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Friday, March 6, 2026

विज्ञानमय कोष

 प्रश्न:  “भ्रमित मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को प्रकाशित करते हुए, विज्ञानमय कोष के सक्रिय न होने के कारण, कर्म करते समय स्वतन्त्र और फल भोगते समय परतंत्र है.” - इसको समझाइये।

उत्तर:  शरीर मूलक विधि से मानव जीवन में चित्त का अधूरा भाग (चित्रण) काम करता रहता है, इसलिए ऐसा होता है.  यही जीव चेतना है.  जीव चेतना में विज्ञानमय कोष सक्रिय नहीं रहता है.  अनुभवमूलक विधि से ही विज्ञानमय कोष सक्रिय होता है, जो ज्ञान-विवेक-विज्ञान सम्पन्नता है.  आत्मा और बुद्धि में ही विज्ञानमय कोष है.  इनकी क्रियाशीलता से ही पूरा जीवन अनुभव को प्रमाणित कर पाता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Thursday, March 5, 2026

परम्परा विधि से अध्ययन

अर्थ समझ में आना साक्षात्कार है.  वस्तु वास्तविकता को व्यक्त करता है.  साक्षात्कार का मतलब है - वस्तु को होने और रहने के रूप में पहचानना।  अस्तित्व में सभी कुछ होने और रहने के स्वरूप में है.  एक के बाद एक वस्तु का क्रमिक रूप में साक्षात्कार होता है.  चारों अवस्थाओं का पूरा साक्षात्कार होता है, तो अनुभव होता ही है.  अध्ययन विधि में साक्षात्कार में ही जो समय लगना है वो लगता है.  

आत्मा में अनुभव करने की क्षमता रहता ही है.  इसके साक्षी में हम अध्ययन करते हैं.  अध्ययन कराने वाला अपने अनुभव की रौशनी में ही अध्ययन कराता हैं.  अध्ययन करने वाले के साथ “स्मरण” और “साक्षी” रहता है.  अध्ययन कराने वाले के साथ “प्रमाण” रहता है.  इस तरह परम्परा विधि से अध्ययन होता है.  इस विधि में अध्ययन करने वाला भी होगा, अध्ययन कराने वाला भी होगा।  किसी व्यक्ति को स्वीकारे बिना अध्ययन कैसे होगा?     


पहले साक्षात्कार का अवधारणा बोध होता है, जिसका संकल्प होता है.  इसका नाम है प्रतीति।  अर्थात, साक्षात्कार होने से प्रमाणित करना संभव है, यह प्रतीत होता है.  सहअस्तित्व में अनुभव होता है.  फिर अनुभव होने पर अनुभव का बोध होता है, जिससे संकल्प अब ऋतम्भरा हो गया.  ऋतम्भरा का मतलब - सत्य पूर्ण संकल्प।  अनुभव मूलक विधि से ही ऋतम्भरा आता है, उससे पहले आता नहीं है. अर्थात अब सत्य को प्रमाणित कर सकते हैं, या प्रमाणित करने की योग्यता आ गयी.   प्रमाणित करने की योग्यता के साथ चित्त में चिंतन होता है, उसके उपरान्त चित्रण, तुलन, विश्लेषण, आस्वादन, चयन क्रिया विधि से प्रमाणित होना हो जाता है.  चयन तो मानव परम्परा में ही होगा, चारों अवस्थाओं के साथ ही होगा।  प्रमाणित होने के क्रम में मूल्यों की अभिव्यक्ति है.  संबंधों का निर्वाह होने से मूल्यों का निर्वाह होता है.  संबंधों का निर्वाह नहीं हो पाना ही भ्रम है.  जीव चेतना में संबंधों का निर्वाह नहीं हो पाता है.  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Tuesday, March 3, 2026

जीने का common model

जंगल युग से ग्राम युग, ग्राम युग से राज युग, राज युग से विज्ञान युग तक इतना समय जो मानव धरती पर जिया, उसके करने से धरती बीमार हो गयी.  धरती बीमार होने पर आगे पीढ़ी कहाँ रहेगा?  इस अपराध से मुक्ति का उपाय खोजना होगा या नहीं?  भौतिकवादी विधि से इसका कोई उत्तर नहीं है, आदर्शवादी विधि से इसका कोई उत्तर नहीं है.  सहअस्तित्ववादी विधि से इसके लिए प्रस्ताव है.  

