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Saturday, September 30, 2017

समय. काल, वर्तमान



प्रश्न:  "समय" या "काल" वास्तव में क्या है?  एक तो हम घड़ी में जो टाइम देखते हैं उसको हम समय कहते हैं.  शास्त्रों में काल भगवान के बारे में लिखा है. इसकी वास्तविकता क्या है?

उत्तर:  काल को पहचानने की अभीप्सा मानव में रहा ही है.  काल सही मायनों में नित्य वर्तमान स्वरूपी अस्तित्व ही है.  क्रिया की अवधि में काल-खंड की पहचान है.  शास्त्रों में जो लिखा है "कालो जगत भक्षकः" - ऐसा कुछ नहीं है.

प्रश्न:  काल-खंड की पहचान मनुष्य द्वारा कैसे की गयी?

उत्तर:  मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए काल-खण्डों को पहचाना.  दूसरे ज्योतिषियों को काल-खंड को पहचानने की आवश्यकता निर्मित हुई.  ज्योतिषियों ने क्रिया की अवधि को 'काल' के रूप में पहचाना.  अर्ध-सूर्योदय से अर्ध-सूर्योदय तक धरती की (घूर्णन) क्रिया को उन्होंने 'एक दिन' नाम दिया.  'उदयात उदयम दिनम' - यह लिखा.  फिर एक दिन को २४ घंटों में भाग किया, एक घंटे को ६० मिनट भाग किया, एक मिनट को ६० सेकंड भाग किया, इस तरह ले गए.  किन्तु 'दिन' की परिकल्पना को उन्होंने बनाए रखा.

विज्ञान आने पर उन्होंने काल की परिकल्पना को धरती की क्रिया से अलग कर दिया.  काल-खंड का विभाजन करते चले गए, विखंडित करते करते कालखंड को इतना छोटा कर दिया कि वर्तमान है ही नहीं बता दिया.  काल को गणितीय संख्या मान लिया.  इस तरह गणितीय विधि से वर्तमान को शून्य कर दिया.  जबकि अस्तित्व वर्तमान ही है.

प्रश्न:  काल या वर्तमान का क्या स्वरूप है?

उत्तर:  काल को पहचानने के लिए वर्तमान को पहचानना होगा.  मात्रा और क्रिया के संयुक्त रूप में वर्तमान है.  वर्तने के मूल में मात्रा होता ही है.  वर्तना = स्थिति-गति.  हरेक मात्रा के साथ स्थिति-गति बनी रहती है.  चाहे इकाई का कितना भी परिवर्तन हो, परिणाम हो, विकास हो या ह्रास हो - इकाई की स्थिति-गति बनी ही रहती है.  यह वर्तमान का स्वरूप है.  निरंतर मात्रा सहित स्थिति-गति में होना ही वर्तमान है.  कोई ऐसा मात्रा नहीं है जो स्थिति-गति के रूप में वर्तमान न हो.

प्रश्न:  काल-खंड की गणना की तो व्यवहारिक उपयोगिता है.  गणितीय विधि से काल को पहचानने में क्या परेशानी है?

उत्तर: यदि हम काल का आधार दिन से दिन तक मानते हैं, तो उसका आधार धरती की घूर्णन क्रिया है जो निरंतर है.  उसके बाद दिन के खंड-खंड करते करते छोटे से छोटे टुकड़े तक पहुँच जाते हैं, क्रिया को भूल जाते हैं और गणित को पकड़ लेते हैं तो वह वस्तुविहीन काल हो जाता है, वर्तमान नहीं रह जाता है. वस्तु विहीन काल को ही हम कहते हैं -  वर्तमान को शून्य कर दिया. इस तरह गणित के अनुसार चलते हुए हम वस्तु विहीन जगह में पहुँच जाते हैं.  इस तरह गणित कोई बहुत भारी सत्य की गणना करता है - ऐसा मेरा नहीं कहना है.  गणित वस्तुओं की गणना करने के लिए उपयुक्त है.  वांछित काल की गणना करने के लिए गणित उपयुक्त है.  एक दिन, दो दिन, दस दिन, १०० वर्ष... इस तरह की गणना गणित कर सकता है.  काल की गणना गणित नहीं कर सकता.  काल की परिकल्पना मानव के पास है.

