प्रश्न: अस्तित्व में ज्यादा धरतियां समृद्ध हैं या कम धरतियां समृद्ध हैं?
उत्तर: कम धरतियां समृद्ध हैं.
प्रश्न: कुछ धरतियाँ आवेशित स्थिति में दिखती हैं. जैसे सूरज। वो कैसे उस स्थिति तक पहुंचे?
उत्तर: जहाँ जहाँ सूरज है, वहाँ आदमी ने बर्बाद करके सूरज बनाया है.
प्रश्न: क्या किन्हीं धरतियों पर मानव जागृत भी हैं?
उत्तर: कई धरतियों पर जागृत मानव हैं.
प्रश्न: यदि अस्तित्व अनंत है, जिसमें अनंत धरतियां हैं तो हमारी धरती से हर कोण पर किसी न किसी दूरी पर कोई धरती होनी चाहिए।
उत्तर: कोई न कोई पदार्थ होना चाहिए, वह रहता ही है.
प्रश्न: पर आँख से तो ऐसा दीखता नहीं है.
उत्तर: आँख से बहुत सीमित ही दीखता है. ज्ञान दृष्टि से पता चलता है, अनंत धरतियां हैं, बहुत सारी धरतियों पर मानव जागृत है. यहाँ भी जागृत होने का रास्ता आ गया है. है इसीलिये यहाँ आया, नहीं होता तो कहाँ से आता.
प्रश्न: इस धरती पर जितने जीवन परमाणु हैं, क्या वे इसी धरती के द्रव्य से बने हैं?
उत्तर: सभी धरती पर जीवन परमाणु तैयार होना है, ऐसा कोई नियम नहीं है. परमाणु का गठनपूर्ण होना किसी एक धरती पर होना पर्याप्त है. एक आधा तोला द्रव्य में असंख्य परमाणु होते हैं. उतना गठनपूर्ण परमाणु सारे संसार के लिए पर्याप्त हो जाते हैं.
प्रश्न: कोई धरती कब समृद्ध होगी, इसकी क्या कोई गति है?
उत्तर: यह मनुष्य का हविस है. नियति विधि से जीवन बनना होता है, धरती पर चारों अवस्थाओं का प्रकट होना होता है. इसमें जहाँ जहाँ मानव है, उसको सऊर से जीने की आवश्यकता है. यह आवश्यकता पूरा होने के लिए हमने प्रस्ताव प्रस्तुत किये। यदि इस धरती पर जागृति प्रमाणित होती है तो भविष्य में हो सकता है यहाँ से जागृत जीवन जिन धरतियों पर राक्षस मानव, पशु मानव रह रहे हैं, वहाँ पहुंचेंगे! यह बहुत साधारण बात है.
धरती के समृद्ध होना मानव के हाथ में नहीं है. मानव के हाथ में है - वह जीव चेतना में भी जी सकता है, मानव चेतना में भी जी सकता है, देव चेतना में भी जी सकता है, दिव्य चेतना में भी जी सकता है. क्योंकि मानव को कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता नियति प्रदत्त है.
प्रश्न: एक परमाणु के गठनपूर्ण होने के बाद उसकी क्या अग्रिम गति है?
उत्तर: पहले आशा बंधन में आएगा, फिर विचार बंधन में आएगा, फिर इच्छा बंधन में आएगा, फिर बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न करेगा। बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न चाहे आज कर लो, कल कर लो, या करोड़ वर्षों के बाद कर लो. इस धरती पर आदमी तीनों बंधनों से पीड़ित हो चुका है, पीड़ित करना हो चुका है. बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न होना शेष है. उसके लिए प्रस्ताव है. भौतिकवादी विधि से इसका कोई दवाई निकला नहीं, आदर्शवादी विधि से इसका कोई दवाई निकला नहीं - इसलिए विकल्प विधि को प्रस्तुत किया।
जीवों में जीवन के आशा बंधन के साथ जीने की बात रहती है. मानव में आशा बंधन, विचार बंधन और इच्छा बंधन ये तीनों हैं. इन तीनों बंधनों से मुक्ति के लिए इच्छा हो जाना जल्दी भी हो सकता है, देर से भी हो सकता है. धरती के बीमार होने के बाद समझदार होने की बाध्यता तो आती ही है। अभी भी समझदार होंगे या नहीं, इसको कौन बताएगा? मानव के सम्मुख एक प्रस्ताव आया है, इस आधार पर हम आशा कर रहे हैं कि मानव इसको अपनाएगा। हमारा सत्यापन तो यहीं तक है. इसीलिये कह रहे हैं जीजान लगाकर पूरी बात को वेबसाइट में रखा जाए.
श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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