ANNOUNCEMENTS



Friday, April 10, 2026

न्याय-धर्म-सत्य प्रमाणित होने की आवश्यकता

सबसे कम समय में समझ में आने वाली बात सत्य है, उसके बाद धर्म है, उसके बाद न्याय है, उसके बाद संतुलन है, उसके बाद नियंत्रण है, उसके बाद नियम है.  इस तरह यह क्रम से बना है.  सत्य समझ में आने से ये सब क्रम से समझ आता है.  सत्य सबसे पहले समझ में आता है.  सत्य के आधार पर ही धर्म, धर्म के आधार पर न्याय, न्याय के आधार पर संतुलन, संतुलन के आधार पर नियंत्रण, नियंत्रण के आधार पर नियम समझ में आता है.  समझ का पूरा खाका इतना ही है.  मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम, नियंत्रण और संतुलन प्रकट है.  मानव को यह समझ में नहीं आया है, भाड़ झोंकने चला गया, उससे जहाँ पहुंचना था पहुँच गया.  मानव में न्याय-धर्म-सत्य समझ में आने के बाद नियम-नियंत्रण-संतुलन समझ में आता है, उसके पहले आता नहीं है.  मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम-नियंत्रण-संतुलन वर्तमान रहता है.  मानव में न्याय-धर्म-सत्य शिक्षा विधि में, व्यवस्था विधि में, कार्य विधि में प्रमाणित होने की आवश्यकता थी, वह आया नहीं।  न्याय-धर्म-सत्य समझ नहीं आने के कारण मानव ने मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ अपराध किया, जिससे मनुष्येत्तर प्रकृति असंतुलित-अनियंत्रित हो गयी.  न्याय व्यावहारिक होता है.  न्याय पूर्वक जीने की स्थिति में ही हम नियम, नियंत्रण, संतुलन को पहचान पाते हैं, उसके प्रयोजन को पहचान पाते हैं, निर्वाह कर पाते हैं.  इसके अलावा और कोई तरीका नहीं है.  इसके आगे पैसे के आधार पर, डंडे के आधार पर जो अहंकार को बनाये हैं, उसका सत्यानाश होगा या नहीं?  पैसे और डंडे के आधार पर जो अहंकार बनाये हैं, उसका मृत्यु होगा।  reservation और specialisation के आधार पर जो अहंकार बनाये हैं, उसका मृत्यु होगा।  ये चारों मानव द्वारा बनाये गए अहंकार का स्त्रोत हैं.  यह विज्ञान विधि से आया है.  इससे पहले आदर्शवाद में ज्ञान बहुत दुर्लभ है, ऐसी चर्चा करते रहे.  ज्ञान किसी विशेष गुण वाले के लिए ही है - ऐसा पहले सोचा गया.  अभी हम कह रहे हैं, सभी को ज्ञान सुलभ है, सभी ज्ञान संपन्न होने का अधिकार रखते हैं, उसके योग्य शिक्षा-संस्कार बनाने की ज़रूरत है.  इसमें कोई-कोई पुण्यशील काम करेंगे, ऐसा मेरा सोच है.  स्वयंस्फूर्त विधि से मानव न्याय करे, इसके योग्य शिक्षा-संस्कार को प्रस्तुत करने की आवश्यकता था, वह कर दिया।  शिक्षा-संस्कार विधि से ही आदमी अपराध करने में स्वयंस्फूर्त हुआ है, शिक्षा-संस्कार विधि से आदमी न्याय करने में स्वयंस्फूर्त होगा।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

No comments: