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Saturday, June 30, 2012

विकल्प का आधार


हज़ारों-लाखों वर्षों से अभी तक मानव द्वारा किये हुए कर्म को आंकलित करते हुए इसके विकल्प को खोजा गया है।

हज़ारों-लाखों  वर्षों से अब तक मानव ने जो कार्य किया उसके फल-परिणाम में धरती का बीमार होना मुझे समझ में आया।  हज़ारों-लाखों  वर्षों से मानव ने जो कार्य किया, उसका आंकलन है - मानव ने जीव-चेतना वश सारे अपराधों को किया या अपराधों के साथ सहमत रहा।  अपराधों के साथ सहमत रहने का उदाहरण है - अभी का हमारा संविधान।  इस संविधान के साथ सभी सहमत हैं, जो मूलतः कहता है - "गलती को गलती से रोको, युद्ध को युद्ध से रोको, अपराध को अपराध से रोको".  इन तीनो बातों के मूल में यह अपेक्षा (मान्यता) है - युद्ध से युद्ध रुकता है, अपराध से अपराध रुकता है, गलती से गलती रुकती है।  इसके बाद पूछा तो क्या ऐसे युद्ध रुकता है? अपराध रुकता है?  गलती रुकती है?  तो उत्तर मिला - नहीं।  हर देश की सीमाओं पर तैनात सेनायें या तो युद्द करेंगी या युद्ध के लिए तैयारी करेंगी।  इससे युद्ध रुका कहाँ?  दूसरे - न्याय पालिका ने अपराध से अपराध को रोकने को विधि माना है।  इसका मतलब है, एक आदमी को अपराध करने से रोकने के लिए दस व्यक्ति अपराध करना सीखें, तभी वे अपराध को रोक पायेंगे।  इस विधि से अपराध बढेगा या घटेगा?  इसी तरह गलती को गलती से रोकने से गलतियाँ बढ़ी हैं।  मानव के इन सारे कार्यों का फल-परिणाम धरती पर ही गुजरा , क्योंकि धरती पर ही तो मानव है।  

- श्री ए. नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)


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