प्रमाणित करने के लिए अनुभव आवश्यक है। भाषा से समृद्ध रहना पर्याप्त नहीं है। प्रमाणों से समृद्ध रहना आवश्यक है। श्रवण में तर्क-संगति है। समझ में आने पर प्रयोजन स्वीकार हुआ। फिर उसके आगे अनुभव है। अनुभव भाषा से बहुत ज्यादा है। अनुभव का प्रमाण प्रस्तुत करने जाते हैं, तो वह विपुल हो जाता है। कोई उसका अंत ही नहीं है। अनुभव में अस्तित्व स्पष्ट होता है, उसको प्रमाणित करने के क्रम में उसका विस्तार होता है।
पूरी बात अनुभव से पहले स्पष्ट नहीं होता, किसी व्यक्ति को नहीं होगा। अनुभव के लिए क्या समझना आवश्यक है, उसके लिए अनुभव किया हुआ व्यक्ति ही मार्गदर्शन करेगा। जो अध्ययन कर रहा है, वह अपने-आप से पता कर ले, कि अनुभव के लिए क्या समझना आवश्यक है - क्या आवश्यक नहीं है, ऐसा नहीं होता।
अनुभव के पहले कुछ भाग को हम 'मान' कर शुरू करते हैं। 'माने हुए को जानना' और 'जाने हुए को मानना' - इन दोनों के साथ हम पूरा पड़ते हैं। "सहअस्तित्व है" - इसको हम पहले 'मानते' हैं। फिर सहअस्तित्व क्यों है? और सहअस्तित्व कैसा है? - उसको फिर समझना है। समझने के बाद उसको प्रमाणित करना है। समझने और प्रमाणित करने के बीच अनुभव होता ही है। अनुभव को व्यव्हार में प्रमाणित करने पर समाधान मिलता ही है। समाधान प्रमाणित होने में ही है। केवल स्वयं में समझ लेने मात्र से समाधान नहीं है। प्रमाणित करने की प्रवृत्ति स्वयंस्फूर्त होती है। अनुभव होने के बाद उसको प्रमाणित किये बिना रहा ही नहीं जा सकता।
इस सारी प्रक्रिया में 'स्वयंस्फूर्त' के विरुद्ध जो कदम है - वह है, "मानना"। अभी तक जो पहले मान कर, समझ कर हम चले हैं, 'सहअस्तित्व को मानना' उससे भिन्न है - इसलिए उसमें श्रम लगता है। अध्ययन के लिए पहला चरण 'मानना' ही है। फिर थोडा सुनने के बाद, उसका महत्त्व थोडा समझ आने के बाद उसमें रूचि बनता है। रूचि बनने के बाद उसको स्वत्व बनाने के लिए हम स्वयम को लगाते हैं। स्वयं को लगाते हैं तो तदाकार होते हैं। तदाकार होने पर हम समझ जाते हैं। तद्रूप होने पर हम प्रमाणित होते हैं। तदाकार होते तक पुरुषार्थ है। उसके बाद परमार्थ है, जो स्वयंस्फूर्त होता है।
आदर्शवाद ने कहा - "बिरले व्यक्ति को, हज़ारों-लाखों में किसी एक व्यक्ति को अनुभव होगा।" जबकि यहाँ शुरुआत ही ऐसे किये हैं - "हर व्यक्ति को अनुभव होगा।" इस तरह पासा ही पलट गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
पूरी बात अनुभव से पहले स्पष्ट नहीं होता, किसी व्यक्ति को नहीं होगा। अनुभव के लिए क्या समझना आवश्यक है, उसके लिए अनुभव किया हुआ व्यक्ति ही मार्गदर्शन करेगा। जो अध्ययन कर रहा है, वह अपने-आप से पता कर ले, कि अनुभव के लिए क्या समझना आवश्यक है - क्या आवश्यक नहीं है, ऐसा नहीं होता।
अनुभव के पहले कुछ भाग को हम 'मान' कर शुरू करते हैं। 'माने हुए को जानना' और 'जाने हुए को मानना' - इन दोनों के साथ हम पूरा पड़ते हैं। "सहअस्तित्व है" - इसको हम पहले 'मानते' हैं। फिर सहअस्तित्व क्यों है? और सहअस्तित्व कैसा है? - उसको फिर समझना है। समझने के बाद उसको प्रमाणित करना है। समझने और प्रमाणित करने के बीच अनुभव होता ही है। अनुभव को व्यव्हार में प्रमाणित करने पर समाधान मिलता ही है। समाधान प्रमाणित होने में ही है। केवल स्वयं में समझ लेने मात्र से समाधान नहीं है। प्रमाणित करने की प्रवृत्ति स्वयंस्फूर्त होती है। अनुभव होने के बाद उसको प्रमाणित किये बिना रहा ही नहीं जा सकता।
इस सारी प्रक्रिया में 'स्वयंस्फूर्त' के विरुद्ध जो कदम है - वह है, "मानना"। अभी तक जो पहले मान कर, समझ कर हम चले हैं, 'सहअस्तित्व को मानना' उससे भिन्न है - इसलिए उसमें श्रम लगता है। अध्ययन के लिए पहला चरण 'मानना' ही है। फिर थोडा सुनने के बाद, उसका महत्त्व थोडा समझ आने के बाद उसमें रूचि बनता है। रूचि बनने के बाद उसको स्वत्व बनाने के लिए हम स्वयम को लगाते हैं। स्वयं को लगाते हैं तो तदाकार होते हैं। तदाकार होने पर हम समझ जाते हैं। तद्रूप होने पर हम प्रमाणित होते हैं। तदाकार होते तक पुरुषार्थ है। उसके बाद परमार्थ है, जो स्वयंस्फूर्त होता है।
आदर्शवाद ने कहा - "बिरले व्यक्ति को, हज़ारों-लाखों में किसी एक व्यक्ति को अनुभव होगा।" जबकि यहाँ शुरुआत ही ऐसे किये हैं - "हर व्यक्ति को अनुभव होगा।" इस तरह पासा ही पलट गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)