अणु बंधन और भार बंधन से मुक्त होकर जीवन आशा-बंधन से शुरुआत करता है. आशा यहाँ है - जीने की आशा. जीवन पद में संक्रमित होने पर जीने की आशा होना स्वाभाविक है. जीने के लिए यह अपना कार्य-गति पथ स्थापित करता है, जो अपने में एक आकार होता है. उस आकार का शरीर भौतिक-रासायनिक रूप में बनी रहती है, उस शरीर को वह चलाता है. इसी क्रम में मानव शरीर को चलाने के लिए जीवन प्रस्तुत हुआ. जीव शरीर और मानव शरीर में यही अंतर देखने को मिला, जीव शरीर में कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने का व्यवस्था नहीं है. मानव शरीर में जीवन सहज कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता व्यक्त करने की बात देखा गया. इस आधार पर जीवन जब शरीर को जीवन मानता है तो साढ़े चार क्रियाएं व्यक्त होती हैं. शरीर को जीवन मानने से चयन-आस्वादन के साथ, तुलन-विश्लेषण में से तुलन में प्रिय-हित-लाभात्मक तुलन करने योग्य होता है, उसके अनुसार चित्रण करता है. इस ढंग से साढ़े चार क्रिया में जीवन तृप्ति का सम्भावना बना नहीं। जीवन अतृप्त रहते हुए, जीवन स्वयं को शरीर मानते हुए, जीव चेतना को अपना करके, शरीर को जीवंत बनाते हुए, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध इन्द्रियों को राजी करने के लिए प्रयत्न करते रहा। इसी क्रम में आहार-आवास-अलंकार और दूरगमन-दूरश्रवण-दूरदर्शन सम्बन्धी वस्तुओं को प्राप्त कर लिया। इनको प्राप्त करने के बाद भी सुखी नहीं हुआ, तब मानव की परिभाषा से पता चला कि क्या कमी रह गयी. कमी यह रही - मनाकार को साकार करने में तो मानव सफल हुआ, पर मनः स्वस्थता को प्रमाणित नहीं कर पाया। मनः स्वस्थता के बारे में पता चला, समाधान ही मनः स्वस्थता का प्रमाण है. मनः स्वस्थता यदि प्रमाणित होता है तो सर्वतोमुखी समाधान होता है, जागृति होती है, हम सार्वभौमता-अखंडता में जी पाते हैं. इन सबके आने से मानव चेतना प्रमाणित होती है. अभी जीव चेतना में जीते हुए हमें मानव चेतना का पता ही नहीं रहा. अभी अपने शोध से, अनुसन्धान से पता चला कि जीव चेतना के बाद मानव चेतना है, मानव चेतना के बाद देव चेतना है, देव चेतना के बाद दिव्य चेतना है. इस प्रकार चेतना विकास की सम्भावना बनी हुई है.
अभी सर्वप्रथम मानव चेतना में प्रवेश करने की आवश्यकता है, तभी परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में जीना बनेगा। इसके साथ हम जीवन की दसों क्रियाओं को प्रमाणित करते हैं. तुलन जो आधा हुआ था, उसमें न्याय-धर्म-सत्य जुड़ जाता है, उसके बाद चित्त में साक्षात्कार होता है, उसके बाद संकल्प होता है, उसके बाद अनुभव होता है, अनुभव होने के फलस्वरूप प्रमाण होता है, वह प्रमाण पुनः बोध व संकल्प में आता है, पुनः वह चित्त में चिंतन व चित्रण रूप में आता है, उसका पुनः वृत्ति में तुलन होता है, जिससे व्यवहार में न्याय-धर्म-सत्य के प्रमाणित होने का स्वरूप बनता है, जिसका हम आस्वादन करते हैं और प्रमाणित करने के लिए संबंधों का चयन करते हैं. इस प्रकार मानव सम्बन्ध और प्रकृति सम्बन्ध - इन दोनों संबंधों का हम निर्वाह करते हैं, इस प्रकार व्यवस्था में जीना बन जाता है. व्यवस्था में जीने के लिए जीवन की दसों क्रियाएं प्रयुक्त होता ही है. अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में जीना नहीं है तो दसों क्रियाएं प्रमाणित होगा ही नहीं। जीवन की दसों क्रियाएं जब कभी भी प्रमाणित होगा - अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में ही प्रमाणित होगा. उसका स्वरूप बना - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक जीना। इस प्रकार दस क्रियायें यदि क्रियान्वित होते हैं तो मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) सुगम हो जाता है. हरिहर!
प्रश्न: अभी जो साढ़े चार क्रिया में जी रहे हैं, तो बाकी साढ़े पाँच क्रियाएं कहाँ रहता है?
