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Tuesday, March 24, 2026

भौतिक क्रिया के समृद्ध होने से आशय

प्रश्न: आपने लिखा है, भौतिक क्रिया के समृद्ध होने के उपरान्त यौगिक क्रिया में प्रवृत्त हुआ.  भौतिक क्रिया के समृद्ध होने से क्या आशय है?  


उत्तर: जितने प्रकार के परमाणु की प्रजातियाँ होना है, उनके प्रकट होने के उपरान्त यौगिक क्रिया में प्रवृत्त हुआ.  यही भौतिक क्रिया के समृद्ध होने का अर्थ है.  परमाणुओं की प्रजातियाँ, परमाणुओं से अणुओं की प्रजातियाँ, अणुओं की रचनायें ये सब इसमें शामिल हैं.  सभी मृद, पाषाण, मणि और धातु क समृद्ध होने के बाद ही यौगिक संसार है.  यौगिक विधि में सबसे पहले रसायन पानी का प्रकटन हुआ.  जिसमें एक जलने वाला है, एक जलाने वाला है - ये दोनों मिलकर प्यास बुझाने वाले हो गए.  धरती पर पानी खड़ा होता है. धरती अम्ल और क्षार पानी को देता है, जिससे अम्ल और क्षार के विभिन्न अनुपातों से विभिन्न रस-रसायनों का प्रकटन हुआ.  वही आगे चल करके पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व में परिणित होते हैं.  पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व के योगफल में अनेक परम्पराएं बनी.  पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व का योग ही बीज है.  


पहले प्राकृतिक विधि से बीज बनता है, फिर उसके बाद उसका परम्परा होता है.  हरेक आगे स्थिति के लिए बीज पीछे स्थिति में बना रहता है.  पदार्थावस्था में बीज रूप बनकर के प्राणावस्था में प्रकटन और परम्परा।  प्राणावस्था अपने में समृद्ध होकर के जीवावस्था का बीज तैयार करना, जीवावस्था प्रकट होना और परम्परा स्वरूप में स्थापित होना।  वैसे ही जीवावस्था में ज्ञानावस्था का बीज होना, ज्ञानावस्था प्रकट होना और परम्परा होना।  यह सब क्रम से हुआ है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

दर्शन के अंग्रेजी अनुवाद के लिये मार्गदर्शन

दर्शन के अंग्रेजी अनुवाद के लिए परम्परा के शब्दों को वापरना चाहिए, और उसकी परिभाषा कारण-गुण-गणित विधि से प्रतिपादित होना चाहिए।  यदि यह होता है तो सर्वशुभ होने का रास्ता बन पाता है.  यह नहीं होता है तो नहीं होगा.  इसमें अपने को धारारत करने की बात, आजीवन निष्ठा से काम करने की बात है.  एक दिन की बात नहीं है यह.  यह fictional program नहीं है.  यह परम्परा की विधि से है, आर्यश्रेय विधि से है, अनंत काल के लिए विधि से है.  इसमें कहीं रुकने की बात नहीं है, enrich होने की बात हो सकती है.  क्या enrich करना है?  कारण-गुण-गणित को संप्रेषणा में enrich करना है.  कुल मिला कर सम्पूर्ण अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन के लिए मूल कारण सहअस्तित्व ही है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

मनाकार को साकार करना और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करना

 धरती मानव के रहने के अनुकूल हुआ तब मानव का प्रकटन हुआ.  मानव को अपनी परिभाषा के अनुसार मनः स्वस्थता की ओर जाना था, वह नहीं गया.  मनाकार को साकार करने से मनः स्वस्थता हो जाएगा, ऐसा सोचा - पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।  इसका विरोध भी हुआ, उसको कोई माना नहीं।  विरोध को मानने से कोई प्रवृत्ति बनता नहीं है.  

प्रश्न: मनः स्वस्थता के अभाव में यह तो होना ही था, इसलिए हो गया.  क्या ऐसा सोचना सही है?

उत्तर: यह होना था या नहीं होना था - इसको हम आज तय नहीं कर पाते हैं.  धरती यदि अपने को सुधार लिया तो कहेंगे यह होना था इसलिए हो गया.  यदि धरती अपने को नहीं सुधार पाया तो यही कहेंगे - आदमी नहीं होने वाली बात को कर लिया, दुर्घटना ग्रस्त हो गया।  सच्चाई तो इतना ही है.  

प्रश्न: किसी भी धरती पर जागृति क्रम के बाद ही जागृति आ सकती है, और जागृति क्रम में मानव गलती करता ही है.  ऐसे सोचने में क्या दिक्कत है?

