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Wednesday, May 11, 2022

विचार और तर्क

विचार का एक छोटा सा भाग तर्क है.  स्वीकृति के लिए निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए तर्क है.  निष्कर्ष को जीने में उतारने के लिए तर्क है.


अभी हम विचार को प्रश्न में उलझाने के लिए तर्क को लगाते हैं.  फिर तर्क के लिए तर्क का प्रयोग करते हैं.  वह कभी निष्कर्ष तक पहुँचता नहीं है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०११, अमरकंटक)

Sunday, May 8, 2022

स्व-मूल्यांकन

स्वयम पर विश्वास समझदारी से होता है.  विकसित चेतना (मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना) समझदारी का स्वरूप है.  जीव चेतना समझदारी नहीं है.  विकसित चेतना में पारंगत होने पर हम स्वयं का मूल्यांकन कर सकते हैं.  उसके पहले हम दूसरों से शिकायत ही करते रहते हैं.  विकसित चेतना से पहले हमारा हर व्यक्ति, हर सभा, हर न्यायालय के साथ शिकायत ही बना रहता है.  शिकायत कभी स्वमूल्यांकन का आधार नहीं बनता.  समाधान ही स्वमूल्यांकन का आधार बनता है.  समाधान पाए बिना स्वमूल्यांकन करना बनता नहीं है.  जीव चेतना में हम समाधान नहीं पायेंगे, समस्या ही पायेंगे, समस्या को ही गायेंगे, समस्या को ही गुनेंगे, समस्या में ही हम पंडित कहलायेंगे, दक्षिणा पायेंगे - सभी बात होगा, पर स्वमूल्यांकन होगा नहीं.  स्वमूल्यांकन के लिए समाधान को पाना ही होगा.  समाधान के अर्थ में स्वमूल्यांकन होगा.


स्वमूल्यांकन है - मैं जैसा समझा हूँ, वैसा करता हूँ या नहीं, वैसा जीता हूँ या नहीं, वैसा बोल पाता हूँ या नहीं?  इस check-balance में मूल्यांकन होता है.  यदि हम समझने में, करने में, जीने में, बोलने में एकसूत्रता को पा जाते हैं तो समाधान होगा या समस्या होगा?  एक व्यक्ति में संतुलन यही है.  कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित भेदों से जो हम कर्म करते हैं, इनमे एकसूत्रता बन जाए तो हमारा स्वमूल्यांकन होता है.  एकसूत्रता नहीं आता है तो स्वमूल्यांकन नहीं होता.    इसके बाद समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व स्वरूप में हम जी पा रहे हैं या नहीं - यह दूसरा मूल्यांकन है.  तीसरा - नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म, सत्य पूर्वक जीता हूँ या नहीं - यह तीसरा मूल्यांकन है.  चौथा - स्वधन, स्वनारी-स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य-व्यव्हार स्वरूप में जीता हूँ या नहीं.  हर व्यक्ति समझदार होने पर अपने ऊपर ये कसौटियां लगा सकता है.  शिक्षा इसी के लिए है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर २००९, अमरकंटक)

Wednesday, April 6, 2022

मानव-मानव में समानता की पहचान

 मानव-मानव में समानता की पहचान के साथ ही उनका "साथ में रहना" प्रमाणित होता है.  समानता की पहचान अधूरा रहता है तो उनका "सहवास में रहना" ही बनता है.  "साथ में रहना" में निरंतरता बनता है.  "सहवास में रहना" में निरंतरता बनता नहीं है.  रूप-गुण-स्वभाव-धर्म में विषमता ही सहवास में रहने की बाध्यता है.  इसमें से रूप और गुण कभी दो मानवों के समान नहीं हो सकते.  आपका रूप और मेरा रूप एक नहीं हो सकता.  रचना की खूबी मौलिक रूप में हरेक में अलग-अलग हम देखते है.  गुणों के आधार पर काम करने की जगह में हम और आप अलग-अलग ही रहेंगे.  समान रूप से काम करके हम तृप्ति नहीं पाते हैं.  स्वभाव और धर्म में एकरूपता होने पर मानव का "साथ में रहना" या "जीना" बन जाता है.  मानव में ज्ञान ही स्वभाव और धर्म में एकरूपता का आधार है.  स्वभाव और धर्म के आधार पर मानव जाति एक हो सकती है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Thursday, February 17, 2022

स्वकृपा आवश्यक है


स्वकृपा के बिना ज्ञानप्राप्ति संभव नहीं है.  हमारे चाहे बिना हमको अनुभव कैसे हो सकता है?  अनुभव होने का अधिकार हमारे पास है, यह तो मेरा पहले से ही कल्पना था.  किन्तु अनुभव की वस्तु क्या है, यह स्पष्ट नहीं था.  अब (अनुसन्धान पूर्वक) यह स्पष्ट हो गया कि जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान अनुभव में आता है.  अनुभव के बाद प्रमाणित होना स्वाभाविक ही है.

अनुभव के लिए पीड़ा नहीं है तो शोध काहे को करेंगे?  इस पीड़ा-मुक्ति का आधार शोध ही है.  

ज्ञान में अनुभव हर व्यक्ति का अधिकार है.  

ज्ञान में अनुभव तक कैसे जियें?  इसका उत्तर है - अनुकरण विधि से.  

