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Monday, March 2, 2026

परिवर्तन की सम्भावना

मध्यम वर्गीय कहलाने वाले जो intellects हैं, उन में यह कामना दिखती है कि और कुछ सटीक होना चाहिए, इनमे सत्य के प्रति अपेक्षा है।  अतः ये लोग पहले समझेंगे।  इसीलिये परिवर्तन की सम्भावना है, ऐसा मैं मानता हूँ.  जो निम्न वर्गीय कहलाने वाले अभाव ग्रस्त लोग हैं उनसे कुछ नहीं होगा, उच्च वर्गीय कहलाने वाले जो बहुत ज्यादा संग्रह-सुविधा में लिप्त हो गए हैं - उनसे भी कुछ नहीं होगा।  मध्यम वर्गीय लोग समझने के बाद निम्न वर्गीय लोग समझेंगे, उसके बाद उच्च वर्गीय लोग समझेंगे।

 - श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Sunday, March 1, 2026

सहीपन के लिए संकल्प

हर पीढ़ी का अगली पीढ़ी के साथ generation gap जो दिखता है, उसकी जरूरत है या नहीं?  generation gap की ज़रूरत महसूस होता है, तो जो चल रहा है उसी के साथ continue किया जाए.  generation gap का जरूरत महसूस नहीं होता है तो इस विकल्प को सोचा जाए.


इस विकल्प से समझदारी पूरा होता है या नहीं, यह जांचने का अधिकार आपके पास है.  


जहाँ कहीं भी आप हैं, उसमें श्रम से जी सकते हैं या नहीं - इसको तय करने में आप समर्थ हैं.


फिर हमारी जो अभी जिम्मेदारियां हैं - बच्चे हैं, बड़े हैं उनकी तरफ.  उसके लिए जो अभी तक हमने उपार्जित किया, वो पर्याप्त है या नहीं।  उसको आप judge कर सकते हैं.


इन चार बातों पर यदि आप निष्कर्ष निकाल लें तो आगे की बात सोच सकते हैं.  इनमें से कोई भी बात छोड़ करके आप भाग नहीं सकते।  


सहीपन के लिए यदि हम संकल्प करते हैं तो वह आराम से सफल हो जाता है.  इसके विपरीत आदर्शवाद में बताया गया था - श्रेयांसि बहु विघ्नानि भवन्ति महतामपि।  अर्थात, सहीपन के लिए तुम चलना चाहते हो, तो विध्न बहुत हैं.  मेरा सोचना इससे बिल्कुल विपरीत है.  श्रेय के लिए कोई काम करता है तो उसके लिए बहुत सहायता बन ही जाती है.  सहीपन के लिए आदमी प्रयत्न करने से कोई तकलीफ नहीं है, सभी सुखद है.  मेरे अनुभव के अनुसार ऐसा ही है.  सहीपन के लिए अवधारणा न होने से तकलीफ होती ही है.  मनमानी कुछ करेंगे तो विध्न होगा ही.   


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

जीव और मानव

 प्रश्न: जीव शरीरों को संचालित करने वाले जीवन और मनुष्य शरीर को संचालित करने वाले जीवन में क्या अंतर है?

उत्तर:  मनुष्य शरीर को चलाने वाला जीवन कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को व्यक्त करता है, जबकि जीव शरीर को चलाने वाला जीवन ऐसा नहीं करता।  मनुष्य शरीर में मेधस रचना ऐसी बनी है जिससे जीवन का कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता प्रकट होता है.  जीव शरीरों के मेधस तंत्र में यह व्यवस्था नहीं है.  बहुत से जीवों में मानव के संकेत ग्रहण करने का अधिकार रखा है, किन्तु अपनी कल्पनाशीलता-कर्मस्वतंत्रता उनमे कुछ नहीं है.  इससे जीव कर्म करते समय भी परतंत्र है, फल भोगते समय भी परतंत्र है.  मानव कर्म करते समय में स्वतन्त्र है, फल भोगते समय परतंत्र है.  इसके आगे मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु की खोज करता है.  जीवों में यह बात नहीं है.  उनका आचरण उनके वंश परंपरा के अनुसार ही रहता है.  मानव में ज्ञान के अनुसार आचरण करने का प्रावधान है.  यह अभी तक तय ही नहीं हो पाया।  कैसा आचरण होना चाहिए - इसको बताने वाले एक से बढ़ कर एक अहमता वाले संसार में बैठे हैं!  


