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Monday, July 4, 2022

सत्ता और मध्यस्थ क्रिया

सत्ता की प्रेरणा प्रकृति में मध्यस्थ क्रिया रूप में ही है.  परमाणु, अणु, वनस्पति संसार, जीव संसार में संतुलन इसी आधार पर है.  मानव के भी मध्यस्थ क्रिया के आधार पर संतुलित होने की व्यवस्था है.  


मध्यस्थ सत्ता में प्रेरणा से मध्यस्थ क्रिया है.  वस्तु प्रेरणा पाता है.  प्रेरणा स्वीकृति के रूप में है.  मध्यस्थ सत्ता में जड़-चैतन्य वस्तुओं को मध्यस्थ क्रिया के लिए प्रेरणा है.  


पूर्णता की प्रेरणा मध्यस्थ क्रिया रूप में है.  


प्रश्न: तो क्या जीवन में आत्मा का कोई रोल है उसको पूर्णता (अनुभव) की ओर गतित करने में?


उत्तर: है.  भौतिक संसार में भी मध्यस्थ क्रिया का रोल है, पूर्णता की ओर प्रेरित करने का.  आत्मा की रौशनी में मानव का क्रियाशील होना अभी शेष है.


प्रश्न: आत्मा की रौशनी में मानव के क्रियाशील होने से पूर्व आत्मा का क्या रोल है?


उत्तर: ज्ञानार्जन के अर्थ में, अध्ययन के अर्थ में.


प्रश्न: क्या जीवन की अन्य क्रियाओं में भी पूर्णता के लिए प्रेरणा है?


उत्तर: आशा को आशा की गम्य स्थली के लिए प्रेरणा है.  विचार को विचार की गम्यस्थली के लिए प्रेरणा है.  इच्छा को इच्छा की गम्यस्थली के लिए प्रेरणा है.   संकल्प को संकल्प की गम्यस्थली के लिए प्रेरणा है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक) 



सत्ता और ज्ञान

सहअस्तित्व में मानव समाहित है.  सहअस्तित्व से चारों अवस्थाओं में संतुलन भी इंगित है, सत्ता में सम्पृक्त्ता भी इंगित है.  व्यव्हार रूप में चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित रूप में जीना और अनुभव में सम्पृक्त्ता/पारगामीयता का ज्ञान होना.  पारगामीयता के आधार पर ही सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान है.  व्यापक वस्तु के प्रतिरूप का नाम है ज्ञान.  व्यापक वस्तु को अभिव्यक्त करना, संप्रेषित करना, आचरण में लाना का नाम ज्ञान है.  ज्ञान का प्रमाण केवल मानव है.  व्यापक वस्तु ही मानव द्वारा ज्ञान के नाम से प्रकाशित होता है.

मानव में ऊर्जा सम्पन्नता ज्ञान है.  मानव में जो कुछ भी ऊर्जा है, उसका नाम है 'ज्ञान'.  चार विषयों का ज्ञान, पांच संवेदनाओं का ज्ञान, तीन एषणाओं का ज्ञान, उपकार का ज्ञान.  चार विषयों और पांच संवेदनाओं के ज्ञान से शरीर संवेदनाओं की सीमा में जीना बनता है.  जिसको जीव चेतना नाम है.  तीन एषणाओं और उपकार का ज्ञान होने पर विशालतम स्वरूप में जीना बनता है.  जिसको मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना नाम है.  जिस सीमा में जीना है, जियो!  हम तो आग्रह नहीं करेंगे, आप ऐसे ही जियो.  

ज्ञान के बिना कोई मानव मिलेगा नहीं.  ज्ञान को हम संकीर्ण बनाते हैं तो दुखी होते हैं, विशाल बनाते हैं तो सुखी होते हैं.  

