वास्तविकता के साथ तर्क नहीं होता। वास्तविकता को या तो स्वीकारना होता है या अस्वीकारना होता है. वास्तविकता को अस्वीकारने की स्थिति में हीनता आता ही है. हीनता दुर्बलता है कि हम ये नहीं कर सकते, हम ये नहीं समझ सकते, हम ऐसा जी नहीं सकते. इन तीन बातों में से किसी न किसी को लेकर हीनता होती है. सच्चाई यही है - यह समझ में आने के बाद ऐसा जी नहीं सकते तो कुंठा, निराशा कुछ न कुछ तो होता ही है. इससे आदमी प्रताड़ित होता ही है. यही इस प्रस्ताव का प्रहार है. इसमें सुधरने का रास्ता यही है. स्वयंस्फूर्त विधि से सुधरना।
प्रश्न: सच्चाई यही है - यह समझ में आने पर तो आत्मविश्वास आना चाहिए, हीनता क्यों आएगा?
उत्तर: व्यक्ति परिस्थितिवश प्रताड़ित होता है तो हीनता का शिकार होगा ही. सच्चाई समझ में आने के बाद आचरण में नहीं ला पाता है, तो यह सब होता है. सच्चाई समझ में आने के बाद उसको जीना ही पड़ता है. यह समझ को आचरण में ला कर स्वयंस्फूर्त होने का प्रेरणा है. समझ को आचरण नहीं करेंगे तो कुंठा, हीनता का शिकार होना पड़ेगा। कुंठा, हीनता मनुष्य को स्वीकार नहीं है.
संसार के भ्रम में आसक्त रहते हैं इसीलिये देरी लगता है, नहीं तो इतना देर लगना नहीं चाहिए। आराम से सोच-विचार के, पूरा समझने के बाद जीने के लिए तैयारी करो - ऐसा मेरा कहना है. साधना विधि में मेरे साथ क्या था - पूरा जिज्ञासा होने के बाद, जिसके बिना मैं जी नहीं सकता, यह स्थिति अपने में आने के बाद अनुसन्धान करने की बात थी। जिज्ञासा में थोड़ी भी कमी होती तो हम निकल नहीं पाते। अब आपके लिए समझने के लिए स्त्रोत हो गया, समझने के बाद स्वाभाविक रूप में जीना बनता है. जबतक समझने में आनाकानी करते हैं, यही समय लगाता है.
सीधा सीधा समझने में युवा पीढ़ी में रास्ता है, उसके बाद थोड़ा टेढ़ी मेड़ी होता है, समय लगता है. युवा पीढ़ी में सीधा सीधा ज्ञान स्वीकार हो जाता है, इसमें कोई मजबूर करने की ज़रूरत नहीं रहती. कोई भी मुद्दे को सुना, स्वीकार हुआ, फिर उसके detail में गए, जीने की कला तक पहुंचे। उसके बाद दूसरे मुद्दे पर चले, तीसरे मुद्दे पर चले - ऐसे तो अध्ययन ही होता है. मुद्दे इने-गिने ही हैं. सभी मुद्दे ज्ञान विवेक विज्ञान से जुड़े हैं. विज्ञान व्यवस्था के पांच आयामों से जुड़ा है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)