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Sunday, August 18, 2019

छिद्रान्वेषण के स्थान पर सत्यान्वेषण


मैं किसी से भी मिलता हूँ तो उससे मुझे कुछ न कुछ प्रेरणा तो मिलता ही है.  किसी भी व्यक्ति से मिलना वृथा तो गया ही नहीं.  जिसको मैं डांटता भी हूँ उससे भी कुछ न कुछ प्रेरणा मुझे मिलता ही है.  जिससे प्यार करता हूँ उससे भी मुझे प्रेरणा मिलती है.  इससे ज्यादा क्या बयान करूँ?  लोगों में जो अच्छी बात है छान कर मैं उसको स्वीकारता हूँ.  अभी का लोगों का अभ्यास है - सामने वाले में एक खराब बात मिली तो उसके सब कुछ पर डामर पोत देते हैं!  सामने आदमी का १०० में से ९९ ठीक है, एक छेद मिल गया तो उसके पूरे पर डामर पोत दिया!  उसको पूरा नकार दिया.  ऐसा करके ही तो आदमी जात दरिद्र हुआ है.  आदमी ५१% सही है, उससे आगे क्यों नहीं बढ़ा अभी तक?  एक दूसरे के काम में छेद देखने से. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००५, अमरकंटक)

Friday, August 16, 2019

विकल्प का अर्थ

प्रश्न:  "विकल्प" से क्या अर्थ है?

उत्तर: विकल्प से मतलब है: - विगत से जो कुछ भी हमको दर्शन मिला, सोच-विचार मिला, आचरण मिला, संविधान मिला, व्यवस्था मिला और जो कुछ भी मिला - उसका यह विकल्प है.

दर्शन, सोच-विचार के विकल्प को लेकर हमने स्पष्ट किया है - विगत में अस्तित्व को पूरा न समझते हुए, अस्तित्व में ही किसी एक भाग को दर्शन का आधार मानते हुए ईश्वरवाद और भौतिकवाद तैयार हुआ.  अस्तित्व को छोड़ कर तो कुछ कहा नहीं जा सकता. 

अस्तित्व में ही एक भाग को लेकर ईश्वरवाद चला.  "ईश्वर" जिसका नाम दिया उसको जीव-जगत का जिम्मेवार मान लिया.  जीव-जगत में सृष्टि-स्थिति-लय को माना किन्तु उसको "माया" माना.  ईश्वरवाद पूरा अनुग्रहवाद हुआ.  इस आधार पर किताब (शास्त्र) को प्रमाण बताया.  ईश्वरवाद से भक्ति-विरक्ति मार्ग निकला.  लोग ईश्वरवाद की देहरी पर अपना सर झुकाए, अपनाए, अनुष्ठान किये, आजीवन अनुष्ठान किये.  बहुत सारे उनमे से ईमानदार भी होंगे, बेईमान भी होंगे.  ईमानदार भी जो हुए उनसे कोई ऐसा प्रमाण प्रस्तुत नहीं हुआ, जो परम्परा के रूप में चल पाए.  मानव परम्परा के लिए - जैसे परिवार परम्परा है, जैसे मानव में सांस लेने का परम्परा है, जैसे मानव  में आँख काम करने का परम्परा है - ऐसा कुछ बात उससे निकला नहीं.


अस्तित्व में एक भाग को ही लेकर भौतिकवाद भी चला.  प्रकृति में सृष्टि-स्थिति-लय होने को भौतिकवाद ने भी माना.  किन्तु ईश्वरवाद ने जहाँ भौतिक-रासायनिक वस्तु को माया माना, भौतिकवाद ने उसको सच माना.  किन्तु उसको "अंतिम सत्य" नहीं माना.  यह उनके साथ रखा हुआ एक आधार है.  भौतिकवाद पूरा यंत्रवाद हुआ.  इस तरह यंत्र को सामने रख के ये प्रमाण बताते हैं.  यंत्रवाद ने आकर अपने वर्चस्व का प्रदर्शन करते हुए आदमी को मोटर में घुमा दिया, रेलगाड़ी में घुमा दिया, एयरोप्लेन में घुमा दिया, चंद्रमा का यात्रा करा दिया - इसको "सच" बताया. 

