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Wednesday, March 19, 2025

श्राप, ताप, और पाप से मुक्ति

मनुष्य जब जागृति की ओर उन्मुख होता है, तो वह श्राप, ताप, और पाप तीनो से मुक्त हो जाता है।  जागृति की ओर उन्मुख होना = मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) की ओर कदम बढ़ाना।  हमारा पूर्वाभ्यास या आदतें ही ताप है.  ताप मतलब जल जाना.  हमारे पूर्वाभ्यास से ही हम तप्त हैं.  पाप वह है जो हम अव्यवस्था की ओर किये रहते हैं.  अपराध करने के लिए जितने भी कामनाएं हैं - वे श्राप हैं.  कितने लोग इस तरह श्राप, ताप, पाप से ग्रस्त हैं - आप ही गिन लो!  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

Sunday, January 5, 2025

प्रतिफल, पारितोष, पुरस्कार

अभी कुकर्मों के लिए पारितोष और पुरस्कार दिया जाता है.  मानव चेतना विधि से उपकार का पुरस्कार और पारितोष होता है.  उपकार का प्रतिफल नहीं होता.  प्रतिफल श्रम नियोजन का ही होता है.

ज्ञान-विवेक-विज्ञान सम्बन्धी बातों का कामना या सम्मान ही किया जा सकता है.  कामना के साथ हम जो खुशहाली से देते हैं - वह पारितोष है.  सम्मान योग्य कार्य होने पर हम जो देते हैं - वह पुरस्कार है.  जैसे बच्चों को शुभकामना के साथ जो देते हैं - वह पारितोष है.  फिर जब प्रमाण होने पर उसका सम्मान किया - तो वह पुरस्कार है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)