यदि हम काल की गणना करना भी चाहें तो भी क्रिया तो निरंतर रहता ही है.  जैसे - यह धरती ठोस है.  दूसरा धरती ठोस नहीं है.  कालान्तर में वह ठोस होता है.  ठोस होने पर भी वह वर्तमान की रेखा में ही होता है.  वर्तमान की रेखा को छोड़ करके वह ठोस हो जाए - ऐसा कोई तरीका नहीं है.  वर्तमान अभी भी है, कल भी है, उसके आगे भी है.  वर्तमान की निरंतरता है.  इसी तरह सारे परिणाम वर्तमान की रेखा में ही हैं.  अस्तित्व न घटता है, न बढ़ता है - इस आधार पर वर्तमान निरंतर है.

प्रश्न:  रासायनिक-भौतिक परिणितियां होने से हमको विगत और भविष्य का भास होता है, इस तरह हम भूतकाल और भविष्य काल को पहचानते हैं.  क्या रासायनिक-भौतिक परिणितियां होने से वर्तमान में कोई अंतर नहीं आता?

उत्तर:  क्रियाएं परिणित हो कर दूसरी क्रियाओं के रूप में ही होते हैं.  परिणिति से मात्रा का अभाव नहीं हो जाता.  जैसे - लोहा परिणित हो कर मिट्टी हो गया, तो मिट्टी का वर्तमान है ही.  मिट्टी परिणित हो कर पत्थर हो गया, तो पत्थर का वर्तमान है ही.  पत्थर परिणित हो कर मणि हो गया, तो मणि का वर्तमान है ही.  मणि परिणित हो कर धातु हो गया, तो धातु का वर्तमान है ही.  वर्तमान कभी भी समाप्त नहीं होता.

एक समय ठोस रूप में वर्तमान है, दुसरे समय विरल रूप में वर्तमान है - वर्तमान कहाँ पीछे छुटा?  वर्तमान कहाँ पीछे छूट सकता है?  वस्तु का तिरोभाव होता ही नहीं है.  भौतिक संसार और रासायनिक संसार में परिणितियां होती ही हैं.  ये दोनों परिणामवादी हैं ही.  इसी परिणामवादी भौतिक-रासायनिक संसार को ही जड़ प्रकृति कहते हैं.

परिणित होने के बाद भी वस्तु दुसरे स्वरूप में कार्य करता ही रहता है.  कार्य मुक्ति वस्तु का कभी होता ही नहीं है.  मात्रा का वर्तने का काम नित्य है - परिणित हो या यथास्थिति में हो.  कई वस्तुएं लम्बे समय तक यथास्थिति में रहते हैं, तो कई शीघ्र परिणाम को भी प्राप्त कर लेते हैं.  इसी क्रम में जीवन अपरिणामी हो जाता है.  जीवन के साथ परिणाम का सम्बन्ध छूट जाता है.  जीवन में गुणात्मक विकास होता है, जबकि भौतिक-रासायनिक संसार में मात्रात्मक विकास और ह्रास होता है.  भौतिक-रासायनिक संसार में विकास और ह्रास की गणना को ही 'परिणाम' कहते हैं.

परिणाम को यदि हम काल का आधार बनाने जाते हैं तो हम फंस जाते हैं.  काल का कोई निश्चित स्वरूप उससे नहीं बनता.

प्रश्न:  परिणाम से मुक्त वस्तु को क्या "काल" को पहचानने का आधार बनाया जा सकता है?

उत्तर: जीवन परिणाम से मुक्त है.  मानव जीवन ही काल को नित्य वर्तमान स्वरूप में अनुभव करता है.  जीवन के लिए तो कालखंड होता नहीं है.  शरीर चलाओ या न चलाओ, जीवन तो रहता ही है.  जीवन में परिणितियां होती ही नहीं हैं, उसमे काल का बाधा होता नहीं है.  काल की बाधा से मुक्त होने के साथ-साथ और भी बहुत सी बाधाओं से जीवन मुक्त है.  रासायनिक-भौतिक रचना (शरीर) की पुष्टि या असहयोग की बाधा से भी जीवन मुक्त है.  शरीर को छोड़ करके भी जीवन रहता ही है.  जीवन शरीर के साथ भी वैसे ही रहता है, शरीर के बाद भी वैसे ही रहता है.  इस आधार पर जीवन की निरंतरता है ही.  जीवन में गुणात्मक परिवर्तन (चेतना विकास) की बात हम प्रस्तुत किये.  जीवों में जीवन के कुछ गुण प्रमाणित हुए, मनुष्य में कुछ गुण अभी तक प्रमाणित हुए, इसके आगे और गुणों को प्रमाणित होने की आवश्यकता है - जिसे हम 'जागृति' नाम दे रहे हैं.  जीवन की यथास्थिति जागृति की हो तो उसकी निरंतरता सुखद होगी, सुंदर होगी, सौभाग्यमय होगी - यह हम अपने अनुभव और परिकल्पना में जोड़ कर चल रहे हैं.

