संयम में पहले मेरा स्वरूप समझ में आया. मैं समझने वाला हूँ - यह आ गया. मैं क्या चीज़ है? मैं एक परमाणु है, गठनपूर्ण है, इसमें इस इस प्रकार की क्रियाएं हो रही हैं, किस क्रिया से क्या स्पष्ट होता है - यह सब अध्ययन हो गया. इस आधार पर पूरे अस्तित्व को हम समझने योग्य हो गए. कुल मिला कर यही तो हुआ है. सर्वप्रथम मेरा ही अध्ययन मुझको हुआ. इससे पहले (आदर्शवाद में) बताते थे हम कोई समझने योग्य वस्तु नहीं हूँ, हमको समझ में आ गया कि हम ही तो सब समझने वाला हूँ. हमको परम्परा ने कैसा बना कर रखा था! Click point यही है कि मैं ही सब कुछ को समझने वाला हूँ. इसको अच्छी तरह से बैठा लेने पर बहुत कुछ काम बन जाता है. मैं अपना अध्ययन कर सकता हूँ, फलस्वरूप संसार का अध्ययन कर सकता हूँ. सहअस्तित्व विधि से ही मैं अध्ययन करता हूँ.
मैं समझने वाला हूँ. समझने की वस्तु अस्तित्व है. अस्तित्व सहअस्तित्व स्वरूपी है. सहअस्तित्व में सब कुछ अध्ययन है - यह निकल गया. अध्ययन के बारे में शुरू किये तो पाँच सूत्र में सब आ गया - लिखा हुआ! लिख कर आया, फिर एक एक चित्र आने लगा, जैसे - पदार्थावस्था मृद पाषाण मणि धातु के रूप में. लाखों मिट्टी, लाखों मणि, लाखों धातु की प्रजातियाँ देखी। इतनी प्रजातियाँ हैं उनके लिए कंप्यूटर को करोड़ वर्ष लगाओ - और बाकी ही रहेगा।
प्रश्न: लिखा हुआ आया - इससे क्या आशय है?
उत्तर: इसके बारे में हमारा सोच ऐसा है, भाषा भी कहीं न कहीं दौड़ते ही रहता है. भाषा कहीं मरा नहीं है. शब्द तो मरा नहीं है, यह तो आपको भी पता है. भाषा भी मरा नहीं है मेरे अनुसार। मैं जब संयम शुरू किया तो जो तीन चार भाषाएं मैं जानता हूँ, उसमें बहुत सारा बात सुनने में आती थी लेकिन दृश्य नहीं दिखता था. कई भाषाओ में आया, कुछ को मैं जानता रहा, कुछ को नहीं जानता रहा. उस स्थिति में ९०% साधक पागल हो सकता है. संयोग से मैं नहीं हुआ. मैं सोचता रहा मुझे कर्णनाद तो नहीं हो गया है, उसका मैं उपचार करता रहा. वो कर्णनाद नहीं था, लेकिन उन ध्वनियों का स्त्रोत मुझे दिखता नहीं रहा. करीब एक वर्ष तक यह चला. फिर उसके बाद दृश्य आया. पहला दृश्य आया - एक पत्थर सामने, वह धीरे धीरे पिघला, पिघल करके फैलता रहा फैलता रहा, उस जगह तक फैला जहाँ वह स्वचालित रूप में काम कर रहा है. स्वचालित रूप में प्रत्येक सूक्ष्म सूक्ष्मतम भाग सभी काम कर रहे हैं. इसको देखा। पता चला परमाणु है, स्वचालित है. एक दिन के पूरा समय में हुआ यह. एक moment में नहीं हुआ यह. होते होते पूरा दिन में १०-१२ घंटे यही रहा. शरीर अध्यास जब आया तब मुझे यह ज्ञान हुआ परमाणु का स्वरूप ऐसा है! कभी इच्छा होती थी, इसमें परमाणु कैसे काम कर रहे हैं, पुनः फिर वैसा ही प्रोसेस होता था, फिर दिख जाता था. यही कई बार रिपीट हुआ. सर्वप्रथम जो जीवन को देखा था, उसके साथ यह correlate हो गया, गठनपूर्ण होने के रूप में. भूखे परमाणु को देखा, अजीर्ण परमाणु को देखा, गठनपूर्ण परमाणु के रूप में जीवन को देख लिया। इन तीनों को देखने के बाद हमको बताने को समझाने को क्या चीज़ बचता है, आप बताओ! अस्तित्व में तीन ही प्रकार की क्रियाएं हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया और जीवन क्रिया। इसके अलावा चौथे प्रजाति की क्रिया ही नहीं है. इन तीन क्रियाओं के permutation combination में चार अवस्थाएं हैं, चार पद हैं. इतना ही अध्ययन की वस्तु है. यह अध्ययन होता है तो क्या करना चाहिए यह निकलता है, क्या नहीं करना चाहिए यह भी निकलता है. क्या है, यह भी निकलता है. कैसा है, यह भी निकलता है. कितना है, इसका उत्तर निकलता है - जितना मनुष्य को चाहिए, उससे ज्यादा है.
श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)
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