ANNOUNCEMENTS



Wednesday, June 10, 2026

जीवन के स्वरूप को समझना

 


सामान्य रूप में हम शरीर को ही जीवन मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.  परमाणु में विकास और विकास क्रम को समझा।  परमाणु में अंशों का घटना-बढ़ना देखा जाता है.  यह घटना-बढ़ना क्यों है?  कोई ऐसी स्थिति है, जिसमें घटना-बढ़ना नहीं है, वहाँ तक पहुंचना है.  यह धरती पर भूखे परमाणु और अजीर्ण परमाणु के रूप में मिलते हैं.  सभी अजीर्ण परमाणु विकीरणीयता को प्रसारित करते हैं.   भूखे परमाणु विकीरणीयता प्रसारित नहीं करते।  भूखे परमाणुओं में अंशों को ग्रहण करना और छोड़ना बना रहता ह।  अजीर्ण परमाणुओं में अंशों को छोड़ने की ज्यादा प्रवृत्ति बनी रहती है.  इस प्रकार आदान-प्रदान हो करके अनेक प्रजाति के परमाणु इस धरती पर रचित हुए.  इसकी आवश्यकता ऐसे प्रतीत होती है, प्राणावस्था के प्रकटन के लिए उसका भ्रूण पदार्थावस्था में तैयार होना आवश्यकता रही, इसी लिए इतने सब प्रजाति के परमाणु तैयार हुए.  इस तरह परमाणु में विकास के क्रम में धरती अपने में पदार्थावस्था से समृद्ध हुई.  विकास के स्वरूप को गठनपूर्ण परमाणु के रूप में पहचाना।  गठनपूर्णता का आशय है - गठन में तृप्ति।  मध्यांश से लेकर परिवेशीय अंशों तक भर गए. इससे ज्यादा हो नहीं सकता, इससे कम हो नहीं सकता - इस जगह में आ गए.  इसमें अब न कोई अंश घट सकता है, न बढ़ सकता है.  ऐसा परमाणु अपने में अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त हो जाता है, स्वयं स्फूर्त विधि से.  इसमें मनुष्य का कोई हाथ नहीं है.  


अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त होकर जीवन आशा-बंधन से शुरुआत करता है.  आशा यहाँ है - जीने की आशा.  जीवन पद में संक्रमित होने पर जीने की आशा होना स्वाभाविक है.  जीने के लिए यह अपना कार्य-गति पथ स्थापित करता है, जो अपने में एक आकार होता है.  उस आकार का शरीर भौतिक-रासायनिक रूप में बनी रहती है, उस शरीर को वह चलाता है.  इसी क्रम में मानव शरीर को चलाने के लिए जीवन प्रस्तुत हुआ.  जीव शरीर और मानव शरीर में यही अंतर देखने को मिला, जीव शरीर में कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने का व्यवस्था नहीं है.  मानव शरीर में जीवन सहज कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने की बात देखा गया.  इस आधार पर जीवन जब शरीर को जीवन मानता है तो साढ़े चार क्रियाएं व्यक्त होती हैं.  शरीर को जीवन मानने से चयन-आस्वादन के साथ, तुलन-विश्लेषण में से तुलन में प्रिय-हित-लाभात्मक तुलन करने योग्य होता है, उसके अनुसार चित्रण करता है.  इस ढंग से साढ़े चार क्रिया में जीवन तृप्ति का सम्भावना बना नहीं।  जीवन अतृप्त रहते हुए, जीवन स्वयं को शरीर मानते हुए, जीव चेतना को अपना करके, शरीर को जीवंत बनाते हुए, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध इन्द्रियों को राजी करने के लिए प्रयत्न करते रहा।  इसी क्रम में आहार-आवास-अलंकार और दूरगमन-दूरश्रवण-दूरदर्शन सम्बन्धी वस्तुओं को प्राप्त कर लिया।  इनको प्राप्त करने के बाद भी सुखी नहीं हुआ, तब मानव की परिभाषा से पता चला कि क्या कमी रह गयी.  कमी यह रही - मनाकार को साकार करने में तो मानव सफल हुआ, पर मनः स्वस्थता को प्रमाणित नहीं कर पाया।  मनः स्वस्थता के बारे में पता चला, समाधान ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है.  मनः स्वस्थता यदि प्रमाणित होता है तो सर्वतोमुखी समाधान होता है, जागृति होती है, हम सार्वभौमता-अखंडता में जी पाते हैं.  इन सबके आने से मानव चेतना प्रमाणित होती है.  अभी जीव चेतना में जीते हुए हमें मानव चेतना का पता ही नहीं रहा.  अभी अपने शोध से, अनुसन्धान से पता चला कि जीव चेतना के बाद मानव चेतना है, मानव चेतना के बाद देव चेतना है, देव चेतना के बाद दिव्य चेतना है.  इस प्रकार चेतना विकास की सम्भावना बनी हुई है.  


