- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद - अगस्त २००६, अमरकंटक
This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
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Wednesday, December 13, 2017
Tuesday, December 12, 2017
Tuesday, December 5, 2017
Monday, December 4, 2017
Friday, December 1, 2017
अध्ययन एक उपलब्धि, और साधना की पृष्ठभूमि - भाग १
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद - अगस्त २००६, अमरकंटक
Wednesday, November 29, 2017
Tuesday, November 28, 2017
Monday, November 27, 2017
Sunday, November 26, 2017
Thursday, November 23, 2017
संस्कृति, उत्सव, उन्मुक्तता और वैविध्यता
चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत और काव्य-साहित्य - इन चारों को मिलाकर हम "कला" मानते हैं जो अभी संस्कृति का स्वरूप मानते है. इसके साथ त्यौहार मनाना, उत्सव मनाना, नाचना, गाना, बाजा बजाना - इसको संस्कृति का क्रिया स्वरूप मानते हैं. उसी के साथ शादी-ब्याह के रीति-रिवाजों का निर्वाह करना, और वहाँ उत्सव मनाने के तरीकों को प्रस्तुत करना को संस्कृति मानते हैं.
यहाँ संस्कृति की परिभाषा दिया - "पूर्णता के अर्थ में किया गया कृतियाँ". पूर्णता के अर्थ में क्या करेंगे - इसके लिए विकल्प दिया.
जैसे - जब कोई संतान जन्मता है तो उस समय उत्सव में यह कामना व्यक्त किया, यह संतान जो आया है वह मानव चेतना से संपन्न हो, विद्वान हो, तकनीकी शिक्षण से उत्पादन करने में सक्षम बने. ऐसे गीतों को तैयार करना. ऐसे गीतों का गायन, ऐसा बाजा-भजन्तरी, नाच-गाना सब कर लो!
एक गाँव में अनेक उत्सवों को पहचाना जा सकता है. जैसे - ऋतुकाल उत्सव को हर ऋतु - जैसे बसंत, शिशिर, ग्रीष्म - के साथ मनाया जा सकता है. ऐसे साल में ६ उत्सव! हर व्यक्ति के साथ जन्मोत्सव, शिक्षा में स्नातकोत्सव (उस दिन को याद करने के लिए जब स्नातक हुए थे!), विवाहोत्सव. ये हरेक व्यक्ति के साथ है. गाँव में १०० परिवार हों तो कितने उत्सव हो जायेंगे! उसके बाद कृषि से सम्बंधित उत्सव! व्यवस्था से सम्बंधित उत्सव! व्यवस्था की पाँचों समितियों के पांच उत्सव. वर्ष में एक दिन ग्राम स्वराज्य सभा का उत्सव! एक वर्ष में हम क्या-क्या कर पाए, आगे क्या करने की तैयारी है - इसको पूरे गाँव के सामने रखना. सफलता जो हुआ उसके आधार पर कविता, निबंध, प्रबंध, गाना, बाजा, भजन्तरी, नाच-गाना - सब कर लेना!
जैसे न्याय-सुरक्षा समिति के उत्सव में हमारे गाँव में पूरे वर्ष न्याय-सुरक्षा को लेकर क्या-क्या किये, १०० परिवारों में से सबकी आराम और तकलीफों का बखान. हर परिवार अपना अपना सत्यापन करे - हमारे परिवार में सभी परिवार जनों द्वारा न्याय-सुरक्षा सटीक निर्वाह हुआ या नहीं हुआ? मूल्य-चरित्र-नैतिकता विधि से, और उपयोग-सदुपयोग-प्रयोजनशीलता विधि से. उसको डॉक्यूमेंट किया जाए.
वस्तुओं और सेवा का परिवार में "उपयोग" होता है, अखंड समाज में "सदुपयोग" होता है, और सार्वभौम व्यवस्था में "प्रयोजनशील" होता है. वस्तु और सेवा कौन अर्पित करेगा? जो समृद्ध परिवार हैं, वे अर्पित करेंगे. गाँव के सभी १०० परिवार समृद्ध हैं. उसी तरह समृद्ध परिवारों के बीच विनिमय-कोष व्यवस्था का उत्सव. हर परिवार ने क्या किया - इस पर निबंध, प्रबंध. श्रम मूल्य को कैसे पहचाना - इसका डॉक्यूमेंटेशन. साथ में गायन, बाजा, भजन्तरी!
इसमें थोडा मखौल भी है, सुखद भी है - पर यथार्थ पूरा है! मखौल से आशय है - गंभीरता के स्थान पर हल्के-फुल्के तरीके से बात किया, पर भाव फिर भी पूरा आ गया! अब आप बताओ - यह सब हुल्लड़बाजी, हल्ला-दंगा पूर्णता के अर्थ में है या नहीं!?
मानव को कहीं न कहीं उन्मुक्तता भी चाहिए. यह उन्मुक्तता अखंडता और सार्वभौमता के साथ जुड़ा रहे. हंसी-खेल बिना पूर्वाग्रह के है तो उन्मुक्तता है. पूर्वाग्रह के साथ तो हंसी-खेल भी प्रतिस्पर्धा है.
खेल एक दूसरे को प्रसन्नता देने के लिए है, स्वस्थ रहने के लिए है. स्वस्थ रहना व्यक्ति, परिवार और गाँव के लिए प्रसन्नता है. स्वस्थ और प्रसन्न रहने पर हम ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं.
आशय एक ही रहते हुए, लक्ष्य एक ही रहते हुए - हर मनुष्य के समझने का और अपनी समझ को व्यक्त करने का तरीका भिन्न होगा. तरीका बदलना स्वाभाविक है, क्योंकि मानव यंत्र नहीं है!
एक तरफ समझ और दूसरी तरफ व्यवस्था में जीने का प्रमाण - इन दोनों के बीच में हमारी वैविध्यता है. समझने-समझाने में, सीखने-सिखाने में, करने-कराने में! अध्ययन से लेकर अध्यापन तक, व्यवहार से लेकर व्यवस्था तक, कृषि से लेकर उद्योग तक - हर जगह में सीखना-सिखाना, करना-कराना, समझना-समझाना बना रहेगा.
समझाने में परिपूर्णता और जिज्ञासा में परिपूर्णता दोनों आवश्यक है. कैसे समझायेंगे - इसमें वैविध्यता रहेगी. अपनी मौलिकता के अनुसार आप समझायेंगे. कैसे भी समझाया, समझा दिया - उसका मूल्यांकन है. किस तरीके से समझाया, उसका मूल्यांकन नहीं है!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद - अगस्त २००६, अमरकंटक
Wednesday, November 22, 2017
समाधि-संयम पूर्वक गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता का अनुसंधान
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद - जनवरी २००७, अमरकंटक
Tuesday, November 21, 2017
पहले विचार और मानसिकता में लक्ष्य को समाधान-समृद्धि बनाओ!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद - जनवरी २००७, अमरकंटक
मानवीयता पूर्ण आचरण ही समझदारी का सर्वोपरि प्रमाण है
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद - जनवरी २००७, अमरकंटक
Monday, November 20, 2017
सूक्ष्म संवेदना
(जागृति पूर्वक) सतर्कता-सजगता विधि से हम सदा-सदा तीन दिशाओं के दृष्टा बने रहते हैं. जैसे - हम किसी सामने खड़े व्यक्ति को देखते हैं तो वह व्यक्ति कैसा दिख रहा है, वह क्या कर रहा है, और वह क्या सोच रहा है - इन तीनो संवेदनाओं को हम ग्रहण करते हैं. सामने व्यक्ति क्या सोच रहा है उसको पहचानना भी संवेदना ही है - जिसको "सूक्ष्म संवेदना" नाम दिया. इसको भी हम शरीर के साथ ही ग्रहण करते हैं.
विचार जीवन में होते हैं. जीवन के साथ ही शरीर में संवेदनाएं अनुप्राणित होती हैं. सूक्ष्म संवेदना (सामने व्यक्ति का विचार) यदि समझ में आता है तो हम सामने व्यक्ति को समझे, अन्यथा हम सामने व्यक्ति को समझे नहीं. "सोचना" या विचार ही "दिखने" और "करने" के मूल में होता है.
यदि हम सामने व्यक्ति के विचार को उसके दिखने और उसके करने से मिला पाते हैं तो हम उसको समझे, अन्यथा हम सामने व्यक्ति को समझे नहीं!
इस तरह संवेदना विधि से मनुष्य का मनुष्य से अध्ययन का स्त्रोत बना है. हर मनुष्य का अध्ययन हर मनुष्य कर सकता है.
जो दिख रहा है - वह "गणित", जो कर रहा है - वह "गुण", जो है - वह "कारण". इस तरह कारण-गुण-गणित के संयुक्त स्वरूप में मानव द्वारा हर वस्तु की पहचान और सम्प्रेश्ना होती है. मानव से जुड़ा यह एक सिद्धांत है.
इसी विधि से मानवों में एक दूसरे के साथ मंगल मैत्री के निर्वाह की आवश्यकता की आपूर्ति है. मंगल मैत्री आवश्यक है - क्योंकि हमे व्यवस्था में जीना है! व्यवस्था में जिए बिना मानव का कल्याण नहीं है. सर्वमानव का कल्याण व्यवस्था में जीने में ही है.
सर्वमानव के कल्याण (शुभ) का स्वरूप है - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाण. इसके लिए अखंड समाज सूत्र-व्याख्या, अखंड राष्ट्र सूत्र-व्याख्या, सार्वभौम व्यवस्था सूत्र-व्याख्या - यही शिक्षा की वस्तु है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित - अगस्त २००६, अमरकंटक
Sunday, November 19, 2017
यह व्यवस्था के लिए विकल्प है! व्यवस्था के लिए यही विकल्प है!!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद, अगस्त २००६, अमरकंटक
Saturday, November 18, 2017
Friday, November 17, 2017
जीवन शक्तियों में अपेक्षाकृत अधिक गति और पैनापन
आशा गति से विचार गति, विचार गति से इच्छा गति, इच्छा गति से संकल्प गति, संकल्प गति से प्रमाण गति ज्यादा होती है.
आशा से ज्यादा पैनापन विचार में, विचार से ज्यादा पैनापन इच्छा में, इच्छा से ज्यादा पैनापन संकल्प में, संकल्प से ज्यादा पैनापन प्रमाण में होता है.
इसी अपेक्षाकृत अधिक गति और पैनेपन के आधार पर ही एक दूसरे के साथ मूल्यांकन और तदाकार होना संभव है.
- श्रद्धेय ए. नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
आशा से ज्यादा पैनापन विचार में, विचार से ज्यादा पैनापन इच्छा में, इच्छा से ज्यादा पैनापन संकल्प में, संकल्प से ज्यादा पैनापन प्रमाण में होता है.
इसी अपेक्षाकृत अधिक गति और पैनेपन के आधार पर ही एक दूसरे के साथ मूल्यांकन और तदाकार होना संभव है.
- श्रद्धेय ए. नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
Thursday, November 16, 2017
Saturday, October 21, 2017
साधना विधि का विवरण
इस धरती पर ७०० करोड़ आदमियों के मन में कोई भी प्रश्न हों तो उसका उत्तर मेरे पास है. यदि समस्या है तो उसका समाधान है. प्रश्न समस्या ही है. अभी तक मैं उस जगह नहीं पहुंचा जो मुझे कहना पड़े कि इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है.
प्रश्न: आपने साधना किस विधि से किया - इसको कृपया और स्पष्ट करें.
उत्तर: यह बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है फिर भी इसका उत्तर इस प्रकार से है.
पतंजलि योग सूत्र में साधना की आठ भूमियों को बताया गया है. ( यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाध्योअष्टावन्गानि [ २९ - साधनपाद, पतंजलि योग सूत्र])
इसमें पहले 'यम' और 'नियम' को बताया है - जो आचरण से सम्बंधित हैं.
उसके बाद 'आसन' और 'प्राणायाम' को बताया है - जो शरीर स्वस्थता से सम्बंधित हैं.
उसके बाद 'प्रत्याहार' में बताया है - मानसिकता में क्या सोचना चाहिए और क्या नहीं सोचना चाहिए. इसमें विरक्ति या असंग्रह विधि से जीने की प्रेरणा है. संग्रह प्रवृत्ति से मुक्ति को बहुत अच्छे से यहाँ समझाया गया है.
उसके बाद है - 'धारणा'. (देशबन्धश्चित्तस्य धारणा [ १ - विभूतिपाद , पतंजलि योग सूत्र]) जिसका मतलब है - किसी वस्तु या क्षेत्र में हमारी चित्त-वृत्तियाँ निरोध हो सकती हैं. जैसे - एक चित्र के आकार में चित्त वृत्तियाँ निरोध होना. कोई आकार, कोई देवी-देवता, कोई अक्षर, कोई कल्पना ही क्यों न हो, माता, पिता, गुरु या स्वयं के शरीर के आकार में चित्त-वृत्तियाँ निरोध हो जाने को हम धारणा कहेंगे.
इसके बाद उसके निश्चित बिंदु में यदि हमारी चित्त-वृत्तियाँ निरोध होती हैं, तो उसको 'ध्यान' नाम दिया. ( तत्रप्रत्येकतानता ध्यानम [२ - विभूतिपाद , पतंजलि योग सूत्र])
ध्यान के बिंदु का अर्थ रहे पर उसका स्वरूप न रहे, इस स्थिति का नाम है - 'समाधि'. (तदेवार्थमात्रनिर्भासम स्वरूपशून्यमिव समाधिः [३ - विभूतिपाद , पतंजलि योग सूत्र])
इसको आप पतंजलि योग सूत्र में पढेंगे तो आपको वह यथावत मिलेगा.
समाधि में चित्त वृत्ति निरोध होता ही है. चित्त-वृत्ति निरोध होने का मतलब है - हमारी आशा, विचार और इच्छाएं चुप हो जाना. शास्त्रों/प्राचीन ग्रंथों में आशा-विचार-इच्छा चुप हो जाती हैं - यह नहीं लिखा है. मैं स्वयं इसको देखा हूँ. आशा, विचार और इच्छा का चुप हो जाना समाधि है. इसके आधार पर ही शास्त्रों/प्राचीन ग्रंथों में लिखा है - मानव जो कुछ भी समझ सकता है, सोच सकता है - समाधि उसके पार की स्थिति है. इस स्थिति में मुझे तो कोई ज्ञान मिला नहीं. जिसको मिला हो, वो बताये! समाधि का कोई गवाही नहीं होता है. अब इसको बताएं तो कोई विश्वास कैसे करेगा? तब 'संयम' की बात आयी.
(त्रयमेकत्र संयमः [४ - विभूतिपाद , पतंजलि योग सूत्र]) एक विषय में तीनो (धारणा, ध्यान और समाधि) का होना संयम कहलाता है.
विभूतिपाद में कई तरह के संयम की चर्चा है. जैसे - (कंठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्ति [३० - विभूतिपाद , पतंजलि योग सूत्र]) कंठकूप गलग्रंथि और स्वरग्रंथि के बीच के गड्ढे को कहते हैं. उस जगह में संयम करने से भूख और प्यास से मुक्ति हो जाती है. मेरे भूख-प्यास से मुक्त हो जाने से संसार का कौनसा कल्याण हो जाएगा? इससे क्या होने वाला है? ऐसा अन्तःकरण में चर्चा होने पर उसका कोई उत्तर मुझे मिला नहीं.
दूसरा - (नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् [२९ - विभूतिपाद , पतंजलि योग सूत्र]) अर्थात नाभिचक्र में संयम करने से एक ही आदमी अनेक शरीर स्वरूप में व्यक्त हो सकता है. यह सिद्धि किसको चाहिए? जानमारी, सेंधमारी, लूटमारी करने वालों को इसकी ज़रूरत होगी. मेरे लिए इसका क्या प्रयोजन है? मुझे इस सिद्धि का अपने लिए कोई प्रयोजन दिखा नहीं.
इस प्रकार पूरा विभूतिपाद मेरे लिए प्रयोजन का ध्वनि दे नहीं पाया. किसी को इनमे प्रयोजन दिखता हो तो करते रहे!
इसके चलते, संयम में धारणा-ध्यान-समाधि के क्रम को उलटा किया; इस अपेक्षा में कि शायद इससे भिन्न कोई फल निकल आये. इन तीन स्थितियों को एकत्र करने से संयम तो होगा ही, यदि मैं इनका क्रम बदलता हूँ तो शायद इस प्रक्रिया का फल बदल जाए! क्या फल होगा, यह उस समय पता नहीं था.
इसको लेकर मैं चल दिया और मानव के पुण्य से मैं सफल हो गया. क्या सफल हुआ? मानव का अध्ययन हुआ, जीवन का अध्ययन हुआ, अस्तित्व का अध्ययन हुआ. पूरा अस्तित्व अध्ययन होने पर विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति सूत्रों का पता चला. इन चार सूत्रों में यह सारा अध्ययन समाता है. इन चार सूत्रों को फिर वांग्मय स्वरूप दिया. क्यों दिया? पहला - धरती बीमार हो गयी है, शायद इसको समझने में ही धरती की दवाई है. दूसरे - यह उपलब्धि मेरे अकेले की नहीं है, मानव जाति की उपलब्धि है. यह ठीक हुआ या नहीं हुआ - यह आगे विद्वान लोग तय करेंगे.
विगत से जो भी दर्शन उपलब्ध हैं वे रहस्य मूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन के स्वरूप में हैं. रहस्य में ही सारी बात किये हैं. रहस्य मानव का प्रमाण नहीं हो सकता. रहस्य के आधार पर कुछ लिखने के पक्ष में मैं पहले भी नहीं था. संयोग से यह देखने के बाद पता चला - अध्यव्सायिक विधि से समझ में आने वाली बात अभी तक बचा हुआ रहा है. सहअस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति का अध्ययन आवश्यक है. मानव को जागृति पूर्वक जीना है. पूरा दर्शन इस अर्थ में लिखा है. अध्ययन पूर्वक सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ दृष्टा पद में होते हैं, जिसको प्रमाणित करने के क्रम में जागृति होती है.
प्रश्न: आप जो समाधि-संयम पूर्वक अध्ययन किये, उसका स्वरूप क्या था? हम जो अभी कर रहे हैं, उससे वह कैसे भिन्न है?
