“मैं समझा हूँ, जिया हूँ, प्रमाणित हूँ. हर व्यक्ति समझ सकता है, जी सकता है, प्रमाणित हो सकता है.” ऐसा मैंने कई जगह पर सत्यापन किया है.
समझने, जीने और प्रमाणित होने को लेकर हर व्यक्ति अपने अधिकार से ही सत्यापन करेगा। यदि ऐसा सत्यापन नहीं करना बनता है तो reference के साथ यही कहना बनेगा कि ऐसा किताब में लिखा है. दोनों में कितना अंतर हो गया? यदि जिम्मेदारी है तो सत्यापन ही होगा। जिम्मेदारी नहीं है तो सूचना ही होगा, reference ही होगा। जिम्मेदारी यही है - मैं जिया हूँ, आप जी सकते हैं, हर व्यक्ति जी सकता है. मैंने इसी जिम्मेदारी से सत्यापन किया है.
हर व्यक्ति में कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता प्रकृति प्रदत्त है. इसके आधार पर ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी तीनों समझ सकते हैं, जी सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं. जीना ही प्रमाण है.
मुझसे कई लोगों ने पूछा है - इससे आगे भी क्या कोई अवस्था होगा? भौतिकवादी विचार के अनुसार विकास कहीं रुकता नहीं है. मेरे अनुसार निर्भ्रमता से आगे कोई ज़रूरत नहीं बनती है, जरूरत पड़ेगा तो आगे चलके आप बता देना! हम काहे को रोकें? यहाँ तक हम स्पष्ट हैं, इसमें हमको संतुष्टि है, इस प्रकार की संतुष्टि आपको भी मिल सकती है. इसमें अतृप्ति की जगह नहीं है. अतृप्ति होगा तो पुनः शोध होगा। आप स्वयं शोध करो, अनुसन्धान करो! हम किसी के लिए दरवाजा बंद नहीं कर रहे हैं. अनुसन्धान होगा समाधि-संयम विधि से ही. अज्ञात को ज्ञात करना। संयम से अज्ञात ज्ञात होता है, इस बात को आपको बता दिया। कैसे संयम करना है - वह भी बता दिया। हमने कैसे संयम किया वह आपको बता दिया। पहले पतंजलि ने क्या बताया है, वह भी आपको बता दिया। पतंजलि ने संयम के बारे में जो बताया है, वह सिद्धि प्राप्त करने के लिए है, यह मुझको समझ में आया.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)
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