अभी सर्वप्रथम मानव चेतना में प्रवेश करने की आवश्यकता है, तभी परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में जीना बनेगा।  इसके साथ हम जीवन की दसों क्रियाओं को प्रमाणित करते हैं.  तुलन जो आधा हुआ था, उसमें न्याय-धर्म-सत्य जुड़ जाता है, उसके बाद चित्त में साक्षात्कार होता है, उसके बाद संकल्प होता है, उसके बाद अनुभव होता है, अनुभव होने के फलस्वरूप प्रमाण होता है, वह प्रमाण पुनः बोध व संकल्प में आता है, पुनः वह चित्त में चिंतन व चित्रण रूप में आता है, उसका पुनः वृत्ति में तुलन होता है, जिससे व्यवहार में न्याय-धर्म-सत्य के प्रमाणित होने का स्वरूप बनता है, जिसका हम आस्वादन करते हैं और प्रमाणित करने के लिए संबंधों का चयन करते हैं.  इस प्रकार मानव सम्बन्ध और प्रकृति सम्बन्ध - इन दोनों संबंधों का हम निर्वाह करते हैं, इस प्रकार व्यवस्था में जीना बन जाता है.  व्यवस्था में जीने के लिए जीवन की दसों क्रियाएं प्रयुक्त होता ही है.  अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में जीना नहीं है तो दसों क्रियाएं प्रमाणित होगा ही नहीं।  जीवन की दसों क्रियाएं जब कभी भी प्रमाणित होगा - अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में ही प्रमाणित होगा.  उसका स्वरूप बना - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जीना।  इस प्रकार दस क्रियायें यदि क्रियान्वित होते हैं तो मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) सुगम हो जाता है.  हरिहर! 