उत्तर: आप कागज़ में अध्ययन करते हैं, मैंने प्रकृति में अध्ययन किया. अभी जैसे परमाणु, अणु या बैक्टीरिया को देखने के लिए आपको एक लेबोरेटरी चाहिए. इसके बिना आपको वह दीखता नहीं है. मैंने वही वस्तु को सीधा प्रकृति में देखा है - इसमें किसको क्या तकलीफ है? संयम की यही गरिमा है कि मैं इस तरह देख पाया. आप जो सूक्ष्मतम देखने के लिए उपकरणों को प्राप्त किये हैं - चाहे विद्युत् विधि से हो या रेडिएशन विधि से - वे सब मानव की ताकत की आन्शिकता में हैं. सभी लेबोरेटरी मानव के मनाकार का साकार स्वरूप है. मानव अभी अपनी पूर्ण क्षमता को कहीं भी नियोजित कर ही नहीं पाता, आंशिक भाग को ही नियोजित कर पाता है.
स्वयं में मानव का होना-रहना बना ही रहता है. होते-रहते हुए मानव अपनी ताकत को लगाता है. अस्तित्व सहज विधि से होते हुए, किसी विधि से रहते हुए - मानव अपनी जितनी भी मानसिकता को नियोजित करता है, उसी में कोई डिजाईन बनाता है. मनाकार को साकार करने में मानव पूरी तरह नियोजित हुआ नहीं है, बचा ही है.
मानव की सम्पूर्णता समाधान में ही व्यक्त होती है. समाधान ही सुख है, मानव धर्म है.
मानव जाति की सम्पूर्णता समाधान स्वरूप में ही व्यक्त होती है - एक दूसरे के साथ.
तकनीकी विधि से मानव अपनी ताकत का थोडा सा ही परिचय दे पाया है. नाश होने के भाग में मानव बहुत कुछ सुन चुका है, कर चुका है. बचने के बारे में सुन नहीं पा रहा है. नाश होने की घंटी तो बज ही रही है, अब उद्धार होने या बचने की घंटी को भी हिलाया जाए, बजाया जाए! ऐसा मैं कह रहा हूँ. इसको बदलना है तो बताओ!
प्रश्न: मानव ने भ्रमवश धरती को बहुत नुकसान पहुंचाया है. अब जिस गति से मानव जाति इस बात को समझ रही है, उसको देख कर लगता है - कहीं समझ में आने से पहले धरती का नाश ही न हो जाए! इसमें आपका क्या कहना है?
उत्तर: यह कल्पना तो आता ही है. आप कुछ अनुचित नहीं कह रहे हैं. बचने के लिए हम एक प्रयोग ही कर सकते हैं. हमारे पास जो समय शेष है उसमे हम अपराध मुक्त हो सकते हैं. यदि दूसरे ग्रह पर भी जाना है, तो कम से कम वहां जा कर तो अपराध नहीं करेंगे! दूसरे - यदि धरती में शक्तियां अभी भी शेष हैं, तो मानव के सुधरने पर उसके स्वस्थ होने का अवसर बन सकता है. ये दोनों संभावनाओं को लेकर इस दर्शन को प्रस्तुत किया है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अछोटी, २००८)
Sunday, October 15, 2017
विगत से इस प्रस्ताव को जोड़ने की बात को ख़त्म करो!
प्रश्न: गठनपूर्णता होते ही जीवन परमाणु को क्या कोई ज्ञान रहता है?
उत्तर: गठनपूर्णता के साथ ही जीवचेतना का ज्ञान जीवन को आ जाता है. जीवचेतना का ज्ञान है - वंशानुषंगीय विधि. जिससे वह आहार-निद्रा-भय-मैथुन कार्यकलाप का अनुकरण करता है.
प्रश्न: क्या जीव अपने प्रकटन के बाद कुछ नया "सीख" कर भिन्न आचरण नहीं कर सकते?
उत्तर: नहीं. उनमे वंशानुषंगीयता ही है. वंशानुषंगीयता है - शरीर के अनुसार जीवन का चलना. जीव वंशानुषंगीय विधि से जीना जानता है. सर्वप्रथम जो चिड़िया/तोता बना, आचरण को प्रस्तुत किया - वह आज तक वैसे ही चिड़िया/तोता जैसा आचरण करता है. सर्वप्रथम जो बन्दर बना, आचरण को प्रस्तुत किया - वह आज तक वैसे ही बन्दर जैसा आचरण करता है. वैसे ही हर जीव के साथ है.
जीवों में शरीर रचनाओं का क्रमिक रूप से प्रकटन हुआ. स्वेदज संसार अंडज को जोड़ा. अंडज संसार पिंडज को जोड़ा. पिंडज में मानव शरीर का प्रकटन हुआ. मानव शरीर ऐसा प्रकट हुआ कि मानव "चेतना" के सम्बन्ध में सोचने योग्य हुआ. इसी क्रम में चेतना में श्रेष्ठता के क्रम को सोचने योग्य भी हुआ. जीव चेतना से मानव चेतना श्रेष्ठ, मानव चेतना से देव चेतना श्रेष्ठ, देव चेतना से दिव्य चेतना श्रेष्ठ. जीव चेतना विधि से जीते हुए मानव ने सकल अपराध को वैध मान लिया.
मानव ने जब शुरू किया तो वंशानुषंगीय विधि से ही शुरू किया. समय के साथ उसका विचार शैली बदलता गया. विचार शैली बदलते-बदलते विचार में गुणात्मक परिवर्तन की आवश्यकता बनी. तब जा करके चेतना में श्रेष्ठता का क्रम को पहचानना बना.
प्रश्न: मानव ने जब से धरती पर शुरू किया, तब से अब तक उसने कई उपलब्धियां भी तो की हैं. उस से सम्बंधित बहुत कुछ ज्ञान मानव ने हासिल किया है. वंशानुषंगीय विधि से यह ज्ञान हमें प्राप्त होता नहीं है और हम लोग उसको सीखते-सिखाते हैं - इस ज्ञान को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: मानव ने अभी तक ये सब जो भी प्रयत्न किया वह शरीर के लिए उपयोगिता के अर्थ में किया, जीवन के लिए उपयोगिता के अर्थ में प्रयत्न नहीं किया. भौतिक-रासायनिक वस्तुओं से सम्बंधित ज्ञान की मैं यहाँ कोई बात नहीं कर रहा हूँ. वह सब शरीर के लिए आहार-निद्रा-भय-मैथुन के अर्थ में है. उसको वहीं सुरक्षित रखो! मैं जीवन ज्ञान की बात कर रहा हूँ, जिसके लिए "चेतना विकास" की बात है. जो हम "सीखते" हैं - वह कोई जीवन-ज्ञान नहीं है. अभी तक जो सीखते-सिखाते रहे उसमे "चेतना विकास" की बात नहीं है, वह सब भौतिक-रासायनिक संसार से सम्बंधित है - जो शरीर के लिए है. उसको एक तरफ रखके आप बात करो!
प्रश्न: चेतना विकास से सम्बंधित ज्ञान मानव को अभी किस स्वरूप में "प्राप्त" रहता है?
उत्तर: अनुमान स्वरूप में प्राप्त रहता है! अनुमान में रहता है, इसीलिये उसको मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना स्वीकार होता है. अनुमान में जो स्वीकार होता है, उसको व्यवहार में प्रमाणित करने तक अध्ययन है. अध्ययन से हम ज्ञान को अपना स्वत्व बनाते हैं. अध्ययन से जीवन संतुष्टि की बात है. वंशानुषंगीयता से शरीर संतुष्टि की बात है. जीवन संतुष्टि के लिए अध्ययन को हम धरती पर पहली बार प्रस्तावित किये हैं. उसमे आपका और हमारा tug of war चल रहा है!
जीवन को ज्ञान "प्राप्त" था, इसीलिये अनुभव हुआ. प्राप्त था, लेकिन अभ्यास नहीं था. परंपरा नहीं था. उसको अभ्यास में और परंपरा में डालने के लिए हम प्रस्ताव रखे हैं.
जीवन को ज्ञान "प्राप्त" था, तभी तो उसमे भास, आभास, प्रतीति होती है. जीवन सत्ता में संपृक्त रहता है - फलस्वरूप अनुमान में ज्ञान प्राप्त है, फिर अध्ययन के संयोग से भास-आभास-प्रतीति होती है. प्रतीत होने के पश्चात अनुभव होता है. अनुभव होने से प्रमाण होता है.
हर मनुष्य में कल्पनाशीलता है. जिससे शब्द के अर्थ में सहअस्तित्व में वस्तु का ज्ञान होता है - विकसित चेतना के रूप में. विकसित चेतना ही तीन भाग में है - मानव चेतना, देव चेतना, और दिव्य चेतना. जीव चेतना पहले से है ही - जिसमे शरीर के लिए सीखना, शरीर के लिए जीना, और शरीर के लिए ही मरना होता है. जीवन संतुष्टि के लिए चेतना विकास की बात है.
विगत से यह प्रस्ताव जुड़ता नहीं है. इस प्रस्ताव को विगत से जोड़ने की बात को ख़त्म करो!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०११, अछोटी)
उत्तर: गठनपूर्णता के साथ ही जीवचेतना का ज्ञान जीवन को आ जाता है. जीवचेतना का ज्ञान है - वंशानुषंगीय विधि. जिससे वह आहार-निद्रा-भय-मैथुन कार्यकलाप का अनुकरण करता है.
प्रश्न: क्या जीव अपने प्रकटन के बाद कुछ नया "सीख" कर भिन्न आचरण नहीं कर सकते?
उत्तर: नहीं. उनमे वंशानुषंगीयता ही है. वंशानुषंगीयता है - शरीर के अनुसार जीवन का चलना. जीव वंशानुषंगीय विधि से जीना जानता है. सर्वप्रथम जो चिड़िया/तोता बना, आचरण को प्रस्तुत किया - वह आज तक वैसे ही चिड़िया/तोता जैसा आचरण करता है. सर्वप्रथम जो बन्दर बना, आचरण को प्रस्तुत किया - वह आज तक वैसे ही बन्दर जैसा आचरण करता है. वैसे ही हर जीव के साथ है.
जीवों में शरीर रचनाओं का क्रमिक रूप से प्रकटन हुआ. स्वेदज संसार अंडज को जोड़ा. अंडज संसार पिंडज को जोड़ा. पिंडज में मानव शरीर का प्रकटन हुआ. मानव शरीर ऐसा प्रकट हुआ कि मानव "चेतना" के सम्बन्ध में सोचने योग्य हुआ. इसी क्रम में चेतना में श्रेष्ठता के क्रम को सोचने योग्य भी हुआ. जीव चेतना से मानव चेतना श्रेष्ठ, मानव चेतना से देव चेतना श्रेष्ठ, देव चेतना से दिव्य चेतना श्रेष्ठ. जीव चेतना विधि से जीते हुए मानव ने सकल अपराध को वैध मान लिया.
मानव ने जब शुरू किया तो वंशानुषंगीय विधि से ही शुरू किया. समय के साथ उसका विचार शैली बदलता गया. विचार शैली बदलते-बदलते विचार में गुणात्मक परिवर्तन की आवश्यकता बनी. तब जा करके चेतना में श्रेष्ठता का क्रम को पहचानना बना.
प्रश्न: मानव ने जब से धरती पर शुरू किया, तब से अब तक उसने कई उपलब्धियां भी तो की हैं. उस से सम्बंधित बहुत कुछ ज्ञान मानव ने हासिल किया है. वंशानुषंगीय विधि से यह ज्ञान हमें प्राप्त होता नहीं है और हम लोग उसको सीखते-सिखाते हैं - इस ज्ञान को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: मानव ने अभी तक ये सब जो भी प्रयत्न किया वह शरीर के लिए उपयोगिता के अर्थ में किया, जीवन के लिए उपयोगिता के अर्थ में प्रयत्न नहीं किया. भौतिक-रासायनिक वस्तुओं से सम्बंधित ज्ञान की मैं यहाँ कोई बात नहीं कर रहा हूँ. वह सब शरीर के लिए आहार-निद्रा-भय-मैथुन के अर्थ में है. उसको वहीं सुरक्षित रखो! मैं जीवन ज्ञान की बात कर रहा हूँ, जिसके लिए "चेतना विकास" की बात है. जो हम "सीखते" हैं - वह कोई जीवन-ज्ञान नहीं है. अभी तक जो सीखते-सिखाते रहे उसमे "चेतना विकास" की बात नहीं है, वह सब भौतिक-रासायनिक संसार से सम्बंधित है - जो शरीर के लिए है. उसको एक तरफ रखके आप बात करो!
प्रश्न: चेतना विकास से सम्बंधित ज्ञान मानव को अभी किस स्वरूप में "प्राप्त" रहता है?
उत्तर: अनुमान स्वरूप में प्राप्त रहता है! अनुमान में रहता है, इसीलिये उसको मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना स्वीकार होता है. अनुमान में जो स्वीकार होता है, उसको व्यवहार में प्रमाणित करने तक अध्ययन है. अध्ययन से हम ज्ञान को अपना स्वत्व बनाते हैं. अध्ययन से जीवन संतुष्टि की बात है. वंशानुषंगीयता से शरीर संतुष्टि की बात है. जीवन संतुष्टि के लिए अध्ययन को हम धरती पर पहली बार प्रस्तावित किये हैं. उसमे आपका और हमारा tug of war चल रहा है!
जीवन को ज्ञान "प्राप्त" था, इसीलिये अनुभव हुआ. प्राप्त था, लेकिन अभ्यास नहीं था. परंपरा नहीं था. उसको अभ्यास में और परंपरा में डालने के लिए हम प्रस्ताव रखे हैं.
जीवन को ज्ञान "प्राप्त" था, तभी तो उसमे भास, आभास, प्रतीति होती है. जीवन सत्ता में संपृक्त रहता है - फलस्वरूप अनुमान में ज्ञान प्राप्त है, फिर अध्ययन के संयोग से भास-आभास-प्रतीति होती है. प्रतीत होने के पश्चात अनुभव होता है. अनुभव होने से प्रमाण होता है.
हर मनुष्य में कल्पनाशीलता है. जिससे शब्द के अर्थ में सहअस्तित्व में वस्तु का ज्ञान होता है - विकसित चेतना के रूप में. विकसित चेतना ही तीन भाग में है - मानव चेतना, देव चेतना, और दिव्य चेतना. जीव चेतना पहले से है ही - जिसमे शरीर के लिए सीखना, शरीर के लिए जीना, और शरीर के लिए ही मरना होता है. जीवन संतुष्टि के लिए चेतना विकास की बात है.
विगत से यह प्रस्ताव जुड़ता नहीं है. इस प्रस्ताव को विगत से जोड़ने की बात को ख़त्म करो!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०११, अछोटी)
Wednesday, October 4, 2017
न्याय-सुरक्षा, संविधान, संप्रभुता
न्याय का केंद्र बिंदु है - उभय तृप्ति. न्याय को बनाए रखने के लिए 'सुरक्षा' है. अन्याय की दूर-दूर तक संभावना को दूर करने/रोकने के लिए सुरक्षा. अव्यवस्था या आकस्मिक दुर्घटना से बचाव के साथ चलने का नाम है -"सुरक्षा".
प्रश्न: आपने "मानवीय संविधान" जो प्रस्तुत किया है, उसका क्या आधार है?
उत्तर: मानवीय संविधान का मूल बिंदु है - मानवीयता पूर्ण आचरण. मानवीयता पूर्ण आचरण जागृति के आधार पर होता है. इस आचरण को हर देश-काल में प्रयोग करने की स्वतंत्रता ही मानवीय संविधान है.
वर्तमान में जो संविधान है वह "शक्ति केन्द्रित शासन" की व्याख्या करता है. शक्ति केन्द्रित शासन का अर्थ है - गलती को गलती से रोकना, अपराध को अपराध से रोकना, युद्ध को युद्ध से रोकना.
संविधान के लिए "संप्रभुता" को पहचानने की आवश्यकता होती है. (राज युग में) संप्रभुता को "जो गलती नहीं करता" के स्वरूप में पहचाना गया. ईश्वर गलती नहीं करता - इसलिए ईश्वर को संप्रभुता का आधार माना गया. फिर राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मान कर कहा - राजा गलती नहीं करता, और राजा को संप्रभुता का आधार माना गया. फिर गुरु गलती नहीं करता, कह कर गुरु को संप्रभुता का आधार माना गया.
गणतंत्र आने पर संप्रभुता को पहचानने की आवश्यकता हुई. तो कहा गया - वोटर के पास संप्रभुता है. वोटर गलती नहीं करता, ऐसा सोचा गया. वोटर के गलती नहीं करने की क्या गारंटी है? इसका नहीं में उत्तर मिलने पर सोचा गया - "वोटर वोट देते समय गलती नहीं करता". इस पर हमारे (भारत के) संविधान की "संप्रभुता" टिका हुआ है! संविधान में यह तय नहीं है कि राष्ट्रपति गलती नहीं कर सकता या प्रधानमंत्री गलती नहीं कर सकता.
मानवीय संविधान में कहा -
- प्रबोधन करने योग्य, प्रमाणित करने योग्य अधिकार सम्पन्नता ही प्रबुद्धता या समझदारी है.
- समझदारी को व्यवस्था में जी कर प्रमाणित करना संप्रभुता है. न्याय, समाधान और समृद्धि को प्रमाणित करना संप्रभुता है. मानव द्वारा व्यवस्था में जीना = मानवीयता पूर्ण आचरण
- मानवीयता पूर्ण आचरण को सर्व देश-काल में उपयोग करना सर्वमानव का मौलिक अधिकार है.
- मानव द्वारा अपने मौलिक अधिकार को प्रमाणित करना ही राज्य है.
हर व्यक्ति मानवीयता पूर्ण आचरण को अपने जीने में ला सकता है. हर व्यक्ति का संप्रभुता संपन्न व्यक्तित्व हो सकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी आश्रम)
Saturday, September 30, 2017
समय. काल, वर्तमान
प्रश्न: "समय" या "काल" वास्तव में क्या है? एक तो हम घड़ी में जो टाइम देखते हैं उसको हम समय कहते हैं. शास्त्रों में काल भगवान के बारे में लिखा है. इसकी वास्तविकता क्या है?
उत्तर: काल को पहचानने की अभीप्सा मानव में रहा ही है. काल सही मायनों में नित्य वर्तमान स्वरूपी अस्तित्व ही है. क्रिया की अवधि में काल-खंड की पहचान है. शास्त्रों में जो लिखा है "कालो जगत भक्षकः" - ऐसा कुछ नहीं है.
प्रश्न: काल-खंड की पहचान मनुष्य द्वारा कैसे की गयी?