उत्तर: इसको हम कैसे कहें?  दोनों हो सकता है - सीधा-सीधा पहुंचे हों, या गलती कर-करके पहुंचे हों.  हम अपनी भड़ास के मारे ऐसा कहते हैं, क्योंकि हम ऐसे हैं.  मानव परिभाषा के अनुसार मनाकार को साकार करना और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करना होता है.  जिसमें से कहीं पहले मनः स्वस्थता के लिए प्रयत्न हुआ हो सकता है.  जैसे इसी धरती पर आदर्शवाद मनः स्वस्थता के लिए पहले प्रयत्न किया, वो रहस्यमय होने के कारण प्रमाणित नहीं हुआ.  ज्ञान के बारे में जिज्ञासा आदर्शवादियों ने पैदा किया।  यदि वे सफल हो जाते तो यह दुर्घटना काहे को होती?  धरती घायल होने वाली बात क्यों होती?  ज्ञान को लेकर परिकल्पना जंगल युग से है.  ऋषिकुल जंगल युग की है.  

कल्पनाशीलता कर्म-स्वतंत्रता हर मानव के पास है ही.  इसमें दोनों साथ-साथ विकसित हो सकता है या एक पहले विकसित हो, दूसरा बाद में हो - यह हो सकता है.  इस धरती पर मानव ने पहले कर्म स्वतंत्रता की तृप्ति के लिए कल्पनाशीलता का प्रयोग किया, जिससे मनाकार को साकार करना हो गया किन्तु मनःस्वस्थता का भाग वीरान रहा।  मनः स्वस्थता की ओर गया तो पता चला मनाकार को साकार करते करते धरती ही बीमार हो गयी.  अब दूसरे धरती पर जाने की शेखचिल्ली बातें करते हैं.   

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


प्रकाशमानता, प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब, प्रत्यानुबिम्ब

हर वस्तु प्रकाशमान है.  इसका प्रमाण है, वस्तुएं एक दूसरे को पहचानती हैं.  एक परमाणु अंश दूसरे परमाणु अंश को पहचानता है, इसीलिये परमाणु गठन होता है.  इसी प्रकार अनेक अंशों का पहचान भी एक दूसरे के साथ होती है.   इसी क्रम में एक परमाणु दूसरे परमाणु को पहचानता है.  इसका प्रमाण है - अणु.  एक अणु दूसरे अणु को पहचानता है.  इसका प्रमाण है - अणु रचित रचना।  यह धरती एक अणु रचित रचना है.  एक दूसरे के पहचानने के आधार पर प्रतिबिम्बन समझ में आता है. 


इसके बाद आता है, प्रत्येक वस्तु अनंत कोण संपन्न है.  इस आधार पर प्रत्येक कोण में स्थित पदार्थ एक दूसरे को पहचानते हैं.  या सभी ओर से वस्तु को पहचाना जाता है.  कोण हर वस्तु में समायी है.  अभी प्रचलित विज्ञान इसका उल्टा बताता है.  प्रचलित विज्ञान के अनुसार वस्तु में कोण नहीं समाया है, कोण बनाता है आदमी। 


इसके बाद आता है, अनुबिम्ब।  अनुबिम्ब का मतलब है - प्रतिबिम्ब का प्रतिबिम्ब।  प्रतिबिम्ब के आधार पर पहचान हुई, अनुबिम्ब के आधार पर प्रभाव पड़ा.   जैसे, आपका प्रतिबिम्ब मुझ पर है, आपकी पहचान को जो मैं समझा हूँ उसे मैं अपने बच्चों को समझा देता हूँ, यह मेरे बच्चों पर आपका अनुबिम्ब हुआ.  इस तरह एक वस्तु दूसरी वस्तु को प्रतिबिम्बन विधि से पहचानती है.  अनेक वस्तुएं एक वस्तु को अनुबिंबन विधि से पहचानती हैं.  यह पहचान सहअस्तित्व में होने-रहने के लिए होता है.  जैसे मैं आपको पहचानता हूँ, आपके साथ जीने के लिए.  अनुबिंबन विधि से अनेक व्यक्ति आपके साथ जीने के लिए आ जाते हैं.  मेरे साथ जीने के लिए पहले एक भी व्यक्ति नहीं था.  पहले कुछ व्यक्ति हुए, फिर बहुत सारे व्यक्ति हो गए - यह अनुबिंबन विधि से हुआ.  प्रतिबिम्ब और अनुबिम्ब भौतिक-रासायनिक वस्तु में है ही, सहअस्तित्व में रहने के लिए.  इसी आधार पर धरती पर रचना प्रवृत्ति सफल हुआ है.  धरती स्वयं एक रचना है - अनंत अणुओं परमाणुओं से बनी.  यह रचना प्रतिबिम्ब-अनुबिम्ब विधि से सार्थक हो गयी. 