भौतिकवादी विधि से मानव के जीने का मॉडल निकला - सुविधा-संग्रह।  आदर्शवादी विधि से मानव के जीने का मॉडल निकला - भक्ति-विरक्ति।  अपने-पराये का दूरी भक्ति-विरक्ति बनाया ही है.  विरक्ति का पालन करने वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्तियों से दूर हो गया या नहीं?  सुविधा-संग्रह के चलते अमीरी-गरीबी की दूरियाँ हो गयी या नहीं?  ये दूरियाँ बने हुए कैसे सर्वमानव का जीने का common model बने, आप ही बताओ!  बल्कि इनके चलते धरती बीमार हो गयी. 

सहअस्तित्ववादी विधि से जीने का common model launch किया - समाधान-समृद्धि।  क्या इसको challenge किया जा सकता है?  इससे दूर भागा जा सकता है, इसको challenge किया नहीं जा सकता।  समाधान-समृद्धि पूर्वक हर परिवार जी सकता है.  समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि।  यह चाहिए या नहीं चाहिए?  

मानव अनादिकाल से शुभ चाह ही रहा है.  इस क्रम में मनाकार को साकार तो वह कर लिया, किन्तु मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने का पक्ष वीरान रहा है.  उसके लिए यह प्रस्ताव है.  मनः स्वस्थता को प्रमाणित किये बिना मानव के जीने का common model कैसे निकलेगा?  इससे पहले आदर्शवाद और भौतिकवाद मानव के जीने का common model नहीं निकाल पाया।  जीने का common model के लिए प्रयास किया जाए या नहीं किया जाए?  जीने के common model का प्रमाण मैं हूँ. यह आपको स्वीकार होता है तो आप में किसी कोने में जो जिम्मेदारी है, उसको निर्वाह किया जाए.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, March 2, 2026

परिवर्तन की सम्भावना

मध्यम वर्गीय कहलाने वाले जो intellects हैं, उन में यह कामना दिखती है कि और कुछ सटीक होना चाहिए, इनमे सत्य के प्रति अपेक्षा है।  अतः ये लोग पहले समझेंगे।  इसीलिये परिवर्तन की सम्भावना है, ऐसा मैं मानता हूँ.  जो निम्न वर्गीय कहलाने वाले अभाव ग्रस्त लोग हैं उनसे कुछ नहीं होगा, उच्च वर्गीय कहलाने वाले जो बहुत ज्यादा संग्रह-सुविधा में लिप्त हो गए हैं - उनसे भी कुछ नहीं होगा।  मध्यम वर्गीय लोग समझने के बाद निम्न वर्गीय लोग समझेंगे, उसके बाद उच्च वर्गीय लोग समझेंगे।

 - श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Sunday, March 1, 2026

सहीपन के लिए संकल्प

हर पीढ़ी का अगली पीढ़ी के साथ generation gap जो दिखता है, उसकी जरूरत है या नहीं?  generation gap की ज़रूरत महसूस होता है, तो जो चल रहा है उसी के साथ continue किया जाए.  generation gap का जरूरत महसूस नहीं होता है तो इस विकल्प को सोचा जाए.


इस विकल्प से समझदारी पूरा होता है या नहीं, यह जांचने का अधिकार आपके पास है.  


जहाँ कहीं भी आप हैं, उसमें श्रम से जी सकते हैं या नहीं - इसको तय करने में आप समर्थ हैं.


फिर हमारी जो अभी जिम्मेदारियां हैं - बच्चे हैं, बड़े हैं उनकी तरफ.  उसके लिए जो अभी तक हमने उपार्जित किया, वो पर्याप्त है या नहीं।  उसको आप judge कर सकते हैं.


इन चार बातों पर यदि आप निष्कर्ष निकाल लें तो आगे की बात सोच सकते हैं.  इनमें से कोई भी बात छोड़ करके आप भाग नहीं सकते।  


सहीपन के लिए यदि हम संकल्प करते हैं तो वह आराम से सफल हो जाता है.  इसके विपरीत आदर्शवाद में बताया गया था - श्रेयांसि बहु विघ्नानि भवन्ति महतामपि।  अर्थात, सहीपन के लिए तुम चलना चाहते हो, तो विध्न बहुत हैं.  मेरा सोचना इससे बिल्कुल विपरीत है.  श्रेय के लिए कोई काम करता है तो उसके लिए बहुत सहायता बन ही जाती है.  सहीपन के लिए आदमी प्रयत्न करने से कोई तकलीफ नहीं है, सभी सुखद है.  मेरे अनुभव के अनुसार ऐसा ही है.  सहीपन के लिए अवधारणा न होने से तकलीफ होती ही है.  मनमानी कुछ करेंगे तो विध्न होगा ही.   


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

जीव और मानव

 प्रश्न: जीव शरीरों को संचालित करने वाले जीवन और मनुष्य शरीर को संचालित करने वाले जीवन में क्या अंतर है?