उत्तर: मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए काल-खण्डों को पहचाना. दूसरे ज्योतिषियों को काल-खंड को पहचानने की आवश्यकता निर्मित हुई. ज्योतिषियों ने क्रिया की अवधि को 'काल' के रूप में पहचाना. अर्ध-सूर्योदय से अर्ध-सूर्योदय तक धरती की (घूर्णन) क्रिया को उन्होंने 'एक दिन' नाम दिया. 'उदयात उदयम दिनम' - यह लिखा. फिर एक दिन को २४ घंटों में भाग किया, एक घंटे को ६० मिनट भाग किया, एक मिनट को ६० सेकंड भाग किया, इस तरह ले गए. किन्तु 'दिन' की परिकल्पना को उन्होंने बनाए रखा.
विज्ञान आने पर उन्होंने काल की परिकल्पना को धरती की क्रिया से अलग कर दिया. काल-खंड का विभाजन करते चले गए, विखंडित करते करते कालखंड को इतना छोटा कर दिया कि वर्तमान है ही नहीं बता दिया. काल को गणितीय संख्या मान लिया. इस तरह गणितीय विधि से वर्तमान को शून्य कर दिया. जबकि अस्तित्व वर्तमान ही है.
प्रश्न: काल या वर्तमान का क्या स्वरूप है?
उत्तर: काल को पहचानने के लिए वर्तमान को पहचानना होगा. मात्रा और क्रिया के संयुक्त रूप में वर्तमान है. वर्तने के मूल में मात्रा होता ही है. वर्तना = स्थिति-गति. हरेक मात्रा के साथ स्थिति-गति बनी रहती है. चाहे इकाई का कितना भी परिवर्तन हो, परिणाम हो, विकास हो या ह्रास हो - इकाई की स्थिति-गति बनी ही रहती है. यह वर्तमान का स्वरूप है. निरंतर मात्रा सहित स्थिति-गति में होना ही वर्तमान है. कोई ऐसा मात्रा नहीं है जो स्थिति-गति के रूप में वर्तमान न हो.
प्रश्न: काल-खंड की गणना की तो व्यवहारिक उपयोगिता है. गणितीय विधि से काल को पहचानने में क्या परेशानी है?
उत्तर: यदि हम काल का आधार दिन से दिन तक मानते हैं, तो उसका आधार धरती की घूर्णन क्रिया है जो निरंतर है. उसके बाद दिन के खंड-खंड करते करते छोटे से छोटे टुकड़े तक पहुँच जाते हैं, क्रिया को भूल जाते हैं और गणित को पकड़ लेते हैं तो वह वस्तुविहीन काल हो जाता है, वर्तमान नहीं रह जाता है. वस्तु विहीन काल को ही हम कहते हैं - वर्तमान को शून्य कर दिया. इस तरह गणित के अनुसार चलते हुए हम वस्तु विहीन जगह में पहुँच जाते हैं. इस तरह गणित कोई बहुत भारी सत्य की गणना करता है - ऐसा मेरा नहीं कहना है. गणित वस्तुओं की गणना करने के लिए उपयुक्त है. वांछित काल की गणना करने के लिए गणित उपयुक्त है. एक दिन, दो दिन, दस दिन, १०० वर्ष... इस तरह की गणना गणित कर सकता है. काल की गणना गणित नहीं कर सकता. काल की परिकल्पना मानव के पास है.
यदि हम काल की गणना करना भी चाहें तो भी क्रिया तो निरंतर रहता ही है. जैसे - यह धरती ठोस है. दूसरा धरती ठोस नहीं है. कालान्तर में वह ठोस होता है. ठोस होने पर भी वह वर्तमान की रेखा में ही होता है. वर्तमान की रेखा को छोड़ करके वह ठोस हो जाए - ऐसा कोई तरीका नहीं है. वर्तमान अभी भी है, कल भी है, उसके आगे भी है. वर्तमान की निरंतरता है. इसी तरह सारे परिणाम वर्तमान की रेखा में ही हैं. अस्तित्व न घटता है, न बढ़ता है - इस आधार पर वर्तमान निरंतर है.
प्रश्न: रासायनिक-भौतिक परिणितियां होने से हमको विगत और भविष्य का भास होता है, इस तरह हम भूतकाल और भविष्य काल को पहचानते हैं. क्या रासायनिक-भौतिक परिणितियां होने से वर्तमान में कोई अंतर नहीं आता?
उत्तर: क्रियाएं परिणित हो कर दूसरी क्रियाओं के रूप में ही होते हैं. परिणिति से मात्रा का अभाव नहीं हो जाता. जैसे - लोहा परिणित हो कर मिट्टी हो गया, तो मिट्टी का वर्तमान है ही. मिट्टी परिणित हो कर पत्थर हो गया, तो पत्थर का वर्तमान है ही. पत्थर परिणित हो कर मणि हो गया, तो मणि का वर्तमान है ही. मणि परिणित हो कर धातु हो गया, तो धातु का वर्तमान है ही. वर्तमान कभी भी समाप्त नहीं होता.
एक समय ठोस रूप में वर्तमान है, दुसरे समय विरल रूप में वर्तमान है - वर्तमान कहाँ पीछे छुटा? वर्तमान कहाँ पीछे छूट सकता है? वस्तु का तिरोभाव होता ही नहीं है. भौतिक संसार और रासायनिक संसार में परिणितियां होती ही हैं. ये दोनों परिणामवादी हैं ही. इसी परिणामवादी भौतिक-रासायनिक संसार को ही जड़ प्रकृति कहते हैं.
परिणित होने के बाद भी वस्तु दुसरे स्वरूप में कार्य करता ही रहता है. कार्य मुक्ति वस्तु का कभी होता ही नहीं है. मात्रा का वर्तने का काम नित्य है - परिणित हो या यथास्थिति में हो. कई वस्तुएं लम्बे समय तक यथास्थिति में रहते हैं, तो कई शीघ्र परिणाम को भी प्राप्त कर लेते हैं. इसी क्रम में जीवन अपरिणामी हो जाता है. जीवन के साथ परिणाम का सम्बन्ध छूट जाता है. जीवन में गुणात्मक विकास होता है, जबकि भौतिक-रासायनिक संसार में मात्रात्मक विकास और ह्रास होता है. भौतिक-रासायनिक संसार में विकास और ह्रास की गणना को ही 'परिणाम' कहते हैं.
परिणाम को यदि हम काल का आधार बनाने जाते हैं तो हम फंस जाते हैं. काल का कोई निश्चित स्वरूप उससे नहीं बनता.
प्रश्न: परिणाम से मुक्त वस्तु को क्या "काल" को पहचानने का आधार बनाया जा सकता है?
उत्तर: जीवन परिणाम से मुक्त है. मानव जीवन ही काल को नित्य वर्तमान स्वरूप में अनुभव करता है. जीवन के लिए तो कालखंड होता नहीं है. शरीर चलाओ या न चलाओ, जीवन तो रहता ही है. जीवन में परिणितियां होती ही नहीं हैं, उसमे काल का बाधा होता नहीं है. काल की बाधा से मुक्त होने के साथ-साथ और भी बहुत सी बाधाओं से जीवन मुक्त है. रासायनिक-भौतिक रचना (शरीर) की पुष्टि या असहयोग की बाधा से भी जीवन मुक्त है. शरीर को छोड़ करके भी जीवन रहता ही है. जीवन शरीर के साथ भी वैसे ही रहता है, शरीर के बाद भी वैसे ही रहता है. इस आधार पर जीवन की निरंतरता है ही. जीवन में गुणात्मक परिवर्तन (चेतना विकास) की बात हम प्रस्तुत किये. जीवों में जीवन के कुछ गुण प्रमाणित हुए, मनुष्य में कुछ गुण अभी तक प्रमाणित हुए, इसके आगे और गुणों को प्रमाणित होने की आवश्यकता है - जिसे हम 'जागृति' नाम दे रहे हैं. जीवन की यथास्थिति जागृति की हो तो उसकी निरंतरता सुखद होगी, सुंदर होगी, सौभाग्यमय होगी - यह हम अपने अनुभव और परिकल्पना में जोड़ कर चल रहे हैं.
इस तरह काल की सही व्याख्या वर्तमान ही है. हर परिणाम की यथास्थिति वर्तमान की रेखा में ही है. इस तरह वर्तमान की निरंतरता को हम अच्छी तरह से स्वीकार सकते हैं.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी)
Thursday, September 28, 2017
इतिहास - मध्यस्थ दर्शन के दृष्टिकोण से
प्रश्न: इतिहास के बारे में आपका क्या दृष्टिकोण है? क्या इतिहास से हम कुछ सबक ले सकते हैं? इतिहास का सही स्वरूप क्या है?
उत्तर: अभी तक मानव परंपरा कैसा गुजरा, उसकी समीक्षा को स्मरण करने की विधि इतिहास है. जो बीत चुका है उसको स्मरण में लाने की विधि इतिहास है. इस इतिहास के अनेक आयाम हैं. जैसे - आर्थिक विधा में हज़ार साल पहले मानव क्या समझा और किया? राज्य को कैसे समझा? हज़ार साल पहले किसको 'न्यायिक संविधान' समझा? उस समय अलंकार का क्या स्वरूप होता था? कैसे नाचता रहा, गाता रहा, भाषा का प्रयोग करता रहा?
अभी इतिहास में केवल मार-काट किसने, कब और कैसे किया - यही याद करते हैं. देवासुर संग्राम की कथाएँ तो शुरुआत से ही लिखी हैं. वैदिक ऋचाओं में भी इनको बढ़िया से लिखा हुआ है. किसने, कैसे, किसको मारा-काटा. इससे हम क्या सीखें? क्या समझें? "मानव इतिहास" के लिए कोई प्रस्तुति यहाँ से मिलता नहीं है.
मेरे अनुसार अभी तक "मानव" का इतिहास शुरू ही नहीं हुआ है. सम्मानजनक भाषा प्रयोग करें तो यही कहना बनता है. अमानवीयता के इतिहास को यदि आप मानव का इतिहास कहना चाहें तो हमको इसमें कोई तकलीफ नहीं है. एक नारियल उसमे मैं भी चढ़ा दूंगा!
मानवीयता का इतिहास इस धरती पर अभी तक शुरू नहीं हुआ है - यह तो बात सही है. राक्षस मानव और पशु मानव के इतिहास को पढ़ करके कोई "मानव" तो होने वाला नहीं है.
अभी तक के घटना-क्रम से सार्थक यही है - उन्होंने मानव शरीर परंपरा को बनाए रखा. अध्यात्मवाद ने हमको अच्छी भाषा/शब्दों को दिया, उसके लिए भी हम उनके कृतज्ञ हैं. व्यापक कोई वस्तु होता है, यह सूचना दिया है. देवी-देवता श्रेष्ठ होते हैं - यह सूचना दिया है. तीसरे, मानव सदा से शुभ चाहते रहे - इसके लिए हम कृतज्ञ हैं.
प्रश्न: तो क्या हम इतिहास को पढ़ाना बंद कर दें?
उत्तर: नहीं, ऐसा कुछ नहीं कहा है मैंने. हम पढ़ाएंगे - जंगल युग से पाषाण युग, पाषाण युग से धातु युग, धातु युग से कबीला युग, कबीला युग से ग्राम युग तक मानव किस बात को समझदारी (ज्ञान) मानता रहा? उस समझदारी को आर्थिक आयाम में उसने कैसे प्रयोग किया? मानव-मानव के बीच व्यवहार में कैसे प्रयोग किया? जंगल-ज़मीन के साथ अपनी शक्तियों को कैसे उपयोग किया? और उसका परिणाम क्या निकला? इसी के अंतर्गत राज्य, संस्कृति, कला, अलंकार आदि आ जाता है. उसके बाद राज युग में क्या आश्वासन मिला, यह आश्वासन कितना सार्थक हुआ? युद्ध और मार-काट को हम नहीं पढ़ायेंगे. हम यह पढ़ाएंगे - जंगल युग से राज युग तक प्रगति की क्या कड़ियाँ बनी? राक्षस मानव और पशु मानव के संघर्ष में मानव कैसा परेशान हुआ? यहाँ से आज मानवीयता के इतिहास को शुरू करने तक कैसे आ गया? यह हम पढ़ाएंगे.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी)
Wednesday, September 6, 2017
श्रम-गति-परिणाम
सत्ता मूल ताकत है. जो सभी वस्तुओं में पारगामी है. सत्ता में भीगे होने के आधार पर हर वस्तु बल संपन्न है और कार्यशील होने के लिए प्रवृत्त है. कार्यशील होने के लिए वस्तु में आकर्षण और प्रत्याकर्षण का योग होना आवश्यक है.
परमाणु में क्रिया का मतलब ही श्रम-गति-परिणाम है. श्रम-गति-परिणाम पूर्वक प्रत्येक परमाणु में आकर्षण-प्रत्याकर्षण के योगफल में उत्सव होता ही रहता है. हर इकाई के अंग-अवयवों के बीच ऐसा आकर्षण-प्रत्याकर्षण होता ही रहता है. जैसे - आपके शरीर में आँख के साथ हाथ, हाथ के साथ पाँव - इनके बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक ही उनकी कार्य गति है. जबकि आपका शरीर एक ही है. उसी तरह परमाणु एक ही है, पर उसमें श्रम, गति और परिणाम - ये तीनो उसकी क्रिया की व्याख़्या करते हैं. श्रम और गति के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने पर कार्य-गति का स्वरूप (परिणाम) बनता है. गति और परिणाम के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने से कार्य-गति का स्वरूप (श्रम) बनता है. श्रम और परिणाम के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने से कार्य-गति का स्वरूप (गति) बनता है. क्रिया नित्य अभिव्यक्ति है, नित्य प्रकाशमान है - यह कहीं रुकता ही नहीं है. इसकी रुकी हुई जगह को कहीं/कभी पहचाना नहीं जा सकता। यह निरंतर है. परस्परता में ही गति की बात है. परस्परता नहीं तो गति की कोई बात ही नहीं हो सकती। विकासशील परमाणुओं में कम से कम दो अंशों का गठन है, जिनमे आकर्षण-प्रत्याकर्षण और उसके फलन में कम्पनात्मक गति और वर्तुलात्मक गति बना ही रहता है. कम्पनात्मक गति और वर्तुलात्मक गति परमाणु की कार्यशीलता का ही स्वरूप है. हर परमाणु कार्यरत है - ऊर्जा सम्पन्नता वश, बल सम्पन्नता वश, चुम्बकीय बल सम्पन्नता वश. परमाणु में क्रियाशीलता के लिए स्वयं में ही प्रेरणा-विधि और कार्य-विधि बनी है. जड़ परमाणुओं में श्रमशीलता भी है, गतिशीलता भी है, परिणामशीलता भी है. ये तीनो - श्रमशीलता, गतिशीलता, परिणामशीलता - एक दूसरे के लिए प्रेरक हैं.
मात्रा (इकाई) की पहचान क्रिया सहित ही है. क्रिया के बिना मात्रा की पहचान नहीं है. कुछ भी निष्क्रिय मात्रा आप नहीं पाओगे. क्रिया का व्याख्या जड़ संसार में श्रम-गति-परिणाम है. चैतन्य संसार में भ्रम और जागृति स्वरूप में क्रिया है. श्रम, गति, परिणाम स्वरूप में जड़-क्रिया और भ्रम-जागृति स्वरूप में चैतन्य क्रिया है. और कुछ होता नहीं। इस अनंत संसार की सम्पूर्ण क्रिया मूलतः इतना ही है.
क्रिया ऊर्जा-सम्पन्नता वश है. सत्ता ऊर्जा है. सत्ता पारगामी है. सत्ता को अवरोध करने वाली एक भी वस्तु नहीं है. पहले इस सत्य को अपनी अवधारणा में लाओ. क्रिया एक-एक इकाइयों के रूप में है. एक-एक होने से आशय है, उसके सभी ओर सत्ता है. प्रत्येक एक के सभी ओर सत्ता का होना ही 'सीमा' है. हरेक एक सीमित रूप में रचित है. इकाई के सभी ओर सत्ता का होना ही उस इकाई की नियंत्रण रेखा है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी आश्रम, सितम्बर १९९९)
Monday, August 7, 2017
जाँचने का मतलब
अध्ययन कराने वाला "प्रवर्तनशील" होता है. प्रवर्तनशीलता = मनुष्य की प्रवृत्ति को ध्यानाकर्षण करना। अध्ययन जो करा रहा है उसको सही "मान" करके आप अध्ययन शुरू करते हैं. वह ज्ञान, विवेक, विज्ञान को लेकर जो प्रस्तावित करता है, उसको जाँचा जाए. जाँचने के क्रम में कुछ समझ नहीं आता है तो उसको प्रवर्तनशील व्यक्ति समझाने की ताकत रखता है. उसको स्पष्ट कर लिया जाए. जाँचने के बाद यदि कुछ गलत निकलता है तो उस पर चर्चा या परामर्श हो सकता है.
"सत्य यही है" - आपको मेरा ऐसा कहना अजीब लग सकता है, क्योंकि आपका अब तक ऐसा सुनने का अभ्यास नहीं है.
प्रश्न: ज्ञान को जाँचने से आपका क्या आशय है?
उत्तर: ज्ञान से प्रयोजन पूरा होता है या नहीं - जाँचने का मतलब यही है. प्रयोजन है - अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था। पहले यह सोचिये कि अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था चाहिए या नहीं चाहिए? फिर यह सोचिये कि उसके लिए यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है या नहीं? अध्ययन पूर्वक हम इस जगह पर आ जाते हैं कि यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है. यदि इस जगह नहीं आ पाते हैं तो इस प्रस्ताव के अनुसार कोई नहीं चलेगा। हम बात करते ही रह जाएंगे युगों तक! अध्ययन में पूर्णतया तत्पर होना ही होगा।
मूल से फल और फल से मूल तक जाँचा जाए. मूल ज्ञान है. फल व्यवस्था है. इन दोनों के साथ तालमेल बनता है या नहीं - इसको जाँचा जाए. जाँचने का अधिकार हर मानव में कल्पनाशीलता स्वरूप में रखा है. मूल तक जाने के लिए अध्ययन है. फल तक जाने के लिए व्यवहाराभ्यास और कर्माभ्यास है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अछोटी)
"सत्य यही है" - आपको मेरा ऐसा कहना अजीब लग सकता है, क्योंकि आपका अब तक ऐसा सुनने का अभ्यास नहीं है.
प्रश्न: ज्ञान को जाँचने से आपका क्या आशय है?
