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Monday, October 25, 2021

कान्ति - अनुभव प्रकाश

कान्ति अनुभव प्रकाश ही है.  जीवन में अनुभव प्रकाश ही कान्ति स्वरूप में काम करता है.  अनुभव का प्रतिबिम्बन बुद्धि पर, बुद्धि से चित्त पर, चित्त से वृत्ति पर, वृत्ति से मन पर, मन से व्यवहार पर होता है.  यही अनुभव प्रकाश और कान्ति का मतलब है.  


प्रश्न: आपने जो लिखा है, "जीवन प्रकाश में सम्पूर्ण रूप दिखते हैं."  - इससे क्या आशय है?


उत्तर: अनुभव प्रकाश में जब जीवन प्रकाशित होता है, उस प्रकाश में यह पता चलता है कि प्रत्येक वस्तु प्रकाशमान है.  अभी के विज्ञान के अनुसार बाहरी प्रकाश से (जैसे सूर्य के प्रकाश से) वस्तुएं प्रकाशित हैं.  ईश्वरवादियों के अनुसार, ईश्वरीय इच्छा से सब प्रकाशित है, यह बताया.  यहाँ कह रहे हैं - सबमे प्रकाशमानता है, यह जीवन जाग्रति सहज प्रकाश से स्पष्ट होता है.  ज्ञानगोचर विधि यही है.  


प्रश्न: 'कान्ति' की परावर्तन क्रिया को 'रूप' कहने का क्या आशय है?


उत्तर: कान्ति का परावर्तन पहले रूप पर होता है, फिर गुण पर, फिर स्वभाव पर, फिर धर्म पर होता है.  हरेक इकाई में रूप-गुण-स्वभाव-धर्म अविभाज्य होता है, इसीलिये कान्ति की परावर्तन क्रिया को 'रूप' कह दिया.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Tuesday, October 19, 2021

सदुपयोग से शुरू करते हैं, श्रम से उपार्जन तक पहुँचते हैं

 समझदारी के प्रस्ताव की जांच जीने में ही होती है.  जिए बिना जांचने में मज़ा तो आता है, पर समझ नहीं आता!  जीने में जांचने में गंभीरता से सोचना बनता है.  जीने में जांचने से समझदारी को पूरा करने में आपको देरी नहीं लगेगी.  


जीने में जांचने के लिए स्वावलंबन का डिजाईन चाहिए, और उसके अनुसार lifestyle बदलने की बात जुड़ी है.  यह करने में आपको कोई संकट न हो, इसको आप अच्छे से सुनिश्चित करो.  किसी को संकटग्रस्त बनाने का हमारा इरादा नहीं है.  स्वयंस्वीकृत विधि से, स्वयंस्फूर्त विधि से ही हम पार पा सकते हैं.


साधना के लिए हर हालत को झेलने के लिए मेरी मानसिक तैयारी थी, इसलिए हमको संकट हुआ ही नहीं.  हालात परास्त हो गए, पर हम परास्त नहीं हुए.  ऐसे सबकुछ झेल जाने का यह मनोबल सभी में तैयार हो जाएगा, इस पर मेरा विश्वास नहीं है.  किसी में भी वह साहस नहीं होगा - ऐसा मैं नहीं कहता हूँ.  पर सबमे ऐसा साहस नहीं है.  मैं जितना झेला, उतना सबको झेलना पड़े तो वह common model भी नहीं होगा.  


छोड़ने-पकड़ने की बात मैं नहीं कर रहा हूँ.  समझने की बात कर रहा हूँ.  समझने के बाद छोड़ना-पकड़ना आप स्वयं तय करो.  समझाने के लिए मैं तैयार बैठा हूँ.  मैं जब साधना के लिए निकला तो यह आश्वासन मेरे पास नहीं था.  भक्ति-विरक्ति विधि में जो पास है, सबको लुटाकर आगे बढ़ने की बात होती है.  अब इस अनुसन्धान को अपना स्वत्व बनाने के लिए सब कुछ लुटा कर बढ़ने की बात नहीं है.  जो हम प्राप्त किये हैं, उसको सदुपयोग में लगा कर बढ़ते हैं, फिर थोडा सा परिश्रम से जीना बन जाता है.  इतने को हर व्यक्ति कर सकता है.  समाधान-समृद्धि पूर्वक जी कर अपनी उपयोगिता सिद्ध करना - लक्ष्य वही है.  इसमें छोड़ने-पकड़ने की बात नहीं है.  सदुपयोग से शुरू करते हैं, श्रम से उपार्जन तक पहुँचते हैं.


-श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Monday, October 18, 2021

स्वयंस्फूर्त विधि से ही सर्वशुभ का कार्यक्रम चल सकता है.

मानव को विधिवत अर्थोपार्जन भी करना चाहिए और विधिवत अर्थ का सदुपयोग भी करना चाहिए.