प्रत्यानुबिम्ब है - अनुबिम्ब का प्रतिबिम्ब।  प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब और प्रत्यानुबिम्ब में वस्तु ट्रांसफर नहीं होता है, वस्तु का प्रभाव ट्रांसफर होता है.  प्रत्यानुबिम्ब विधि से वस्तु का प्रभाव क्षेत्र बन गया.  प्रत्यानुबिम्ब विधि से मानव परम्परा में लोकव्यापीकरण होता है, जो है - ज्ञान का प्रभाव।  जिनके साथ हम जीते हैं, उनपर हमारा प्रतिबिम्ब रहता ही है.  वो जिन जिन के साथ जीते हैं, उन पर हमारा अनुबिम्ब रहता ही है.  वो जिन जिन से सम्बन्ध में रहते हैं, उनके सीमा तक हमारा प्रभाव क्षेत्र रहता है.  मानव का प्रभाव क्षेत्र ज्ञान या समझदारी रूप में होता है.  समझदारी समान है - इस धरती पर हो या अन्य धरती पर हो.  समझदारी का धारक-वाहक मानव है.  इस ढंग से प्रतिबिम्ब, अनुबिम्ब और प्रत्यानुबिम्ब का प्रयोजन है - सहअस्तित्व में होना और रहना।    


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Friday, March 6, 2026

विज्ञानमय कोष

 प्रश्न:  “भ्रमित मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को प्रकाशित करते हुए, विज्ञानमय कोष के सक्रिय न होने के कारण, कर्म करते समय स्वतन्त्र और फल भोगते समय परतंत्र है.” - इसको समझाइये।

उत्तर:  शरीर मूलक विधि से मानव जीवन में चित्त का अधूरा भाग (चित्रण) काम करता रहता है, इसलिए ऐसा होता है.  यही जीव चेतना है.  जीव चेतना में विज्ञानमय कोष सक्रिय नहीं रहता है.  अनुभवमूलक विधि से ही विज्ञानमय कोष सक्रिय होता है, जो ज्ञान-विवेक-विज्ञान सम्पन्नता है.  आत्मा और बुद्धि में ही विज्ञानमय कोष है.  इनकी क्रियाशीलता से ही पूरा जीवन अनुभव को प्रमाणित कर पाता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)


Thursday, March 5, 2026

परम्परा विधि से अध्ययन

अर्थ समझ में आना साक्षात्कार है.  वस्तु वास्तविकता को व्यक्त करता है.  साक्षात्कार का मतलब है - वस्तु को होने और रहने के रूप में पहचानना।  अस्तित्व में सभी कुछ होने और रहने के स्वरूप में है.  एक के बाद एक वस्तु का क्रमिक रूप में साक्षात्कार होता है.  चारों अवस्थाओं का पूरा साक्षात्कार होता है, तो अनुभव होता ही है.  अध्ययन विधि में साक्षात्कार में ही जो समय लगना है वो लगता है.  

आत्मा में अनुभव करने की क्षमता रहता ही है.  इसके साक्षी में हम अध्ययन करते हैं.  अध्ययन कराने वाला अपने अनुभव की रौशनी में ही अध्ययन कराता हैं.  अध्ययन करने वाले के साथ “स्मरण” और “साक्षी” रहता है.  अध्ययन कराने वाले के साथ “प्रमाण” रहता है.  इस तरह परम्परा विधि से अध्ययन होता है.  इस विधि में अध्ययन करने वाला भी होगा, अध्ययन कराने वाला भी होगा।  किसी व्यक्ति को स्वीकारे बिना अध्ययन कैसे होगा?     


