हर वस्तु प्रकाशमान है. इसका प्रमाण है, वस्तुएं एक दूसरे को पहचानती हैं. एक परमाणु अंश दूसरे परमाणु अंश को पहचानता है, इसीलिये परमाणु गठन होता है. इसी प्रकार अनेक अंशों का पहचान भी एक दूसरे के साथ होती है. इसी क्रम में एक परमाणु दूसरे परमाणु को पहचानता है. इसका प्रमाण है - अणु. एक अणु दूसरे अणु को पहचानता है. इसका प्रमाण है - अणु रचित रचना। यह धरती एक अणु रचित रचना है. एक दूसरे के पहचानने के आधार पर प्रतिबिम्बन समझ में आता है.
इसके बाद आता है, प्रत्येक वस्तु अनंत कोण संपन्न है. इस आधार पर प्रत्येक कोण में स्थित पदार्थ एक दूसरे को पहचानते हैं. या सभी ओर से वस्तु को पहचाना जाता है. कोण हर वस्तु में समायी है. अभी प्रचलित विज्ञान इसका उल्टा बताता है. प्रचलित विज्ञान के अनुसार वस्तु में कोण नहीं समाया है, कोण बनाता है आदमी।
इसके बाद आता है, अनुबिम्ब। अनुबिम्ब का मतलब है - प्रतिबिम्ब का प्रतिबिम्ब। प्रतिबिम्ब के आधार पर पहचान हुई, अनुबिम्ब के आधार पर प्रभाव पड़ा. जैसे, आपका प्रतिबिम्ब मुझ पर है, आपकी पहचान को जो मैं समझा हूँ उसे मैं अपने बच्चों को समझा देता हूँ, यह मेरे बच्चों पर आपका अनुबिम्ब हुआ. इस तरह एक वस्तु दूसरी वस्तु को प्रतिबिम्बन विधि से पहचानती है. अनेक वस्तुएं एक वस्तु को अनुबिंबन विधि से पहचानती हैं. यह पहचान सहअस्तित्व में होने-रहने के लिए होता है. जैसे मैं आपको पहचानता हूँ, आपके साथ जीने के लिए. अनुबिंबन विधि से अनेक व्यक्ति आपके साथ जीने के लिए आ जाते हैं. मेरे साथ जीने के लिए पहले एक भी व्यक्ति नहीं था. पहले कुछ व्यक्ति हुए, फिर बहुत सारे व्यक्ति हो गए - यह अनुबिंबन विधि से हुआ. प्रतिबिम्ब और अनुबिम्ब भौतिक-रासायनिक वस्तु में है ही, सहअस्तित्व में रहने के लिए. इसी आधार पर धरती पर रचना प्रवृत्ति सफल हुआ है. धरती स्वयं एक रचना है - अनंत अणुओं परमाणुओं से बनी. यह रचना प्रतिबिम्ब-अनुबिम्ब विधि से सार्थक हो गयी.
प्रत्यानुबिम्ब है - अनुबिम्ब का प्रतिबिम्ब। प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब और प्रत्यानुबिम्ब में वस्तु ट्रांसफर नहीं होता है, वस्तु का प्रभाव ट्रांसफर होता है. प्रत्यानुबिम्ब विधि से वस्तु का प्रभाव क्षेत्र बन गया. प्रत्यानुबिम्ब विधि से मानव परम्परा में लोकव्यापीकरण होता है, जो है - ज्ञान का प्रभाव। जिनके साथ हम जीते हैं, उनपर हमारा प्रतिबिम्ब रहता ही है. वो जिन जिन के साथ जीते हैं, उन पर हमारा अनुबिम्ब रहता ही है. वो जिन जिन से सम्बन्ध में रहते हैं, उनके सीमा तक हमारा प्रभाव क्षेत्र रहता है. मानव का प्रभाव क्षेत्र ज्ञान या समझदारी रूप में होता है. समझदारी समान है - इस धरती पर हो या अन्य धरती पर हो. समझदारी का धारक-वाहक मानव है. इस ढंग से प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब और प्रत्यानुबिम्ब का प्रयोजन है - सहअस्तित्व में होना और रहना।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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