प्रश्न: वस्तु बोध क्या है - इसको उदाहरण के साथ समझाइये।
उत्तर: हम शब्दों का उच्चारण करते हैं, भाषा का प्रयोग करते हैं, किताबों को पढ़ते हैं - इनको सुनने तक तो हम अच्छा बुरा मानते हैं. यहाँ तक हम पहुँचे हैं. शब्द से कोई वस्तु को इंगित कराया जाता है - चाहे वह वस्तु कोई कार्य-घटना हो, वस्तु-घटना हो, परिणाम-घटना हो, अस्तित्व में वो बना रहता है. वह समझ में आना वस्तु-बोध है. अर्थात शब्द के अर्थ से इंगित वस्तु अस्तित्व में पहचान लेना वस्तु-बोध है.
वस्तु का प्रतिबिम्ब सदा-सदा रहता ही है. वस्तु अपने रूप-गुण-स्वभाव-धर्म सहित प्रतिबिंबित है ही. इसलिए प्रतिबिम्ब में कोई गति नहीं होता. बिम्ब का प्रतिबिम्ब होता ही है. जैसे मैं कुछ बोल रहा हूँ. वह शब्द तो आप सुनते ही हो. उस शब्द का अर्थ आप पर प्रतिबिंबित है. इसीलिये आपको अर्थ समझ में आता है. जैसे मैंने “पानी” शब्द कहा. “पानी” शब्द पानी वस्तु नहीं है. लेकिन मेरे “पानी” कहने से आपको पानी वस्तु का बोध हो जाता है. इसी तरह, “धरती” कहते हैं - धरती का बोध हो जाता है. “हवा” कहते हैं, हवा का बोध हो जाता है. इसी प्रकार “समाधान” कहने से समाधान का बोध होना है, “ज्ञान” कहने से ज्ञान का बोध होना है, “विवेक” कहने से विवेक का बोध होना है, “विज्ञान” कहने से विज्ञान का बोध होना है, “न्याय” कहने से न्याय का बोध होना है, “सत्य” कहने से सत्य का बोध होना है. हम इसमें चूक जाते हैं.
सम्पूर्ण वस्तुएँ अस्तित्व में हैं. अस्तित्व में वस्तु-बोध कराने के लिए हम शब्द का प्रयोग करते हैं. शब्द के अर्थ में वस्तु इंगित होना होता है. अस्तित्व में जो कुछ भी वस्तु है वह हर मनुष्य पर प्रतिबिंबित है ही. व्यापक वस्तु आदमी पर प्रतिबिंबित है, आदमी में से आर पार है, आदमी के सभी ओर घिरा है, आदमी के परस्परता के बीच में रहता ही है. इस ढंग से व्यापक वस्तु को बोध कराना सुगम हो गया. व्यापक वस्तु में ही हर वस्तु क्रियाशील है, जिसको अध्ययन करके basic thesis develop किया। शाश्वत रूप में जो है ही, उसको संप्रेषणा योग्य बनाया। अस्तित्व व्यापक वस्तु में सम्पृक्त एक एक वस्तु के रूप में नित्य विद्यमान है, नित्य वर्तमान है, नित्य वैभव है. यह होने से सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व में है. नहीं है, उसका वस्तु बोध होता नहीं है. नहीं है, वाले शब्दों से वस्तु बोध नहीं करा सकते। जैसे - पैर में काँटा गड गया, उससे दर्द नहीं होना चाहिए। मनुष्य को समस्या नहीं चाहिए। कांटे का दर्द नहीं चाहिए तो जूता खोज लिया। समस्या नहीं चाहिए तो समाधान खोज लिया। अपना-पराया नहीं चाहिए तो मानव चेतना को ढूंढ लिया। इस प्रकार हमे पता चलता है, होने के रूप में ही सभी वस्तु का बोध है. न होने के रूप में कोई वस्तु का बोध नहीं होता. न होने वाला “घटना” हो सकता है. जैसे काँटा गड़ने से पीड़ित होना, समस्या से पीड़ित होना, अपना-पराया से पीड़ित होना - घटना के रूप में है. इनका उपाय खोजना मानव का काम है. ईश्वरवादी विधि से सोचते रहे, भगवान् आएंगे सबका उद्धार करेंगे। हमारे लोगों का उद्धार करेंगे, बाकी सबका नाश करेंगे! ईर्ष्या, द्वेष, समस्या, दुःख आदि योग संयोग से घटित होते हैं, अस्तित्व में ये होते नहीं हैं. इनका वस्तु बोध नहीं होता। मानव ही इस प्रकार की घटनाओं को घटित करने का आधार हुआ. मानव ने सारी समस्या जीव चेतना विधि से जीने के कारण किया। अब मानव चेतना विधि से जिया जाए. उसमें यदि परेशानी होती है तो देव चेतना को खोजा जाए. देव चेतना में परेशानी होती है तो दिव्य चेतना को खोजा जाए. आप लोग अत्याधुनिक संसार से जूझ के आये हो, क्या इसका कोई विरोध हो सकता है? इस प्रस्ताव का विरोध तो कहीं हो ही नहीं सकता।
इसी आधार पर मैंने अपना मुँह खोला। यह मानव का वस्तु है. अपने में हज़म करके जाना ठीक नहीं है, संसार के साथ धोखाधड़ी है. कम से कम हम तो धोखाधड़ी न करूँ! यहाँ से शुरू किये।
जीव चेतना से मानव ने बहुत सारी वस्तुओं का बोध किया है. अब मानव चेतना विधि से जिन वस्तुओं का बोध होना है, वो बोध हो जायेगी। बोध करा हुआ वस्तुएं ज्यादा हो गया है, बोध नहीं हुआ वस्तुएं कम हैं. जीवन के गुण, जीवन के कार्यकलाप, जीवन का लक्ष्य - उसको हमे पकड़ना है. दूसरा, अस्तित्व का लक्ष्य हमको पकड़ना है. ये दोनों पहचान में आने के बाद मानव का लक्ष्य और मानव चेतना का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है.
श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००६, अमरकंटक)
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