पहले साक्षात्कार का अवधारणा बोध होता है, जिसका संकल्प होता है.  इसका नाम है प्रतीति।  अर्थात, साक्षात्कार होने से प्रमाणित करना संभव है, यह प्रतीत होता है.  सहअस्तित्व में अनुभव होता है.  फिर अनुभव होने पर अनुभव का बोध होता है, जिससे संकल्प अब ऋतम्भरा हो गया.  ऋतम्भरा का मतलब - सत्य पूर्ण संकल्प।  अनुभव मूलक विधि से ही ऋतम्भरा आता है, उससे पहले आता नहीं है. अर्थात अब सत्य को प्रमाणित कर सकते हैं, या प्रमाणित करने की योग्यता आ गयी.   प्रमाणित करने की योग्यता के साथ चित्त में चिंतन होता है, उसके उपरान्त चित्रण, तुलन, विश्लेषण, आस्वादन, चयन क्रिया विधि से प्रमाणित होना हो जाता है.  चयन तो मानव परम्परा में ही होगा, चारों अवस्थाओं के साथ ही होगा।  प्रमाणित होने के क्रम में मूल्यों की अभिव्यक्ति है.  संबंधों का निर्वाह होने से मूल्यों का निर्वाह होता है.  संबंधों का निर्वाह नहीं हो पाना ही भ्रम है.  जीव चेतना में संबंधों का निर्वाह नहीं हो पाता है.  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Tuesday, March 3, 2026

जीने का common model

जंगल युग से ग्राम युग, ग्राम युग से राज युग, राज युग से विज्ञान युग तक इतना समय जो मानव धरती पर जिया, उसके करने से धरती बीमार हो गयी.  धरती बीमार होने पर आगे पीढ़ी कहाँ रहेगा?  इस अपराध से मुक्ति का उपाय खोजना होगा या नहीं?  भौतिकवादी विधि से इसका कोई उत्तर नहीं है, आदर्शवादी विधि से इसका कोई उत्तर नहीं है.  सहअस्तित्ववादी विधि से इसके लिए प्रस्ताव है.  

भौतिकवादी विधि से मानव के जीने का मॉडल निकला - सुविधा-संग्रह।  आदर्शवादी विधि से मानव के जीने का मॉडल निकला - भक्ति-विरक्ति।  अपने-पराये का दूरी भक्ति-विरक्ति बनाया ही है.  विरक्ति का पालन करने वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्तियों से दूर हो गया या नहीं?  सुविधा-संग्रह के चलते अमीरी-गरीबी की दूरियाँ हो गयी या नहीं?  ये दूरियाँ बने हुए कैसे सर्वमानव का जीने का common model बने, आप ही बताओ!  बल्कि इनके चलते धरती बीमार हो गयी. 

सहअस्तित्ववादी विधि से जीने का common model launch किया - समाधान-समृद्धि।  क्या इसको challenge किया जा सकता है?  इससे दूर भागा जा सकता है, इसको challenge किया नहीं जा सकता।  समाधान-समृद्धि पूर्वक हर परिवार जी सकता है.  समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि।  यह चाहिए या नहीं चाहिए?  

मानव अनादिकाल से शुभ चाह ही रहा है.  इस क्रम में मनाकार को साकार तो वह कर लिया, किन्तु मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने का पक्ष वीरान रहा है.  उसके लिए यह प्रस्ताव है.  मनः स्वस्थता को प्रमाणित किये बिना मानव के जीने का common model कैसे निकलेगा?  इससे पहले आदर्शवाद और भौतिकवाद मानव के जीने का common model नहीं निकाल पाया।  जीने का common model के लिए प्रयास किया जाए या नहीं किया जाए?  जीने के common model का प्रमाण मैं हूँ. यह आपको स्वीकार होता है तो आप में किसी कोने में जो जिम्मेदारी है, उसको निर्वाह किया जाए.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, March 2, 2026

परिवर्तन की सम्भावना

मध्यम वर्गीय कहलाने वाले जो intellects हैं, उन में यह कामना दिखती है कि और कुछ सटीक होना चाहिए, इनमे सत्य के प्रति अपेक्षा है।  अतः ये लोग पहले समझेंगे।  इसीलिये परिवर्तन की सम्भावना है, ऐसा मैं मानता हूँ.  जो निम्न वर्गीय कहलाने वाले अभाव ग्रस्त लोग हैं उनसे कुछ नहीं होगा, उच्च वर्गीय कहलाने वाले जो बहुत ज्यादा संग्रह-सुविधा में लिप्त हो गए हैं - उनसे भी कुछ नहीं होगा।  मध्यम वर्गीय लोग समझने के बाद निम्न वर्गीय लोग समझेंगे, उसके बाद उच्च वर्गीय लोग समझेंगे।

 - श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Sunday, March 1, 2026

सहीपन के लिए संकल्प

हर पीढ़ी का अगली पीढ़ी के साथ generation gap जो दिखता है, उसकी जरूरत है या नहीं?  generation gap की ज़रूरत महसूस होता है, तो जो चल रहा है उसी के साथ continue किया जाए.  generation gap का जरूरत महसूस नहीं होता है तो इस विकल्प को सोचा जाए.


इस विकल्प से समझदारी पूरा होता है या नहीं, यह जांचने का अधिकार आपके पास है.  


