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Thursday, January 27, 2011

अस्तित्व का स्वरूप

समाधि-संयम पूर्वक अस्तित्व का स्वरूप मुझे समझ में आया। अभी तक अस्तित्व के बारे में जो ब्रह्मवादी कहते रहे हैं - वैसा नहीं है अस्तित्व! ब्रह्मवादियों का कहना है - केवल ब्रह्म का ही अस्तित्व है, बाकी सब उसी से उत्पन्न होता है, और फिर उसी में विलय हो जाता है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है।

मूलतः व्यापक वस्तु है और एक-एक वस्तुएं हैं। एक-एक वस्तु जड़-प्रकृति में भी हैं - जिनको हम भौतिक-रासायनिक वस्तु भी कहते हैं। यह पदार्थ-अवस्था और प्राण-अवस्था हैं। दूसरे एक-एक वस्तु चैतन्य-प्रकृति में भी है - जिसको जीव-अवस्था और ज्ञान-अवस्था भी कहते हैं। जड़-चैतन्य जितनी भी एक-एक वस्तुएं हैं, वे व्यापक-वस्तु में समाई हुई हैं।

समाई हुई स्थिति का मैंने अनुभव किया - घिरा हुआ है, डूबा हुआ है, और भीगा हुआ है। इसको नाम दिया - 'सम्पृक्तता'। पूर्णता के अर्थ में डूबा, भीगा, घिरा होना = सम्पृक्तता। ऐसी स्थिति में मैंने पूरे संसार को देखा।

अस्तित्व सहअस्तित्व है। सहअस्तित्व नित्य प्रकटनशील है। कैसे प्रकट होता है? व्यापक वस्तु स्वयं में निरपेक्ष ऊर्जा स्वरूप में है। सभी अवस्थाओं को यह साम्य-ऊर्जा प्राप्त है। साम्य-ऊर्जा के आधार पर हरेक एक कार्य-ऊर्जा को पैदा करता है। हरेक एक ऊर्जा-संपन्न है, जिससे क्रियाशील होने के आधार पर कार्य-ऊर्जा को पैदा करता है। इस तरह पदार्थावस्था से लेकर प्राण-अवस्था, जीव-अवस्था, ज्ञान-अवस्था तक परमाणु रूप में क्रियाशीलता वश शब्द, ताप, और विद्युत् स्वरूप में कार्य-ऊर्जा निष्पन्न होती है। हरेक एक परमाणु ऐसी कार्य-ऊर्जा को तैयार करता है। परमाणु से ही अस्तित्व में मूल-व्यवस्था की शुरुआत है। परमाणु के पूर्व-रूप परमाणु-अंश में व्यवस्था नहीं है। परमाणु के पर-रूप (रचना) में भी मूल-व्यवस्था नहीं है, सम्मिलित व्यवस्था होती है।

ऐसे ही पदार्थ-अवस्था समृद्ध होने पर धरती जैसे बड़ी-बड़ी रचना पर यौगिक विधि से परमानुएं किसी अनुपात में मिल कर रसायन-संसार को शुरू करते हैं। रसायन-संसार में सर्व-प्रथम किसी भी धरती पर पानी तैयार होता है। पानी और धरती के संयोग से अनेक रचनाएँ तैयार होने लगते हैं - जिसे वनस्पति-संसार कहते हैं। वनस्पति-संसार मूलतः परमाणु ही हैं। ये पदार्थ-अवस्था से ही प्रकट हुए हैं। मिट्टी-पत्थर-मणि-धातु के रूप में न हो कर ये परमाणु जीवों और मनुष्यों के आहार स्वरूप में हो जाते हैं। प्राण-कोशा प्राण-अवस्था को मूल रूप है। प्राण-कोशायें गुणात्मक परिवर्तन को पा कर जीव-शरीरों की रचना करती हैं। जीवों का आहार पहले से ही प्राण-अवस्था के रूप में तैयार रहता है। अनेक जाति के जीव तैयार होने के बाद मानव-शरीर किसी न किसी जीव-शरीर से तैयार हुआ। अभी विज्ञानी मान रहे हैं केवल बन्दर से ही मानव-जाति की शुरुआत हुई। मेरे हिसाब से ऐसा नहीं है। भौगोलिक स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न जानवरों से मनुष्य-शरीर का निर्माण हुआ, जिसकी फिर परंपरा हुई।

हर मानव भी व्यापक वस्तु में डूबा-भीगा-घिरा है। मानव जीवन और शरीर का संयुक्त रूप है। जीवन शरीर को चलाता है। जीवन जब तक शरीर को चलाता है, तब तक जीता हुआ मानते हैं। जीवन जब शरीर को छोड़ देता है - तब हम मरा हुआ मान लेते हैं। हर मानव-संतान ज्ञान-अवस्था की उपज होते हुए भी 'ज्ञान' को स्वीकारा नहीं है। जीवन ज्ञान-संपन्न होने के लिए शरीर-यात्रा शुरू करता है। ज्ञान-संपन्न नहीं हो पाता है तो पीड़ित होता है। इसलिए इस पूरी बात की सूचना मानव-सम्मुख रखने की ज़रुरत है और उसका समाधान रखने की ज़रुरत है।

- श्रद्धेय नागराज जी के उदबोधन से (जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन - चकारसी २००८)


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