उत्तर: ज्ञान से प्रयोजन पूरा होता है या नहीं - जाँचने का मतलब यही है. प्रयोजन है - अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था। पहले यह सोचिये कि अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था चाहिए या नहीं चाहिए? फिर यह सोचिये कि उसके लिए यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है या नहीं? अध्ययन पूर्वक हम इस जगह पर आ जाते हैं कि यह प्रस्ताव पूरा पड़ता है. यदि इस जगह नहीं आ पाते हैं तो इस प्रस्ताव के अनुसार कोई नहीं चलेगा। हम बात करते ही रह जाएंगे युगों तक! अध्ययन में पूर्णतया तत्पर होना ही होगा।
मूल से फल और फल से मूल तक जाँचा जाए. मूल ज्ञान है. फल व्यवस्था है. इन दोनों के साथ तालमेल बनता है या नहीं - इसको जाँचा जाए. जाँचने का अधिकार हर मानव में कल्पनाशीलता स्वरूप में रखा है. मूल तक जाने के लिए अध्ययन है. फल तक जाने के लिए व्यवहाराभ्यास और कर्माभ्यास है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मई २००७, अछोटी)
Tuesday, July 4, 2017
जानने का प्रमाण ही मानना है.
अनुभव की रौशनी और स्मरण - इन दोनों के बीच में वस्तु-बोध होता है. इसी का नाम अध्ययन है.
मानव के करने, सोचने, बोलने और प्रमाणित करने में उसके तृप्त होने की स्थिति का नाम अनुभव है.
हम जो बोध किये और जो प्रमाणित किये इन दोनों में तृप्ति को पाना ही समाधान है.
कारण के अनुसार कार्य और कार्य के अनुसार कारण हो जाना तृप्ति है, वही समाधान है.
कार्य और कारण की परस्पर तृप्ति, विचार और कार्य की परापर तृप्ति, विचार और निर्णय की परस्पर तृप्ति, पाए हुए ज्ञान और उसके वितरण में तृप्ति - (अनुभव मूलक विधि से) ये तृप्तियाँ मिलती रहती हैं, इस तरह मानव के निरंतर तृप्ति का रास्ता बना हुआ है. जबकि भ्रमवश हम अतृप्ति को अपने जीने का घर बना लिए हैं.
जीवन के दो अवयवों के बीच जो संगीत होता है, वही तृप्ति है.
जानना मानने के अनुसार हो, मानना जानने के अनुसार हो - वह तृप्ति है. दूसरे - जानना मानने का विरोध न करे और मानना जानने का विरोध न करे - वह तृप्ति है.
जानने वाला भाग मानने वाले भाग को स्वीकार रहा है और मानने में जानना स्वीकार हो रहा है - यह तृप्ति बिंदु अनुभव है. इसी तरह मानने और पहचानने में तृप्ति, पहचानने और निर्वाह करने में तृप्ति.
जो जाने-माने हैं उसी को हम पहचानने-निर्वाह करने में हम प्रमाणित करते हैं.
जानने की वस्तु है - सहअस्तित्व, विकास क्रम, विकास, जागृतिक्रम और जागृति. जो हमने जाना उसको प्रमाणित करने के तरीके के साथ ही उसको 'मानना' होता है. जानने और मानने के तृप्ति-बिंदु तक पहुँचते हैं तो हम प्रमाणित करने में सफल हो जाते हैं.
जानने की प्रक्रिया है अध्ययन. अध्ययन करने के क्रम में हम इस स्थिति में आ जाते हैं कि "मैं प्रमाणित कर सकता हूँ" - तब हम "मान" लिए.
प्रश्न: "जानने" और "मानने" की बीच क्या दूरी है?
उत्तर: जानने और मानने के बीच दूरी हमारी बेवकूफी ही है! यदि दूरी है तो जाने ही नहीं है. जानने का प्रमाण ही मानना है. यह आज के बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोगों पर बड़ा प्रहार लग सकता है.
जानने का प्रमाण मानना है. मानने का प्रमाण पहचानना है. पहचानने का प्रमाण निर्वाह करना है. निर्वाह करने का प्रमाण में प्रमाण को पुनः जानना है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९७)
Sunday, June 25, 2017
साथी-सहयोगी सम्बन्ध में न्याय
प्रश्न: हम इस दर्शन के अध्ययन-अभ्यास क्रम में समृद्धि को प्रमाणित करने के प्रयास में कृषि कार्य कर रहे हैं. हमारे सहयोग के लिए कुछ लोग आते हैं, जिनको हम यहाँ के अभी के रेट के अनुसार पारिश्रमिक देते हैं. हमको कई बार लगता है वह उनके लिए बहुत कम है. तो क्या करें?
उत्तर: आपको लगता है कम दे रहे हैं, तो ज्यादा दे दो! यही उसका उत्तर है.
प्रश्न: पर ज्यादा देने की भी हमारी हैसियत नहीं है... फिर क्या करें?
उत्तर: यदि नहीं दे सकते हैं तो ऐसे मान कर शुरू करें, अभी जो मान्यता है उसके अनुसार हम देंगे. अभी परंपरा में जितना देते हैं उससे थोड़ा ज्यादा, अपनी हैसियत के अनुसार, दे दिया और संतुष्टि पा लिया - ऐसे चल सकते हैं. आगे उनके समझदार होने पर उनके साथ समानता और भागीदारी करेंगे.
प्रश्न: क्या हम सहयोग न लें?
उत्तर: सहयोग न लें यह कौन कहता है? जैसे आपके यहाँ जोतना, बोना और काटने का काम है. सरकार ने मानो १०० रुपया रोजी तय किया है - उसके अनुसार हमने उनको दे दिया.
मैं भी १९५० से अपने उत्पादन कार्य में सहयोग लेता रहा हूँ. मैंने यह देखा है - १९५० में एक आदमी एक दिन में जितना काम करता था आज उसका दस प्रतिशत भी काम नहीं करता. जबकि पैसा बढ़ा है. उसके बावजूद मैं अपने विवेक से इसको संतुलित बना कर चलता हूँ.
प्रश्न: एक व्यापारी भी तो अपने काम के लिए सहयोगियों को रखता है, और उनको बाज़ार के रेट के अनुसार मेहनताना देता है. तो हममे और उस व्यापारी में फर्क क्या हुआ?
उत्तर: व्यापारी केवल उनसे अपने लाभ के लिए काम निकालता है. हमारा सहयोगी के साथ जुड़ाव उसको समझदार बनाने, या उपकार करने तक है. सहयोगी के समझदार होने पर ही उत्पादन कार्य के फल में उनके साथ भागीदारी का सुख मिलेगा, उससे पहले नहीं.
प्रश्न: यदि उनका समझदारी की तरफ कोई रुझान नहीं हो तो?
उत्तर: तो उनके साथ अभी जो परंपरा में है उसके अनुसार चलना होगा. दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है.
हमारे घर पर भी एक लड़का सेवा करता था. कुछ समय हमारे साथ रहने के बाद वही लड़का समझने की इच्छा हमसे व्यक्त किया. उसकी हमने व्यवस्था कर दिया.
प्रश्न: परंपरा के अनुसार ही उनको देने से हमको जो असंतुष्टि होती है, उसका क्या?
उत्तर: अपनी संतुष्टि के अनुसार उनको उससे थोडा ज्यादा दे दिया, जैसे - त्योहारों पर, उत्सव पर आदि.
ज्ञान विधि से जिनका हम सहयोग लेते हैं उनके श्रम का मूल्यांकन करते हैं, यह आ पाता है तो हमे उस सम्बन्ध में संतुष्टि होता है. यह नहीं आ पाता है तो संतुष्टि नहीं होता.
समझदार होने पर ही सहयोगी को संतुष्टि होगा, उससे पहले नहीं. समझदारी होने पर उपयोगिता के आधार पर प्रतिफल और उससे संतुष्टि होता है.
साथी-सहयोगी सम्बन्ध में सफल होना समानता में ही है. समझदारी में ही समानता होती है, भौतिक वस्तुओं में समानता होती नहीं है.
इसमें मूल मुद्दा है - साथी और सहयोगी दोनों को समझदार बनना. दूसरे - सहयोगी द्वारा अपने श्रम का मूल्यांकन स्वयं करना, साथी द्वारा भी वह मूल्यांकन होना, दोनों मूल्यांकन में साम्यता होना, फलन में उभय तृप्ति होना.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २००८, भोपाल)
उत्तर: आपको लगता है कम दे रहे हैं, तो ज्यादा दे दो! यही उसका उत्तर है.
प्रश्न: पर ज्यादा देने की भी हमारी हैसियत नहीं है... फिर क्या करें?
उत्तर: यदि नहीं दे सकते हैं तो ऐसे मान कर शुरू करें, अभी जो मान्यता है उसके अनुसार हम देंगे. अभी परंपरा में जितना देते हैं उससे थोड़ा ज्यादा, अपनी हैसियत के अनुसार, दे दिया और संतुष्टि पा लिया - ऐसे चल सकते हैं. आगे उनके समझदार होने पर उनके साथ समानता और भागीदारी करेंगे.
प्रश्न: क्या हम सहयोग न लें?
उत्तर: सहयोग न लें यह कौन कहता है? जैसे आपके यहाँ जोतना, बोना और काटने का काम है. सरकार ने मानो १०० रुपया रोजी तय किया है - उसके अनुसार हमने उनको दे दिया.
मैं भी १९५० से अपने उत्पादन कार्य में सहयोग लेता रहा हूँ. मैंने यह देखा है - १९५० में एक आदमी एक दिन में जितना काम करता था आज उसका दस प्रतिशत भी काम नहीं करता. जबकि पैसा बढ़ा है. उसके बावजूद मैं अपने विवेक से इसको संतुलित बना कर चलता हूँ.
प्रश्न: एक व्यापारी भी तो अपने काम के लिए सहयोगियों को रखता है, और उनको बाज़ार के रेट के अनुसार मेहनताना देता है. तो हममे और उस व्यापारी में फर्क क्या हुआ?
उत्तर: व्यापारी केवल उनसे अपने लाभ के लिए काम निकालता है. हमारा सहयोगी के साथ जुड़ाव उसको समझदार बनाने, या उपकार करने तक है. सहयोगी के समझदार होने पर ही उत्पादन कार्य के फल में उनके साथ भागीदारी का सुख मिलेगा, उससे पहले नहीं.
प्रश्न: यदि उनका समझदारी की तरफ कोई रुझान नहीं हो तो?
उत्तर: तो उनके साथ अभी जो परंपरा में है उसके अनुसार चलना होगा. दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है.
हमारे घर पर भी एक लड़का सेवा करता था. कुछ समय हमारे साथ रहने के बाद वही लड़का समझने की इच्छा हमसे व्यक्त किया. उसकी हमने व्यवस्था कर दिया.
प्रश्न: परंपरा के अनुसार ही उनको देने से हमको जो असंतुष्टि होती है, उसका क्या?
उत्तर: अपनी संतुष्टि के अनुसार उनको उससे थोडा ज्यादा दे दिया, जैसे - त्योहारों पर, उत्सव पर आदि.
ज्ञान विधि से जिनका हम सहयोग लेते हैं उनके श्रम का मूल्यांकन करते हैं, यह आ पाता है तो हमे उस सम्बन्ध में संतुष्टि होता है. यह नहीं आ पाता है तो संतुष्टि नहीं होता.
समझदार होने पर ही सहयोगी को संतुष्टि होगा, उससे पहले नहीं. समझदारी होने पर उपयोगिता के आधार पर प्रतिफल और उससे संतुष्टि होता है.
साथी-सहयोगी सम्बन्ध में सफल होना समानता में ही है. समझदारी में ही समानता होती है, भौतिक वस्तुओं में समानता होती नहीं है.
इसमें मूल मुद्दा है - साथी और सहयोगी दोनों को समझदार बनना. दूसरे - सहयोगी द्वारा अपने श्रम का मूल्यांकन स्वयं करना, साथी द्वारा भी वह मूल्यांकन होना, दोनों मूल्यांकन में साम्यता होना, फलन में उभय तृप्ति होना.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २००८, भोपाल)
Friday, June 16, 2017
अध्ययन के लिए गति
प्रश्न: हम अपने अध्ययन को गति देने के लिए क्या करें?
उत्तर: अध्ययन में रुचि पैदा हो जाए तो अध्ययन के लिए गति बनेगी। हमारी निष्ठा हमारी इच्छा या रुचि या प्राथमिकता पर निर्भर है. जिस बात को हम प्राथमिक मानते हैं उसमें हमारी पूरी निष्ठा रहती है. इच्छा के तीन स्तर हैं - कारण इच्छा, सूक्ष्म इच्छा और तीव्र इच्छा। इन तीनों स्तरों में से किसी स्तर पर हमारी अध्ययन करने की इच्छा भी है. जो बात तीव्र इच्छा के स्तर पर आ जाती है, फिर उसको करना ही होता है - और कोई रास्ता नहीं है. अध्ययन के लिए तीव्र इच्छा बनने के लिए अपनी 'उपयोगिता' को पहचानने की आवश्यकता है. हम जब स्वयं "उपयोगी" हो जाते हैं तो हमारा "उपकार" करना बनता ही है. हम स्वयं उपयोगी नहीं हैं तो हम उपकार कैसे करेंगे?
अभी आपके सामने पूरा वांग्मय है और इस वांग्मय को प्रस्तुत करने वाला जीता-जागता आदमी मौजूद है - इस नसीब को ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग किया जाए. अपनी जिज्ञासा को स्पष्ट पहचाना जाए. जो बात आपको स्पष्ट नहीं हुआ है, उसको मुझ से समझ लिया जाए.
मैं जो जीता हूँ, उसमे कोई समस्या नहीं है. मेरे जीने के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े भाग में समाधान ही है. मेरी सभी करतूत से समाधान ही मिलता है, समस्या मिलता ही नहीं है. सभी मोड़ मुद्दे पर समाधान मिलता है तो सुखी होने के अलावा और क्या होगा? उसी तरह सबको जीना है.
प्रश्न: कैसे पता करें कि हमे इस प्रस्ताव को लेकर क्या स्पष्ट नहीं है?
उत्तर: मानव के जीने के चार आयाम हैं - (१) आचरण, (२) संविधान (विधि), (३) शिक्षा, (४) व्यवस्था। जो बात इन चारों आयामों में समाधान प्रस्तुत करे उसको सर्वमानव के लिए सही माना जाए. इन चारों आयामों में इस प्रस्ताव के अनुसार समाधान का सूत्र-व्याख्या हुआ या नहीं, इसको आजमाना। आजमाने का मतलब है - हम दूसरे को समझाने में सफल हुए या नहीं? यही स्वयं को आजमाना है. इस आजमाने से पता लगेगा क्या स्पष्ट है, क्या स्पष्ट नहीं है.
प्रश्न: अपनी निष्ठा का कैसे मूल्याँकन करें?
उत्तर: इस प्रस्ताव पर सोच-विचार के बाद जो योजना बनती है, उसको क्रियान्वयन करने के लिए हम क्या किये, कितना किये, यही कर रहे हैं या और कुछ भी कर रहे हैं - इसके आधार पर अपनी निष्ठा का मूल्यांकन है.
प्रश्न: "अनुभव के लिए तीव्र इच्छा" का क्या मतलब है?
उत्तर: इसका मतलब है - अनुभव मूलक विधि से ही हम पार पायेंगे, दूसरा कोई रास्ता नहीं है. अनुभवगामी पद्दति में तर्क कुछ दूर तक उपयोगी है, पर तर्क बोध और अनुभव तक पहुंचेगा - ऐसा नहीं है. बोध और अनुभव अपने में होने वाला निर्धारण ही है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, भोपाल)
उत्तर: अध्ययन में रुचि पैदा हो जाए तो अध्ययन के लिए गति बनेगी। हमारी निष्ठा हमारी इच्छा या रुचि या प्राथमिकता पर निर्भर है. जिस बात को हम प्राथमिक मानते हैं उसमें हमारी पूरी निष्ठा रहती है. इच्छा के तीन स्तर हैं - कारण इच्छा, सूक्ष्म इच्छा और तीव्र इच्छा। इन तीनों स्तरों में से किसी स्तर पर हमारी अध्ययन करने की इच्छा भी है. जो बात तीव्र इच्छा के स्तर पर आ जाती है, फिर उसको करना ही होता है - और कोई रास्ता नहीं है. अध्ययन के लिए तीव्र इच्छा बनने के लिए अपनी 'उपयोगिता' को पहचानने की आवश्यकता है. हम जब स्वयं "उपयोगी" हो जाते हैं तो हमारा "उपकार" करना बनता ही है. हम स्वयं उपयोगी नहीं हैं तो हम उपकार कैसे करेंगे?
अभी आपके सामने पूरा वांग्मय है और इस वांग्मय को प्रस्तुत करने वाला जीता-जागता आदमी मौजूद है - इस नसीब को ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग किया जाए. अपनी जिज्ञासा को स्पष्ट पहचाना जाए. जो बात आपको स्पष्ट नहीं हुआ है, उसको मुझ से समझ लिया जाए.
मैं जो जीता हूँ, उसमे कोई समस्या नहीं है. मेरे जीने के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े भाग में समाधान ही है. मेरी सभी करतूत से समाधान ही मिलता है, समस्या मिलता ही नहीं है. सभी मोड़ मुद्दे पर समाधान मिलता है तो सुखी होने के अलावा और क्या होगा? उसी तरह सबको जीना है.
प्रश्न: कैसे पता करें कि हमे इस प्रस्ताव को लेकर क्या स्पष्ट नहीं है?
उत्तर: मानव के जीने के चार आयाम हैं - (१) आचरण, (२) संविधान (विधि), (३) शिक्षा, (४) व्यवस्था। जो बात इन चारों आयामों में समाधान प्रस्तुत करे उसको सर्वमानव के लिए सही माना जाए. इन चारों आयामों में इस प्रस्ताव के अनुसार समाधान का सूत्र-व्याख्या हुआ या नहीं, इसको आजमाना। आजमाने का मतलब है - हम दूसरे को समझाने में सफल हुए या नहीं? यही स्वयं को आजमाना है. इस आजमाने से पता लगेगा क्या स्पष्ट है, क्या स्पष्ट नहीं है.
प्रश्न: अपनी निष्ठा का कैसे मूल्याँकन करें?