जहाँ कहीं भी आप हैं, उसमें श्रम से जी सकते हैं या नहीं - इसको तय करने में आप समर्थ हैं.


फिर हमारी जो अभी जिम्मेदारियां हैं - बच्चे हैं, बड़े हैं उनकी तरफ.  उसके लिए जो अभी तक हमने उपार्जित किया, वो पर्याप्त है या नहीं।  उसको आप judge कर सकते हैं.


इन चार बातों पर यदि आप निष्कर्ष निकाल लें तो आगे की बात सोच सकते हैं.  इनमें से कोई भी बात छोड़ करके आप भाग नहीं सकते।  


सहीपन के लिए यदि हम संकल्प करते हैं तो वह आराम से सफल हो जाता है.  इसके विपरीत आदर्शवाद में बताया गया था - श्रेयांसि बहु विघ्नानि भवन्ति महतामपि।  अर्थात, सहीपन के लिए तुम चलना चाहते हो, तो विध्न बहुत हैं.  मेरा सोचना इससे बिल्कुल विपरीत है.  श्रेय के लिए कोई काम करता है तो उसके लिए बहुत सहायता बन ही जाती है.  सहीपन के लिए आदमी प्रयत्न करने से कोई तकलीफ नहीं है, सभी सुखद है.  मेरे अनुभव के अनुसार ऐसा ही है.  सहीपन के लिए अवधारणा न होने से तकलीफ होती ही है.  मनमानी कुछ करेंगे तो विध्न होगा ही.   


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

जीव और मानव

 प्रश्न: जीव शरीरों को संचालित करने वाले जीवन और मनुष्य शरीर को संचालित करने वाले जीवन में क्या अंतर है?

उत्तर:  मनुष्य शरीर को चलाने वाला जीवन कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को व्यक्त करता है, जबकि जीव शरीर को चलाने वाला जीवन ऐसा नहीं करता।  मनुष्य शरीर में मेधस रचना ऐसी बनी है जिससे जीवन का कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता प्रकट होता है.  जीव शरीरों के मेधस तंत्र में यह व्यवस्था नहीं है.  बहुत से जीवों में मानव के संकेत ग्रहण करने का अधिकार रखा है, किन्तु अपनी कल्पनाशीलता-कर्मस्वतंत्रता उनमे कुछ नहीं है.  इससे जीव कर्म करते समय भी परतंत्र है, फल भोगते समय भी परतंत्र है.  मानव कर्म करते समय में स्वतन्त्र है, फल भोगते समय परतंत्र है.  इसके आगे मानव कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के तृप्ति बिंदु की खोज करता है.  जीवों में यह बात नहीं है.  उनका आचरण उनके वंश परंपरा के अनुसार ही रहता है.  मानव में ज्ञान के अनुसार आचरण करने का प्रावधान है.  यह अभी तक तय ही नहीं हो पाया।  कैसा आचरण होना चाहिए - इसको बताने वाले एक से बढ़ कर एक अहमता वाले संसार में बैठे हैं!  


मानव और देवमानव में ये अंतर है कि मानव minimum beautiful है, उससे अच्छा देवमानव है. उसके लिए प्रयत्न मानव में होती रहती है.  मानव द्वारा दिव्यमानव पद को प्राप्त करने के लिए देवमानव बीच में स्थिति है.  दिव्यमानव पद में पहुँचने के बाद पुनः वापस नहीं होता।  वह संक्रमण है.  इस तरह - गठन पूर्णता के साथ जीव चेतना की सीमा में जीना होता है.  मानव चेतना में जीने से क्रिया पूर्णता हो गयी.  दिव्य चेतना में पहुँचने के बाद आचरण पूर्णता हो गयी.  पूर्णता के ये तीन stages हैं.  मानव पद में जो आचरण निश्चित हो गया, वह आचरण देवमानव भी करेगा, दिव्यमानव भी करेगा।  मानवीयता पूर्ण आचरण इनमें यथावत बना रहता है.  इनमें अंतर केवल उपकार करने में होता है.  मानव जितना उपकार करता है उससे ज्यादा देव मानव उपकार करता है, पूर्ण रूप में दिव्य मानव उपकार करता है.  आचरण में तीनों समान हैं.  इसीलिए मानव पद को base माना है.  इसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता।  मानव का आचरण, स्वभाव और दृष्टि पूर्वक जीना संभव है या नहीं - इसको आप जाँचिए।  यदि संभव है तो हम क्या प्रमाणित हो पाते हैं या नहीं - इसको सोचा जा सकता है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)