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Monday, January 10, 2011

आदर्शवाद का विकल्प




प्रश्न: भविष्य में जब मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद की परंपरा स्थापित होती है, तो क्या वैदिक-विचार के प्रति आस्था बना रहेगा या विलय हो जाएगा?

उत्तर: वैदिक-विचार में जो शुभकामना है, वो स्वीकार होगा। शुभकामना के अनुरूप जो शिक्षा मिलनी चाहिए, वह मिलेगा। इसमें किसको क्या तकलीफ है? शुभ को प्रमाणित करने का स्वरूप मध्यस्थ-दर्शन सहअस्तित्ववाद दिया है। यह किसी का विरोध नहीं है। विरोध करके हम आगे चल नहीं पायेंगे। मैंने किसी विरोधाभास को अपनाया नहीं है। यदि मेरी प्रस्तुति में कोई विरोधाभास है तो आप बताइये - मैं उसको ठीक कर दूंगा।

आदर्शवाद से हमे भाषा मिला। वे भी इसको "श्रुति" ही कहे हैं। भौतिकवाद से दूरसंचार मिला। ये दोनों (भाषा और दूर-संचार) मानव जाति के सटीक जीने के लिए asset हैं, ये liability नहीं हैं। इनको परंपरा में बनाए रखने की आवश्यकता है।

भाषा जो हमे आदर्शवाद से मिला वह 'धातु' के आधार पर ध्वनित था। यहाँ मैंने ध्वनि के आधार पर परिभाषा दे दिया। इसकी आवश्यकता है या नहीं? - इसको आप विद्वान लोग सोचें!

आदर्शवाद से जो हमको प्रेरणा मिला, और भौतिकवाद से जो हमको प्रेरणा मिला - उसका विकल्प है यह! यह प्रस्ताव आदर्शवाद और भौतिकवाद के लक्ष्य से सम्बंधित नहीं है। आदर्शवाद के लक्ष्य 'अस्तित्व विहीन मोक्ष' से सम्बंधित नहीं है। यहाँ 'अस्तित्व पूर्ण मोक्ष' की बात है। क्या चाहिए - आप ही सोच लो! हमको उससे कोई परेशानी नहीं है। 'अस्तित्व विहीन मोक्ष' चाहिए तो रहस्यात्मक अध्यात्मवाद के पास जाओ। आदर्शवाद रहस्य-मूलक होने से 'अस्तित्व पूर्ण मोक्ष' को बता नहीं पाया। 'अस्तित्व विहीन मोक्ष' से मनुष्य संतुष्ट हो नहीं सकता। रहस्य विधि से अध्ययन हो नहीं सकता। रहस्य-विधि से हम शुभकामना ही व्यक्त कर सकते हैं। वही आदर्शवाद किया। रहस्य-विधि से हम प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकते। शुभकामना तो बहुत व्यक्त किया है, उसके विरोध में भी किया है - फिर भी हम कहते हैं, शुभकामना व्यक्त किया है.  शुभकामना व्यक्त करने मात्र से प्रमाण कहाँ हुआ?  प्रमाण को प्रस्तुत करने के लिए मध्यस्थ दर्शन को विकल्प नाम दिया।  इसमें किस ज्ञानी को, किस विज्ञानी को, किस अज्ञानी को तकलीफ है?  अध्ययन करके देखो, प्रमाण होता है तो अपनाओगे, नहीं होता है तो नहीं अपनाओगे।  अभी प्रवेश करने के लिए इससे अच्छा क्या प्रस्तुति हो सकता है?  कोई चीज़ छोड़ करके भागने के लिए नहीं है यह.  यद्यपि हमारे पास अधिकार रखा है कि याज्ञवल्क्य जी, वशिष्ठ जी, विश्वामित्र जी, गौतम जी, व्यास जी - इन सबको मैं विश्लेषित कर सकता हूँ.  शंकराचार्य जी, रामानुजाचार्य जी, माधवाचार्य जी - इनको मैं विश्लेषित कर सकता हूँ.  गाँधी जी, विनोबा जी, जयप्रकाश नारायण जी - इन सभी को मैं विश्लेषित कर सकता हूँ.  इन ११ व्यक्तियों का मैंने नाम लिया, इन सबको मैं विश्लेषित कर सकता हूँ.  उसके बाद विज्ञानियों को भी मैं विश्लेषित कर सकता हूँ.  आदर्शवाद की समीक्षा कर दिया - रहस्य के कारण वे मानव को अस्तित्व पूर्ण मोक्ष को बता नहीं पाए.  अस्तित्व विहीन मोक्ष से मानव संतुष्ट हो नहीं सकता।  आदर्शवाद में ज्ञान को सर्वोच्च बताया। ज्ञान क्या है? पूछा तो बताया - ब्रह्म ही ज्ञान है। ब्रह्म क्या है? -पूछा तो बताया - दृष्टा, दृश्य, दर्शन ये तीनो ब्रह्म ही हैं। कार्य, कारण, कर्ता - ये तीनो ब्रह्म ही हैं। यदि केवल ब्रह्म ही है - तो आप-हम क्यों बने हैं? किस प्रयोजन के लिए आपका नाम अलग है, मेरा नाम अलग है - सबका नाम 'ब्रह्म' ही क्यों नहीं हुआ? वेदमूर्तियो की सभा में मैंने यह पूछा था.  रहस्य से हम पार नहीं पाए। आप पार पाते हों, तो बताते रहना। आप रहस्य से पार नहीं पाओगे - यह मैं क्यों कहूं? इसीलिये अपनी बात को विकल्प रूप में प्रस्तुत किया।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २०१०, अमरकंटक)

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