प्रश्न: अभी जो साढ़े चार क्रिया में जी रहे हैं, तो बाकी साढ़े पाँच क्रियाएं कहाँ रहता है? उत्तर: क्रिया तो रहता है, पर प्रकट नहीं रहता है. जीवन का ध्यान उन क्रियाओं की ओर नहीं गया है. जैसे, अपने ही घर में कोई चीज़ ढका रहता है, पड़ा रहता है बरसों - वैसा हो गया. अनदेखी कर दिया। उस ओर ध्यान नहीं दिया। प्रश्न: जीवन में बल का क्या स्वरूप है? उत्तर: जीवन में अलग-अलग बल होता नहीं। अध्ययन के लिए जीवन के चार परिवेशों में बल-शक्ति स्वरूप में बताया है. स्थिति में बल, गति में शक्ति। मन अपने स्थिति में आस्वादन क्रिया है, गति में चयन क्रिया है. मन आस्वादन में बल प्रयोग किया रहता है, चयन में शक्ति के रूप में गतित रहता है. इसी प्रकार वृत्ति में स्थिति में तुलन बल है, उसका गति बनता है वह विश्लेषण है, जो दूर दूर तक पहुँचता है. इसी प्रकार चित्त में साक्षात्कार/चिंतन बल है, वही चित्रण रूप में दूर दूर तक पहुँचती है. उसी प्रकार बुद्धि में बोध बल है, एक तो अध्ययन से सत्य बोध और दूसरे अनुभव मूलक विधि से अनुभव प्रमाण बोध. बुद्धि में बोध स्थिति में ही होता है, संकल्प दूर दूर तक पहुँचती है. इसी प्रकार अनुभव आत्मा का बल होता है, प्रामाणिकता शक्ति होती है - जो प्रमाणित होता है. इस ढंग से पांच बल और पांच शक्तियों को अनुभव करने की बात है. ये बल और शक्तियाँ अक्षय हैं. जीवन शक्तियां और बल - ये घटने वाला नहीं हैं. जितना ज्यादा इनका प्रयोग करते हैं, उतना ज्यादा ये प्रखर होती हैं. शरीर शक्तियां क्षरणशील हैं, जीवन शक्तियाँ अक्षय हैं. जीवन अमर है. जीवन क्रियाओं को देख कर, शरीर क्रियाओं को देख कर - हम जीवन और शरीर को अलग अलग पहचान पाते हैं. आचरण के आधार पर हर वस्तु की पहचान होती है. जैसे कोई पक्षी या जीव के आचरण को देख कर ही हम अंगुलीन्यास कर पाते हैं कि यही वह जीव है. वनस्पतियों के आचरण को देख कर ही हम उनकी पहचान करते हैं. उसी प्रकार लोहे, मिट्टी, पत्थर को उनके आचरण के आधार पर हम उनकी पहचान करते हैं. इसी प्रकार हम जीवन के आचरण और शरीर के आचरण को देख करके जीवन को अपने स्वरूप में पहचानते हैं, शरीर को अपने स्वरूप में पहचानते हैं. इस ढंग से जीवन की दसों क्रियाओं के साथ जागृति पूर्वक जीना बनता है. साढ़े चार क्रिया में भ्रम पूर्वक जीता है. शरीर को जीवन मान लेना भ्रम है. शरीर को शरीर ही माना जाए, जीवन को जीवन ही माना जाए - इसमें कौनसे ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी को तकलीफ है? ना समझें, हठ प्रवृत्ति का प्रयोग करें, भाग जाएँ - यह संभव है. इससे भाग करके कहाँ जाओगे? भागते भागते कहीं न कहीं थकोगे ही. इससे भागना बनता नहीं है. अपनाने में जितना देरी लगाना है वो लगा सकते हैं. इससे भागते हैं, तो थकते ही है. सारी परिस्थितियां इस प्रस्ताव के अनुकूल हो रही हैं. इसी लिए हम सोच रहे हैं कि यह लोकगम्य होगा, लोकव्यापीकरण होगा, सर्वशुभ की प्रवृत्ति मानव में बनेगी, अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में जीने का मौका मिलेगा। प्रश्न: चित्रण क्रिया को स्पष्ट करें? उत्तर: चित्रण दोनो तरीके से होता है - अनुभव मूलक विधि से, और शरीर मूलक विधि से. शरीर मूलक विधि से पाँचों संवेदनाओं को राजी होने या नाराज होने के अर्थ में सहमति और असहमति का चित्रण होता है. जीवन अक्षय बल और शक्ति संपन्न है, उसको कोई भौतिक वस्तु की ज़रूरत नहीं है. जीवन की जरूरत अपने कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु रुपी जागृति को प्रमाणित करना है. इसी लिए वह बारम्बार शरीर यात्रा को करता है. मानव परम्परा में इसकी सम्भावना नहीं होने के कारण बारम्बार असफल हो कर जाता है. इससे पता चलता है - जीवन को अपने ढंग से काम करने योग्य शिक्षा को हमने विकसित नहीं किया, उसको विकसित करने की आवश्यकता है. आचरण को विकसित नहीं किया, आचरण को विकसित करने की आवश्यकता है. संविधान को विकसित नहीं किया, संविधान को विकसित करने की आवश्यकता है. व्यवस्था को विकसित नहीं किया, व्यवस्था को विकसित करने की आवश्यकता है. शिक्षा में प्रवेश कराने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं. सम्बन्ध का चित्रण होता ही है. सम्बन्ध के नाम का चित्रण है, उसके बाद उसके प्रयोजन का चित्रण है. जैसे माँ एक सम्बन्ध का नाम है, माँ के सम्बन्ध का प्रयोजन है - पोषण। शरीर का पोषण, ज्ञान का पोषण, विवेक का पोषण, विज्ञान का पोषण, व्यव्हार का पोषण, भाषा का पोषण। सभी विधा में पोषण। पोषण प्रधान संरक्षण माँ है. संरक्षण प्रधान पोषण पिता है. सभी विधा में मानव मानव-चेतना पूर्वक जिए - यही पोषण का आधार बनता है. जीव चेतना विधि से सभी विधाओं में पोषण करना बन नहीं पाता है. इसी लिए मानव का मानव चेतना में प्रवेश होना आवश्यक है ताकि वह अपनी संतान को मानव चेतना में पारंगत बना सके. तभी माता-पिता की जिम्मेदारी पूरी हुई. संतान को हम पैदा करें, उसका पोषण दूसरा कोई करे - यह कहाँ तक न्याय हुआ? जीव चेतना में संतान पैदा किया, दो चार दिन उसको चूमा चाटा, उसके बाद छोड़ दिया। इस पद्दति को छोड़ के, यदि हर अभिभावक मानव चेतना विधि से अपनी संतान का पोषण-संरक्षण करते हैं तो अखंड-समाज सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना सुगम हो जाता है. इसी क्रम में शिक्षा के स्वरूप का चित्रण होता है, स्वास्थ्य का चित्रण होता है, स्वस्थ रहने की विधि का चित्रण होता है, उसके क्रियान्वयन का चित्रण होता है. मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ हम अनेक प्रकार के यंत्रों को चित्रित करते हैं, उनको प्रयोजित करते हैं. इसी प्रकार विश्वास निर्वाह का चित्रण होता है, सहयोगिता भाव का चित्रण, सहकारिता भाव का चित्रण करने में कोई दिक्क्त नहीं है. नकारात्मक चित्रण इतने किए हैं, सकारात्मक चित्रण भी कर सकते हैं. अपराध का चित्रण सीमित हैं, न्याय पक्ष का चित्रण असीमित है. चित्रण विधि से हमारा विचार परिष्कृत होता है. संकल्प विधि से स्वीकार होता है. अनुभव विधि से प्रमाणित हो जाता है. इस क्रम से हम निकलते हैं तो हमारा सुखी होना बन ही जाता है, हम अपराध मुक्त हो जाते हैं, समृद्धि पूर्वक जीना बन जाता है, समाधान को प्रमाणित करना बन जाता है. सर्वमानव में इसकी आवश्यकता तो बना ही है.


