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Saturday, June 13, 2026

प्रकाश, प्रतिबिम्बन


 प्रतिबिम्बन में समय नहीं लगता।  ताप एक अलग चीज़ है.  प्रतिबिम्ब बिम्ब का होता है.  ताप गुण का है.  वस्तु में जो गुण फैला उसको हम ताप कह रहे हैं.  गुण प्रभावित होने में समय लगता है.  किन्तु प्रतिबिम्बन में समय की बात नहीं है.  प्रतिबिम्ब रहता ही है.  


प्रश्न: हम प्रकाश और प्रतिबिम्बन को समझना चाहते हैं.


उत्तर: बिम्ब का प्रतिबिम्ब होता है, उसका अनुबिम्ब होता है, उसका प्रत्यानुबिम्ब होता है.  जैसा - आपका प्रतिबिम्ब मुझ पर है.  मेरा प्रतिबिम्ब आपके प्रतिबिम्ब के साथ तीसरे व्यक्ति पर प्रतिबिंबित है.  वो आपका अनुबिम्ब कहलाया।  इससे आगे चौथे व्यक्ति पर आपका प्रत्यानुबिम्ब हुआ.  इस तरह प्रतिबिम्ब के पुंज बनके इकाइयां एक दूसरे पर प्रतिबिंबित हैं.  यह एक बहुत बढ़िया approach है.  यह यदि soothing way में present करें तो आदमी को पता चलेगा वो अभी तक क्या सोच रहा था, क्या पढ़ रहा था, जबकि वास्तविकता में ये है क्या चीज़!  


जैसे आप मुझ पर प्रतिबिंबित हो, तो केवल आप ही नहीं आप पर हज़ार और प्रतिबिम्बों के साथ आप मुझ पर प्रतिबिंबित हो.  मैं लाख प्रतिबिम्बों के साथ आप पर प्रतिबिंबित हूँ.  इस तरह का काम्प्लेक्स है यह.  जब जितना ज़रूरत है, एक दूसरे से समझ लेते हैं.  


जैसे - शंकराचार्य जी (चंद्रशेखर भारती जी) और रमण महृषि जी के कहने पर हम यहाँ पर आये.  उसमें हम सफल हो गए.  वहाँ से लेकर यहाँ तक उन दोनों का प्रतिबिम्ब कहीं ख़तम हुआ क्या?  उन दोनों के कथन से प्रभावित हो कर मैं आया, वह प्रभाव कहीं ख़तम हुआ?  वो ख़तम नहीं होता, infinite हो गया.  उस प्रतिबिम्ब के साथ ही मैं आपके साथ प्रतिबिंबित हूँ.  इस बीच में कितनी चीज मुझ पर प्रतिबिंबित हुआ होगा, वह कल्पनातीत है, असंख्य है.  उन सबके साथ मैं आपके ऊपर प्रतिबिंबित हूँ.  मुझको आप consider कर रहे हो.  Consider करके अस्तित्व में जो वस्तु बोध होना है, उस चैनल में हम बात कर रहे हैं.  वस्तु बोध होने के लिए आपको बताया - शब्द का अर्थ होता है, अर्थ के स्वरूप में अस्तित्व में वस्तु होता है, वो बोध होने से वस्तु बोध हुआ, उससे पहले शब्द बोध हुआ.  शब्द स्मरण में रहता है.  इसमें कहाँ से कहाँ तक कितना जवाब है, आप ही सोच लो!  Infinite है, सब जगह में वर्तमान है.  


हर वस्तु अपनी अर्हता के अनुसार प्रतिबिंबित है.  हर वस्तु के ऊपर अनेक वस्तुएं प्रतिबिंबित रहते हैं.  हर वस्तु जितनी वस्तुएं उस पर प्रतिबिंबित हैं, उनके समेत ही प्रतिबिंबित होती है.  इतने में पूरा पड़ जायेंगे। 


प्रतिबिम्ब का दूसरा नाम है - प्रकाशन।  वस्तु में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म अविभाज्य है.  प्रतिबिम्ब रूप का होता है.  किन्तु वस्तु में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म निहित रहता ही है.  पहचान जब करने जाते हैं तो इन चारों के साथ ही वस्तु का पहचान पूरा होता है.  अकेले रूप की पहचान करने से हम वस्तु की उपयोगिता को निर्णय कर नहीं पाते हैं.  गुण, स्वभाव, धर्म - ये भूत होते ही नहीं।  यदि इनकी पहचान हुई हो तो ये परम्परा में प्रवेश होते ही हैं.  गुण, स्वभाव, धर्म के आधार पर उपयोगिता की जो पहचान हुई, वो परम्परा में continue होती है.  जो उपयोगी नहीं है, वह drop हो जाता है.  आदिकाल से अभी तक जो उपयोगी है, वो continue हुआ है.  जो उपयोगी नहीं है, वह drop होता गया है. अभी भी मानव द्वारा कुछ चीजें drop होना शेष हैं - जैसे, अपना-पराया की दीवार।  अपना-पराया का दीवार drop होना मानव चेतना विधि से ही होगा, जीव चेतना विधि से होगा नहीं।  इसीलिये मानव चेतना विधि को introduce करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं.  मानव चेतना आने के बाद मानव चेतना परम्परा में निरंतर हो जाती है, जबकि जीव चेतना में से छन के जो उपयोगी है वो continue कर ही रहे हैं.  मानव चेतना से पूर्णतः continuation बन जाती है, शंकाएं समाप्त हो जाती हैं.  उससे अच्छा होने के लिए देव चेतना रखा ही है.  उससे भी अच्छा होने के लिए दिव्य चेतना रखा है.  प्रस्ताव के improvement की सम्भावना को रख कर के हम शुरू किये हैं.  अस्तित्व में models बने हुए हैं.  मैंने इन models को बनाया हो ऐसा नहीं है, मैंने इनको trace किया है.  


प्रतिबिम्ब और ताप में अंतर है.  प्रतिबिम्ब हर वस्तु तक पहुँचता है.  ताप परावर्तित हो कर कम होता  जाता है.  प्रतिबिम्ब यथावत रहता है.  दृष्टिपाट और दृग-बिंदु विधि से जो वस्तु जितना दूर होता है, वह उतना छोटा दिखाई देता है.  


प्रश्न: रंग क्या है?


उत्तर: रसायन से रंग है.  सफ़ेद वस्तु अलग रसायन है.  काला वस्तु अलग रसायन है.  प्रकाश में ये वस्तुएं हमको आँख से दिखता है.  प्रकाश के अभाव में न काला दिखता है न सफ़ेद दिखता है.  सूर्य का प्रकाश रंग को पैदा नहीं करता।  


श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)

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