उत्तर: इस प्रस्ताव पर सोच-विचार के बाद जो योजना बनती है, उसको क्रियान्वयन करने के लिए हम क्या किये, कितना किये, यही कर रहे हैं या और कुछ भी कर रहे हैं - इसके आधार पर अपनी निष्ठा का मूल्यांकन है.
प्रश्न: "अनुभव के लिए तीव्र इच्छा" का क्या मतलब है?
उत्तर: इसका मतलब है - अनुभव मूलक विधि से ही हम पार पायेंगे, दूसरा कोई रास्ता नहीं है. अनुभवगामी पद्दति में तर्क कुछ दूर तक उपयोगी है, पर तर्क बोध और अनुभव तक पहुंचेगा - ऐसा नहीं है. बोध और अनुभव अपने में होने वाला निर्धारण ही है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, भोपाल)
Wednesday, June 14, 2017
समझ के करो
हर जगह "करके समझो" के स्थान पर "समझ के करो" - चाहे उत्पादन में, या शिक्षा में, या आचरण में, या संविधान में. समझ के करने में हम हर स्थिति में अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था सूत्र-व्याख्या में जी पाते हैं.
"समझ के करने" से व्यर्थ के प्रयोग करने से हम बच सकते हैं. "समझ के करने" पर हर प्रयोग सार्थक होता है.
इस तरह अच्छे ढंग से, अच्छे मन से यदि हम चलें तो उपकार कर सकते हैं. अभी तक आरामदेहिता को खोजते हुए जो चलते रहे उसमे थोड़ा परिवर्तन होगा। आरामदेहिता को खोजने की जगह उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता को पहचानने की जगह में हम आ जाते हैं. इसके लिए हमको मूल्यमूलक और लक्ष्यमूलक विधि से काम करना होगा। रूचिमूलक विधि (आरामदेहिता को खोजना) से आदमी अब तक चला है - उससे कोई उपकार हुआ नहीं। अब (समझ के) लक्ष्यमूलक और मूल्यमूलक विधि से प्रयोग करने की आवश्यकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, भोपाल )
"समझ के करने" से व्यर्थ के प्रयोग करने से हम बच सकते हैं. "समझ के करने" पर हर प्रयोग सार्थक होता है.
इस तरह अच्छे ढंग से, अच्छे मन से यदि हम चलें तो उपकार कर सकते हैं. अभी तक आरामदेहिता को खोजते हुए जो चलते रहे उसमे थोड़ा परिवर्तन होगा। आरामदेहिता को खोजने की जगह उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता को पहचानने की जगह में हम आ जाते हैं. इसके लिए हमको मूल्यमूलक और लक्ष्यमूलक विधि से काम करना होगा। रूचिमूलक विधि (आरामदेहिता को खोजना) से आदमी अब तक चला है - उससे कोई उपकार हुआ नहीं। अब (समझ के) लक्ष्यमूलक और मूल्यमूलक विधि से प्रयोग करने की आवश्यकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, भोपाल )
Saturday, May 6, 2017
"ज्ञान व्यापार" और "धर्म व्यापार" हम नहीं करेंगे
समझदारी के इस लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में हर व्यक्ति "स्वेच्छा" से भागीदार हो सकता हैं।
यह कोई "उपदेश" नहीं है।
मैं स्वयं एक वेदमूर्ति परिवार से हूँ। उपदेश देने में मैं माहिर हूँ। उपदेश की विधि है - "जो न मैं समझा हों, और न आप समझोगे - उसको मैं आपको बताऊँ, फ़िर आप मुझे कुछ दे कर खुश हों, मैं आप से वह ले कर खुश होऊं!" इस तरीके को मैंने छोड़ दिया - क्योंकि यह निरर्थक है, इससे कोई प्रयोजन नहीं निकलता। प्रयोजन जिससे निकलता है, उसको अनुसन्धान करने में मैंने २५ वर्ष लगाया, फ़िर और २५ वर्ष लगाया उसको संसार को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने के लिए, फ़िर १० वर्ष से इस बात को लोगों के सम्मुख रखने योग्य हुए। आज इस बात को करीब २००० लोग अध्ययन कर रहे हैं। आगे और लोग इसको अध्ययन करेंगे - यह आशा किया जा सकता है। जो चाहें, वे अध्ययन करने में भागीदारी कर सकते हैं।
अध्ययन कराने को लेकर हम प्रतिज्ञा किए हैं - "ज्ञान व्यापार" और "धर्म व्यापार" हम नहीं करेंगे। अध्ययन के लिए कोई दक्षिणा उगाहने की बात नहीं है। अध्ययन के लिए कोई शुल्क नहीं रखा है। ज्ञान जीवन सहज-अपेक्षा है। ज्ञान को टुकडा करके बेचा नहीं जा सकता। अभी जो "बुद्धि-जीवी" कहलाये जाते हैं - वे अपने ज्ञान को "बेच" रहे हैं। उनसे पूछने पर - "ज्ञान को कैसे बेचोगे? 'ज्ञान' को तुम क्या जानते हो?" - उनसे कोई उत्तर मिलता नहीं है। इस बात का कोई उत्तर देने वाला हो तो मैं उसको फूल माला पहना करके सुनूंगा! ज्ञान को "बेचने की विधि" को मुझे बताने वाला आज तक मिला नहीं है। अभी ज्ञान-व्यापार और धर्म-व्यापार में कितने लोग लगे हैं, उसका आंकडा रखा ही है। सारी दरिद्रता, सारी अपराध-प्रवृत्ति धर्म-व्यापार और ज्ञान-व्यापार से ही है।
समझदार होने के बाद हम धर्म-व्यापार करेंगे नहीं, ज्ञान-व्यापार करेंगे नहीं। मैं यदि "धर्म" को समझता हूँ तो मैं अपने बच्चे को उसके योग्य बनाऊं, अपने अडोस-पड़ोस के व्यक्तियों को उसके योग्य बनाऊं, अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को उसके योग्य बनाऊं - यही बनता है। मैं वही कर रहा हूँ। मेरे संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के बीच मैं काम कर रहा हूँ। व्यापार से मुक्त - धर्म और ज्ञान का बोध कराने की मैंने व्यवस्था कर दिया।
धर्म-आचार्यों से मैंने इस बारे में (ज्ञान-व्यापार और धर्म-व्यापार को लेकर) बात-चीत किया। इस बात को छेड़ने से आचार्य-लोग बहुत नाराज होते हैं। मैं उन आचार्यों की बात कर रहा हूँ जो शंकराचार्य पद पर बैठे हैं। एक आचार्य नाराज नहीं हुए। वे थे - श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य! वे अमरकंटक आए थे, उसके बाद उनसे सत्संग हुआ, उन्होंने मेरी बात को अध्ययन करने के बाद बताया - "तुमने एक महत कार्य किया है। हम तो धर्म के लक्षणों को बताकर शिष्टानुमोदन करते हैं, तुमने धर्म का अध्ययन कराने का व्यवस्था किया है।" ऐसा एक ही ऐसे व्यक्ति ने कहा। दूसरा ऐसे व्यक्ति ने अभी तक कहा नहीं है। इन सब बातों से जो मुझे संतोष मिलना था, मिलता रहा। मैं आगे-आगे बढ़ता गया, और इस प्रकार चलते-चलते आज आप लोगों के सान्निध्य में आ गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (४ अक्टूबर २००९, हैदराबाद)
यह कोई "उपदेश" नहीं है।
मैं स्वयं एक वेदमूर्ति परिवार से हूँ। उपदेश देने में मैं माहिर हूँ। उपदेश की विधि है - "जो न मैं समझा हों, और न आप समझोगे - उसको मैं आपको बताऊँ, फ़िर आप मुझे कुछ दे कर खुश हों, मैं आप से वह ले कर खुश होऊं!" इस तरीके को मैंने छोड़ दिया - क्योंकि यह निरर्थक है, इससे कोई प्रयोजन नहीं निकलता। प्रयोजन जिससे निकलता है, उसको अनुसन्धान करने में मैंने २५ वर्ष लगाया, फ़िर और २५ वर्ष लगाया उसको संसार को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने के लिए, फ़िर १० वर्ष से इस बात को लोगों के सम्मुख रखने योग्य हुए। आज इस बात को करीब २००० लोग अध्ययन कर रहे हैं। आगे और लोग इसको अध्ययन करेंगे - यह आशा किया जा सकता है। जो चाहें, वे अध्ययन करने में भागीदारी कर सकते हैं।
अध्ययन कराने को लेकर हम प्रतिज्ञा किए हैं - "ज्ञान व्यापार" और "धर्म व्यापार" हम नहीं करेंगे। अध्ययन के लिए कोई दक्षिणा उगाहने की बात नहीं है। अध्ययन के लिए कोई शुल्क नहीं रखा है। ज्ञान जीवन सहज-अपेक्षा है। ज्ञान को टुकडा करके बेचा नहीं जा सकता। अभी जो "बुद्धि-जीवी" कहलाये जाते हैं - वे अपने ज्ञान को "बेच" रहे हैं। उनसे पूछने पर - "ज्ञान को कैसे बेचोगे? 'ज्ञान' को तुम क्या जानते हो?" - उनसे कोई उत्तर मिलता नहीं है। इस बात का कोई उत्तर देने वाला हो तो मैं उसको फूल माला पहना करके सुनूंगा! ज्ञान को "बेचने की विधि" को मुझे बताने वाला आज तक मिला नहीं है। अभी ज्ञान-व्यापार और धर्म-व्यापार में कितने लोग लगे हैं, उसका आंकडा रखा ही है। सारी दरिद्रता, सारी अपराध-प्रवृत्ति धर्म-व्यापार और ज्ञान-व्यापार से ही है।
समझदार होने के बाद हम धर्म-व्यापार करेंगे नहीं, ज्ञान-व्यापार करेंगे नहीं। मैं यदि "धर्म" को समझता हूँ तो मैं अपने बच्चे को उसके योग्य बनाऊं, अपने अडोस-पड़ोस के व्यक्तियों को उसके योग्य बनाऊं, अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को उसके योग्य बनाऊं - यही बनता है। मैं वही कर रहा हूँ। मेरे संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के बीच मैं काम कर रहा हूँ। व्यापार से मुक्त - धर्म और ज्ञान का बोध कराने की मैंने व्यवस्था कर दिया।
धर्म-आचार्यों से मैंने इस बारे में (ज्ञान-व्यापार और धर्म-व्यापार को लेकर) बात-चीत किया। इस बात को छेड़ने से आचार्य-लोग बहुत नाराज होते हैं। मैं उन आचार्यों की बात कर रहा हूँ जो शंकराचार्य पद पर बैठे हैं। एक आचार्य नाराज नहीं हुए। वे थे - श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य! वे अमरकंटक आए थे, उसके बाद उनसे सत्संग हुआ, उन्होंने मेरी बात को अध्ययन करने के बाद बताया - "तुमने एक महत कार्य किया है। हम तो धर्म के लक्षणों को बताकर शिष्टानुमोदन करते हैं, तुमने धर्म का अध्ययन कराने का व्यवस्था किया है।" ऐसा एक ही ऐसे व्यक्ति ने कहा। दूसरा ऐसे व्यक्ति ने अभी तक कहा नहीं है। इन सब बातों से जो मुझे संतोष मिलना था, मिलता रहा। मैं आगे-आगे बढ़ता गया, और इस प्रकार चलते-चलते आज आप लोगों के सान्निध्य में आ गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (४ अक्टूबर २००९, हैदराबाद)
Wednesday, April 26, 2017
अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन का आधार
भय से मुक्ति हर मानव की आवश्यकता है. हर मानव चाहता है कि भय न रहे. हर मानव कहीं न कहीं चाहता है कि हम विश्वास पूर्वक जी सकें। यह बात मानव में निहित है. जब तक भय है तब तक अपने में विश्वास कहाँ है? भय के स्थान पर मानव समाधान-समृद्धि पूर्वक जी सकता है. इसको मैंने समझ लिया और जी लिया। इसके बाद "अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन" को प्रस्तुत किया। अस्तित्व तो था ही, मानव भी था ही - अस्तित्व में अनुभव पूर्वक मानव के जीने के सूत्र, सुख को अनुभव करने के सूत्र, समाधानित होने के सूत्र, समृद्ध होने के सूत्र, वर्तमान में विश्वास करने के सूत्र, सहअस्तित्व (सार्वभौम व्यवस्था) में जीने के सूत्र को हासिल कर लिया। मानव ही इन सूत्रों की व्याख्या अपने जीने में करता है. इस ढंग से वर्तमान में प्रमाणित होने के धरातल से अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन का आधार बना.
अस्तित्व एक ध्रुव है - जो मूल है, अस्तित्व में जागृति दूसरा ध्रुव है - जो फल है. मूल भी सहअस्तित्व है, फल भी सहअस्तित्व है. अब यह जाँच सकते हैं, मानव क्या जागृति के अनुरूप जी रहा है या नहीं? जीने के लिए तत्पर है या नहीं?
हर मानव अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन के अध्ययन पूर्वक समाधानित होगा तथा अनुभवमूलक विधि से परिवार में समृद्धि, समाज में अभय और राष्ट्र में सहअस्तित्व (सार्वभौम व्यवस्था) को प्रमाणित करेगा।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)
अस्तित्व एक ध्रुव है - जो मूल है, अस्तित्व में जागृति दूसरा ध्रुव है - जो फल है. मूल भी सहअस्तित्व है, फल भी सहअस्तित्व है. अब यह जाँच सकते हैं, मानव क्या जागृति के अनुरूप जी रहा है या नहीं? जीने के लिए तत्पर है या नहीं?
हर मानव अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन के अध्ययन पूर्वक समाधानित होगा तथा अनुभवमूलक विधि से परिवार में समृद्धि, समाज में अभय और राष्ट्र में सहअस्तित्व (सार्वभौम व्यवस्था) को प्रमाणित करेगा।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)
Tuesday, April 25, 2017
ईश्वरवाद की समीक्षा
जिज्ञासा के लिए सबसे बाधक तत्व यदि कोई है तो वह है "भय". ईश्वरवाद को हम जब तक ओढ़े रहेंगे तब तक हम भय से मुक्ति नहीं पाएंगे। ईश्वरवाद का मतलब है - "ईश्वर सब कुछ करता है." इस भ्रम को छोड़ देना चाहिए। ईश्वर की ताकत से ही हम सब भरे हैं, जिसको उपयोग करके हम समाधानित हो सकते हैं, समृद्ध हो सकते हैं - इस ढंग से सोचने की आवश्यकता है. यह सहअस्तित्ववादी विचार का मूल रूप है.
ईश्वरवादी विधि में सोचा गया - "ईश्वर ही सब कुछ करता है." इससे मानव का कोई जिम्मेदारी ही नहीं रहा. हर क्षण ईश्वर से डरते रहो, डर के ईश्वर से प्रार्थना करते रहो. जो कुछ भी हो रहा है, उन्ही की मर्जी से हो रहा है - ऐसा मानो। मर गए तो इसका मतलब है ईश्वर रूठ गए. जी गए तो ईश्वर की कृपा रही. ऐसी हम व्याख्या देने लगे. इस तरह डर-भय में जीने वाली बात ईश्वरवाद से आयी.
आदर्शवादी विधि से असंख्य कथाएँ लिखित रूप में आ चुकी हैं. नर्क के प्रति भय पैदा करना, स्वर्ग के प्रति प्रलोभन पैदा करना - इसी अर्थ में सारी आदर्शवादी कथायें लिखी गयी हैं.
आदर्शवाद मानव को ज्ञानावस्था की इकाई के रूप में पहचान नहीं पाया और मानव को भी एक जीव ही कहा. जीव में स्वाभाविक रूप से भय की प्रवृत्ति होती है, ऐसा बताये। भय से मुक्त होने के लिए 'आश्रय' की आवश्यकता होना बताया गया. मूल आश्रय ईश्वर होना बताया गया. ईश्वर ही सबके भय को दूर करने वाला है, उनकी कृपा होने की आवश्यकता है - ऐसे ले गए. इसकी दो शाखाएं निकली - पहले ज्ञान ही एक मात्र बात थी, बाद में भक्ति को भी लोकमान्यता मिली। भक्ति से भी भय से मुक्ति हो जाती है - ऐसी परिकल्पना दी गयी. कौन भय से छुड़ायेगा? इस प्रश्न के उत्तर में ईश्वर के स्थान पर देवी-देवता आ गए. देवी-देवता को प्रमाणित करने वाला कोई नहीं है, किन्तु देवी-देवता से भय-मुक्ति हो जाएगा - ऐसा सबके मन में भरे. भय को मानव की स्वाभाविक गति बताया गया.
कोई भयभीत आदमी ईश्वर को वर करके भय मुक्त हो गया हो, ऐसा प्रमाण मिला नहीं। न ही कोई व्यक्ति ऐसा घोषणा कर पाया कि मैं भय से मुक्त हो गया हूँ, भय मुक्त विधि से जी रहा हूँ. जो अपने को भय से मुक्त हो गया मानते हैं, ऐसे "सिद्ध" कहलाने वाले भी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं - "हमको भय से मुक्ति कराओ, दरिद्रता से छुडाओ!" और जो सिद्ध नहीं हुए हैं, उनको भी ऐसे ही प्रार्थना करना है! फिर क्या फर्क पड़ा?
ईश्वर है तो वह वस्तु क्या है? ईश्वर वस्तु (जो कोई वास्तविकता को व्यक्त करे) है या केवल शब्द या भाषा ही है?
ईश्वरवादी विधि में शब्द को प्रमाण माना, वस्तु को प्रमाण माना ही नहीं! यह ऐसा ही है, जैसे मैं आपको कहूं आप गौण हैं, आपका नाम प्रधान है. इस प्रकार की बातें आने से मानव और गुमराह हो गया. मैं अपनी मूर्खता वश, या हठ वश, या परिस्थिति वश, या स्वविवेक वश, या नियति वश कहीं न कहीं इसको लांघ गया. मैंने सोचा - यह तो कहीं गड़बड़ है, इसकी स्पष्ट रूपरेखा होना आवश्यक है.