मानव में "सच" या "झूठ" होता है, यंत्र में क्या होना है?  - ऐसा मैं समझा.  यंत्र में क्या सच, क्या झूठ?  यंत्र को चलाने वाले, बनाने वाले मानव में सच या झूठ की बात हो सकती है.  यंत्र तो मानव का ही बनाया हुआ है.  इसमें हमारा कहना है - विज्ञान का ज्ञान भाग गलत है, तकनीकी भाग ठीक है.  विज्ञान से मानव को जो ज्ञान होता है - वह गलत है. 

अध्यात्मवादी/ईश्वरवादी भी ज्ञान को लेकर प्रयत्न किये, किन्तु वे भी सहअस्तित्व को समझे नहीं.  ईश्वरवादियों ने पहले शब्द को ब्रह्म माना, फिर आप्त-वाक्य को प्रमाण माना, उसके बाद शास्त्र को प्रमाण माना.  इस प्रकार कई लहर उनमे चल चुकी हैं.  विज्ञान अथा से इति तक यंत्र को प्रमाण मानने में टिके हैं.

ज्ञान का धारक-वाहक केवल मानव है.  यंत्र नहीं है.  किताब नहीं है.  इस आधार पर विकल्प को सोचा जाए.

अध्यात्मवाद और भौतिकवाद दोनों का विकल्प बना है तो दोनों में कही हुई बातों को "सुधारा" जाए.  शब्दों को सुधारे बिना कार्य-व्यव्हार में सुधार नहीं हो सकता.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००५, रायपुर)

विकल्प की आवश्यकता

अस्तित्व सहअस्तित्व स्वरूपी है.
सहअस्तित्व सत्ता में संपृक्त प्रकृति है.
ऐसे प्रकृति चार अवस्था व चार पदों में है.
इसमें विकास-क्रम, विकास, जाग्रति-क्रम, जाग्रति - ये शाश्वत प्रक्रियाएं हैं.

सत्ता अपरिणामी है.  जीवन विकास पूर्वक अपरिणामी हुआ है.

मनुष्य आदिकाल से अमरत्व को खोजता रहा है.  शास्त्रों में लिखा है - "अमरा निर्जरा देवास्त्रिदशा विबुधा सुरा:" (अमरकोष, प्रथम काण्ड, १.१.१३)  जो जरा (वृद्ध) नहीं होता है, उसको उन्होंने देवता कहा.

जीवन में जरा-दोष नहीं है.  परिणाम दोष नहीं है, इसलिए जरा-दोष नहीं है.  जीवन मात्रात्मक परिवर्तन से मुक्त है.  जब तक मात्रात्मक परिवर्तन है तब तक जरा-दोष है.  रासायनिक-भौतिक वस्तुओं में मात्रात्मक परिवर्तन है, जरा दोष है, इसलिए रचना-विरचना उनमे होता ही रहता है.  जीवन में कोई रचना-विरचना होता ही नहीं है.  जीवन में होता है - चेतना.  चेतना में गुणात्मक विकास होता है.

चेतना का स्वरूप बताया - जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना, और दिव्य चेतना.

मानव जीवचेतना पूर्वक अव्यवस्था में फंसता है, क्लेश को मोलता है, गलती-अपराध को करता है. 

मानव की स्थिति जीव चेतना की है - इसकी गवाही में सभी राजतंत्र यह स्वीकारे हैं कि मानव गलती-अपराध कर सकता है. 

मानव की स्थिति जीव चेतना की है - इसकी गवाही में सभी (ईश्वरवादी) धर्मगद्दी मानव को पापी, अज्ञानी और स्वार्थी कहा है.  इसी ईश्वरवाद में कहा है - "मुंडे मुंडे मतिभिन्ना: कुंडे कुंडे नवं पयः" (वायु पुराण).  (मतलब हर आदमी का अलग अलग मत होगा ही)  इसी क्रम में कहा - "सुनो सबकी, करो मन की".  इसी क्रम में कहा - "खाली हाथ आये, खाली हाथ जायेंगे".  यह सब झूठ का पुलिंदा है, भ्रम है.  भ्रम को आप झूठ मानोगे या नहीं?

"खाली हाथ आये और खाली हाथ जायेंगे" - ये शरीर की बात कर रहे हैं.  जीवन ज्ञान नहीं है, इसका प्रमाण दे दिया या नहीं?  जीवन ज्ञान ईश्वरवादी परम्परा में नहीं था - इस बात का यह प्रमाण है.  शिष्ट परिवारों में, वेद मूर्ति परिवारों में यह नारा चला है - "खाली हाथ आये और खाली हाथ जायेंगे".  इससे पता चलता है कि उनको जीवन ज्ञान नहीं था. 