उत्तर:  मनुष्य शरीर को चलाने वाला जीवन कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को व्यक्त करता है, जबकि जीव शरीर को चलाने वाला जीवन ऐसा नहीं करता।  मनुष्य शरीर में मेधस रचना ऐसी बनी है जिससे जीवन का कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता प्रकट होता है.  जीव शरीरों के मेधस तंत्र में यह व्यवस्था नहीं है.  बहुत से जीवों में मानव के संकेत ग्रहण करने का अधिकार रखा है, किन्तु अपनी कल्पनाशीलता-कर्मस्वतंत्रता उनमे कुछ नहीं है.  इससे जीव कर्म करते समय भी परतंत्र है, फल भोगते समय भी परतंत्र है.  मानव कर्म करते समय में स्वतन्त्र है, फल भोगते समय परतंत्र है.  इसके आगे मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु की खोज करता है.  जीवों में यह बात नहीं है.  उनका आचरण उनके वंश परंपरा के अनुसार ही रहता है.  मानव में ज्ञान के अनुसार आचरण करने का प्रावधान है.  यह अभी तक तय ही नहीं हो पाया।  कैसा आचरण होना चाहिए - इसको बताने वाले एक से बढ़ कर एक अहमता वाले संसार में बैठे हैं!  


मानव और देवमानव में ये अंतर है कि मानव minimum beautiful है, उससे अच्छा देवमानव है. उसके लिए प्रयत्न मानव में होती रहती है.  मानव द्वारा दिव्यमानव पद को प्राप्त करने के लिए देवमानव बीच में स्थिति है.  दिव्यमानव पद में पहुँचने के बाद पुनः वापस नहीं होता।  वह संक्रमण है.  इस तरह - गठन पूर्णता के साथ जीव चेतना की सीमा में जीना होता है.  मानव चेतना में जीने से क्रिया पूर्णता हो गयी.  दिव्य चेतना में पहुँचने के बाद आचरण पूर्णता हो गयी.  पूर्णता के ये तीन stages हैं.  मानव पद में जो आचरण निश्चित हो गया, वह आचरण देवमानव भी करेगा, दिव्यमानव भी करेगा।  मानवीयता पूर्ण आचरण इनमें यथावत बना रहता है.  इनमें अंतर केवल उपकार करने में होता है.  मानव जितना उपकार करता है उससे ज्यादा देव मानव उपकार करता है, पूर्ण रूप में दिव्य मानव उपकार करता है.  आचरण में तीनों समान हैं.  इसीलिए मानव पद को base माना है.  इसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता।  मानव का आचरण, स्वभाव और दृष्टि पूर्वक जीना संभव है या नहीं - इसको आप जाँचिए।  यदि संभव है तो हम क्या प्रमाणित हो पाते हैं या नहीं - इसको सोचा जा सकता है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Saturday, February 28, 2026

विकास और जागृति

अनुभव होने के रूप में होता है या और किसी रूप में होता है?  होना मतलब अस्तित्व।  हवा के होने के आधार पर हवा का अनुभव है.  धरती के होने के आधार पर धरती का अनुभव है.  पानी के होने के आधार पर पानी का अनुभव है.  होने का ही अध्ययन है, होने का ही अनुभव है.  होने का अनुभव पूर्वक ही न्याय धर्म सत्य पूर्वक जीना प्रमाणित होता है.  

विज्ञान ने ऐसा माना - हमको जो बर्बाद करना है, वो अध्ययन है.  हमको जो बर्बाद करना है, वो प्रयोग है.  इसको सुविधा-संग्रह के आधार पर विकास मान लिया।  दूसरे, जो ज्यादा मार-पीट कर सके उसको ज्यादा विकसित मान लिया।  और कोई आधार नहीं है.  इस ढंग से जो होना था, वह हो ही चुका है.


अब यह सोचा जाए - न्याय पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  समाधान पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  सत्य पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  इसके साथ नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  इस तरह इन 6 बिंदुओं में हम विकास और जागृति को पहचान सकते हैं.  अब हमको निर्णय करना है - शोषण और मारपीट करना विकास और जागृति है या न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जीना विकास और जागृति है?


अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है.  इसी से, इसी में, इसी के लिए अध्ययन है.  इसको छोड़ करके हम जो कुछ अध्ययन करते हैं वो मिथ्या हो जाता है, अपराध के लिए रास्ता बन जाता है.  सहअस्तित्व को भुलावा दे कर हमने कुछ भी अध्ययन किया, तो वह अपराध की जगह में पहुँच जाता है या चुप होने की जगह में पहुँच जाता है.  प्रयोग में आ जाएंगे तो अपराध करेंगे, रहस्य में फंसेंगे तो चुप हो जायेंगे।  यह बात तयशुदा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)