ईश्वरवाद के अभ्यास, साधना, योग आदि उपक्रमों से मैं गुजरा हूँ. मैंने यह निष्कर्ष निकाला - ये सारे उपक्रम, अभ्यास विधियों का उपयोग करना कोई अनुचित नहीं है यदि समझदारी को प्राप्त करना लक्ष्य हो तो. यदि समझदारी लक्ष्य नहीं है, केवल पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, जप-तप आदि करने को ही समझदारी का प्रमाण बताना चाहेंगे तो वह सार्थक नहीं होगा।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)
ईश्वरवादी विधि में सोचा गया - "ईश्वर ही सब कुछ करता है." इससे मानव का कोई जिम्मेदारी ही नहीं रहा. हर क्षण ईश्वर से डरते रहो, डर के ईश्वर से प्रार्थना करते रहो. जो कुछ भी हो रहा है, उन्ही की मर्जी से हो रहा है - ऐसा मानो। मर गए तो इसका मतलब है ईश्वर रूठ गए. जी गए तो ईश्वर की कृपा रही. ऐसी हम व्याख्या देने लगे. इस तरह डर-भय में जीने वाली बात ईश्वरवाद से आयी.
आदर्शवादी विधि से असंख्य कथाएँ लिखित रूप में आ चुकी हैं. नर्क के प्रति भय पैदा करना, स्वर्ग के प्रति प्रलोभन पैदा करना - इसी अर्थ में सारी आदर्शवादी कथायें लिखी गयी हैं.
आदर्शवाद मानव को ज्ञानावस्था की इकाई के रूप में पहचान नहीं पाया और मानव को भी एक जीव ही कहा. जीव में स्वाभाविक रूप से भय की प्रवृत्ति होती है, ऐसा बताये। भय से मुक्त होने के लिए 'आश्रय' की आवश्यकता होना बताया गया. मूल आश्रय ईश्वर होना बताया गया. ईश्वर ही सबके भय को दूर करने वाला है, उनकी कृपा होने की आवश्यकता है - ऐसे ले गए. इसकी दो शाखाएं निकली - पहले ज्ञान ही एक मात्र बात थी, बाद में भक्ति को भी लोकमान्यता मिली। भक्ति से भी भय से मुक्ति हो जाती है - ऐसी परिकल्पना दी गयी. कौन भय से छुड़ायेगा? इस प्रश्न के उत्तर में ईश्वर के स्थान पर देवी-देवता आ गए. देवी-देवता को प्रमाणित करने वाला कोई नहीं है, किन्तु देवी-देवता से भय-मुक्ति हो जाएगा - ऐसा सबके मन में भरे. भय को मानव की स्वाभाविक गति बताया गया.
कोई भयभीत आदमी ईश्वर को वर करके भय मुक्त हो गया हो, ऐसा प्रमाण मिला नहीं। न ही कोई व्यक्ति ऐसा घोषणा कर पाया कि मैं भय से मुक्त हो गया हूँ, भय मुक्त विधि से जी रहा हूँ. जो अपने को भय से मुक्त हो गया मानते हैं, ऐसे "सिद्ध" कहलाने वाले भी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं - "हमको भय से मुक्ति कराओ, दरिद्रता से छुडाओ!" और जो सिद्ध नहीं हुए हैं, उनको भी ऐसे ही प्रार्थना करना है! फिर क्या फर्क पड़ा?
ईश्वर है तो वह वस्तु क्या है? ईश्वर वस्तु (जो कोई वास्तविकता को व्यक्त करे) है या केवल शब्द या भाषा ही है?
ईश्वरवादी विधि में शब्द को प्रमाण माना, वस्तु को प्रमाण माना ही नहीं! यह ऐसा ही है, जैसे मैं आपको कहूं आप गौण हैं, आपका नाम प्रधान है. इस प्रकार की बातें आने से मानव और गुमराह हो गया. मैं अपनी मूर्खता वश, या हठ वश, या परिस्थिति वश, या स्वविवेक वश, या नियति वश कहीं न कहीं इसको लांघ गया. मैंने सोचा - यह तो कहीं गड़बड़ है, इसकी स्पष्ट रूपरेखा होना आवश्यक है.
ईश्वरवाद के अभ्यास, साधना, योग आदि उपक्रमों से मैं गुजरा हूँ. मैंने यह निष्कर्ष निकाला - ये सारे उपक्रम, अभ्यास विधियों का उपयोग करना कोई अनुचित नहीं है यदि समझदारी को प्राप्त करना लक्ष्य हो तो. यदि समझदारी लक्ष्य नहीं है, केवल पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, जप-तप आदि करने को ही समझदारी का प्रमाण बताना चाहेंगे तो वह सार्थक नहीं होगा।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९९)
Sunday, April 23, 2017
ध्यान देना होगा
प्रश्न: ज्ञान यदि हमको "प्राप्त" ही है तो वह हमारे अनुभव में कैसे नहीं है, हम इसको प्रमाणित क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
उत्तर: "प्राप्त" को पहचान सके इसीलिये अध्ययन है. प्राप्त ज्ञान में अनुभव करने के लिए अध्ययन को जोड़ दिया. जो "है" - उसी का अध्ययन कर सकते हैं. जो "है ही नहीं" - उसका कैसे अध्ययन करोगे? अध्ययन की प्रक्रिया मानव परंपरा में उपलब्ध नहीं थी - उसको जोड़ दिया.
सत्ता में सम्पृक्तता (भीगे रहना) ही जीवन में ज्ञान के प्राप्त रहने का आधार है. जीवन को ज्ञान प्राप्त करने के लिए "प्रयत्न" नहीं करना पड़ता. ज्ञान प्राप्त रहता ही है. ज्ञान से संपन्न होने के लिए मानव को कोई प्रयत्न नहीं करना है. प्राप्त ज्ञान को कार्य रूप में परिणित करने के लिए मानव को प्रयत्न करना होता है. शरीर द्वारा ज्ञान को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करने के लिए पूरा अध्ययन है. अध्ययन ही अभ्यास है, साधना है.
अध्ययन एक synchronization प्रोग्राम है, उसको प्रगट करना एक expansion प्रोग्राम है. समझने में एक बिंदु तक पहुँचने की बात है. Expansion अभिव्यक्ति में है. समझने की विधि में expansion को लगाओगे तो कभी समझ नहीं आएगा. इसी में रुका है. अध्यवसायिक विधि में या intellectually रुकावट वहीं है. नहीं तो अभी तक पार ही न पा जाते! Synchronization की जगह Expansion को लगा देते हैं - यहीं रुका है. आप अपना शोध करोगे तो यही पाओगे. ७०० करोड़ आदमी अपने को शोध करें तो यही पायेंगे. आप शोध ही नहीं करें तो हम नमन के अलावा क्या कर सकते हैं?
प्रश्न: Synchronization की जगह Expansion में न जाएँ, इसके लिए हम क्या करें?
उत्तर: ध्यान देना होगा. अध्ययन के लिए ध्यान देना होता है, अनुभव के बाद ध्यान बना रहता है. मन लगाना ही ध्यान देना है. मन लगेगा तो अध्ययन होगा, मन नहीं लगेगा तो अध्ययन नहीं होगा - किसी का भी! जैसे - मेरा अनुसंधान करने में मन लगा, तभी मैं अनुसंधान कर पाया. मेरा मन नहीं लगता तो मैं कहाँ से अनुसंधान करता? उसी तरह अध्ययन के लिए भी मन लगाना पड़ता है. मैंने तीस वर्ष मन लगाया - आप तीस दिन तो मन को लगाओ! आप तीन वर्ष तो मन को लगाओ!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अछोटी, जुलाई २०११)
उत्तर: "प्राप्त" को पहचान सके इसीलिये अध्ययन है. प्राप्त ज्ञान में अनुभव करने के लिए अध्ययन को जोड़ दिया. जो "है" - उसी का अध्ययन कर सकते हैं. जो "है ही नहीं" - उसका कैसे अध्ययन करोगे? अध्ययन की प्रक्रिया मानव परंपरा में उपलब्ध नहीं थी - उसको जोड़ दिया.
सत्ता में सम्पृक्तता (भीगे रहना) ही जीवन में ज्ञान के प्राप्त रहने का आधार है. जीवन को ज्ञान प्राप्त करने के लिए "प्रयत्न" नहीं करना पड़ता. ज्ञान प्राप्त रहता ही है. ज्ञान से संपन्न होने के लिए मानव को कोई प्रयत्न नहीं करना है. प्राप्त ज्ञान को कार्य रूप में परिणित करने के लिए मानव को प्रयत्न करना होता है. शरीर द्वारा ज्ञान को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करने के लिए पूरा अध्ययन है. अध्ययन ही अभ्यास है, साधना है.
अध्ययन एक synchronization प्रोग्राम है, उसको प्रगट करना एक expansion प्रोग्राम है. समझने में एक बिंदु तक पहुँचने की बात है. Expansion अभिव्यक्ति में है. समझने की विधि में expansion को लगाओगे तो कभी समझ नहीं आएगा. इसी में रुका है. अध्यवसायिक विधि में या intellectually रुकावट वहीं है. नहीं तो अभी तक पार ही न पा जाते! Synchronization की जगह Expansion को लगा देते हैं - यहीं रुका है. आप अपना शोध करोगे तो यही पाओगे. ७०० करोड़ आदमी अपने को शोध करें तो यही पायेंगे. आप शोध ही नहीं करें तो हम नमन के अलावा क्या कर सकते हैं?
प्रश्न: Synchronization की जगह Expansion में न जाएँ, इसके लिए हम क्या करें?
उत्तर: ध्यान देना होगा. अध्ययन के लिए ध्यान देना होता है, अनुभव के बाद ध्यान बना रहता है. मन लगाना ही ध्यान देना है. मन लगेगा तो अध्ययन होगा, मन नहीं लगेगा तो अध्ययन नहीं होगा - किसी का भी! जैसे - मेरा अनुसंधान करने में मन लगा, तभी मैं अनुसंधान कर पाया. मेरा मन नहीं लगता तो मैं कहाँ से अनुसंधान करता? उसी तरह अध्ययन के लिए भी मन लगाना पड़ता है. मैंने तीस वर्ष मन लगाया - आप तीस दिन तो मन को लगाओ! आप तीन वर्ष तो मन को लगाओ!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अछोटी, जुलाई २०११)
Tuesday, April 18, 2017
भाषा की शैली
प्रश्न: आपकी भाषा शैली के बारे में कुछ बताइये. हम दर्शन को दूसरी भाषाओँ में ले जाते समय किन बातों का ध्यान रखें?
भाषा अपने में स्वतन्त्र नहीं है, मानव द्वारा रचित शैली द्वारा नियंत्रित है. शैली का एक आयाम है - कर्ता, कारण, कार्य, फल-परिणाम इनमे से किसको महत्त्व या प्राथमिकता देनी है उसको पहले रखना. दर्शन में कारण को महत्त्व दिया है. वाद में कर्ता को महत्त्व दिया है. शास्त्र में कार्य को महत्त्व दिया है. संविधान में फल-परिणाम को महत्त्व दिया है.
भाषा अपने में स्वतन्त्र नहीं है, मानव द्वारा रचित शैली द्वारा नियंत्रित है. शैली का एक आयाम है - कर्ता, कारण, कार्य, फल-परिणाम इनमे से किसको महत्त्व या प्राथमिकता देनी है उसको पहले रखना. दर्शन में कारण को महत्त्व दिया है. वाद में कर्ता को महत्त्व दिया है. शास्त्र में कार्य को महत्त्व दिया है. संविधान में फल-परिणाम को महत्त्व दिया है.
लिंग के आधार पर विभक्तियों को कम या समाप्त कर दिया. इस प्रस्ताव को दूसरी भाषाओँ में ले जाते समय इस बात का ध्यान रहे.
प्रश्न: शैली क्या समय के साथ बदलती है?
मूल वस्तु बदलता नहीं है, उसको बताने का तरीका समय के साथ बदल जाता है.
प्रश्न: आपने अपनी समझ को बताने के लिए शब्दों का चुनाव कैसे किया?
उत्तर: मैंने जब वस्तु को देखा तो उसको बताने के लिए नाम अपने आप से मुझ में आने लगा. शब्द को मैंने बुलाया नहीं, शब्द अपने आप से आने लगा. उसमें से एक शब्द को लगा दिया.
मैंने प्रयत्न पूर्वक इस दर्शन को व्यक्त किया, ऐसा नहीं है. यह स्वाभाविक रूप में हुआ. समझने के बाद सबको ऐसा ही होगा. समझ के लिखा जाए तो लाभ होगा.
-श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
Thursday, April 13, 2017
रोटी, बेटी, राज्य और धर्म
मानव जाति अनेक समुदायों में अभी बँट गया है. इन समुदायों का एक दूसरे के साथ कोई तालमेल नहीं है. सबका अपने ढंग का नाच-गाना, अपने ढंग का पहनावा, अपने ढंग का रहन-सहन, अपने ढंग का खान-पान.
अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था के लिए रोटी, बेटी, राज्य और धर्म में एकता होना जरूरी है. अभी मानव इस जगह में नहीं है. इसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है. चेतना विकास - मूल्य शिक्षा इसको जोड़ता है.
रोटी-बेटी में एकता होने पर हम अखंड-समाज का अनुभव करते हैं.
प्रश्न: "रोटी-बेटी में एकता" का क्या अर्थ है?
उत्तर: "रोटी में एकता" का मतलब है - हम सब मानव साथ में एक प्रकार के आहार को खा सकें। आज की स्थिति में सबकी रोटी (आहार) अलग अलग है. रोटी में एकता के लिए मानव को अपनी आहार पद्दति को तय करना होगा। ऐसा आहार शाकाहार ही हो सकता है. "बेटी में एकता" का मतलब है - हम किसी भी परिवार में विवाह सम्बन्ध तय कर सकें। ऐसा हुए बिना "अखंड समाज" हुआ - कैसे माना जाए? रोटी-बेटी संस्कृति-सभ्यता से जुड़ी बात है.
प्रश्न: राज्य और धर्म में एकता होने का क्या अर्थ है?
उत्तर: राज्य नीति (तन मन धन रुपी अर्थ की सुरक्षा) और धर्म नीति (तन मन धन रुपी अर्थ का सदुपयोग) विधि (क़ानून) और व्यवस्था से जुड़ी हैं. राज्य और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं. राज्य के बिना धर्म और धर्म के बिना राज्य नहीं हो सकता।
अभी हर राष्ट्र अपनी सीमा के अंतर्गत अपनी-अपनी विधि और व्यवस्था की बात करता है. भारत भी करता है. नेपाल भी करता है. हर राष्ट्र विखंडित होता गया है. एकता को लेकर काम ही नहीं किया। अभी ऐसा सोचते हैं - विखंडित करने से हम ज्यादा प्रगति करते हैं. सार्वभौम व्यवस्था के लिए धरती को एक "अखंड राष्ट्र" के रूप में पहचानना होगा।
सार्वभौम व्यवस्था (अखंड राष्ट्र) स्वरूप में राज्य के पहुँचने के लिए "अखंड समाज" होना बहुत आवश्यक है. अखंड समाज के बिना सार्वभौम व्यवस्था होगा नहीं।
प्रश्न: हमारी इस विखंडनवादी सोच से तो "अखंड समाज" भी कैसे बनेगा? फिर रास्ता क्या है?
उत्तर: विखंडनवादी सोच ही संयुक्त परिवार से एकल परिवार (nuclear family) की ओर ले गया. मियाँ-बीवी राजी रहें - इतने से अखंड समाज होता हो तो कर लो! अखंड समाज सर्वमानव के साथ होता है. उसके लिए एकल परिवार में जीना क्या पर्याप्त होगा?
अखंड समाज के लिए सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में संबंधों को पहचानना होगा। सभी मानव सम्बन्धी हैं. कम से कम मित्र सम्बन्ध सबके साथ है. सम्बन्ध के आधार पर पहचान और मूल्यों का निर्वाह। मूल्यों का निर्वाह ही निष्ठा है. पहले परिवार में व्यवस्था और परिवार में न्याय। उससे पहले मानव में स्वयं में विश्वास। समझदार होने, समाधान संपन्न होने, समृद्धि को प्रमाणित करने योग्य होने - ये तीनों के जुड़ने से स्वयं में विश्वास होता है.
इसका रास्ता शिक्षा है. हर स्नातक को इन तीनों के योग्य बनाना हम चाह रहे हैं. समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने से ही मानवों में एक दूसरे के भय से मुक्ति की बात होती है. यह अभयता ही अखंड समाज का स्वरूप है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
Tuesday, March 7, 2017
विकीरणीय पदार्थ का धरती पर प्रयोजन
प्रश्न: विकीरणीय पदार्थ क्या हैं और उनके धरती पर प्रकटन का क्या प्रयोजन है?
उत्तर: अजीर्ण परमाणुओं के रूप में विकिरणीय पदार्थ हैं. अजीर्ण परमाणुओं का प्रभाव विकीरणीयता है. विकीरणीयता ही ब्रह्माण्डीय किरणों के रूप में काम करता रहता है. ऋतु संतुलन का आधार यही है. पानी बनने का आधार यही है. धरती पर जलने वाले पदार्थ और जलाने वाले पदार्थ के योग से प्यास बुझाने वाले पदार्थ के बनने में विकीरणीय पदार्थ उत्प्रेरक (catalyst) है. जो वस्तु प्राकृतिक रूप में पानी बनने का आधार है, वह मानव के हस्तक्षेप से यदि विघटित/विखंडन करने का आधार बन जाए तो कितना देर लगेगा पानी को धरती से समाप्त होने में?
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
साम्य सत्ता, कार्य ऊर्जा, प्रकटन और प्रवृत्ति
साम्य सत्ता एक दूसरे के बीच खाली स्थली के रूप में सब जगह दिखता है. दो व्यक्तियों के बीच में तो यह है ही - इससे इस बात का अनुमान कर सकते हैं यही वस्तु दो धरती के बीच में भी है, दो जानवरों के बीच में, दो अणुओं, दो परमाणुओं, दो परमाणु अंशों के बीच में भी है. दो इकाइयों के बीच में सत्ता होने का प्रयोजन है - उनके एक दूसरे को पहचानने की व्यवस्था हो जाना। एक दूसरे के बीच खाली स्थली नहीं होती तो वे एक दूसरे को पहचान ही नहीं सकते थे. सत्ता की "पारदर्शीयता" के फलस्वरूप ही एक दूसरे को पहचानना बनता है.
सत्ता एक "प्राप्त" वस्तु है. प्रत्येक एक में यह "पारगामी" है. एक परमाणु अंश, परमाणु, अणु, पत्थर, धरती, मनुष्य - सबमें यह पारगामी है. पारगामीयता के प्रमाण में ऊर्जा सम्पन्नता है. ऊर्जा सम्पन्नता वश क्रियाशीलता है. क्रिया करने के पहले से ही जो प्राप्त रहता है, उसका नाम है - साम्य ऊर्जा। साम्य ऊर्जा सबको प्राप्त है. साम्य ऊर्जा प्राप्त होने से सभी क्रियाशील हैं. सत्ता ही साम्य ऊर्जा है - जिसमें संपृक्त होने से जड़ चैतन्य संसार क्रियाशील है. क्रियाशीलता के फलस्वरूप "कार्य ऊर्जा" बनती है. उपयोगिता-पूरकता स्वरूप में कार्य-ऊर्जा है. कार्य ऊर्जा का प्रयोजन है - एक दूसरे का विकास। जिससे अग्रिम प्रकटन होता है. पिछली अवस्था में अगली अवस्था का भ्रूण रूप रहता है, फलस्वरूप अग्रिम अवस्था प्रकट होता है. सहअस्तित्व इस तरह नित्य और निरंतर प्रकटनशील है. सहअस्तित्व के नित्य और निरंतर प्रकटनशील होने के आधार पर मानव भी प्रकट हो गया. मानव के प्रकट होने का प्रयोजन है - वह सहअस्तित्व के प्रतिरूप स्वरूप में काम करे. सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान के अनुरूप जीवन को सार्थक बनाये। इससे बच के निकलने का कोई रास्ता नहीं है.
सत्ता जड़ प्रकृति को 'ऊर्जा' स्वरूप में प्राप्त है तथा चैतन्य प्रकृति को 'ज्ञान' स्वरूप में प्राप्त है.
प्रश्न: तो क्या प्रकृति में प्रकटन (पहले जड़ फिर चैतन्य) के साथ साथ सत्ता में भी प्रकटन (पहले ऊर्जा फिर ज्ञान) हो गया? क्या सत्ता दो स्वरूप में पैदा हो गया?
उत्तर: नहीं! सत्ता एक ही वस्तु है, उसके दो नाम हैं. जड़ के साथ उसे "ऊर्जा" कहते हैं, चैतन्य के साथ उसे "ज्ञान" कहते हैं.
जड़-चैतन्य प्रकृति सत्ता में संपृक्त है. जड़ प्रकृति के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ऊर्जा कह रहे हैं. चैतन्य प्रकृति (जीवन) के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ज्ञान कह रहे हैं. ऊर्जा है, इसीलिये जड़ प्रकृति कार्यरत है. ज्ञान है, इसीलिये चैतन्य प्रकृति कार्यरत है. कार्यरत न हो ऐसा कोई जड़ या चैतन्य वस्तु नहीं है.
प्रश्न: चेतना क्या है?
उत्तर: चेतना ज्ञान का ही (चैतन्य प्रकृति द्वारा) प्रकाशन है. ज्ञान के प्रकाशन की चार स्थितियाँ हैं - जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना और दिव्य चेतना। "चेतना विकास" अध्ययन की वस्तु बन गयी!
चैतन्य वस्तु (जीवन) अपनी "प्रवृत्ति" के अनुसार चेतना को व्यक्त करती है. चार विषयों में प्रवृत्ति, पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति, तीन ऐषणाओं में प्रवृत्ति और उपकार में प्रवृत्ति। प्रवृत्ति के अनुसार ये चार स्थितियाँ हैं. चार विषयों और पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति जीव चेतना की सीमा में है. लोकेषणा में प्रवृत्ति देवचेतना की सीमा में है. उपकार प्रवृत्ति दिव्य चेतना की सीमा में है.
प्रश्न: प्रवृत्ति और योग्यता में क्या भेद है?
उत्तर: प्रवृत्ति के अनुसार योग्यता (प्रकाशन क्रिया) प्रकट होती है. न कि योग्यता के अनुसार प्रवृत्ति।
प्रवृत्ति ही प्रकट होता है. प्रकटन के अनुसार ही नामकरण है. पदार्थावस्था एक नाम है. प्राणावस्था एक नाम है. जीवावस्था एक नाम है. ज्ञानावस्था एक नाम है. ज्ञानावस्था की प्रवृत्ति का परिशीलन करने गए तो चेतना के चार स्तर पहचान में आ गए. प्रवृत्ति के अनुसार ही मानव जीता है. प्रवृत्ति ही स्वभाव के रूप में आता है.
सहअस्तित्व प्रकटन क्रम में प्रवृत्ति में परिवर्तन हुआ है. जड़ प्रकृति में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन हुआ है. चैतन्य प्रकृति केवल गुणात्मक परिवर्तन होता है. गठनपूर्णता पर्यन्त मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन है. गठनपूर्णता उपरान्त केवल गुणात्मक परिवर्तन है. गुणात्मक परिवर्तन की स्थिति के अनुसार प्रवृत्तियाँ हैं. प्रवृत्तियों के प्रकाशन का नाम "योग्यता" है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
सत्ता एक "प्राप्त" वस्तु है. प्रत्येक एक में यह "पारगामी" है. एक परमाणु अंश, परमाणु, अणु, पत्थर, धरती, मनुष्य - सबमें यह पारगामी है. पारगामीयता के प्रमाण में ऊर्जा सम्पन्नता है. ऊर्जा सम्पन्नता वश क्रियाशीलता है. क्रिया करने के पहले से ही जो प्राप्त रहता है, उसका नाम है - साम्य ऊर्जा। साम्य ऊर्जा सबको प्राप्त है. साम्य ऊर्जा प्राप्त होने से सभी क्रियाशील हैं. सत्ता ही साम्य ऊर्जा है - जिसमें संपृक्त होने से जड़ चैतन्य संसार क्रियाशील है. क्रियाशीलता के फलस्वरूप "कार्य ऊर्जा" बनती है. उपयोगिता-पूरकता स्वरूप में कार्य-ऊर्जा है. कार्य ऊर्जा का प्रयोजन है - एक दूसरे का विकास। जिससे अग्रिम प्रकटन होता है. पिछली अवस्था में अगली अवस्था का भ्रूण रूप रहता है, फलस्वरूप अग्रिम अवस्था प्रकट होता है. सहअस्तित्व इस तरह नित्य और निरंतर प्रकटनशील है. सहअस्तित्व के नित्य और निरंतर प्रकटनशील होने के आधार पर मानव भी प्रकट हो गया. मानव के प्रकट होने का प्रयोजन है - वह सहअस्तित्व के प्रतिरूप स्वरूप में काम करे. सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान के अनुरूप जीवन को सार्थक बनाये। इससे बच के निकलने का कोई रास्ता नहीं है.
सत्ता जड़ प्रकृति को 'ऊर्जा' स्वरूप में प्राप्त है तथा चैतन्य प्रकृति को 'ज्ञान' स्वरूप में प्राप्त है.
प्रश्न: तो क्या प्रकृति में प्रकटन (पहले जड़ फिर चैतन्य) के साथ साथ सत्ता में भी प्रकटन (पहले ऊर्जा फिर ज्ञान) हो गया? क्या सत्ता दो स्वरूप में पैदा हो गया?
उत्तर: नहीं! सत्ता एक ही वस्तु है, उसके दो नाम हैं. जड़ के साथ उसे "ऊर्जा" कहते हैं, चैतन्य के साथ उसे "ज्ञान" कहते हैं.
जड़-चैतन्य प्रकृति सत्ता में संपृक्त है. जड़ प्रकृति के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ऊर्जा कह रहे हैं. चैतन्य प्रकृति (जीवन) के सत्ता में भीगे रहने से प्रभाव को हम ज्ञान कह रहे हैं. ऊर्जा है, इसीलिये जड़ प्रकृति कार्यरत है. ज्ञान है, इसीलिये चैतन्य प्रकृति कार्यरत है. कार्यरत न हो ऐसा कोई जड़ या चैतन्य वस्तु नहीं है.
प्रश्न: चेतना क्या है?
उत्तर: चेतना ज्ञान का ही (चैतन्य प्रकृति द्वारा) प्रकाशन है. ज्ञान के प्रकाशन की चार स्थितियाँ हैं - जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना और दिव्य चेतना। "चेतना विकास" अध्ययन की वस्तु बन गयी!
चैतन्य वस्तु (जीवन) अपनी "प्रवृत्ति" के अनुसार चेतना को व्यक्त करती है. चार विषयों में प्रवृत्ति, पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति, तीन ऐषणाओं में प्रवृत्ति और उपकार में प्रवृत्ति। प्रवृत्ति के अनुसार ये चार स्थितियाँ हैं. चार विषयों और पाँच संवेदनाओं में प्रवृत्ति जीव चेतना की सीमा में है. लोकेषणा में प्रवृत्ति देवचेतना की सीमा में है. उपकार प्रवृत्ति दिव्य चेतना की सीमा में है.
प्रश्न: प्रवृत्ति और योग्यता में क्या भेद है?
उत्तर: प्रवृत्ति के अनुसार योग्यता (प्रकाशन क्रिया) प्रकट होती है. न कि योग्यता के अनुसार प्रवृत्ति।
प्रवृत्ति ही प्रकट होता है. प्रकटन के अनुसार ही नामकरण है. पदार्थावस्था एक नाम है. प्राणावस्था एक नाम है. जीवावस्था एक नाम है. ज्ञानावस्था एक नाम है. ज्ञानावस्था की प्रवृत्ति का परिशीलन करने गए तो चेतना के चार स्तर पहचान में आ गए. प्रवृत्ति के अनुसार ही मानव जीता है. प्रवृत्ति ही स्वभाव के रूप में आता है.
सहअस्तित्व प्रकटन क्रम में प्रवृत्ति में परिवर्तन हुआ है. जड़ प्रकृति में मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन हुआ है. चैतन्य प्रकृति केवल गुणात्मक परिवर्तन होता है. गठनपूर्णता पर्यन्त मात्रात्मक परिवर्तन के साथ गुणात्मक परिवर्तन है. गठनपूर्णता उपरान्त केवल गुणात्मक परिवर्तन है. गुणात्मक परिवर्तन की स्थिति के अनुसार प्रवृत्तियाँ हैं. प्रवृत्तियों के प्रकाशन का नाम "योग्यता" है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक)
Wednesday, February 1, 2017
समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद
प्रश्न: आपके "समाधानात्मक भौतिकवाद" प्रस्तुत करने का क्या आधार रहा?
उत्तर: भौतिकवादी विधि में बताते हैं (अस्तित्व में) हर जगह संघर्ष है. संघर्ष समस्या का पुंज है, बर्बादी का रास्ता है. जबकि मानव सहज अपेक्षा 'आबादी' के लिए है. यह परीक्षण किया गया कि भौतिक संसार समाधान के अर्थ में है, न कि संघर्ष के अर्थ में. उसको कैसे बताया? दो परमाणु अंश गठित हो कर एक व्यवस्था को प्रमाणित करते है. दो अंश के परमाणु का क्रियाकलाप और आचरण निश्चित है. २०० अंश के परमाणु का भी क्रियाकलाप और आचरण निश्चित है. यदि निश्चयता का यह स्वरूप समझ में आता है तो मानव स्वयं के आचरण के प्रति सतर्क हो सकता है. इस आधार पर समाधानात्मक भौतिकवाद को प्रस्तुत किया।
प्रश्न: "व्यवहारात्मक जनवाद" का क्या आशय है?
उत्तर: जनचर्चा में "व्यव्हार" केंद्र में रहने की आवश्यकता है. व्यव्हार से आशय है - अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र व्याख्या। इसी सन्दर्भ में ही हम चर्चा करें। इस को जीवित रखते हुए हम चर्चा करें। इस प्रकार की जनचर्चा से परंपरा में संस्कार सटीक स्थापित हो सकता है. हम यदि चर्चा ही वितण्डावादी करते हैं तो आगे पीढ़ी में सही स्वीकृतियाँ कैसे बनेगा? आगे पीढ़ी तक ज्ञान के पहुँचने के लिए चर्चा एक सेतु है. प्रमाणित करने का प्रेरणा है. व्यव्हार में निर्वाह तो सामयिक ही होता है पर चर्चा में ताजगी सदा-सदा बना रहता है कि हम ऐसा ही निर्वाह करेंगे। इसका नाम है - "व्यवहारात्मक जनवाद". अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र-व्याख्या (या मानवीय व्यवहार) हमारे जीने में भी रहता है और उसको लेकर चर्चा आगे पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्वरूप में भी रहता है. अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र व्याख्या जीने का भी सार है, प्रेरणा का भी सार है.
प्रश्न: और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद?
उत्तर: अनुभवात्मक अध्यात्मवाद अनुभव को स्पष्ट करने हेतु है. अनुभव व्यापक वस्तु में संपृक्तता का ही होता है. व्यापक वस्तु मानव के अनुभव में ही आता है, चर्चा में यह पूरा नहीं होता, व्यापक वस्तु का साक्षात्कार नहीं होता। अध्ययन पूर्वक एक-एक वस्तु (इकाइयों) का साक्षात्कार होता है. नाम (शब्द) से वस्तु की पहचान होना साक्षात्कार है. इकाइयों के रूप और गुण के साथ उनके स्वभाव और धर्म का साक्षात्कार होता है. वस्तु की पहचान होने पर शब्द गौण हो जाता है.
प्रश्न: क्या व्यापक वस्तु का मानव को साक्षात्कार नहीं होता?
उत्तर: नहीं। इकाईत्व का सान्निध्य होकर उसका साक्षात्कार होता है. जिस वस्तु का साक्षात्कार होना है उससे दूरी रखते हुए ही उसका साक्षात्कार हो सकता है. व्यापक वस्तु में डूबे, भीगे, घिरे होने के कारण उससे दूरी की कोई बात ही नहीं है, वह प्राप्त वस्तु है उसका अनुभव ही होता है.
व्यापक वस्तु में सभी वस्तुएं तद्रूपता में हैं. उसी तरह मानव भी व्यापक वस्तु में तद्रूप है. मानव में व्यापक वस्तु ज्ञान है जो चेतना स्वरूप में प्रकाशित है. मानव में व्यापक वस्तु में तद्रूपता चेतना विधि से प्रकाशित है. अभी मानव परंपरा पीढ़ियों से जीव चेतना में तद्रूप है. जीवचेतना में कोई गम्य-स्थली नहीं मिला, इसलिए चेतना विधि में पुनर्विचार के लिए गए - जिससे मानव चेतना मिल गयी. जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन एक संक्रमण है. अपराध मुक्ति और अपने-पराये से मुक्ति इसके बिना होगा नहीं।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
दोहरे व्यक्तित्व से मुक्ति
ज्ञान और जीना अलग अलग नहीं है. जीने में चेतना के चार स्तर हैं. जीव चेतना = जीवों के सदृश ज्ञान। जीव चार विषयों ( आहार,निद्रा, भय, मैथुन) की सीमा में जीता है - मानव जब चार विषयों के साथ पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) की सीमा में जीने लगा तो उसने अपने को जीवों से अच्छा मान लिया। ऐसे में उसका ज्ञान और विचार (मानसिकता) जीवों जैसा ही रहा लेकिन 'वचन' जीवों से भिन्न हो गया. इसीलिये दोहरा व्यक्तित्व हो गया. जीव चेतना से मानव दोहरे व्यक्तित्व में जीता ही है. दोहरा व्यक्तित्व मानव को स्वीकार नहीं होता - पहला संकट यही है. इसीलिये छुपने वाली बात हो गयी. वचन अच्छा होना, सोच-विचार उसके अनुरूप न हो पाना।
प्रश्न: मैं देखूँ तो मेरी पीड़ा यही है. मेरे बोलने में सब ठीक है पर मेरी मानसिकता या विचार सदा मेरे बोलने के अनुरूप नहीं है..
उत्तर: आपका ही नहीं, सभी का यही हालत है. मैंने भी यहीं से शुरू किया था. यह "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" जो मैं कह रहा हूँ, मेरे वचन का मेरी समझ/मानसिकता से तालमेल कहाँ है? वहीं से मैंने शुरुआत किया। यह तालमेल न हो पाना दोहरे व्यक्तित्व का द्योतक है. वचन और मानसिकता में तालमेल न बैठा पाने का संकट सभी को होगा। यह मेरे अकेले का संकट नहीं है. सबके साथ वर्तने वाला संकट स्थली यही है.
दोहरे व्यक्तित्व से मुक्ति जागृति या मानव चेतना से ही हो पाता है - दूसरा कोई युक्ति नहीं है. जीव चेतना में तो होगा नहीं। हम स्वयं यदि मानव चेतना में परिवर्तित न हों तो हम आगे पीढ़ी को मार्गदर्शन नहीं दे पाएंगे। आगे पीढ़ी को यदि मार्गदर्शन करना है तो हमें मानव चेतना में प्रमाणित होना होगा। इससे कम में संतुष्टि की कोई जगह नहीं है. पिछली पीढ़ी भेड़चाल में जैसे चल दी वैसे चल दी, पर अगली पीढ़ी वैसी नहीं है. यह भी हमारे सामने एक धर्मसंकट है. आगे पीढ़ी को हम श्रेष्ठ देखना चाहते हैं और हम स्वयं श्रेष्ठता के लिए तैयार न हों तो कैसे होगा? हम स्वयं समाधानित होना चाहते हैं, जो मानवचेतना से कम में होता नहीं है. मानव चेतना से कम दर्जे में न हमारा स्वयं समाधानित होना बनता है, न अगली पीढ़ी को मार्गदर्शन करना बनता नहीं है. इस तरह दोनों तरीके से मानव चेतना में परिवर्तित होने के लिए हम बाध्य हैं. ये दोनों बातें हमारे व्यवहार और जीने से जुड़ी हैं. भले ही धरती का बीमार होना और अपना-पराया की दूरी बढ़ जाने के मुद्दों को स्थगित कर रखो.
इस आधार पर हम चाह रहे हैं कि हम अच्छे ढंग से जीएं, समाधान पूर्वक जियें, समृद्धि पूर्वक जियें, मानव चेतना को हम सम्बन्ध-मूल्य-मूल्यांकन विधि से प्रमाणित करें, आगे पीढ़ी का मार्गदर्शन करें।
संबंधों को हम पहचानते हैं, निर्वाह करते हैं तो आगे पीढ़ी के लिए हम प्रेरक होते हैं या नहीं? हम स्वयं न करें तो आगे पीढ़ी के लिए कैसे प्रेरक होंगे? यह धर्म संकट हर व्यक्ति के साथ है.