ईश्वरवाद रहस्यमय होने के कारण प्रमाण तक पहुँच नहीं पाया.  अस्तित्व के कुछ भाग को विज्ञानियों ने सच माना, कुछ भाग को ईश्वरवादियों ने सच माना.  दोनों अधूरे होने के कारण प्रमाणित नहीं हो पाए, संकटग्रस्त हुए.  इसीलिये "विकल्प" की ज़रुरत आ गयी.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००५, अमरकंटक)

Wednesday, August 14, 2019

वास्तविकता


प्रश्न: आप "वास्तविकता" किसे कहते हैं?

उत्तर:  चार अवस्थाएं या चार पद वास्तविकता हैं.  वस्तुएं जो कुछ भी प्रकट कर रही हैं, वह सब वास्तविकता है.  उसमे से मानव को जाग्रति के पद में व्यक्त होना वास्तविकता कहा है.  भ्रमित हो कर जो मानव व्यक्त होता है, उसको हमने वास्तविकता कहा नहीं है.  इसलिए दुःख को हमने वास्तविकता नहीं कहा है. 

यह बुद्ध जो "दुःख आर्यसत्य है" कह कर गए, उससे भिन्न है.  हम यहाँ कह रहे हैं - दुःख एक "घटना" है.  मानव जाति की नासमझी से दुःख है.  जिससे हम मुक्ति पाना चाहते हैं वह सब घटना ही है.  घटनाएं परम्परा नहीं हैं.  परम्परा वह है जिसकी निरंतरता हो. 

प्रश्न: दुर्घटनाओं को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर: जितने भी दुर्घटनाएं हैं वे मानव जाति की नासमझी से ही होते हैं.  समझ के जीने में दुर्घटना का कोई स्थान ही नहीं है. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००५, रायपुर)

निरपेक्ष ऊर्जा

प्रश्न:  आपने लिखा है - "सम्पूर्ण पदार्थ अपनी परमाण्विक स्थिति में सचेष्ट हैं, इससे स्पष्ट होता है कि इन्हें ऊर्जा प्राप्त है.  यह निरपेक्ष ऊर्जा है"

इकाइयों की क्रियाशीलता के मूल में ऊर्जा इकाई का ही गुण क्यों नहीं हो सकता?  इसमें "सत्ता" या "निरपेक्ष ऊर्जा" को लाने की क्या आवश्यकता थी?

उत्तर:  इकाई स्वयं से क्रियाशील हो और दूसरों को क्रियाशील करवा सके - ऐसा कुछ गवाहित नहीं है.  यदि आप कहते हो कि ऊर्जा इकाई का ही गुण है तो आपको यह भी बताना होगा कि एक इकाई का ऊर्जा दूसरे तक कैसे पहुँचता है?  अभी इकाइयों की सापेक्षता पूर्वक हम जो ऊर्जा प्राप्त करते हैं - उसमे ईंधन की ऊर्जा से कम ऊर्जा को ही हम प्राप्त करते हैं.  जैसे - स्टीम इंजन में जितना कोयला हम जलाते हैं उस कोयले की ऊष्मा-ऊर्जा से कम ऊर्जा ही हमे वाष्प से मिलती है.  इसका मतलब यह हुआ कि भौतिक वस्तुएं अपने से अधिक ऊर्जान्वित हो कर दूसरे को ऊर्जा दे नहीं पाते हैं.

"ऊर्जा इकाई का ही गुण है" - यह अवधारणा दे कर आप क्या कल्याण करना चाहते हैं?  किस उद्देश्य से?  यदि बिना उद्देश्य के बोलने की इजाज़त हो तो कुछ भी बोलना बनता है.  क्या बिना उद्देश्य के कुछ बात हो सकती है?

सत्ता को निरपेक्ष ऊर्जा इसलिए कहा क्योंकि यह ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत है.  सब वस्तुओं में वह ऊर्जा आ करके जितना वो वस्तु है उससे ज्यादा वह ताकत है.  कोई परमाणु हज़ार वर्ष क्रियाशील रह कर भी रुकता नहीं है, उसकी क्रियाशीलता यथावत रहती है - क्योंकि निरपेक्ष ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत है.   ऊर्जा सम्पन्नता के फलन में क्रियाशीलता ही "मूल चेष्टा" है.  भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, और जीवन क्रिया के मूल में परमाणु ही है.  परमाणु में ही मूल चेष्टा की पहचान है.  क्रियाशीलता ही श्रम, गति, परिणाम के रूप में व्याख्यायित है.  श्रम का विश्राम, गति का गंतव्य और परिणाम का अमरत्व ही विकास व जाग्रति है.  अस्तित्व में जो कुछ भी क्रिया है उसका अर्थ इतना ही है.  उसको अध्ययन करना है, जीना है. 