प्रश्न: शरीर के डिज़ाइन को देखें, जैसे आँख, दाँत, सभी तंत्र को देख के हम बहुत चमत्कृत होते हैं.  यह सब स्वयंस्फूर्त विधि से प्रकट हुआ है, इस पर विश्वास नहीं बन पाता।


उत्तर: अभी तक यही सोचे कि सृष्टि को बनाने वाला कोई बैठा है.  उस कारण यह भ्रम है.  ऐसा कुछ नहीं है.  अस्तित्व में व्यापक वस्तु का महिमा है, एक-एक वस्तु में स्वीकारने की महिमा है, इन दोनों मिल करके अस्तित्व में पूरा डिज़ाइन अपने आप में स्वयंस्फूर्त है.  दो अंश के परमाणु का तीन अंश वाले परमाणु के रूप में होने को कौन कहा?  यह स्वयंस्फूर्त हुआ.  इसी प्रकार यौगिक क्रिया होने को कौन डिज़ाइन किया?  स्वयं स्फूर्त हुआ.  गठन पूर्ण होने के लिए कौन मजबूर किया?  स्वयं स्फूर्त हुआ.  हम जहाँ पहुंचे हैं, इसके आगे चलने के लिए हमको कोई मजबूर करेगा - ऐसा देखने को मिलता नहीं है.  प्रेरणा एक दूसरे के साथ बना ही है, पर हमको मजबूर करेगा ऐसा कोई नहीं है.  


परमाणु में कोई आँख कान नाक कुछ भी नहीं है, पर क्रिया तो है ही.  किन्तु उसमें ध्वनि होता है, विद्युत् होता है, चुंबकीयता होता है.  इसमें सम विषम और मध्यस्थ कार्य प्रणाली देखने को मिली।  सम में अपने में कुछ समा लेता है, विषम में अपने से कुछ विसर्जित कर देता है, मध्यस्थ में अपने को बनाये रखता है.  स्वयं स्फूर्त विधि से यह करता है.  रचना प्राण कोशाओं से शुरू होता है.  काई बनने के बाद एक कोशीय, द्विकोशीय, फिर बहुकोशीय रचना होता है.  बहुकोशीय रचना में अनेक अंग प्रत्यंग बनने लगते हैं.  मच्छर, मक्खी, भुनगी, कीड़ा - इन सबमें कुछ अंग बने हैं, कुछ बने नहीं हैं.  फिर चिड़िया बना, तोता बना - उनमें बहुत सारे अंग बन गए.  उसके बाद गाय, भालू आ गया - उसमे और बहुत सारे अंग बन गए.  फिर मनुष्य आ गया - जिसमें और अंग आ गए.  यह रचना में विकास क्यों हुआ? क्योंकि मानव द्वारा ही अस्तित्व के प्रतिबिम्ब को स्वीकारना और मानव परम्परा में प्रमाणित करना बनता है.  इसका सिद्धांत बताया - सभी कुछ प्रतिबिंबित है.  सहअस्तित्व स्वयं में प्रतिबिंबित है.  सहअस्तित्व के प्रतिबिम्ब का स्वीकृति मानव में ही होता है.  बाकी सारे प्रकृति बिना प्रतिबिम्ब को स्वीकारे सहअस्तित्व में रहते ही हैं.  मानव ज्ञान से लेकर कार्य तक, कार्य से लेकर फल-परिणाम तक, फल-परिणाम से लेकर पुनः ज्ञान तक एक दूसरे के साथ जाँचने का अधिकार रखता है.  ये अधिकार कहाँ से आ गया?  कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के आधार पर, उसके तृप्ति बिंदु पाने के आधार पर यह जाँचने का अधिकार आया.  यह करने पर मानव में समाधान पैदा होना मौलिक है.  समाधान पैदा होना इस आधार पर हुआ कि अस्तित्व सहज रूप में प्रत्येक एक अपने में समाधानित है.  मनुष्येत्तर प्रकृति यांत्रिक रूप में समाधानित है.  मानव को चेतना रूप में भी समाधानित होना है और यांत्रिक रूप में भी समाधानित होना है.  इसके लिए प्रकटन क्रम में शरीर रचना की खूबियाँ बनी, जीवन होता ही है, शरीर रचना की खूबी के आधार पर जीवन अपने को प्रस्तुत करना बन गया.  शरीर ऐसा नहीं रहा बाकी जीव शरीरों में, इसलिए जीवन ऐसे प्रस्तुत नहीं कर पाया।  जीवों में शरीर ही प्रस्तुत हुआ, जहाँ जीवन शरीर के अनुरूप ही काम किया। मानव में जीवन के अनुरूप शरीर के काम करने की व्यवस्था रही, फलस्वरूप जागृति प्रमाणित हो गयी.  