इस तरह हमारे स्वयं में संतुष्ट होने के लिए और हमारी संतान के लिए परंपरा में स्त्रोत बनने के लिए चेतना विकास की ज़रूरत हो गयी, मूल्य शिक्षा की ज़रुरत हो गयी. चेतना विकास और मूल्य शिक्षा में पारंगत होने पर हम अच्छी तरह आगे पीढ़ी के लिए प्रेरक हो पाते हैं.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Tuesday, January 31, 2017
मानसिकता में सार्वभौम व्यवस्था का मॉडल
मानव संवाद करता ही है. मानव आपस में संवाद (बातचीत) न करे - ऐसा होता नहीं। मानव आपस में "विचार" को लेकर कुछ बातचीत करते हैं, "प्रमाणित करने" को लेकर कुछ बातचीत करते हैं, और "जीने" को लेकर कुछ बातचीत करते हैं. सारा विचार प्रमाणित होने में, और सारा प्रमाण जीने में समाहित हो जाता है.
प्रश्न: आपका यहाँ "जीने" से क्या आशय है?
उत्तर: कायिक-वाचिक-मानसिक कृत-कारित-अनुमोदित इन ९ भेदों से मानव जीता है. इन ९ विधाओं में जीता हुआ एक मानव दूसरे को पहचान सकता है और स्वयं अपना भी मूल्यांकन कर सकता है. मानसिकता का ही प्रकाशन वाचिक और कायिक स्वरूप में होता है. कायिक, वाचिक और मानसिक ये तीनो अविभाज्य हैं. मानव प्रधान रूप से कभी मानसिक, कभी वाचिक और कभी कायिक होता है. एक प्रधान रूप में रहता है, दो उसके साथ शामिल रहते हैं.
प्रश्न: मानव के जीने में कोई बात "मानसिक" स्वरूप में हो पर "कायिक" या "वाचिक" स्वरूप में न हो - क्या यह हो सकता है?
उत्तर: यह जीव चेतना पर्यन्त होता है. यही दोहरा व्यक्तित्व का आधार है. जीवचेतना में ऐसा सोच विचार हो सकता है, जिसको बताने में शर्म आती हो. फिर उसको छुपाने का प्रयास होता है. मानवचेतना में जो सोचा उसको न बता सकें, ऐसा कोई विचार ही नहीं आता. मानव चेतना में विचारने, बोलने और करने में कोई barrier नहीं है. जीव चेतना में barrier रहता है.
प्रश्न: जीव चेतना में मानव के जीने में इस अवरोध का कारण कैसे बनता है?
उत्तर: जीव चेतना में मानव जीवों से "अच्छा" जीना चाहता है पर उसकी मानसिकता में "अच्छा" का कोई मॉडल नहीं रहता। जीव चेतना में जीते हुए मानव का विचार और अपेक्षा गुणात्मक रूप में जीवों से भिन्न नहीं है. बोलने में मानव अच्छा ही बोलता है लेकिन मानसिकता में अच्छा रहता नहीं है. यही मजबूरी है. कितना भी आदमी लीपापोती कर ले, जीव चेतना पर्यन्त ये मजबूरी रहेगा ही!
वचन विधा में मानव अव्यवस्था का पक्षधर नहीं है. लेकिन उसकी मानसिकता में व्यवस्था का कोई मॉडल नहीं है. इसी आधार पर ये barrier बन गए.
अभी तक परंपरा मानसिकता में सार्वभौम व्यवस्था का मॉडल देने में असमर्थ रहा. सार्वभौम व्यवस्था का मॉडल न ईश्वरवादी विधि से मिलता है, न भौतिकवादी विधि से. सहअस्तित्ववादी विधि से सार्वभौम व्यवस्था का मॉडल आ गया.
प्रश्न: मानसिकता में सार्वभौम व्यवस्था का मॉडल क्या है?
उत्तर: पहला - मानवीयता पूर्ण आचरण। दूसरा - मानवीयता पूर्ण व्यवस्था। तीसरा - मानवीयता पूर्ण शिक्षा। और चौथा - मानवीय आचार संहिता रुपी संविधान
आचरण, व्यवस्था, शिक्षा और संविधान - इन चारों आयामो में एक सूत्रता होने पर मानसिकता इसमें बन सकता है. यही व्यवस्थात्मक मानसिकता या जागृत मानसिकता है. यह शिक्षा विधि से एक से दूसरे व्यक्ति में अंतरित होता है.
प्रश्न: मानसिकता का शिक्षा विधि से कैसे एक से दूसरे व्यक्ति में अंतरण होता है?
उत्तर: इस मानसिकता को लेकर पहले वचन के स्तर पर (अध्यापक और विद्यार्थी) एकात्म होते हैं. फिर वचन के अर्थ में जाते हैं (तो पुनः एकात्म होते हैं), और यह मानसिकता फिर से prove हो जाता है. फिर उसको व्यवहार में लाने जाते हैं (और पुनः एकात्म होते हैं) तो यह मानसिकता एक बार और prove हो जाता है. ऐसा हो जाने पर मानसिकता आचरण में आ जाता है. इस ढंग से अनुभव तक पहुँचने की व्यवस्था बनी हुई है.
पहले हमको मानसिकता में तैयार होना होगा। मानसिकता में तैयार होते हैं तो वाचिक और कायिक उसके अनुसार चलता ही है. इसी लिए मैं कहता हूँ - "विचारम प्रथमो धर्मः आचरण तदनंतरम" (विचार पहले, आचरण उसके बाद में!) यह विगत में जो कहे "आचरण प्रथमो धर्मः विचारम तदन्तरम" (आचरण पहले, विचार उसके बाद में!) से बिल्कुल उल्टा हो गया. दूसरे विगत में कहा था - "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या", जबकि यहाँ कह रहे हैं - "ब्रह्म सत्य, जगत शाश्वत". इन दोनों मुद्दों पर परंपरा में "परिवर्तन" का सारा सूत्र टिका है. यह बात यदि हाथ लगती है तो परंपरा में "अखंड समाज - सार्वभौम व्यवस्था" की सूत्र-व्याख्या होगी, जिससे अपराध-मुक्ति और अपने-पराये से मुक्ति होगी।
मानवीयता पूर्ण आचरण, शिक्षा, व्यवस्था और संविधान की ज़रुरत है या नहीं? इसके लिए अपने को अर्पण-समर्पण करना है या नहीं? - यह आपके लिए सोचने का मुद्दा है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Saturday, January 21, 2017
प्रतीक प्राप्ति नहीं है
"सर्व धर्म सम भाव" को पाने की उम्मीद में आज भी कुछ लोग लगे हैं. आधे लोग भाषा में फंसे हैं, आधे पैसे को लेकर फंसे हैं.
प्रश्न: पैसे के बिना काम कैसे चलेगा?
उत्तर: मानलो आपके पास एक खोली भर के नोट हों. तो भी उससे आप एक कप चाय नहीं बना सकते, एक चींटी तक का पेट उससे नहीं भर सकता। यदि वस्तु नहीं है तो ये नोट या पैसे किसी काम के नहीं हैं. नोट केवल कागज़ का पुलिंदा है, जिस पर छापा लगा है. छापाखाने में छापा लगा देने भर से कागज़ वस्तु में नहीं बदल जाता।
वस्तु को कोई आदमी ही पैदा करता है. वस्तु का मूल्य होता है. नोट पर कुछ संख्या लिखा रहता है. आज की स्थिति में मूल्यवान वस्तु के बदले में ऐसे संख्या लिखे कागज़ (नोट) को पाकर उत्पादक अपने को धन्य मानता है. यह बुद्धूबनाओ अभियान है या नहीं?
नोट अपने में कोई तृप्ति देने वाला वस्तु नहीं है. संग्रह करें तब भी नहीं, खर्च करें तब भी नहीं। नोट का संग्रह कभी तृप्ति-बिंदु तक पहुँचता नहीं है. नोट खर्च हो जाएँ तो उजड़ गए जैसा लगता है. नोट से कैसे तृप्ति पाया जाए? वस्तु से ही तृप्ति मिलती है. वस्तु से ही हम समृद्ध होते हैं, नोट से हम समृद्ध नहीं होते।
प्रश्न: तो हम नोट पैदा करने के लिए भागीदारी करें या वस्तु पैदा करने के लिए भागीदारी करें?
उतर: अभी सर्वोच्च बुद्धिमत्ता वाले सभी लोग नोट पैदा करने में लगे हैं. सारा नौकरी और व्यापार का प्रपंच नोट पैदा करने के लिए बना है. कोई वस्तु पैदा कर भी रहा है तो उसका उद्देश्य नोट पैदा करना ही है.
इसीलिये सूत्र दिया - "प्रतीक प्राप्ति नहीं है, उपमा उपलब्धि नहीं है."
कभी कभी मैं सोचता हूँ परिस्थितियों ने मानव को बिलकुल अंधा कर दिया है. मुद्रा (पैसे) के चक्कर में उत्पादक को घृणास्पद और उपभोक्ता को पूजास्पद माना जाता है. उत्पादक, व्यापारी और उपभोक्ता - इनके लेन-देन में लाभ-हानि का चक्कर है. उत्पादक लाभ में है या हानि में? व्यापारी लाभ में है या हानि में? उपभोक्ता लाभ में है या हानि में? इसको देखने पर पता चलता है - व्यापारी ही फायदे में है! नौकरी क्या है? व्यापार को घोड़ा बना के सवारी करना नौकरी है. इस तरह नहले पर दहला लगते लगते हम कहाँ पहुँच गए? ऐसे में मानव न्याय के पास आ रहा है या न्याय से दूर भाग रहा है. इस मुद्दे पर सोचने पर लगता है - मानव न्याय से कोसों दूर भाग चुका है.
यह एक छोटा सा निरीक्षण का स्वरूप है. थोड़ा सा हम ध्यान दें तो यह सब हमको समझ में आता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Saturday, January 7, 2017
मूल बात की भाषा को न बदला जाए
प्रश्न: हम आपको कैसे सुनें? किस तरह आपसे अपनी जिज्ञासा व्यक्त करें? कैसे आपकी बात का मनन करें ताकि उसको हम पूर्णतया सही-सही ग्रहण कर सकें और किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकें?
उत्तर: जीने में इसको प्रमाणित करना चाहते हैं, तभी यह जिज्ञासा बनता है. सुनने का तरीका, सोचने का तरीका, सोचने में कहीं रुकें तो प्रश्न करने का तरीका, प्रश्न के उत्तर को पुनः अपने विचार में ले जाने का तरीका, अंततोगत्वा निश्चयन तक पहुँचने का तरीका - ये सब इसमें शामिल है. यह संवाद की अच्छी पृष्ठ-भूमि है, इस पर हमें ध्यान देने की ज़रूरत है.
इसमें पहली बात है जो सुनते हैं उसी को सुनें, उसमें मिलावट करने का प्रयत्न न करें। भाषा को न बदलें। भाषा से इंगित होने वाली वस्तु को न बदलें। अभी लोगों पर इस बात की गहरी मान्यता है कि "जिससे बात करनी है, उसी की भाषा में हमको बात करना पड़ेगा।" जबकि उस भाषा के चलते ही वह सुविधा-संग्रह के चंगुल में पहुँचा है. सुविधा-संग्रह को पूरा करने के उद्देश्य से ही उस सारी भाषा का प्रयोग है, जबकि वास्तविकता यह है कि सुविधा-संग्रह लक्ष्य पूरा होता नहीं है. इस संसार में सुविधा-संग्रह से मुक्त कोई भाषा ही नहीं है. चाहे १० शब्दों वाली भाषा हो या १० करोड़ शब्दों वाली भाषा हो. इस बात को सम्प्रेषित करने के लिए भाषा को बदलना होगा (ऐसा मैंने निर्णय किया). जिस भाषा से अर्थ बोध होता हो वह भाषा सही है. जिस भाषा में अर्थ बोध ही नहीं होना है, सुविधा-संग्रह का चक्कर ही बना रहना है, उस भाषा में इसको बता के भी क्या होगा? ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी तीन जात में सारे आदमी हैं. ये तीनों जात के आदमी सुविधा-संग्रह के चक्कर में पड़े हैं.
तो मूल बात की भाषा को न बदला जाए, उससे इंगित वस्तु को न बदला जाए. वस्तु (वास्तविकता) स्थिर है. यदि भाषा के साथ तोड़-मरोड़ करते हैं तो अर्थ बदल जाएगा, अर्थ बदला तो उससे वस्तु इंगित नहीं होगा।
मैंने जब इस बात को रखा तो कुछ लोगों ने कहा - "आप ऐसा कहोगे तो हम कुछ भी अपना नहीं कर पाएंगे?"
मैंने उनसे पूछा - इस भाषा को छोड़ के, कुछ और भाषा जोड़के आप क्या कर लोगे? सिवाय संसार को भय-प्रलोभन और सुविधा-संग्रह की ओर दौड़ाने के आप क्या कर लोगे? मूल बात की भाषा को बदलोगे तो आपका कथन वही सुविधा-संग्रह में ही जाएगा। धीरे-धीरे उनको समझ में आ गया कि जो कहा जा रहा है उसको उसी के अनुसार सुना जाए, समझा जाए और जी के प्रमाणित किया जाए. जी के प्रमाणित करने में कमी मिले तो इसको बदला जाए. जिए बिना कैसे इसको बदलोगे? इसको जिए नहीं हैं, पहले से ही इसमें परिवर्तन करने लगें तो वह आपकी अपनी व्याख्या होगी, मूल बात नहीं होगी।
परिवर्तन के साथ घमंड होता ही है. मूल बात का reference point छूट गया फिर. reference point छोड़ के हम संसार को सच्चाई बताने गए तो सवाल आएगा ही - इसका आधार क्या है? स्वयं अनुभव हुआ नहीं है तो क्या हालत होगी?
या तो इस घोषणा के साथ शुरू करो कि मैं अनुभव-संपन्न हूँ, प्रमाण हूँ. नहीं तो reference point से शुरू करो. अनुभव यदि हो भी गया तो किस आधार पर हुआ - यह प्रश्न आएगा। उसके उत्तर में जाएंगे तो मूल बात का reference ही आएगा।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Thursday, January 5, 2017
अनुभव की कसौटी
प्रश्न: मैं जो यह सोच रहा हूँ कि मैं भी अनुभव कर सकता हूँ, कहीं यह अत्याशा तो नहीं है?
उत्तर: हर जीवन में अनुभव करने वाला अंग (आत्मा) समाहित है ही. उसको आपको बनाना नहीं है, केवल प्रयोग करना है.
प्रश्न: आपकी बात की पूरी सूचना मिल चुकी है, ऐसा लगता है. इसको स्वीकारना है, यह भी निश्चित है. लेकिन अनुभव को लेकर बात करते हैं तो कुछ कहना नहीं बनता।
उत्तर: सूचना ग्रहण होने और इस प्रस्ताव के अनुरूप जीने का निश्चयन होने के बाद ही अनुभव होता है. यही क्रम है. हम बेसिलसिले में नहीं हैं, सिलसिले में हैं. अनुभव होके रहेगा क्योंकि जीवन की प्यास है अनुभव!
प्रश्न: "जागृति निश्चित है" यह तो ठीक है, पर कब कोई व्यक्ति अनुभव तक पहुंचेगा - इसकी कोई समय सीमा है या नहीं?
उत्तर: भ्रमित संसार में कितने समय में कौन जागृत होगा इसकी समय सीमा नहीं है. भ्रमित परंपरा जागृत हो सकता है - यहाँ हम आ गए हैं. इसमें एक व्यक्ति अनुभव संपन्न हुआ - प्रमाणित हुआ. उसके बाद दो व्यक्ति हुए, प्रमाणित हुए. फिर २००० का होना और फिर सम्पूर्ण मानव जाति का जागृत होना शेष है.
प्रश्न: मुझे कभी-कभी यह लगता है, यह मेरे वश का रोग है भी या नहीं? यदि मुझे अनुभव हो ही नहीं सकता तो मैं इसके अध्ययन में क्यों अपना सिर डालूँ?
उत्तर: आपका यह पूछना जायज है. इस बात की उपयोगिता को किस कसौटी पे तौला जाए? इसको "रूप" के साथ जोड़ के तौलोगे तो यह व्यर्थ लगेगा। इसको "बल" के साथ जोड़ के देखोगे तो यह व्यर्थ लगेगा। इसको "धन" के साथ जोड़ के देखोगे तो यह व्यर्थ लगेगा। इसको "पद" के साथ जोड़ के देखोगे तो यह व्यर्थ लगेगा। इसको "बुद्धि" के साथ जोड़ के देखोगे तो यह सार्थक लगेगा। यह केवल "लगने" की बात मैं कर रहा हूँ. रूप, बल, धन और पद के आधार पर मानव चेतना प्रमाणित नहीं होती। बुद्धि के आधार पर ही मानव चेतना प्रकट होती है. बुद्धि का प्रकाशन प्रमाण के आधार पर ही होता है. प्रमाण अनुभव के आधार पर ही होता है. अनुभव अध्ययन विधि से ही होगा। दूसरी विधि से होगा नहीं। दूसरी विधि है - साधना, समाधि, संयम. उसके लिए लेकिन आप अनुभव का मुद्दा ही नहीं बना पाएंगे। इस सब बात पर चर्चा तो होना चाहिए, मेरे अनुसार!
प्रश्न: इतना तो मुझे भास् होता है कि आपके पास कोई अनमोल सम्पदा है, जो मेरे पास नहीं है.....
उत्तर: इतना ही नहीं यह सम्पदा अभी प्रचलित परंपरा में भी उपलब्ध नहीं है. इसके बाद यह बात आती है - क्या यह सम्पदा एक से दूसरे में हस्तांतरित हो सकती है या नहीं? इसमें अभी तक जितना हम चले हैं, उसमें आपको क्या लगता है - यह हस्तांतरित हो सकती है या नहीं?
जितना अभी तक चले हैं, उससे यह तो लगता है कि आपकी बात हस्तांतरित होती है.
मुख्य बात इतना ही है. आपके प्रमाणित होने पर ही यह बात आपमें हस्तांतरित होगा। एक ही सीढ़ी बचा है. आपको यदि इस बात को हस्तांतरित करने वाला बनना है तो आपको अनुभव करना ही होगा, जीना ही होगा। ये दो ही बात है. इससे कम में काम नहीं चलेगा, इससे ज्यादा की जरूरत नहीं है. मैं यह मानता हूँ इस बात का प्रकटन मानव के सौभाग्य से हुआ है. मानव का सौभाग्य होगा तो इसे स्वीकारेगा। मानव को धरती पर बने रहना है तो परिवर्तन निश्चित है. मानव को धरती पर रहना नहीं है तो जो वह कर रहा है, वही ठीक है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
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