सत्ता को समझने के लिए मनुष्य में जो ज्ञान है, वहां से शुरू करना होगा.  ज्ञान को छोड़ के सत्ता को समझना किसी से होगा नहीं, चाहे कुछ भी कर लो!  ज्ञान को स्वयं में पहचानना ही स्वनिरीक्षण है.  स्वनिरीक्षण विधि से हम निष्कर्ष पर पहुंचेंगे, और किसी विधि से नहीं.  स्वनिरीक्षण पर ध्यान नहीं जाना ही fallacy है.  चार विषय और पांच संवेदनाएं पर-सापेक्ष हैं.  जीवन के लिए शरीर "पर" है.  शरीर की निवृत्ति होती है.  जीवन शरीर को चलाता है, छोड़ देता है.   चार विषय और पांच संवेदनाएं पर-सापेक्ष होने के कारण इनमे स्वनिरीक्षण हो नहीं सकता.  स्वनिरीक्षण मानवीय और अतिमानवीय विषय (तीन एषणा और उपकार) की सीमा में ही संभव है.  स्वनिरीक्षण होने पर पता चलता है, ज्ञान जीवन का है.  सहअस्तित्व ज्ञान के बिना जीवन ज्ञान होता नहीं है.  अभी तक तो हुआ नहीं!  सारा सिर कूट लिया, साधना कर लिया, यज्ञ कर लिया, तप कर लिया, योग कर लिया - क्या नहीं किया!  चारों अवस्थाओं के साथ सहअस्तित्व को अनुभव करना = सहअस्तित्व ज्ञान होना.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०१०, अमरकंटक) 

Wednesday, May 11, 2022

विचार और तर्क

विचार का एक छोटा सा भाग तर्क है.  स्वीकृति के लिए निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए तर्क है.  निष्कर्ष को जीने में उतारने के लिए तर्क है.


अभी हम विचार को प्रश्न में उलझाने के लिए तर्क को लगाते हैं.  फिर तर्क के लिए तर्क का प्रयोग करते हैं.  वह कभी निष्कर्ष तक पहुँचता नहीं है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०११, अमरकंटक)

Sunday, May 8, 2022

स्व-मूल्यांकन

स्वयम पर विश्वास समझदारी से होता है.  विकसित चेतना (मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना) समझदारी का स्वरूप है.  जीव चेतना समझदारी नहीं है.  विकसित चेतना में पारंगत होने पर हम स्वयं का मूल्यांकन कर सकते हैं.  उसके पहले हम दूसरों से शिकायत ही करते रहते हैं.  विकसित चेतना से पहले हमारा हर व्यक्ति, हर सभा, हर न्यायालय के साथ शिकायत ही बना रहता है.  शिकायत कभी स्वमूल्यांकन का आधार नहीं बनता.  समाधान ही स्वमूल्यांकन का आधार बनता है.  समाधान पाए बिना स्वमूल्यांकन करना बनता नहीं है.  जीव चेतना में हम समाधान नहीं पायेंगे, समस्या ही पायेंगे, समस्या को ही गायेंगे, समस्या को ही गुनेंगे, समस्या में ही हम पंडित कहलायेंगे, दक्षिणा पायेंगे - सभी बात होगा, पर स्वमूल्यांकन होगा नहीं.  स्वमूल्यांकन के लिए समाधान को पाना ही होगा.  समाधान के अर्थ में स्वमूल्यांकन होगा.


स्वमूल्यांकन है - मैं जैसा समझा हूँ, वैसा करता हूँ या नहीं, वैसा जीता हूँ या नहीं, वैसा बोल पाता हूँ या नहीं?  इस check-balance में मूल्यांकन होता है.  यदि हम समझने में, करने में, जीने में, बोलने में एकसूत्रता को पा जाते हैं तो समाधान होगा या समस्या होगा?  एक व्यक्ति में संतुलन यही है.  कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित भेदों से जो हम कर्म करते हैं, इनमे एकसूत्रता बन जाए तो हमारा स्वमूल्यांकन होता है.  एकसूत्रता नहीं आता है तो स्वमूल्यांकन नहीं होता.    इसके बाद समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व स्वरूप में हम जी पा रहे हैं या नहीं - यह दूसरा मूल्यांकन है.  तीसरा - नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म, सत्य पूर्वक जीता हूँ या नहीं - यह तीसरा मूल्यांकन है.  चौथा - स्वधन, स्वनारी-स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य-व्यव्हार स्वरूप में जीता हूँ या नहीं.  हर व्यक्ति समझदार होने पर अपने ऊपर ये कसौटियां लगा सकता है.  शिक्षा इसी के लिए है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर २००९, अमरकंटक)

