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Wednesday, November 14, 2012

"सही" और "गलत"

मानव परंपरा में ही "सही" और "गलत" की बात है।  मनुष्येत्तर संसार में कोई अपराध होता ही नहीं है , वे कोई "गलती" करते नहीं हैं।   मनुष्येत्तर संसार का सारा क्रियाकलाप "संतुलन" और "प्रगटन" के अर्थ में है।  मानव ने जीवों के सदृश मार-काट करके संतुलित होने का प्रयत्न किया, वह "गलत" हो गया।  

मानव चेतना "सही" है।  जीव चेतना "गलत" है।   जीव चेतना में कोई सुधार नहीं करना है।  जीव चेतना के स्थान पर मानव चेतना को आना है।  श्रेष्ठता की शुरुआत मानव चेतना से है।  मानव चेतना आने के बाद उससे अधिक श्रेष्ठ देव चेतना और दिव्य चेतना के लिए प्रयास है।  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)

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