मानव और देवमानव में ये अंतर है कि मानव minimum beautiful है, उससे अच्छा देवमानव है. उसके लिए प्रयत्न मानव में होती रहती है.  मानव द्वारा दिव्यमानव पद को प्राप्त करने के लिए देवमानव बीच में स्थिति है.  दिव्यमानव पद में पहुँचने के बाद पुनः वापस नहीं होता।  वह संक्रमण है.  इस तरह - गठन पूर्णता के साथ जीव चेतना की सीमा में जीना होता है.  मानव चेतना में जीने से क्रिया पूर्णता हो गयी.  दिव्य चेतना में पहुँचने के बाद आचरण पूर्णता हो गयी.  पूर्णता के ये तीन stages हैं.  मानव पद में जो आचरण निश्चित हो गया, वह आचरण देवमानव भी करेगा, दिव्यमानव भी करेगा।  मानवीयता पूर्ण आचरण इनमें यथावत बना रहता है.  इनमें अंतर केवल उपकार करने में होता है.  मानव जितना उपकार करता है उससे ज्यादा देव मानव उपकार करता है, पूर्ण रूप में दिव्य मानव उपकार करता है.  आचरण में तीनों समान हैं.  इसीलिए मानव पद को base माना है.  इसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता।  मानव का आचरण, स्वभाव और दृष्टि पूर्वक जीना संभव है या नहीं - इसको आप जाँचिए।  यदि संभव है तो हम क्या प्रमाणित हो पाते हैं या नहीं - इसको सोचा जा सकता है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Saturday, February 28, 2026

विकास और जागृति

अनुभव होने के रूप में होता है या और किसी रूप में होता है?  होना मतलब अस्तित्व।  हवा के होने के आधार पर हवा का अनुभव है.  धरती के होने के आधार पर धरती का अनुभव है.  पानी के होने के आधार पर पानी का अनुभव है.  होने का ही अध्ययन है, होने का ही अनुभव है.  होने का अनुभव पूर्वक ही न्याय धर्म सत्य पूर्वक जीना प्रमाणित होता है.  

विज्ञान ने ऐसा माना - हमको जो बर्बाद करना है, वो अध्ययन है.  हमको जो बर्बाद करना है, वो प्रयोग है.  इसको सुविधा-संग्रह के आधार पर विकास मान लिया।  दूसरे, जो ज्यादा मार-पीट कर सके उसको ज्यादा विकसित मान लिया।  और कोई आधार नहीं है.  इस ढंग से जो होना था, वह हो ही चुका है.


अब यह सोचा जाए - न्याय पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  समाधान पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  सत्य पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  इसके साथ नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्वक जीना विकास और जागृति है.  इस तरह इन 6 बिंदुओं में हम विकास और जागृति को पहचान सकते हैं.  अब हमको निर्णय करना है - शोषण और मारपीट करना विकास और जागृति है या न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जीना विकास और जागृति है?


अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है.  इसी से, इसी में, इसी के लिए अध्ययन है.  इसको छोड़ करके हम जो कुछ अध्ययन करते हैं वो मिथ्या हो जाता है, अपराध के लिए रास्ता बन जाता है.  सहअस्तित्व को भुलावा दे कर हमने कुछ भी अध्ययन किया, तो वह अपराध की जगह में पहुँच जाता है या चुप होने की जगह में पहुँच जाता है.  प्रयोग में आ जाएंगे तो अपराध करेंगे, रहस्य में फंसेंगे तो चुप हो जायेंगे।  यह बात तयशुदा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Friday, February 27, 2026

प्रश्न करने का अधिकार

समझा हुआ व्यक्ति प्रश्न करने का अधिकार रखता है या न समझा हुआ व्यक्ति प्रश्न करने का अधिकार रखता है?   

समझा हुआ व्यक्ति सामने व्यक्ति को समझाने के बाद वह समझा या नहीं समझा, इसको जाँचने के लिए प्रश्न कर सकता है. 

न समझा हुआ व्यक्ति क्या प्रश्न करेगा?  न समझा हुआ व्यक्ति समझने के लिए इच्छा या चाहत प्रकट करेगा या प्रश्न करेगा?  ना समझा हुआ व्यक्ति समझने की चाहत प्रकट कर सकता है क्योंकि उसके पास अनुमान क्षमता है.  अनुमान के आधार पर हम सच्चाई को समझना चाहते हैं, समाधान चाहते हैं - इनके लिए हम अपनी आशा व्यक्त कर सकते हैं.  न समझा हुआ व्यक्ति समझने के लिए अपना चाहत व्यक्त कर सकता है.  चाहत को प्रश्न कहना बेसिरपैर की बात हो गया या नहीं? 

विज्ञान युग ने आ कर तर्क का दरवाजा खोल दिया।  सब कुछ तर्क-संगत होना आवश्यक है - ऐसा कहा.  उनके अनुसार प्रश्न भी तर्क है, उत्तर भी तर्क है.  इससे तर्क के लिए तर्क करने की बात शुरू हो गयी.  यह उन्होंने अपने डूबने के लिए रास्ता बना लिया।  समझा हुआ बात एक से एक जुड़ा रहता है.  इसमें प्रश्न क्या हो सकता है?  अभी हर दारु पिया हुआ आदमी, हर लम्पट आदमी, हर जगह प्रश्न ही प्रश्न करता है.  प्रश्नों की कतार बना देता है.  जबकि उसके पास प्रश्न करने का कोई आधार ही नहीं रहता है.  