इस तरह काल की सही व्याख्या वर्तमान ही है.  हर परिणाम की यथास्थिति वर्तमान की रेखा में ही है.  इस तरह वर्तमान की निरंतरता को हम अच्छी तरह से स्वीकार सकते हैं.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी)


Thursday, September 28, 2017

इतिहास - मध्यस्थ दर्शन के दृष्टिकोण से



प्रश्न:  इतिहास के बारे में आपका क्या दृष्टिकोण है?  क्या इतिहास से हम कुछ सबक ले सकते हैं?  इतिहास का सही स्वरूप क्या है?

उत्तर:  अभी तक मानव परंपरा कैसा गुजरा, उसकी समीक्षा को स्मरण करने की विधि इतिहास है.  जो बीत चुका है उसको स्मरण में लाने की विधि इतिहास है.  इस इतिहास के अनेक आयाम हैं.  जैसे - आर्थिक विधा में हज़ार साल पहले मानव क्या समझा और किया?  राज्य को कैसे समझा?  हज़ार साल पहले किसको 'न्यायिक संविधान' समझा? उस समय अलंकार का क्या स्वरूप होता था?  कैसे नाचता रहा, गाता रहा, भाषा का प्रयोग करता रहा?

अभी इतिहास में केवल मार-काट किसने, कब और कैसे किया - यही याद करते हैं.  देवासुर संग्राम की कथाएँ तो शुरुआत से ही लिखी हैं.  वैदिक ऋचाओं में भी इनको बढ़िया से लिखा हुआ है.  किसने, कैसे, किसको मारा-काटा.  इससे हम क्या सीखें?  क्या समझें?  "मानव इतिहास" के लिए कोई प्रस्तुति यहाँ से मिलता नहीं है. 

मेरे अनुसार अभी तक "मानव" का इतिहास शुरू ही नहीं हुआ है.  सम्मानजनक भाषा प्रयोग करें तो यही कहना बनता है.  अमानवीयता के इतिहास को यदि आप मानव का इतिहास कहना चाहें तो हमको इसमें कोई तकलीफ नहीं है.  एक नारियल उसमे मैं भी चढ़ा दूंगा! 

मानवीयता का इतिहास इस धरती पर अभी तक शुरू नहीं हुआ है - यह तो बात सही है.  राक्षस मानव और पशु मानव के इतिहास को पढ़ करके कोई "मानव" तो होने वाला नहीं है.

अभी तक के घटना-क्रम से सार्थक यही है - उन्होंने मानव शरीर परंपरा को बनाए रखा.  अध्यात्मवाद ने हमको अच्छी भाषा/शब्दों को दिया, उसके लिए भी हम उनके कृतज्ञ हैं.  व्यापक कोई वस्तु होता है, यह सूचना दिया है.  देवी-देवता श्रेष्ठ होते हैं - यह सूचना दिया है.  तीसरे, मानव सदा से शुभ चाहते रहे - इसके लिए हम कृतज्ञ हैं.

प्रश्न:  तो क्या हम इतिहास को पढ़ाना बंद कर दें?

उत्तर:  नहीं, ऐसा कुछ नहीं कहा है मैंने.  हम पढ़ाएंगे - जंगल युग से पाषाण युग, पाषाण युग से धातु युग, धातु युग से कबीला युग, कबीला युग से ग्राम युग तक मानव किस बात को समझदारी (ज्ञान) मानता रहा?  उस समझदारी को आर्थिक आयाम में उसने कैसे प्रयोग किया?  मानव-मानव के बीच व्यवहार में कैसे प्रयोग किया?  जंगल-ज़मीन के साथ अपनी शक्तियों को कैसे उपयोग किया? और उसका परिणाम क्या निकला?  इसी के अंतर्गत राज्य, संस्कृति, कला, अलंकार आदि आ जाता है.  उसके बाद राज युग में क्या आश्वासन मिला, यह आश्वासन कितना सार्थक हुआ?  युद्ध और मार-काट को हम नहीं पढ़ायेंगे.  हम यह पढ़ाएंगे - जंगल युग से राज युग तक प्रगति की क्या कड़ियाँ बनी?  राक्षस मानव और पशु मानव के संघर्ष में मानव कैसा परेशान हुआ?  यहाँ से आज मानवीयता के इतिहास को शुरू करने तक कैसे आ गया?  यह हम पढ़ाएंगे.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी)

Wednesday, September 6, 2017

श्रम-गति-परिणाम




सत्ता मूल ताकत है.  जो सभी वस्तुओं में पारगामी है.  सत्ता में भीगे होने के आधार पर हर वस्तु बल संपन्न है और कार्यशील होने के लिए प्रवृत्त है.  कार्यशील होने के लिए वस्तु में आकर्षण और प्रत्याकर्षण का योग होना आवश्यक है.

