसको दुःख का कारण भी पता रहता है, उसका निवारण कैसे होगा यह भी पता रहता है.  इसमें पीड़ित होने का कोई रास्ता ही नहीं है.  पीड़ा हज़ारों कोस दूर ही रह गया.  जब तक हमे दुःख के कारण और उसके निवारण का पता नहीं है, तब तक हम दुखी को देख कर दुखी होते ही हैं.  लोग मानते हैं कि दूसरों के दुःख देख के वो पीड़ित हो गए तो महान हो गए!  आप ही सोच कर अपने विवेक से निर्णय करो कि क्या ठीक है.  

समाधान से पहले मानव दुखी रहता ही है.  इसी को देख कर पूर्व में कहा गया कि संसार में दुःख ही दुःख है.  विकल्प विधि से हम कह रहे हैं कि समाधान पूर्वक हमे दुःख का कारण पता रहता है, उसके निवारण का अधिकार रहता है.  ऐसे में हमारे दुखी होने का कारण ही नहीं बनता।  

समाधान = सुख, समस्या = दुःख।  अपने में समस्या है इसलिए दूसरों का समस्या हमको दुखी करता है.  अपने में यदि समाधान है तो सामने व्यक्ति के लिए भी समाधान है.  

प्रश्न:  निरंतर सुख की आपकी स्थिति में क्या सारी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं?

उत्तर:  वैध या सकारात्मक इच्छाएं सब रहता हैं.  निषेधात्मक इच्छाएं नहीं रहता हैं.  आपके अनुसार क्या निषेधात्मक इच्छाएं होना चाहिए? निरंतर सुख की इस स्थिति में हर व्यक्ति को होना चाहिए या नहीं?  

प्रश्न: क्या सकारात्मक इच्छाएं दुःख का कारण नहीं है?  मेरी इच्छा है संसार से गरीबी प्रदूषण समाप्त हो जाए, पर संसार में उसके विपरीत ही होता दिख रहा है.  क्या यह मेरे दुःख का कारण नहीं है?

उत्तर: इच्छा होना पर्याप्त नहीं है.  इच्छा के पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होना आवश्यक है.  मानव में शुभेच्छा आदिकाल से है.  उसके पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होने से समाधान होता है.  यह अभी के विज्ञान से नहीं होगा।  मानव लक्ष्य के लिए दिशा निर्धारित करने वाले विज्ञान से यह होगा।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)