प्रश्न: आपने बताया है - संयम काल में आपने कहीं-कहीं संस्कृत भाषा में लिखा हुआ भी देखा। यह कैसे?
उत्तर: संयम काल में घटना के रूप में देखा, उसका नाम भी देखा। कोई घटना होगा तो उसका नाम भी होगा ही. संयम काल में जो सच्चाई देखा, उसका नाम भी आ गया. यह जो लिपि आया वह चित्रण में आया.
प्रश्न: यह संस्कृत भाषा में ही क्यों आया? अन्य भाषा में क्यों नहीं आया?
उत्तर: अनेक भाषा में आया होगा। उसमे से एक भाषा हमको याद था, वो देख लिया।
प्रश्न: संयम के समय चित्त-वृत्ति काम करता है, या चुप रहता है?
उत्तर: संयम काल में मन से लेकर आत्मा तक पाँचों स्तर काम करता है. समाधि काल में मन, वृत्ति, चित्त चुप रहता है, बुद्धि-आत्मा तो पहले से ही चुप रहते हैं. संयम में सब खुल जाते हैं. पारंगत होने के बाद दसों काम करने लग जाते हैं.
समाधि तक पहुँचते तक नकारात्मक सब समाप्त हो गया था. उससे कुछ हुआ नहीं। सही बात को पाना शेष रहा. तभी तो हुआ.
प्रश्न: अभी हमारे पास पूर्व स्मृतियों से नकारात्मक भी आ जाता है, फिर कैसे होगा?
उत्तर: इसी लिए अध्ययन है. अध्ययन में सही बात को प्रस्तुत किया है.
प्रश्न: संयम काल में आपको बहुत सारी ध्वनियाँ सुनने को मिला, वह क्या था?
उत्तर: संयम होने की सम्भावना उदय होने पर, दसों क्रियाएं एकत्र होने के क्रम में, बहुत सारा ध्वनियाँ सुनने को मिला। उसके बाद स्पष्ट होना शुरू किया। समझने के क्रम में समय लगता ही है.
प्रश्न: ये ध्वनियाँ आपको चित्त में सुनाई दी या बुद्धि में?
उत्तर: ये ध्वनियाँ चित्त में ही सुनाई दी थी. बुद्धि में शब्द का अर्थ ही बनता है.
प्रश्न: हम लोगों के दसों क्रियाएं चालू होने के पहले कोई ध्वनियाँ सुनाई देंगी क्या?
उत्तर: नहीं। उसके पहले तर्क रहेगा। तर्क ख़त्म होगा तब अनुभव होगा। अध्ययन विधि में एक-एक मुद्दे पर तर्क ख़त्म होगा। एक मुद्दे पर तर्क ख़त्म हुआ तो दूसरे मुद्दे पर तर्क ख़त्म होने का आसरा बन जाता है. ऐसे चल के अध्ययन पूरा होता है. अध्ययन पूरा होना मतलब सहअस्तित्व अनुभव में आना, मतलब सत्ता में सम्पृक्त सम्पूर्ण प्रकृति अनुभव में आना. सम्पूर्ण प्रकृति विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति स्वरूप में समझ में आना. इतना समझ में आ गया तो अध्ययन हुआ. इतना ही देखा है मैंने। इसको स्पष्ट करने में इतना पोथी हो गया.
प्रश्न: आप जब संयम शुरू करते थे तो पहले क्या समाधि में पहुँच जाते थे?
उत्तर: पहले समाधि, उसके बाद ध्यान, उसके बाद धारणा। इस तरह चुप रहने से वस्तु के पास तक पहुँच गए. तब यथार्थ समझ में आ गया.
समाधि के बाद ध्यान में मेरी जिज्ञासा रुपी लक्ष्य आ गया. धारणा में वह जिज्ञासा ही विस्तृत हुआ. सत्य से मिथ्या कैसे पैदा हुआ? यही तो मूल प्रश्न था.
प्रश्न: संयम काल में क्या शरीर संवेदना का पता चलता है?
उत्तर: संयम में संवेदना रहता ही है, तभी संयम होता है. संयम काल में स्मृति में समाधि रहना चाहिए। स्मृति ही बोध में पहुँचता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २०११, अमरकंटक)
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