आदर्शवाद के इतिहास में मतभेद तो बहुत हुए हैं. पहले अद्वैत विचार में “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या”, “एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति” के ऊपर बहुत सारा रचनात्मक रूप से कहा गया. उसके बाद आया - ब्रह्म सत्य, देवता भी सत्य। देवताओं में भी जीव जगत को पैदा करने, बनाये रखने और संहार करने की शक्ति है. तब ब्रह्मा विष्णु महेश - तीन देवता आ गए. इससे उपासना तंत्र शुरू हुए. वेद विहित था उपासना। पहले विष्णु आगम तंत्र आया, फिर शिव आगम तंत्र, फिर बताया ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों शक्ति के अधीन हैं - इस आधार पर शाक्त आगम तंत्र आया. ऋषिकुल से गुरुकुल आने के क्रम में इनके मतभेदों से काफी परेशान हुए हैं. ऋषिकुल से गुरुकुल, गुरुकुल से कुलगुरूकुल, कुलगुरुकुल से आचार्यकुल। अभी धर्म गद्दियां आचार्य कुल विधि से हैं. आचार्य कुल के आने के बाद भी परिवार में कोई कुलगुरु होता ही रहा. विज्ञान के सम्मुख ये तर्क की कसौटी में ये टिक नहीं पा रहे हैं. धीरे धीरे कुलगुरु परम्परा समाप्त होता जा रहा है, जिसको परिवार में नैतिक शिक्षा का आधार माने थे. शिक्षा संस्थानों में मानव के शिक्षा की बात भौतिकवादी विधि से विज्ञान विधि से शुरू हुई. होते होते विज्ञान विधि धरती को ही ले डूबा। इस ढंग से मानव इस धरती पर रहने योग्य नहीं हुआ. एक तरफ आदर्शवाद में मतभेद, दूसरी तरफ भौतिकवाद में अपराध। भौतिकवादी विधि से अपराध करने की छूट रही, आदर्शवादी विधि में मतभेद से कलह करने की व्यवस्था बना. मतभेदों के आधार पर ही अनेक धर्म गद्दियां स्थापित हुई, अनेक समुदाय हुए. मतभेद के आधार पर विरोधाभास रहा ही. इन विरोधों को बंद करने के लिए राजा आया. राजा को नियंत्रित करने के लिए धर्म गद्दी बैठा। इस ढंग से धर्म गद्दी के पास रोटी खाने की व्यवस्था बन गयी. अच्छा होने के लिए सोचा था, लेकिन अच्छा हुआ नहीं। अब उजागर करने का मुद्दा यही है - ये सारे अच्छा चाहते हुए धरती के बीमार होने की जगह पहुँच गए. तब पता चला कि अभी तक अपराध विधि से चले हैं. इसीलिये पुनर्विचार के लिए विकल्प प्रस्तुत है. पुनर्विचार करना हो तो ठीक, नहीं करना हो तो ठीक. विकल्प को प्रस्तुत करने का यही विधि है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)
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