उत्तर: क्रिया तो रहता है, पर प्रकट नहीं रहता है. जीवन का ध्यान उन क्रियाओं की ओर नहीं गया है. जैसे, अपने ही घर में कोई चीज़ ढका रहता है, पड़ा रहता है बरसों - वैसा हो गया. अनदेखी कर दिया। उस ओर ध्यान नहीं दिया।
प्रश्न: जीवन में बल का क्या स्वरूप है?
उत्तर: जीवन में अलग-अलग बल होता नहीं। अध्ययन के लिए जीवन के चार परिवेशों में बल-शक्ति स्वरूप में बताया है. स्थिति में बल, गति में शक्ति। मन अपने स्थिति में आस्वादन क्रिया है, गति में चयन क्रिया है. मन आस्वादन में बल प्रयोग किया रहता है, चयन में शक्ति के रूप में गतित रहता है. इसी प्रकार वृत्ति में स्थिति में तुलन बल है, उसका गति बनता है वह विश्लेषण है, जो दूर दूर तक पहुँचता है. इसी प्रकार चित्त में साक्षात्कार/चिंतन बल है, वही चित्रण रूप में दूर दूर तक पहुँचती है. उसी प्रकार बुद्धि में बोध बल है, एक तो अध्ययन से सत्य बोध और दूसरे अनुभव मूलक विधि से अनुभव प्रमाण बोध. बुद्धि में बोध स्थिति में ही होता है, संकल्प दूर दूर तक पहुँचती है. इसी प्रकार अनुभव आत्मा का बल होता है, प्रामाणिकता शक्ति होती है - जो प्रमाणित होता है. इस ढंग से पांच बल और पांच शक्तियों को अनुभव करने की बात है. ये बल और शक्तियाँ अक्षय हैं. जीवन शक्तियां और बल - ये घटने वाला नहीं हैं. जितना ज्यादा इनका प्रयोग करते हैं, उतना ज्यादा ये प्रखर होती हैं. शरीर शक्तियां क्षरणशील हैं, जीवन शक्तियाँ अक्षय हैं. जीवन अमर है. जीवन क्रियाओं को देख कर, शरीर क्रियाओं को देख कर - हम जीवन और शरीर को अलग अलग पहचान पाते हैं.
आचरण के आधार पर हर वस्तु की पहचान होती है. जैसे कोई पक्षी या जीव के आचरण को देख कर ही हम अंगुलीन्यास कर पाते हैं कि यही वह जीव है. वनस्पतियों के आचरण को देख कर ही हम उनकी पहचान करते हैं. उसी प्रकार लोहे, मिट्टी, पत्थर को उनके आचरण के आधार पर हम उनकी पहचान करते हैं. इसी प्रकार हम जीवन के आचरण और शरीर के आचरण को देख करके जीवन को अपने स्वरूप में पहचानते हैं, शरीर को अपने स्वरूप में पहचानते हैं. इस ढंग से जीवन की दसों क्रियाओं के साथ जागृति पूर्वक जीना बनता है. साढ़े चार क्रिया में भ्रम पूर्वक जीता है. शरीर को जीवन मान लेना भ्रम है. शरीर को शरीर ही माना जाए, जीवन को जीवन ही माना जाए - इसमें कौनसे ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी को तकलीफ है? ना समझें, हठ प्रवृत्ति का प्रयोग करें, भाग जाएँ - यह संभव है. इससे भाग करके कहाँ जाओगे? भागते भागते कहीं न कहीं थकोगे ही. इससे भागना बनता नहीं है. अपनाने में जितना देरी लगाना है वो लगा सकते हैं. इससे भागते हैं, तो थकते ही है. सारी परिस्थितियां इस प्रस्ताव के अनुकूल हो रही हैं. इसी लिए हम सोच रहे हैं कि यह लोकगम्य होगा, लोकव्यापीकरण होगा, सर्वशुभ की प्रवृत्ति मानव में बनेगी, अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में जीने का मौका मिलेगा।
प्रश्न: चित्रण क्रिया को स्पष्ट करें?
उत्तर: चित्रण दोनो तरीके से होता है - अनुभव मूलक विधि से, और शरीर मूलक विधि से. शरीर मूलक विधि से पाँचों संवेदनाओं को राजी होने या नाराज होने के अर्थ में सहमति और असहमति का चित्रण होता है. जीवन अक्षय बल और शक्ति संपन्न है, उसको कोई भौतिक वस्तु की ज़रूरत नहीं है. जीवन की जरूरत अपने कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु रुपी जागृति को प्रमाणित करना है. इसी लिए वह बारम्बार शरीर यात्रा को करता है. मानव परम्परा में इसकी सम्भावना नहीं होने के कारण बारम्बार असफल हो कर जाता है. इससे पता चलता है - जीवन को अपने ढंग से काम करने योग्य शिक्षा को हमने विकसित नहीं किया, उसको विकसित करने की आवश्यकता है. आचरण को विकसित नहीं किया, आचरण को विकसित करने की आवश्यकता है. संविधान को विकसित नहीं किया, संविधान को विकसित करने की आवश्यकता है. व्यवस्था को विकसित नहीं किया, व्यवस्था को विकसित करने की आवश्यकता है. शिक्षा में प्रवेश कराने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं.