प्रश्न:  मच्छर-मक्खी जैसे जीव, जिनमें जीवन नहीं है - उनमें दर्द (pain) की पहचान होती है क्या?


उत्तर: उनमें प्राणकोशायें काम करते रहते हैं.  उनमें अंग-अवयवों की कमी के कारण से दर्द की पहचान नहीं हो पाती।  जिन जीवों में सप्त धातुओं से रचित शरीर है, समृद्ध मेधस है, और उसके साथ जीवन है - उनमे दर्द को स्वीकारने वाली बात होती है.  इनमे मानव संकेतों को ग्रहण करने की बात रहती है.  ऐसे जीवों में शरीर के अनुरूप वंशानुषंगीय विधि से जीवन काम किया, इसलिए जीवन व्यक्त नहीं हो पाया।  वहाँ बाघ के शरीर में बाघ के अनुसार जीवन काम करता है, गाय के शरीर में गाय के अनुसार जीवन काम करता है.  मानव शरीर में मन जैसा चाहता है वैसा करने वाली बात हो गयी.  मानव को क्या करना चाहिए?  मानव ने जैसा भी किया सुखी होने के लिए किया।  सुखी हो गया तो उसको अपनाना है.  मानव जैसे काम करने से सुखी होता है, उसके बाद देवता जैसे काम करने से सुखी होता है, उसके बाद दिव्य मानव जैसे काम करने से सुखी होता है.  यह स्पष्ट होने के बाद मानव चेतना के साथ आचरण को जोड़ा, शिक्षा को जोड़ा, व्यवस्था को जोड़ा, संविधान को जोड़ा - इन चारों को जोड़ने से परम्परा से जोड़ दिया।  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)

Monday, April 13, 2026

जिम्मेदारी से सत्यापन

“मैं समझा हूँ, जिया हूँ, प्रमाणित हूँ.  हर व्यक्ति समझ सकता है, जी सकता है, प्रमाणित हो सकता है.”  ऐसा मैंने कई जगह पर सत्यापन किया है.  

समझने, जीने और प्रमाणित होने को लेकर हर व्यक्ति अपने अधिकार से ही सत्यापन करेगा।  यदि ऐसा सत्यापन नहीं करना बनता है तो reference के साथ यही कहना बनेगा कि ऐसा किताब में लिखा है.  दोनों में कितना अंतर हो गया?  यदि जिम्मेदारी है तो सत्यापन ही होगा।  जिम्मेदारी नहीं है तो सूचना ही होगा, reference ही होगा।  जिम्मेदारी यही है - मैं जिया हूँ, आप जी सकते हैं, हर व्यक्ति जी सकता है.  मैंने इसी जिम्मेदारी से सत्यापन किया है.  

हर व्यक्ति में कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता प्रकृति प्रदत्त है.  इसके आधार पर ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी तीनों समझ सकते हैं, जी सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं.  जीना ही प्रमाण है.  