Wednesday, April 6, 2022

मानव-मानव में समानता की पहचान

 मानव-मानव में समानता की पहचान के साथ ही उनका "साथ में रहना" प्रमाणित होता है.  समानता की पहचान अधूरा रहता है तो उनका "सहवास में रहना" ही बनता है.  "साथ में रहना" में निरंतरता बनता है.  "सहवास में रहना" में निरंतरता बनता नहीं है.  रूप-गुण-स्वभाव-धर्म में विषमता ही सहवास में रहने की बाध्यता है.  इसमें से रूप और गुण कभी दो मानवों के समान नहीं हो सकते.  आपका रूप और मेरा रूप एक नहीं हो सकता.  रचना की खूबी मौलिक रूप में हरेक में अलग-अलग हम देखते है.  गुणों के आधार पर काम करने की जगह में हम और आप अलग-अलग ही रहेंगे.  समान रूप से काम करके हम तृप्ति नहीं पाते हैं.  स्वभाव और धर्म में एकरूपता होने पर मानव का "साथ में रहना" या "जीना" बन जाता है.  मानव में ज्ञान ही स्वभाव और धर्म में एकरूपता का आधार है.  स्वभाव और धर्म के आधार पर मानव जाति एक हो सकती है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Thursday, February 17, 2022

स्वकृपा आवश्यक है


स्वकृपा के बिना ज्ञानप्राप्ति संभव नहीं है.  हमारे चाहे बिना हमको अनुभव कैसे हो सकता है?  अनुभव होने का अधिकार हमारे पास है, यह तो मेरा पहले से ही कल्पना था.  किन्तु अनुभव की वस्तु क्या है, यह स्पष्ट नहीं था.  अब (अनुसन्धान पूर्वक) यह स्पष्ट हो गया कि जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान अनुभव में आता है.  अनुभव के बाद प्रमाणित होना स्वाभाविक ही है.

अनुभव के लिए पीड़ा नहीं है तो शोध काहे को करेंगे?  इस पीड़ा-मुक्ति का आधार शोध ही है.  

ज्ञान में अनुभव हर व्यक्ति का अधिकार है.  

ज्ञान में अनुभव तक कैसे जियें?  इसका उत्तर है - अनुकरण विधि से.  

अभी संसार में जितनी तरह की रूढ़ियाँ हैं, उनको अलग रख कर हम निष्कर्ष पर आने के लिए यहाँ प्रयास कर रहे  हैं.  धरती के बीमार होने से इस प्रस्ताव की आवश्यकता बनता जा रहा है.  ऋतु परिवर्तन हो चुका है, बहुत प्रजाति की वनस्पतियाँ लुप्त हो चुकी हैं, कई प्रकार की जीव प्रजातियाँ समाप्त हो चुकी हैं.  लेकिन मनुष्य सुविधा-संग्रह के अलावा दूसरा कुछ सोच नहीं पा रहा है.

अब आगे का कार्यक्रम है - यदि साक्षात्कार नहीं हुआ है तो अध्ययन से साक्षात्कार का रास्ता बनाया जाए.  यदि साक्षात्कार हो रहा है तो उसके अनुसार जीने का डिजाईन तैयार किया जाए.  इसमें दूसरा पुराण-पंचांग कुछ नहीं है.  

पहले यह पता चल जाता तो समय बच जाता, ऐसा सोचने की जगह -  जब जागे तभी सवेरा हुआ मान लो! 


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर २००९, अमरकंटक)