प्रश्न:  आपके निरपेक्ष ऊर्जा को ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत बताने का क्या उद्देश्य है?

उत्तर: मैंने संसार को व्यवस्था के स्वरूप में देखा.  व्यवस्था के स्वरूप में संसार को प्रस्तुत करना ज़रूरी माना.  भौतिकवादी संसार को अव्यवस्था बता कर शुरू किया.  ईश्वरवाद संसार को माया बता कर शुरू किया.  इन दोनों से व्यवस्था बनने वाला नहीं है.  व्यवस्था के स्वरूप में अस्तित्व को प्रस्तुत करने के तकलीफ हो तो बताओ!

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००५, रायपुर)

Friday, August 9, 2019

प्रमाण : अनुभव, व्यव्हार, प्रयोग




प्रमाण को लेकर आपने सूत्र दिया है: -

अनुभव ही प्रमाण परम 
प्रमाण ही समझ ज्ञान
समझ ही प्रत्यक्ष
प्रत्यक्ष ही समाधान, कार्य-व्यव्हार
कार्य-व्यव्हार ही प्रमाण 
प्रमाण ही जागृत परम्परा
जागृत परम्परा ही सहअस्तित्व 

इसको और स्पष्ट कर दीजिये.

उत्तर:  अब प्रमाण पूर्वक जीने की बात आयी है.  प्रमाण है - अनुभव प्रमाण, व्यव्हार प्रमाण और प्रयोग प्रमाण

हमारे आवश्यक वस्तुओं को बनाने में प्रयोग होगा.  व्यव्हार प्रमाण मानव के साथ होगा.  अनुभव प्रमाण व्यवस्था के रूप में होगा.  प्रयोग, व्यव्हार और व्यवस्था कैसा होगा, उसको प्रमाणित करने का सूत्र-व्याख्या भी प्रस्तुत कर दिए.

मानव का अनुभव-प्रमाण पूर्वक सार्वभौम व्यवस्था में जीना बनता है.  व्यव्हार-प्रमाण पूर्वक अखंड-समाज में मानव के साथ जीना बनता है.  प्रयोग-प्रमाण पूर्वक सामान्याकान्क्षा (आहार, आवास, अलंकार) और महत्त्वाकांक्षा (दूरगमन, दूरश्रवण, दूरदर्शन) की वस्तुओं का उत्पादन पूर्वक उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशील बनाना बनता है.  इस प्रकार यदि हम इन तीनों प्रमाणों के साथ जीने का परम्परा बनाते हैं तो मानव का समाधान पूर्वक, समृद्धि पूर्वक व्यवस्था में जीना बनता है.

प्रश्न:  मध्यस्थ दर्शन के प्रकटन से पहले प्रमाण का क्या स्वरूप रहा?

उत्तर:  इसके पहले हमारे पूर्वजों ने (आदर्शवाद में) प्रमाण के बारे में कुछ प्रस्तुत किया.  पहले "शब्द प्रमाण" बताया.  शब्द-प्रमाण को लेकर एक बहुत भारी उपनिषद ही लिखा है - उसका नाम है "कठोपनिषद".  उसमे प्रतिपादित किया है - प्रणव शब्द (ॐ) को शब्द माना.  इसके बाद वेद को शब्द माना.  ब्रह्म सूत्र में लिखा है - "ईक्षतेर नाशब्दम" (ब्र. सू. १, १.५)  जिसका शंकराचार्य ने व्याख्या दिया - ये तीनों वेदों के शब्दों से इस को वर्णन नहीं किया जा सकता.  इस प्रकार वेद को और प्रणव (ॐ) को शब्द माना.  उसके आधार पर कहा - शब्द ही प्रमाण है.

उसके संरक्षण में व्याकरण आयी.  व्याकरण में शब्द को ही "पद" माना.  शब्द को एक ने "प्रमाण" माना और दूसरे ने "पद" माना.  इससे जो उथलपुथल (वाद-विवाद) हुई वह अपने में एक इतिहास ही है.

इसके बाद कहा - आप्त-वाक्य प्रमाण है.

उसके बाद कहा - प्रत्यक्ष अनुमान आगम प्रमाण है.