इस बात को generalise करने की ज़रूरत है या नहीं?  यद्दपि हमारे प्रस्ताव में मैंने इस तरीके को प्रस्तुत नहीं किया है.  जरूरत होने पर इसको प्रस्तुत किया जा सकता है, ऐसा मेरा सोच है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Monday, February 23, 2026

आदर्श का मतलब है - मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर

जिसको आदर्श माना, उसको परम पूज्य मानना।  उनको सम्मानजनक विधि से सम्बोधन करना, उनको खाना खिलाना आदि को पुण्य मानना।  इससे हमारे सभी पापों से मुक्ति होती है - ऐसा भी मानना।  हम बहुत ऐश्वर्यवान हो जाएंगे - यह भी मानना।  यही आदर्शवादी परम्परा में बताया गया है.  आदर्श का केंद्र बनाया जैसे  - एक पत्थर को, एक झाड़ को, एक नदी को.  कुल मिलाकर आदर्श है - हमारी मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर.  इससे अधिक कुछ निकलता है?  उसी प्रकार देवी-देवताओं और अवतारों को आदर्श बनाया - क्यों, मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर.  उससे पहले ज्ञान को आदर्श बनाया - क्यों, वो भी मनोकामनाओं को पूरा करने का ठौर.  मनोकामनाएं पूरा होते-होते धरती ही बीमार हो गया.  

अब यह सब चलेगा नहीं।  अब वही चलेगा जिससे मानवीयता पूर्ण आचरण स्पष्ट होता हो, संविधान स्पष्ट होता हो, शिक्षा स्पष्ट होता हो, और व्यवस्था स्पष्ट होता हो.  इन चार बातों को यदि हम शिक्षा विधि से दे पाएं तो वह चलेगा, बाकी कुछ भी नहीं चलेगा।  

इसीलिए मध्यस्थ दर्शन में लिखा - प्रतीक प्राप्ति नहीं है, उपमा उपलब्धि नहीं है.  

मनुष्य समझदार हो कर समाधानित होता है, सुखी होता है.  भ्रमित रह कर समस्या पैदा करता है, दुखी रहता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Sunday, February 22, 2026

सुख और दुःख


 प्रश्न: आपके सामने कोई दुःखी व्यक्ति आता है तो क्या आप दुःखी नहीं होते?  निरंतर सुख में कैसे बने रहते हैं?

उत्तर: मानव समाधान में ही निरंतर सुखी है.  दुखी व्यक्ति को देखने पर हमारे मन में उसके दुःख के निराकरण का उपाय आता है, तो हम निरंतर सुखी हैं.  यह दूसरे व्यक्ति में उसकी ज़रूरत के अनुसार ही ट्रांसफर होगा, हमारे इच्छा से ट्रांसफर नहीं होगा।  दुखी व्यक्ति अपने में सुधार करने पर ही सुखी होगा।  समझदार व्यक्ति को सामने व्यक्ति के दुःख को देख कर पीड़ा नहीं होती, क्योंकि उसको दुःख का कारण भी पता रहता है, उसका निवारण कैसे होगा यह भी पता रहता है.  इसमें पीड़ित होने का कोई रास्ता ही नहीं है.  पीड़ा हज़ारों कोस दूर ही रह गया.  जब तक हमे दुःख के कारण और उसके निवारण का पता नहीं है, तब तक हम दुखी को देख कर दुखी होते ही हैं.  लोग मानते हैं कि दूसरों के दुःख देख के वो पीड़ित हो गए तो महान हो गए!  आप ही सोच कर अपने विवेक से निर्णय करो कि क्या ठीक है.  

समाधान से पहले मानव दुखी रहता ही है.  इसी को देख कर पूर्व में कहा गया कि संसार में दुःख ही दुःख है.  विकल्प विधि से हम कह रहे हैं कि समाधान पूर्वक हमे दुःख का कारण पता रहता है, उसके निवारण का अधिकार रहता है.  ऐसे में हमारे दुखी होने का कारण ही नहीं बनता।  

समाधान = सुख, समस्या = दुःख।  अपने में समस्या है इसलिए दूसरों का समस्या हमको दुखी करता है.  अपने में यदि समाधान है तो सामने व्यक्ति के लिए भी समाधान है.  

प्रश्न:  निरंतर सुख की आपकी स्थिति में क्या सारी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं?

उत्तर:  वैध या सकारात्मक इच्छाएं सब रहता हैं.  निषेधात्मक इच्छाएं नहीं रहता हैं.  आपके अनुसार क्या निषेधात्मक इच्छाएं होना चाहिए? निरंतर सुख की इस स्थिति में हर व्यक्ति को होना चाहिए या नहीं?  

प्रश्न: क्या सकारात्मक इच्छाएं दुःख का कारण नहीं है?  मेरी इच्छा है संसार से गरीबी प्रदूषण समाप्त हो जाए, पर संसार में उसके विपरीत ही होता दिख रहा है.  क्या यह मेरे दुःख का कारण नहीं है?

उत्तर: इच्छा होना पर्याप्त नहीं है.  इच्छा के पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होना आवश्यक है.  मानव में शुभेच्छा आदिकाल से है.  उसके पीछे ज्ञान-विवेक-विज्ञान होने से समाधान होता है.  यह अभी के विज्ञान से नहीं होगा।  मानव लक्ष्य के लिए दिशा निर्धारित करने वाले विज्ञान से यह होगा।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)