धरती मानव के रहने के अनुकूल हुआ तब मानव का प्रकटन हुआ. मानव को अपनी परिभाषा के अनुसार मनः स्वस्थता की ओर जाना था, वह नहीं गया. मनाकार को साकार करने से मनः स्वस्थता हो जाएगा, ऐसा सोचा - पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। इसका विरोध भी हुआ, उसको कोई माना नहीं। विरोध को मानने से कोई प्रवृत्ति बनता नहीं है.
प्रश्न: मनः स्वस्थता के अभाव में यह तो होना ही था, इसलिए हो गया. क्या ऐसा सोचना सही है?
उत्तर: यह होना था या नहीं होना था - इसको हम आज तय नहीं कर पाते हैं. धरती यदि अपने को सुधार लिया तो कहेंगे यह होना था इसलिए हो गया. यदि धरती अपने को नहीं सुधार पाया तो यही कहेंगे - आदमी नहीं होने वाली बात को कर लिया, दुर्घटना ग्रस्त हो गया। सच्चाई तो इतना ही है.
प्रश्न: किसी भी धरती पर जागृति क्रम के बाद ही जागृति आ सकती है, और जागृति क्रम में मानव गलती करता ही है. ऐसे सोचने में क्या दिक्क्त है?
उत्तर: इसको हम कैसे कहें? दोनों हो सकता है - सीधा-सीधा पहुंचे हों, या गलती कर-करके पहुंचे हों. हम अपनी भड़ास के मारे ऐसा कहते हैं, क्योंकि हम ऐसे हैं. मानव परिभाषा के अनुसार मनाकार को साकार करना और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करना होता है. जिसमें से कहीं पहले मनः स्वस्थता के लिए प्रयत्न हुआ हो सकता है. जैसे इसी धरती पर आदर्शवाद मनः स्वस्थता के लिए पहले प्रयत्न किया, वो रहस्यमय होने के कारण प्रमाणित नहीं हुआ. ज्ञान के बारे में जिज्ञासा आदर्शवादियों ने पैदा किया। यदि वे सफल हो जाते तो यह दुर्घटना काहे को होती? धरती घायल होने वाली बात क्यों होती? ज्ञान को लेकर परिकल्पना जंगल युग से है. ऋषिकुल जंगल युग की है.
कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता हर मानव के पास है ही. इसमें दोनों साथ-साथ विकसित हो सकता है या एक पहले विकसित हो, दूसरा बाद में हो - यह हो सकता है. इस धरती पर मानव ने पहले कर्म स्वतंत्रता की तृप्ति के लिए कल्पनाशीलता का प्रयोग किया, जिससे मनाकार को साकार करना हो गया किन्तु मनःस्वस्थता का भाग वीरान रहा। मनः स्वस्थता की ओर गया तो पता चला मनाकार को साकार करते करते धरती ही बीमार हो गयी. अब दूसरे धरती पर जाने की शेखचिल्ली बातें करते हैं.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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