सामान्य रूप में हम शरीर को ही जीवन मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है. परमाणु में विकास और विकास क्रम को समझा। परमाणु में अंशों का घटना-बढ़ना देखा जाता है. यह घटना-बढ़ना क्यों है? कोई ऐसी स्थिति है, जिसमें घटना-बढ़ना नहीं है, वहाँ तक पहुंचना है. यह धरती पर भूखे परमाणु और अजीर्ण परमाणु के रूप में मिलते हैं. सभी अजीर्ण परमाणु विकीरणीयता को प्रसारित करते हैं. भूखे परमाणु विकीरणीयता प्रसारित नहीं करते। भूखे परमाणुओं में अंशों को ग्रहण करना और छोड़ना बना रहता ह। अजीर्ण परमाणुओं में अंशों को छोड़ने की ज्यादा प्रवृत्ति बनी रहती है. इस प्रकार आदान-प्रदान हो करके अनेक प्रजाति के परमाणु इस धरती पर रचित हुए. इसकी आवश्यकता ऐसे प्रतीत होती है, प्राणावस्था के प्रकटन के लिए उसका भ्रूण पदार्थावस्था में तैयार होना आवश्यकता रही, इसी लिए इतने सब प्रजाति के परमाणु तैयार हुए. इस तरह परमाणु में विकास के क्रम में धरती अपने में पदार्थावस्था से समृद्ध हुई. विकास के स्वरूप को गठनपूर्ण परमाणु के रूप में पहचाना। गठनपूर्णता का आशय है - गठन में तृप्ति। मध्यांश से लेकर परिवेशीय अंशों तक भर गए. इससे ज्यादा हो नहीं सकता, इससे कम हो नहीं सकता - इस जगह में आ गए. इसमें अब न कोई अंश घट सकता है, न बढ़ सकता है. ऐसा परमाणु अपने में अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त हो जाता है, स्वयं स्फूर्त विधि से. इसमें मनुष्य का कोई हाथ नहीं है.
अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त होकर जीवन आशा-बंधन से शुरुआत करता है. आशा यहाँ है - जीने की आशा. जीवन पद में संक्रमित होने पर जीने की आशा होना स्वाभाविक है. जीने के लिए यह अपना कार्य-गति पथ स्थापित करता है, जो अपने में एक आकार होता है. उस आकार का शरीर भौतिक-रासायनिक रूप में बनी रहती है, उस शरीर को वह चलाता है. इसी क्रम में मानव शरीर को चलाने के लिए जीवन प्रस्तुत हुआ. जीव शरीर और मानव शरीर में यही अंतर देखने को मिला, जीव शरीर में कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने का व्यवस्था नहीं है. मानव शरीर में जीवन सहज कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने की बात देखा गया. इस आधार पर जीवन जब शरीर को जीवन मानता है तो साढ़े चार क्रियाएं व्यक्त होती हैं. शरीर को जीवन मानने से चयन-आस्वादन के साथ, तुलन-विश्लेषण में से तुलन में प्रिय-हित-लाभात्मक तुलन करने योग्य होता है, उसके अनुसार चित्रण करता है. इस ढंग से साढ़े चार क्रिया में जीवन तृप्ति का सम्भावना बना नहीं। जीवन अतृप्त रहते हुए, जीवन स्वयं को शरीर मानते हुए, जीव चेतना को अपना करके, शरीर को जीवंत बनाते हुए, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध इन्द्रियों को राजी करने के लिए प्रयत्न करते रहा। इसी क्रम में आहार-आवास-अलंकार और दूरगमन-दूरश्रवण-दूरदर्शन सम्बन्धी वस्तुओं को प्राप्त कर लिया। इनको प्राप्त करने के बाद भी सुखी नहीं हुआ, तब मानव की परिभाषा से पता चला कि क्या कमी रह गयी. कमी यह रही - मनाकार को साकार करने में तो मानव सफल हुआ, पर मनः स्वस्थता को प्रमाणित नहीं कर पाया। मनः स्वस्थता के बारे में पता चला, समाधान ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है. मनः स्वस्थता यदि प्रमाणित होता है तो सर्वतोमुखी समाधान होता है, जागृति होती है, हम सार्वभौमता-अखंडता में जी पाते हैं. इन सबके आने से मानव चेतना प्रमाणित होती है. अभी जीव चेतना में जीते हुए हमें मानव चेतना का पता ही नहीं रहा. अभी अपने शोध से, अनुसन्धान से पता चला कि जीव चेतना के बाद मानव चेतना है, मानव चेतना के बाद देव चेतना है, देव चेतना के बाद दिव्य चेतना है. इस प्रकार चेतना विकास की सम्भावना बनी हुई है.
अभी सर्वप्रथम मानव चेतना में प्रवेश करने की आवश्यकता है, तभी परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में जीना बनेगा। इसके साथ हम जीवन की दसों क्रियाओं को प्रमाणित करते हैं. तुलन जो आधा हुआ था, उसमें न्याय-धर्म-सत्य जुड़ जाता है, उसके बाद चित्त में साक्षात्कार होता है, उसके बाद संकल्प होता है, उसके बाद अनुभव होता है, अनुभव होने के फलस्वरूप प्रमाण होता है, वह प्रमाण पुनः बोध व संकल्प में आता है, पुनः वह चित्त में चिंतन व चित्रण रूप में आता है, उसका पुनः वृत्ति में तुलन होता है, जिससे व्यवहार में न्याय-धर्म-सत्य के प्रमाणित होने का स्वरूप बनता है, जिसका हम आस्वादन करते हैं और प्रमाणित करने के लिए संबंधों का चयन करते हैं. इस प्रकार मानव सम्बन्ध और प्रकृति सम्बन्ध - इन दोनों संबंधों का हम निर्वाह करते हैं, इस प्रकार व्यवस्था में जीना बन जाता है. व्यवस्था में जीने के लिए जीवन की दसों क्रियाएं प्रयुक्त होता ही है. अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में जीना नहीं है तो दसों क्रियाएं प्रमाणित होगा ही नहीं। जीवन की दसों क्रियाएं जब कभी भी प्रमाणित होगा - अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में ही प्रमाणित होगा. उसका स्वरूप बना - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जीना। इस प्रकार दस क्रियायें यदि क्रियान्वित होते हैं तो मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) सुगम हो जाता है. हरिहर!
श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)