सम्बन्ध का चित्रण होता ही है. सम्बन्ध के नाम का चित्रण है, उसके बाद उसके प्रयोजन का चित्रण है. जैसे माँ एक सम्बन्ध का नाम है, माँ के सम्बन्ध का प्रयोजन है - पोषण। शरीर का पोषण, ज्ञान का पोषण, विवेक का पोषण, विज्ञान का पोषण, व्यव्हार का पोषण, भाषा का पोषण। सभी विधा में पोषण। पोषण प्रधान संरक्षण माँ है. संरक्षण प्रधान पोषण पिता है. सभी विधा में मानव मानव-चेतना पूर्वक जिए - यही पोषण का आधार बनता है. जीव चेतना विधि से सभी विधाओं में पोषण करना बन नहीं पाता है. इसी लिए मानव का मानव चेतना में प्रवेश होना आवश्यक है ताकि वह अपनी संतान को मानव चेतना में पारंगत बना सके. तभी माता-पिता की जिम्मेदारी पूरी हुई. संतान को हम पैदा करें, उसका पोषण दूसरा कोई करे - यह कहाँ तक न्याय हुआ? जीव चेतना में संतान पैदा किया, दो चार दिन उसको चूमा चाटा, उसके बाद छोड़ दिया। इस पद्दति को छोड़ के, यदि हर अभिभावक मानव चेतना विधि से अपनी संतान का पोषण-संरक्षण करते हैं तो अखंड-समाज सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना सुगम हो जाता है. इसी क्रम में शिक्षा के स्वरूप का चित्रण होता है, स्वास्थ्य का चित्रण होता है, स्वस्थ रहने की विधि का चित्रण होता है, उसके क्रियान्वयन का चित्रण होता है. मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ हम अनेक प्रकार के यंत्रों को चित्रित करते हैं, उनको प्रयोजित करते हैं. इसी प्रकार विश्वास निर्वाह का चित्रण होता है, सहयोगिता भाव का चित्रण, सहकारिता भाव का चित्रण करने में कोई दिक्क्त नहीं है. नकारात्मक चित्रण इतने किए हैं, सकारात्मक चित्रण भी कर सकते हैं. अपराध का चित्रण सीमित हैं, न्याय पक्ष का चित्रण असीमित है. चित्रण विधि से हमारा विचार परिष्कृत होता है. संकल्प विधि से स्वीकार होता है. अनुभव विधि से प्रमाणित हो जाता है. इस क्रम से हम निकलते हैं तो हमारा सुखी होना बन ही जाता है, हम अपराध मुक्त हो जाते हैं, समृद्धि पूर्वक जीना बन जाता है, समाधान को प्रमाणित करना बन जाता है. सर्वमानव में इसकी आवश्यकता तो बना ही है.
प्रश्न: सृष्टि के डिज़ाइन को देखें, इसकी बारीकी और सुंदरता को देख के हम बहुत चमत्कृत होते हैं. जैसे मानव शरीर में देखने के लिए आँख, खाने के लिए दाँत - सब कुछ इतना systematic बना हुआ है. यह सब स्वयंस्फूर्त विधि से अस्तित्व में प्रकट हुआ है, इस पर विश्वास नहीं बन पाता।
उत्तर: अभी तक यही सोचे कि सृष्टि को बनाने वाला कोई बैठा है. उस कारण यह भ्रम है. ऐसा कुछ नहीं है. अस्तित्व में व्यापक वस्तु का महिमा है, एक-एक वस्तु में स्वीकारने की महिमा है, इन दोनों मिल करके अस्तित्व में पूरा डिज़ाइन अपने आप में स्वयंस्फूर्त है. दो अंश के परमाणु का तीन अंश वाले परमाणु के रूप में होने को कौन कहा? यह स्वयंस्फूर्त हुआ. इसी प्रकार यौगिक क्रिया होने को कौन डिज़ाइन किया? स्वयं स्फूर्त हुआ. गठन पूर्ण होने के लिए कौन मजबूर किया? स्वयं स्फूर्त हुआ. हम जहाँ पहुंचे हैं, इसके आगे चलने के लिए हमको कोई मजबूर करेगा - ऐसा देखने को मिलता नहीं है. प्रेरणा एक दूसरे के साथ बना ही है, पर हमको मजबूर करेगा ऐसा कोई नहीं है.
