जिसको आदर्श माना, उसको परम पूज्य मानना। उनको सम्मानजनक विधि से सम्बोधन करना, उनको खाना खिलाना आदि को पुण्य मानना। इससे हमारे सभी पापों से मुक्ति होती है - ऐसा भी मानना। हम बहुत ऐश्वर्यवान हो जाएंगे - यह भी मानना। यही आदर्शवादी परम्परा में बताया गया है. आदर्श का केंद्र बनाया जैसे - एक पत्थर को, एक झाड़ को, एक नदी को. कुल मिलाकर आदर्श है - हमारी मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर. इससे अधिक कुछ निकलता है? उसी प्रकार देवी-देवताओं और अवतारों को आदर्श बनाया - क्यों, मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर. उससे पहले ज्ञान को आदर्श बनाया - क्यों, वो भी मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर. मनोकामनाएं पूरा होते-होते धरती ही बीमार हो गया.
अब यह सब चलेगा नहीं। अब वही चलेगा जिससे मानवीयता पूर्ण आचरण स्पष्ट होता हो, संविधान स्पष्ट होता हो, शिक्षा स्पष्ट होता हो, और व्यवस्था स्पष्ट होता हो. इन चार बातों को यदि हम शिक्षा विधि से दे पाएं तो वह चलेगा, बाकी कुछ भी नहीं चलेगा।
इसीलिए मध्यस्थ दर्शन में लिखा - प्रतीक प्राप्ति नहीं है, उपमा उपलब्धि नहीं है.
मनुष्य समझदार हो कर समाधानित होता है, सुखी होता है. भ्रमित रह कर समस्या पैदा करता है, दुखी रहता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
No comments:
Post a Comment