अभी संसार में जितनी तरह की रूढ़ियाँ हैं, उनको अलग रख कर हम निष्कर्ष पर आने के लिए यहाँ प्रयास कर रहे  हैं.  धरती के बीमार होने से इस प्रस्ताव की आवश्यकता बनता जा रहा है.  ऋतु परिवर्तन हो चुका है, बहुत प्रजाति की वनस्पतियाँ लुप्त हो चुकी हैं, कई प्रकार की जीव प्रजातियाँ समाप्त हो चुकी हैं.  लेकिन मनुष्य सुविधा-संग्रह के अलावा दूसरा कुछ सोच नहीं पा रहा है.

अब आगे का कार्यक्रम है - यदि साक्षात्कार नहीं हुआ है तो अध्ययन से साक्षात्कार का रास्ता बनाया जाए.  यदि साक्षात्कार हो रहा है तो उसके अनुसार जीने का डिजाईन तैयार किया जाए.  इसमें दूसरा पुराण-पंचांग कुछ नहीं है.  

पहले यह पता चल जाता तो समय बच जाता, ऐसा सोचने की जगह -  जब जागे तभी सवेरा हुआ मान लो! 


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर २००९, अमरकंटक) 

Sunday, November 21, 2021

समझदार होने के प्रति ईमानदारी


 


समझदारी के प्रस्ताव को समझ के फिर जाँचना होता है.  बिना समझे जाँचने का कोई मतलब नहीं निकलता.  विगत की विचारधाराओं को जांचने से कुछ निकलेगा नहीं.  किसी भी विधा से दौड़ के आओ उनसे अपराध ही निकलना है.  राज्य विधा से अपराध, धर्म विधा से विरोध, शिक्षा विधा से अपराध, व्यापार विधा से अपराध ही निकलता है.  अपराधिक शिक्षा, अपराधिक राज्य, अपराधिक व्यापार, अपराधिक धर्म, अपराधिक व्यवस्था - इतना ही है.  आदमी के अभी अपराध से बचने का जगह कहाँ है, आप बताओ?  इतना सब होने के बावजूद, इन सबसे छूट के समझदारी पूर्वक जीने का एक प्रस्ताव है.  समाधानित व्यक्ति, समाधान-समृद्धि संपन्न परिवार, समाधान समृद्धि अभय संपन्न समाज, समाधान समृद्धि अभय सहअस्तित्व प्रमाण परम्परा स्वरूपी व्यवस्था.  सुधरा हुआ का स्वरूप इतना ही है. आपकी जरूरत होगी तो इसको समझना आपकी झकमारी है.  इसमें किसी दूसरे का कोई दोष नहीं है.


 इससे अधिक की चाहत मानव के पास नहीं है.  यह चाहिए या नहीं, आप देख लो!  इसके अलावा जो अपराधिक चाहतें हैं, मानव में - उनका प्रभाव समझदारी के आगे पहले ही निरस्त हो जाता है.  जैसे अँधेरी खोली में दिया जलाने से तत्काल प्रकाश हो जाता है, यह उसी प्रकार है.  करोड़ों वर्षों से अन्धकार से भरी खोली क्यों न हो, एक माचिस की तीली से सारा अन्धकार ख़तम!  मानव समझदार होने के प्रति कितना ईमानदारी से संलग्न हो सकता है, उतना ही इसमें देरी है.


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Thursday, November 18, 2021

समझदारी या मजामारी

अब दो ही रास्ते हैं आदमी के पास - समझदारी या मजामारी.  मजामारी में सभी अपराध वैध हैं.  समझदारी में वैध बात अलग है, अवैध बात अलग है.  जैसे - गुड़ और गोबर.  गुड़ एक अलग चीज़ है, गोबर एक अलग चीज़ है.  इसमें मानव के मन पर एक प्रहार भी है, एक सुझाव भी है.  विगत से जुड़ी हुई सूत्रों पर प्रहार है, भविष्य में सुधरने के लिए प्रस्ताव है.  जैसा बने,वैसा करो अब!  

प्रश्न: आप हर समय यह भ्रम और जाग्रति का विश्लेषण क्यों करते हैं?

उत्तर: अभी संक्रमित होने के लिए, परिवर्तित होने के लिए इस विश्लेषण को करने की आवश्यकता है.  जैसे - लाभ समझ में आने के लिए हानि समझ में आना भी आवश्यक है.  हानि किसमें है यह स्पष्ट किये बिना आप लाभ को बता ही नहीं सकते.

इस तरह भ्रम और जाग्रति का नीर-क्षीर विश्लेषण किया.  अब सर्वेक्षण में आया कि हर मानव जाग्रति को चाहता है.  लेकिन अभी मानव जहाँ है, उसको अपने मन की जाग्रति चाहिए!  वो होता नहीं है.  इसीलिये जीव-चेतना और मानव-चेतना के बीच की लक्ष्मण-रेखा को स्पष्ट कर दिया.  मानव चेतना में मानव समझदारी से जीता है.  जीव चेतना में सकल अपराध को समझदारी मानता है.  भ्रमित मानव में जागृत होने की अपेक्षा है, उस अपेक्षा को पूरा करने के लिए तमीज चाहिए.  उस तमीज के लिए यह प्रस्ताव है.  यह पर्याप्त है या नहीं उसको पहले जांचो, उसके बाद बात करो!

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)