परमाणु में कोई आँख कान नाक कुछ भी नहीं है, पर क्रिया तो है ही. किन्तु उसमें ध्वनि होता है, विद्युत् होता है, चुंबकीयता होता है. इसमें सम विषम और मध्यस्थ कार्य प्रणाली देखने को मिली। सम में अपने में कुछ समा लेता है, विषम में अपने से कुछ विसर्जित कर देता है, मध्यस्थ में अपने को बनाये रखता है. स्वयं स्फूर्त विधि से यह करता है. रचना प्राण कोशाओं से शुरू होता है. काई बनने के बाद एक कोशीय, द्विकोशीय, फिर बहुकोशीय रचना होता है. बहुकोशीय रचना में अनेक अंग प्रत्यंग बनने लगते हैं. मच्छर, मक्खी, भुनगी, कीड़ा - इन सबमें कुछ अंग बने हैं, कुछ बने नहीं हैं. फिर चिड़िया बना, तोता बना - उनमें बहुत सारे अंग बन गए. उसके बाद गाय, भालू आ गया - उसमे और बहुत सारे अंग बन गए. फिर मनुष्य आ गया - जिसमें और अंग आ गए. यह रचना में विकास क्यों हुआ? क्योंकि मानव द्वारा ही अस्तित्व के प्रतिबिम्ब को स्वीकारना और मानव परम्परा में प्रमाणित करना बनता है. इसका सिद्धांत बताया - सभी कुछ प्रतिबिंबित है. सहअस्तित्व स्वयं में प्रतिबिंबित है. सहअस्तित्व के प्रतिबिम्ब का स्वीकृति मानव में ही होता है. बाकी सारे प्रकृति बिना प्रतिबिम्ब को स्वीकारे सहअस्तित्व में रहते ही हैं. मानव ज्ञान से लेकर कार्य तक, कार्य से लेकर फल-परिणाम तक, फल-परिणाम से लेकर पुनः ज्ञान तक एक दूसरे के साथ जाँचने का अधिकार रखता है. ये अधिकार कहाँ से आ गया? कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के आधार पर, उसके तृप्ति बिंदु पाने के आधार पर यह जाँचने का अधिकार आया. यह करने पर मानव में समाधान पैदा होना मौलिक है. समाधान पैदा होना इस आधार पर हुआ कि अस्तित्व सहज रूप में प्रत्येक एक अपने में समाधानित है. मनुष्येत्तर प्रकृति यांत्रिक रूप में समाधानित है. मानव को चेतना रूप में भी समाधानित होना है और यांत्रिक रूप में भी समाधानित होना है. इसके लिए प्रकटन क्रम में शरीर रचना की खूबियाँ बनी, जीवन होता ही है, शरीर रचना की खूबी के आधार पर जीवन अपने को प्रस्तुत करना बन गया. शरीर ऐसा नहीं रहा बाकी जीव शरीरों में, इसलिए जीवन ऐसे प्रस्तुत नहीं कर पाया। जीवों में शरीर ही प्रस्तुत हुआ, जहाँ जीवन शरीर के अनुरूप ही काम किया। मानव में जीवन के अनुरूप शरीर के काम करने की व्यवस्था रही, फलस्वरूप जागृति प्रमाणित हो गयी.
प्रश्न: मच्छर-मक्खी जैसे जीव, जिनमें जीवन नहीं है - उनमें दर्द (pain) की पहचान होती है क्या?
उत्तर: उनमें प्राणकोशायें काम करते रहते हैं. उनमें अंग-अवयवों की कमी के कारण से दर्द की पहचान नहीं हो पाती। जिन जीवों में सप्त धातुओं से रचित शरीर है, समृद्ध मेधस है, और उसके साथ जीवन है - उनमे दर्द को स्वीकारने वाली बात होती है. इनमे मानव संकेतों को ग्रहण करने की बात रहती है. ऐसे जीवों में शरीर के अनुरूप वंशानुषंगीय विधि से जीवन काम किया, इसलिए जीवन व्यक्त नहीं हो पाया। वहाँ बाघ के शरीर में बाघ के अनुसार जीवन काम करता है, गाय के शरीर में गाय के अनुसार जीवन काम करता है. मानव शरीर में मन जैसा चाहता है वैसा करने वाली बात हो गयी. मानव को क्या करना चाहिए? मानव ने जैसा भी किया सुखी होने के लिए किया। सुखी हो गया तो उसको अपनाना है. मानव जैसे काम करने से सुखी होता है, उसके बाद देवता जैसे काम करने से सुखी होता है, उसके बाद दिव्य मानव जैसे काम करने से सुखी होता है. यह स्पष्ट होने के बाद मानव चेतना के साथ आचरण को जोड़ा, शिक्षा को जोड़ा, व्यवस्था को जोड़ा, संविधान को जोड़ा - इन चारों को जोड़ने से परम्परा से जोड़ दिया।