आज की स्थिति में विधिवत अर्थोपार्जन का स्वरूप परम्परा में है ही नहीं.  लेकिन आज की स्थिति में आप उचित/अनुचित जैसे भी अर्थोपार्जन किये, उसको सदुपयोग करना आपके अधिकार में है.  आगे चल के विधिवत उपार्जन की बात भी सोचा जाए, किया जाए.  दोनों को एक साथ नहीं कर सकते, इसलिए यह मध्यम मार्ग निकल गया.  प्राप्त अर्थ का दुरूपयोग के स्थान पर आप सदुपयोग कर सकते हैं.  परिवार के जो आपके दायित्व हैं, उनको पूरा करते हुए घायल विहीन विधि से हमे चलना है.  इसमें परिवार में किसी बच्चे, बूढ़े, पत्नी, पति की उपेक्षा की बात कहीं आता ही नहीं है.  सर्वसम्मति से पूरे परिवार की सम्मति से ही गति है.  परिवार की ही सहमति न हो तो गति कहाँ है?  नारी को पीछे छोड़ के जो राजा बनने निकले, वो सब कचड़ा हो गए.  यह काफी सोचने का मुद्दा है.


जाग्रति के कार्यक्रम में कहीं भी घायल हो कर कोई काम नहीं करेगा.  स्वयं स्वीकृत विधि से, स्वयम स्फूर्त विधि से, स्वयं उत्साह विधि से हर व्यक्ति जाग्रति के कार्यक्रम को करेगा.  स्वयंस्फूर्त होने पर किसी से शिकायत करने का कोई आधार ही नहीं है.  मैं भी इसी विधि से चला हूँ, इसीलिये इतना ठोस विधि से मैं बात करता हूँ.  स्वयंस्फूर्त विधि से ही सर्वशुभ का कार्यक्रम चल सकता है.  लदाऊ-फंसाऊ विधि से सर्वशुभ हो ही नहीं सकता.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Sunday, October 3, 2021

निरंतरता अनुभव के साथ ही होगा


 

मानव शरीर चलाते हुए जीवन में कम से कम आशा, विचार, इच्छा या साढ़े चार क्रियाएं कार्यरत रहता है.  शरीर छोड़ने के बाद भी ऐसे जीवन की साढ़े चार क्रियाएं काम करता रहता है.  उसके बाद यदि उत्थान होता है तो दस क्रियाओं का क्रियाशील होना होता है.  जीवन के ये दो ही स्टेशन हैं - भ्रम और जाग्रति - उसके बीच में कुछ नहीं है.  शरीर यात्रा में जो आंशिक समझ में आया उसकी निरंतरता नहीं बनती.  निरंतरता अनुभव के साथ ही होगा.  


अनुभव संपन्न जीवन में शरीर छोड़ने के बाद भी अनुभव बना ही रहता है.  भ्रमित जीवन शरीर छोड़ने के बाद भी भ्रमित ही रहता है.  


प्रश्न: अनुभव संपन्न जीवन जब नयी शरीर यात्रा शुरू करता है, तब क्या होता है?


उत्तर: तब यदि जाग्रति की परम्परा होगी तो ऐसे जीवन को जल्दी समझ में आएगा, मेरे अनुसार.  यदि जाग्रति की परम्परा नहीं हो ऐसे जीवन को पुनः अनुसन्धान ही करना होगा.  यदि जाग्रति की परम्परा नहीं है तो अनुसन्धान पूर्वक उसको परम्परा में स्थापित करने का प्रवृत्ति बीज रूप में जीवन में रहता ही है.  जाग्रति की परम्परा होने के बाद माँ के गर्भ से ही, फिर जन्म से ही जीवन को ज्ञान का पोषण मिलना शुरू हो जाता है.  ऐसी स्थिति को हम पाना चाह रहे हैं.  इसी को हम सर्वशुभ कहते हैं.


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)

Saturday, October 2, 2021

पूर्ण - पूर्णता - सम्पूर्णता

 





ज्ञान सत्ता है.  ज्ञाता प्रकृति है.  

सहअस्तित्व में ज्ञान और ज्ञाता दोनों हैं.  

ज्ञान भी व्यापक है, सत्ता भी व्यापक है - इसलिए ज्ञान के आधार पर जो व्यवस्था होती है उसको प्रभुसत्ता (प्रबुद्धता पूर्ण सत्ता) कहा.  सम्पूर्ण प्रकृति व्यापक वस्तु में समाहित है, इसीलिये प्रकृति व्यवस्था स्वरूप में रहता है.  

व्यापक वस्तु स्थितिपूर्ण है, अशेष प्रकृति स्थितिशील है.  पूर्ण में गर्भित होने के कारण प्रकृति में पूर्णता के प्रकटन होने की बात है.  पूर्णता का स्वरूप है - गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता.  पूर्ण (सत्ता) का स्वरूप है - व्यापकता, पारगामीयता, पारदर्शीयता.  

पूर्णता प्रकृति में है, पूर्ण व्यापक है.  यह भेद समझ में आना चाहिए.  यह समझ में आने के बाद काफी सूत्र स्पष्ट हो जाते हैं.

पूर्ण में गर्भित होने का प्रयोजन सम्पूर्णता और पूर्णता है.  सम्पूर्णता भौतिक-रासायनिक प्रकृति में है.  पूर्णता चैतन्य प्रकृति (जीवन) में है.  पूर्ण में गर्भित होने से सम्पूर्णता और उसके बाद पूर्णता है.  बीज इतना ही है.  मेरे अनुसंधान का यही मूल मुद्दा है.  विकल्प होने का आधार यही है.  नहीं तो यह प्रस्ताव भौतिकवाद और आदर्शवाद से जुड़ा ही रहता.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)