मुझसे कई लोगों ने पूछा है - इससे आगे भी क्या कोई अवस्था होगा?  भौतिकवादी विचार के अनुसार विकास कहीं रुकता नहीं है.  मेरे अनुसार निर्भ्रमता से आगे कोई ज़रूरत नहीं बनती है, जरूरत पड़ेगा तो आगे चलके आप बता देना!  हम काहे को रोकें?  यहाँ तक हम स्पष्ट हैं, इसमें हमको संतुष्टि है, इस प्रकार की संतुष्टि आपको भी मिल सकती है.  इसमें अतृप्ति की जगह नहीं है.  अतृप्ति होगा तो पुनः शोध होगा। आप स्वयं शोध करो, अनुसन्धान करो!   हम किसी के लिए दरवाजा बंद नहीं कर रहे हैं.  अनुसन्धान होगा समाधि-संयम विधि से ही.  अज्ञात को ज्ञात करना।  संयम से अज्ञात ज्ञात होता है, इस बात को आपको बता दिया।  कैसे संयम करना है - वह भी बता दिया।  हमने कैसे संयम किया वह आपको बता दिया।  पहले पतंजलि ने क्या बताया है, वह भी आपको बता दिया।  पतंजलि ने संयम के बारे में जो बताया है, वह सिद्धि प्राप्त करने के लिए है, यह मुझको समझ में आया.   

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)


Friday, April 10, 2026

इस प्रस्ताव का प्रहार

वास्तविकता के साथ तर्क नहीं होता।  वास्तविकता को या तो स्वीकारना होता है या अस्वीकारना होता है.  वास्तविकता को अस्वीकारने की स्थिति में हीनता आता ही है.  हीनता दुर्बलता है कि हम ये नहीं कर सकते, हम ये नहीं समझ सकते, हम ऐसा जी नहीं सकते.  इन तीन बातों में से किसी न किसी को लेकर हीनता होती है.  सच्चाई यही है - यह समझ में आने के बाद ऐसा जी नहीं सकते तो कुंठा, निराशा कुछ न कुछ तो होता ही है.  इससे आदमी प्रताड़ित होता ही है.  यही इस प्रस्ताव का प्रहार है.  इसमें सुधरने का रास्ता यही है.  स्वयंस्फूर्त विधि से सुधरना।  

प्रश्न:  सच्चाई यही है - यह समझ में आने पर तो आत्मविश्वास आना चाहिए, हीनता क्यों आएगा?


उत्तर: व्यक्ति परिस्थितिवश प्रताड़ित होता है तो हीनता का शिकार होगा ही.  सच्चाई समझ में आने के बाद आचरण में नहीं ला पाता है, तो यह सब होता है.  सच्चाई समझ में आने के बाद उसको जीना ही पड़ता है.   यह समझ को आचरण में ला कर स्वयंस्फूर्त होने का प्रेरणा है.  समझ को आचरण नहीं करेंगे तो कुंठा, हीनता का शिकार होना पड़ेगा।  कुंठा, हीनता मनुष्य को स्वीकार नहीं है. 


संसार के भ्रम में आसक्त रहते हैं इसीलिये देरी लगता है, नहीं तो इतना देर लगना नहीं चाहिए।  आराम से सोच-विचार के, पूरा समझने के बाद जीने के लिए तैयारी करो - ऐसा मेरा कहना है.  साधना विधि में मेरे साथ क्या था - पूरा जिज्ञासा होने के बाद, जिसके बिना मैं जी नहीं सकता, यह स्थिति अपने में आने के बाद अनुसन्धान करने की बात थी।  जिज्ञासा में थोड़ी भी कमी होती तो हम निकल नहीं पाते।  अब आपके लिए समझने के लिए स्त्रोत हो गया, समझने के बाद स्वाभाविक रूप में जीना बनता है.  जबतक समझने में आनाकानी करते हैं, यही समय लगाता है. 