परमाणु में क्रिया का मतलब ही श्रम-गति-परिणाम है.  श्रम-गति-परिणाम पूर्वक प्रत्येक परमाणु में आकर्षण-प्रत्याकर्षण के योगफल में उत्सव होता ही रहता है.  हर इकाई के अंग-अवयवों के बीच ऐसा आकर्षण-प्रत्याकर्षण होता ही रहता है.  जैसे - आपके शरीर में आँख के साथ हाथ, हाथ के साथ पाँव - इनके बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण पूर्वक ही उनकी कार्य गति है.  जबकि आपका शरीर एक ही है.  उसी तरह परमाणु एक ही है, पर उसमें श्रम, गति और परिणाम - ये तीनो उसकी क्रिया की व्याख़्या करते हैं.  श्रम और गति के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने पर कार्य-गति का स्वरूप (परिणाम) बनता है.  गति और परिणाम के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने से कार्य-गति का स्वरूप (श्रम) बनता है.  श्रम और परिणाम के बीच आकर्षण-प्रत्याकर्षण होने से कार्य-गति का स्वरूप (गति) बनता है.  क्रिया नित्य अभिव्यक्ति है, नित्य प्रकाशमान है - यह कहीं रुकता ही नहीं है.  इसकी रुकी हुई जगह को कहीं/कभी पहचाना नहीं जा सकता।  यह निरंतर है.  परस्परता में ही गति की बात है.  परस्परता नहीं तो गति की कोई बात ही नहीं हो सकती।  विकासशील परमाणुओं में कम से कम दो अंशों का गठन है, जिनमे आकर्षण-प्रत्याकर्षण और उसके फलन में कम्पनात्मक गति और वर्तुलात्मक गति बना ही रहता है.  कम्पनात्मक गति और वर्तुलात्मक गति परमाणु की कार्यशीलता का ही स्वरूप है.  हर परमाणु कार्यरत है - ऊर्जा सम्पन्नता वश, बल सम्पन्नता वश, चुम्बकीय बल सम्पन्नता वश.  परमाणु में क्रियाशीलता के लिए स्वयं में ही प्रेरणा-विधि और कार्य-विधि बनी है.   जड़ परमाणुओं में श्रमशीलता भी है, गतिशीलता भी है, परिणामशीलता भी है.  ये तीनो - श्रमशीलता, गतिशीलता, परिणामशीलता - एक दूसरे के लिए प्रेरक हैं.

मात्रा (इकाई) की पहचान क्रिया सहित ही है.  क्रिया के बिना मात्रा की पहचान नहीं है.  कुछ भी निष्क्रिय मात्रा आप नहीं पाओगे.  क्रिया का व्याख्या जड़ संसार में श्रम-गति-परिणाम है.  चैतन्य संसार में भ्रम और जागृति स्वरूप में क्रिया है.  श्रम, गति, परिणाम स्वरूप में जड़-क्रिया और भ्रम-जागृति स्वरूप में चैतन्य क्रिया है.  और कुछ होता नहीं।  इस अनंत संसार की सम्पूर्ण क्रिया मूलतः इतना ही है.

क्रिया ऊर्जा-सम्पन्नता वश है.  सत्ता ऊर्जा है.  सत्ता पारगामी है.  सत्ता को अवरोध करने वाली एक भी वस्तु नहीं है.  पहले इस सत्य को अपनी अवधारणा में लाओ.  क्रिया एक-एक इकाइयों के रूप में है.  एक-एक होने से आशय है, उसके सभी ओर सत्ता है.  प्रत्येक एक के सभी ओर सत्ता का होना ही 'सीमा' है.  हरेक एक सीमित रूप में रचित है.  इकाई के सभी ओर  सत्ता का होना ही उस इकाई की नियंत्रण रेखा है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी आश्रम, सितम्बर १९९९)