प्रश्न: जीव शरीरों को संचालित करने वाले जीवन और मनुष्य शरीर को संचालित करने वाले जीवन में क्या अंतर है?
उत्तर: मनुष्य शरीर को चलाने वाला जीवन कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को व्यक्त करता है, जबकि जीव शरीर को चलाने वाला जीवन ऐसा नहीं करता। मनुष्य शरीर में मेधस रचना ऐसी बनी है जिससे जीवन का कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता प्रकट होता है. जीव शरीरों के मेधस तंत्र में यह व्यवस्था नहीं है. बहुत से जीवों में मानव के संकेत ग्रहण करने का अधिकार रखा है, किन्तु अपनी कल्पनाशीलता-कर्मस्वतंत्रता उनमे कुछ नहीं है. इससे जीव कर्म करते समय भी परतंत्र है, फल भोगते समय भी परतंत्र है. मानव कर्म करते समय में स्वतन्त्र है, फल भोगते समय परतंत्र है. इसके आगे मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु की खोज करता है. जीवों में यह बात नहीं है. उनका आचरण उनके वंश परंपरा के अनुसार ही रहता है. मानव में ज्ञान के अनुसार आचरण करने का प्रावधान है. यह अभी तक तय ही नहीं हो पाया। कैसा आचरण होना चाहिए - इसको बताने वाले एक से बढ़ कर एक अहमता वाले संसार में बैठे हैं!
मानव और देवमानव में ये अंतर है कि मानव minimum beautiful है, उससे अच्छा देवमानव है. उसके लिए प्रयत्न मानव में होती रहती है. मानव द्वारा दिव्यमानव पद को प्राप्त करने के लिए देवमानव बीच में स्थिति है. दिव्यमानव पद में पहुँचने के बाद पुनः वापस नहीं होता। वह संक्रमण है. इस तरह - गठन पूर्णता के साथ जीव चेतना की सीमा में जीना होता है. मानव चेतना में जीने से क्रिया पूर्णता हो गयी. दिव्य चेतना में पहुँचने के बाद आचरण पूर्णता हो गयी. पूर्णता के ये तीन stages हैं. मानव पद में जो आचरण निश्चित हो गया, वह आचरण देवमानव भी करेगा, दिव्यमानव भी करेगा। मानवीयता पूर्ण आचरण इनमें यथावत बना रहता है. इनमें अंतर केवल उपकार करने में होता है. मानव जितना उपकार करता है उससे ज्यादा देव मानव उपकार करता है, पूर्ण रूप में दिव्य मानव उपकार करता है. आचरण में तीनों समान हैं. इसीलिए मानव पद को base माना है. इसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता। मानव का आचरण, स्वभाव और दृष्टि पूर्वक जीना संभव है या नहीं - इसको आप जाँचिए। यदि संभव है तो हम क्या प्रमाणित हो पाते हैं या नहीं - इसको सोचा जा सकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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