सीधा सीधा समझने में युवा पीढ़ी में रास्ता है, उसके बाद थोड़ा टेढ़ी मेड़ी होता है, समय लगता है.  युवा पीढ़ी में सीधा सीधा ज्ञान स्वीकार हो जाता है, इसमें कोई मजबूर करने की ज़रूरत नहीं रहती.  कोई भी मुद्दे को सुना, स्वीकार हुआ, फिर उसके detail में गए, जीने की कला तक पहुंचे।  उसके बाद दूसरे मुद्दे पर चले, तीसरे मुद्दे पर चले - ऐसे तो अध्ययन ही होता है.  मुद्दे इने-गिने ही हैं.  सभी मुद्दे ज्ञान विवेक विज्ञान से जुड़े हैं.  विज्ञान व्यवस्था के पांच आयामों से जुड़ा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

न्याय-धर्म-सत्य प्रमाणित होने की आवश्यकता

सबसे कम समय में समझ में आने वाली बात सत्य है, उसके बाद धर्म है, उसके बाद न्याय है, उसके बाद संतुलन है, उसके बाद नियंत्रण है, उसके बाद नियम है.  इस तरह यह क्रम से बना है.  सत्य समझ में आने से ये सब क्रम से समझ आता है.  सत्य सबसे पहले समझ में आता है.  सत्य के आधार पर ही धर्म, धर्म के आधार पर न्याय, न्याय के आधार पर संतुलन, संतुलन के आधार पर नियंत्रण, नियंत्रण के आधार पर नियम समझ में आता है.  समझ का पूरा खाका इतना ही है.  मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम, नियंत्रण और संतुलन प्रकट है.  मानव को यह समझ में नहीं आया है, भाड़ झोंकने चला गया, उससे जहाँ पहुंचना था पहुँच गया.  मानव में न्याय-धर्म-सत्य समझ में आने के बाद नियम-नियंत्रण-संतुलन समझ में आता है, उसके पहले आता नहीं है.  मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम-नियंत्रण-संतुलन वर्तमान रहता है.  मानव में न्याय-धर्म-सत्य शिक्षा विधि में, व्यवस्था विधि में, कार्य विधि में प्रमाणित होने की आवश्यकता थी, वह आया नहीं।  न्याय-धर्म-सत्य समझ नहीं आने के कारण मानव ने मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ अपराध किया, जिससे मनुष्येत्तर प्रकृति असंतुलित-अनियंत्रित हो गयी.  न्याय व्यावहारिक होता है.  न्याय पूर्वक जीने की स्थिति में ही हम नियम, नियंत्रण, संतुलन को पहचान पाते हैं, उसके प्रयोजन को पहचान पाते हैं, निर्वाह कर पाते हैं.  इसके अलावा और कोई तरीका नहीं है.  इसके आगे पैसे के आधार पर, डंडे के आधार पर जो अहंकार को बनाये हैं, उसका सत्यानाश होगा या नहीं?  पैसे और डंडे के आधार पर जो अहंकार बनाये हैं, उसका मृत्यु होगा।  reservation और specialisation के आधार पर जो अहंकार बनाये हैं, उसका मृत्यु होगा।  ये चारों मानव द्वारा बनाये गए अहंकार का स्त्रोत हैं.  यह विज्ञान विधि से आया है.  इससे पहले आदर्शवाद में ज्ञान बहुत दुर्लभ है, ऐसी चर्चा करते रहे.  ज्ञान किसी विशेष गुण वाले के लिए ही है - ऐसा पहले सोचा गया.  अभी हम कह रहे हैं, सभी को ज्ञान सुलभ है, सभी ज्ञान संपन्न होने का अधिकार रखते हैं, उसके योग्य शिक्षा-संस्कार बनाने की ज़रूरत है.  इसमें कोई-कोई पुण्यशील काम करेंगे, ऐसा मेरा सोच है.  स्वयंस्फूर्त विधि से मानव न्याय करे, इसके योग्य शिक्षा-संस्कार को प्रस्तुत करने की आवश्यकता था, वह कर दिया।  शिक्षा-संस्कार विधि से ही आदमी अपराध करने में स्वयंस्फूर्त हुआ है, शिक्षा-संस्कार विधि से आदमी न्याय करने में स्वयंस्फूर्त होगा।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