उसके बाद चौथा कहा - शास्त्र प्रमाण है.

करीब-करीब ये सभी शब्द-प्रमाण ही हैं.

विज्ञानियों ने प्रयोग को प्रमाण कहा.  प्रयोग में यंत्र रहा.  यंत्र जो कहेगा वह सत्य है - ऐसा माना.  उसी आधार पर हमारी स्वास्थ्य को बताने के लिए भी यंत्र को लाये.  यंत्र प्रमाण के तले अपने सुखी होने के लिए हम बहुत सारा प्रयत्न कर रहे हैं.  उसमे कुछ में आसार दिखता है, कुछ में आसार भी नहीं दिखता - ये दोनों हो रहा है.  होते-होते हम विज्ञान विधि से कहीं पहुंचेंगे.

आदर्शवाद और भौतिकवाद (विज्ञान) ने प्रमाण को लेकर जो कहा उसके विकल्प में हम ये तीन प्रमाणों (अनुभव प्रमाण, व्यव्हार प्रमाण और प्रयोग प्रमाण) को प्रतिपादित कर रहे हैं.  इस तरह विकल्प में प्रमाण बदला है, प्रमाण की विधि बदली है, प्रमाण की स्वीकृतियाँ बदली हैं.  अनुभवमूलक विधि से प्रमाण होना है या प्रत्यक्ष-अनुमान-आगम विधि से होना है या शब्द-प्रमाण विधि से होना है - उस पर हमे सोचने की आवश्यकता है.  सोचने पर यदि किसी व्यक्ति का निष्कर्ष निकलता है कि अनुभवमूलक विधि से ही प्रमाण पूरा पड़ता है तो वह निष्ठावान होगा ही.  ऐसा मेरा सोचना है.

प्रमाण के लिए क्या कहा? - "समझ के करो!"

समझ क्या चीज़ है? - "ज्ञान"

ज्ञान क्या चीज़ है ? - "अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान"

इसको अध्ययन किया जा सकता है - यह आपको भी विश्वास हुआ है, मुझको भी विश्वास हुआ है.  अध्ययन आप भी कराते हो, अध्ययन मैं भी कराता हूँ.

ज्ञान ही है जो अध्ययन कराया जा सकता है.  बाकी को अध्ययन कराना बनता भी नहीं है.  अभी की "ज़बरदस्ती" है - जो अध्ययन कराना बनता नहीं है उसको हम अध्ययन मान रहे हैं, जो अध्ययन होता है उसको हम अध्ययन मान नहीं रहे हैं.  जबरदस्ती किया है इसलिए दुःख पाया भी है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (रायपुर, २००५)

Wednesday, August 7, 2019

उपदेश: "जाने हुए को मान लो, माने हुए को जान लो"



ईश्वरवादी परंपरा में कहा गया, विज्ञान में भी कहा गया - "कर के समझो".  ईश्वरवादी परम्परा में कहा गया - "आचरण प्रथमो धर्मः विचारम तदनंतरम"  मतलब - आचरण के बाद विचार करना, उससे पहले नहीं!  इसमें व्यतिरेक यह दिखा - विचार के बिना कोई आचरण कर ही नहीं सकता.  मैंने यह कहा तो मुझे बताया गया कि तुम छोटा मुंह बड़ी बात करते हो.

अब हमने प्रस्तुत किया है - "समझ के करो!" समझ के सोच विचार करना, काम करना, फल परिणाम पाना यदि हम शुरू करते हैं तो धरती में यदि कुछ ताकत बचा होगा तो वह सुधार लेगा.  इस शुभेच्छा से यह प्रस्ताव रखा है.

सभी वास्तविकताओं का प्रयोजन का पता लगा लेना = जानना.  जानने के बाद मानना. 
जानने-मानने के बाद पहचानने-निर्वाह करने की बात आती है.

जाने हुए को मान लेने और माने हुए को जान लेने - इन दोनों स्थितियों में समझ के ही करना बनता है.

समझ के करने से प्रयोजन के अर्थ में प्रयोग करना बन जाता है.  व्यर्थता के प्रयोग करना बंद हो जाता है.

प्रश्न: "जाना हुआ" और "माना हुआ" में क्या अंतर है?

उत्तर: भ्रमित संसार में जाने हुए और माने हुए में व्यतिरेक रहता है.  जागृत संसार में जाने हुए और माने हुए में कोई व्यतिरेक नहीं है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००५, रायपुर)