पुनर्विचार के लिए विकल्प

आदर्शवाद के इतिहास में मतभेद तो बहुत हुए हैं.  पहले अद्वैत विचार में  “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या”, “एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति” के ऊपर बहुत सारा रचनात्मक रूप से कहा गया.  उसके बाद आया - ब्रह्म सत्य, देवता भी सत्य।  देवताओं में भी जीव जगत को पैदा करने, बनाये रखने और संहार करने की शक्ति है.  तब ब्रह्मा विष्णु महेश - तीन देवता आ गए.  इससे उपासना तंत्र शुरू हुए.  वेद विहित था उपासना।  पहले विष्णु आगम तंत्र आया, फिर शिव आगम तंत्र, फिर बताया ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों शक्ति के अधीन हैं - इस आधार पर शाक्त आगम तंत्र आया.  ऋषिकुल से गुरुकुल आने के क्रम में  इनके मतभेदों से काफी परेशान हुए हैं.  ऋषिकुल से गुरुकुल, गुरुकुल से कुलगुरूकुल, कुलगुरुकुल से आचार्यकुल।  अभी धर्म गद्दियां आचार्य कुल विधि से हैं.  आचार्य कुल के आने के बाद भी परिवार में कोई कुलगुरु होता ही रहा.  विज्ञान के सम्मुख ये तर्क की कसौटी में ये टिक नहीं पा रहे हैं. धीरे धीरे कुलगुरु परम्परा समाप्त होता जा रहा है, जिसको परिवार में नैतिक शिक्षा का आधार माने थे.  शिक्षा संस्थानों में मानव के शिक्षा की बात भौतिकवादी विधि से विज्ञान विधि से शुरू हुई.  होते होते विज्ञान विधि धरती को ही ले डूबा।  इस ढंग से मानव इस धरती पर रहने योग्य नहीं हुआ.  एक तरफ आदर्शवाद में मतभेद, दूसरी तरफ भौतिकवाद में अपराध।  भौतिकवादी विधि से अपराध करने की छूट रही, आदर्शवादी विधि में मतभेद से कलह करने की व्यवस्था बना.  मतभेदों के आधार पर ही अनेक धर्म गद्दियां स्थापित हुई, अनेक समुदाय हुए.  मतभेद के आधार पर विरोधाभास रहा ही.  इन विरोधों को बंद करने के लिए राजा आया.  राजा को नियंत्रित करने के लिए धर्म गद्दी बैठा।  इस ढंग से धर्म गद्दी के पास रोटी खाने की व्यवस्था बन गयी.  अच्छा होने के लिए सोचा था, लेकिन अच्छा हुआ नहीं।  अब उजागर करने का मुद्दा यही है - ये सारे अच्छा चाहते हुए धरती के बीमार होने की जगह पहुँच गए.  तब पता चला कि अभी तक अपराध विधि से चले हैं.  इसीलिये पुनर्विचार के लिए विकल्प प्रस्तुत है.  पुनर्विचार करना हो तो ठीक, नहीं करना हो तो ठीक.  विकल्प को प्रस्तुत करने का यही विधि है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, April 6, 2026

सुन्दर बात

परमाणु में विकास और रचना में विकास - ये दोनों मिलकर के मानव परम्परा तक पहुंचे।  यह प्रतिपादन न हमको विज्ञान से मिलता है, न ईश्वरवाद से मिलता है.  

अनुसन्धान है:  परिणाम का अमरत्व (गठन पूर्णता), श्रम का विश्राम (क्रिया पूर्णता), गति का गंतव्य (आचरण पूर्णता)


अभी तक इसका जिक्र परम्परा में था नहीं।  न भौतिकवाद कर पाया, न आदर्शवाद कर पाया।  इन तीनों बातों को बोध कराने के लिए क्या ये कुछ किये हैं?  


अनुभव ज्ञान आपके सम्मुख प्रस्तुत किया, यदि मानव चाहते हैं तो इस ज्ञान को अपना सकते हैं.  सुन्दर बात इतना ही है.  हर मानव समझदार होना चाहता है, किसी आयु के बाद हर व्यक्ति अपने आप को समझदार मानता ही है.  यह दोनों बात सर्वेक्षित हो गयी.  इस आधार पर आशा रखकर इस प्रस्ताव को प्रस्तुत किये।  यदि यह नहीं होता तो इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने का कोई जगह ही नहीं था.  पूरा मानव परम्परा ही जब अपकृत्यों में लगा है तो इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने का जगह कहाँ है? मानव का आशय के आधार पर इस प्रस्ताव को प्रस्तुत किया है.  पहले एक दो व्यक्तियों को यह बात स्वीकार होने में काफी समय लगा.  दो से चार, चार से चालीस, चालीस से चार हज़ार होने में कम समय लगा.  मानव परम्परा में यह ज्ञान समा जाना चाहिए।  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Thursday, April 2, 2026

मानवीयता - देव मानवीयता - दिव्य मानवीयता

क्रियापूर्णता होने पर सतर्कता पूर्ण होता है, जो मानवीयता है.  अब क्रियापूर्णता तो है ही, सजगता के साथ आचरण पूर्णता की ओर चले.  सतर्कता पूर्ण सजगता सहित देव मानवीयता है.  सजगता पूर्ण सहजता सहित दिव्य मानवीयता है. 


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)